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पर्यावरण Class 6,7,8 यूपी बोर्ड | Menu
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पर्यावरण Paryavaran Class 6,7,8 UP Board यूपी बोर्ड

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पर्यावरण Book Class 6,7,8 Paryavaran Hamara Paryavaran UP Board

हमारा पर्यावरण

Paryavaran Hamara Paryavaran Textbook Class 6,7,8

UP Board Class 6, 7, 8 Paryavaran Notes Chapter 13 आपदाएँ एवं उनका प्रबंध

जब अचानक घटनाओं के कारण समाज प्रभावित होता है, जिससे समुदाय व स्थानीय संसाधनों को नुकसान पहुंचता है, तो हम स्थिति को ‘आपदा’ के रूप में कह सकते हैं।

आपदा दो प्रकार की होती हैं-
(i) प्राकृतिक आपदा
(ii) मानव निर्मित आपदा

प्राकृतिक आपदाएं
भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट, भूस्खलन, सुनामी, हिम्स्खलन, बाढ़, अत्यधिक तापमान या ऊष्म लहर, सूखा, दावानल, चक्रवात और तूफानी लहर, महामारी,

मानव निर्मित आपदा
बमों का विस्फोट, आग लगना, मिटटी का कटाव, महामारी, जनसंख्या विस्फोट, मानवजनित भूस्खलन, रसायन कारखानों से जहरीली गैसों का रिसाव

भूकम्प
भूकम्प का साधारण अर्थ है भूमि का काँपना अथवा पृथ्वी का हिलना। दूसरे शब्दों में अचानक झटके से प्रारम्भ हुए पृथ्वी के कम्पन को भूकम्प कहते हैं। भूकंप एक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। भूकंप एक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। जमीन मे दरारे पड़ने लगती है और यह धसने लगती है। धरातल पर दरार पड़ने से रेल लाइन मुड़ जाते है तथा सड़क , जल, तेल पाइप, पुल आदि प्रभावित हो जाती है।

पृथ्वी की प्लेटो मे असंतुलन पैदा होने से कई आपदाएँ उत्त्पन होती है –
(i) ज्वालामुखी विस्पफोट के कारण
(ii) महाद्वीपीय एवं महासागरीय प्लेटो के संचलन के कारण
(iii) भ्रंश एवं वलन द्वारा
(iv) मानव निर्मित जलाशयों के जल दाब द्वारा
(v) अणुबमो के विस्फोटो द्वारा

ज्वालामुखी
प्रायः एक गोलाकार छिद्र अथवा खुला हुआ भाग जिससे होकर पृथ्वी के अत्यंत तप्त भू-गर्भ से गैस, तरल लावा, जल एवं चट्टानों के टुकड़ों से युक्त गर्म पदार्थ पृथ्वी के धरातल पर प्रकट होते हैं, ज्वालामुखी कहलाता है।

ज्वालामुखी द्वारा मानव समाज मे होने वाली हानियाँ-
1. ज्वालामुखी की धूल और गैसें वातावरण को अपारदर्शी बना देती हैं जिससे वायु परिवहन मुश्किल हो जाता है, श्वसन रोग बढ़ जाता है और सूर्यातप को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से भी रोकता है ( यह पृथ्वी को ठंण्डा करता है )।
2. क्षेत्र में लावा का जमाव होने से वहा की जमीन को सरंध्र बनाती है जिससे क्षेत्र में पानी की कमी हो जाती है।
3. ज्वालामुखियों के अचानक फटने से मानव बस्ती, मानव जीवन और उसकी संपत्ति को नुकसान होता है।
4. जंगल नष्ट हो जाते है तथा जंगल मे रहने वाले पशु पक्षी जीव जंतु भी मर जाते है।

सुनामी
सुनामी शब्द जापानी भाषा के ‘सु’ तथा ‘नामी’ से लिया गया है जिसमें ‘सु’ का शाब्दिक अर्थ समुद्रतट या बंदरगाह और नामी का अर्थ तरंग या लहर से है। इस प्रकार सुनामी का अर्थ ‘बंदरगाह तरंग’ है। सुनामी, समुद्र तल में होने वाली आंतरिक उथल-पुथल का कारण है जिसमें महासागरीय लहरें समुद्र से उठकर आस-पास के क्षेत्रों को तबाह कर देती हैं। सुनामी एक बहुत विनाशकारी आपदा है जिसके प्रभाव से जन और धन दोनों की हानि होती है।

अल्लाह का बाँध
16 जून, सन 1819 मे गुजरात राज्य के कच्छ मे भयंकर भूकंप आया था। इस भूकंप के कारण अरब सागर मे जोरदार सुनामी लहरे उत्पन्न हुई। इससे उच्च सागरीय तरंग के कारण गुजरात का तटवर्ती भाग जलमग्न हो गया। समुद्र मे खरे जहाजों एवं नावों को भरी क्षति हुई। इस भूकंप के कारण 24 किमी की लम्बाई से स्थलीय भाग ुपत उठ गया। जल से घिरे लोग इसी ऊपर उठे स्थलीय भाग पर अपनी प्राण रक्षा हेतु शरण प्राप्त कर सके। इसी कारण इस स्थल को ‘अल्लाह का बाँध’ नाम दिया गया था।

चक्रवात तथा तूफान
चक्रवात की उत्पत्ति स्थलीय एवं समुदी दोनों भागो मे होती है। इसमें समुद्री चक्रवात सर्वाधिक शक्तिशाली, विध्वंसक, खतरनाक तथा प्राणघातक होते है। इन समुद्री चक्रवातों को विश्व के विभिन्न देशो मे विभिन्न नमो से जाने जाते है।

भूस्खलन
भू स्खलन से भी जनजीवन प्रभावित होता है। जब ऊँचे स्थानों से अधिक मात्रा मई मिटटी, चटटनों, वनस्पति आदि खिसक जाती कर निचले भाग मे जमा होती है ही उसे भू स्खलन कहते है।
जब कभी अत्यधिक वर्षा होती है या कई दिनों तक वर्षा होती है तो इसके प्रभाव से चट्टानें टूट कर नदी की घाटी मे गिर जाती है।

बाढ़
बाढ़ एक प्राकृतिक, अप्राकृतिकआपदा है जिस में अत्यधिक मात्रा में पानी एकत्र हो जाता है। बाढ़ का पानी तेज़ बहाव का या स्थिर भी हो सकता है। कभी कभार मानवीय भूल के कारण कोई बांध या तटबंध टूटने से भी बाढ़ जैसे हालात उत्पन्न हो जाते हैं, उसे अप्राकृतिक बाढ़ कहते हैं। भारतीय परिदृश्य में अत्यधिक लगातार मानसून के बारिश के कारण बांध या तटबंध टूटने से बाढ़ का पानी आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश करता है, जिसे प्राकृतिक बाढ़ भी कर सकते हैं। अगर बाढ़ का पानी स्थिर है तो वह इतना खतरनाक नहीं होता है। बाढ़ का पानी का तेज़ बहाव काफी खतरनाक होता है क्योंकि देखने में समान बहाव भी अच्छे तैराक की डूबा सकता है।

बाढ़ के कारण
(i) अत्यधिक बारिश का होना।
(ii) नगरीकरण विस्तार के कारण नदियों के किनारों का कम जो जाना।
(iii) चक्रवाती तूफान के कारण भी तटीय क्षेत्रो मे बाढ़ आती है।
(iv) हिम चोटियों का पिघलना।
(v) अधिक मृदा अपरदन के कारण नदी की गहराई का कम हो जाना और जल से प्राकृतिक बहाव मे अवरोध उत्पन्न होना।

मानवीय आपदाएं
मानव निर्मित आपदा वे आपदाएं हैं जिनका कारण मानवीय गतिविधियाँ होती हैं। भारत में हुई सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी मानव निर्मित आपदा का एक ज्वल्लंत उदाहरण है। मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति पर निर्भर रहता है। कुछ आपदा तो मानव मतभेद के कारण होती हैं जैसी आंतकवादी हमला तथा कुछ आपदा मानव लापरवाही के कारण होती हैं जैसै:-आग लगना सड़क दुर्घटना आदि हैं।

एड्स एक ज्वलंत मानवीय आपदा
एड्स शब्द अंग्रेजी भाषा AIDS के चार अक्षरों से मिलकर बना है। इसका अर्थ निम्नलिखित है –

एड्स HIV नाम के विषाणु से होता है। इस विषाणु से मानव के शरीर मे रोगो से लड़ने की क्षमता समाप्त हो जाती है। परिणामसवरुप रोगी को कई तरह के संक्रमण हो जाते है। तथा तरह तरह की बीमारियाँ हो जाती है।

एड्स का संक्रमण कैसे होता है
एड्स के वायरस एच.आई.वी. किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में मुख्य रूप से संभोग के दौरान वीर्य से, रोगग्रस्त व्यक्ति के खून से और ब्लड चढ़ाने के दौरान या नशे के लिए शिराओं में प्रयुक्त एक ही सिरिंज की निडिल की प्रयोग से पहुंच जाते हैं।

एड्स नहीं फैलता है
(i) लार एवं आँसू जैसे द्रवों से इसका संक्रमण नहीं होती है।
(ii) एड्स ग्रस्त व्यक्ति के दैनिक प्रयोग की वस्तुओ का उपयोग करने से जैसे – किताबे, पेन, मशीनों आदि।
(iii) खाँसने, छींकने, हवा से।
(iv) कीट पतंगों के काटने से, मक्खी, मछर, जूं आदि।

एड्स से बचाव के क्या उपाय है
इंजेक्शन हेतु विष्क्रमित साफ़ नई सुई का प्रयोग करना चाहिए।
नशीली दवाओं के इंजेक्शन नहीं लेने चाहिए। नशाखोरी से हमेशा दूर रहना चाहिए।

 

UP Board Class 6, 7, 8 Paryavaran Notes Chapter 12 ऊर्जा के स्रोत एवं सतत विकास

किसी भी कार्यकर्ता के कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा (Energy) कहते हैं। ऊँचाई से गिरते हुए जल में ऊर्जा है क्योंकि उससे एक पहिये को घुमाया जा सकता है जिससे बिजली पैदा की जा सकती है। ऊर्जा की सरल परिभाषा देना कठिन है। ऊर्जा वस्तु नहीं है।

ऊर्जा के स्रोत

नव्यकरणीय स्रोत

यह ऐसी ऊर्जा है जो प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करती है। इसमें सौर ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, पवन, ज्वार, जल और बायोमास के विभिन्न प्रकारों को शामिल किया जाता है। उल्लेखनीय है कि यह कभी भी समाप्त नहीं हो सकती है और इसे लगातार नवीनीकृत किया जाता है। जैसे जल, पवन, सूर्य आदि।

अनव्यकरणीय स्रोत

जीवाश्म ईंधन की खोज के बाद ये सबसे महत्त्वपूर्ण खनिज ऊर्जा स्रोतों में से एक हैं। ये ऊर्जा संसाधन सीमित हैं। इसका अर्थ है कि ये अनवीकरणीय संसाधनों और एक बार उपभोग कर लिये जायें तो ये समाप्त हो जायेंगे। प्रमुख प्रकार के तीन जीवाश्म ईंधन हैं- कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस, एवं विश्व भर में इस आधार पर ये लगभग 90% ऊर्जा उपभोग के लिये प्रदान करते हैं।

वर्तमान समय मे हमें नव्यकरणीय स्रोतों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए। और अनव्यकरणीय स्रोतों का काम उपयोग करना चाहिए।

सौर ऊर्जा
वह ऊर्जा है जो सीधे सूर्य से प्राप्त की जाती है। वैसे तो सौर ऊर्जा का इस्तेमाल पेड़-पौधों, जीव जंतुओं एवं जलवायु द्वारा किया विभिन्न स्तर पर किया जाता है लेकिन आजकल सौर ऊर्जा से विद्युत् उत्पन्न करने का भी प्रचलन बढ़ गया है। सौर ऊर्जा से विद्युत् उत्पन्न करने के लिए सोलर पैनल का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अंतर्गत सूर्य की ऊर्जा को सोलर पावर प्लांट के माध्यम से विद्युत् ऊर्जा मे बदला जाता है।

सोलर लालटेन
सौर ऊर्जा उपकरण किसी भी स्थान पर स्थापित किया जा सकता है। इसका प्रयोग लोग अपने घरो मे बिजली का बल्ब जलाने, खाना पकाने, पंखा आदि चलने मे कर रहे है। यह नव्यकरणीय स्रोत है। इसका प्रयोग पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से भी उपयोगी है।

सोलर कुकर
सोलर कुकर वह उपकरण है जो खाना पकाने के लिये सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करता है। इसके कई लाभ हैं, जो इस प्रकार हैं: -रसोई गैस, मिट्टी तेल, विद्युत ऊर्जा, कोयले अथवा लकड़ी की कोई आवश्यकता नहीं… -रसोई गैस, मिट्टी तेल, विद्युत ऊर्जा, कोयले अथवा लकड़ी की कोई आवश्यकता नहीं होती। -ईंधन पर कोई खर्चा करने की आवश्यकता नहीं है।

पवन ऊर्जा
पवन स्थल या समुद्र में बहने वाली हवा की एक गति है। पवन चक्की के ब्लेड जिससे जुड़े होते है उनके घुमाने से पवन चक्की घुमने लगती है जिससे पवन ऊर्जा उत्पन्न होती है। पवन ऊर्जा द्वारा गेहूँ पीसने, धान कूटने, तेल पेरने, तथा भूमिगत जल निकालने का कार्य किया जाता है।

जल ऊर्जा
जल का प्रयोग हम पीने मे, सिंचाई मे, उद्योगों आदि मे करते है। जल, विद्युत् ऊर्जा का नव्यकरणीय स्रोत है। इससे प्रदूषण नहीं होता परन्तु ये बांध अनेक पर्यावरण समस्याएं पैदा करती है। भारत मे प्रमुख जल विद्युत् संयंत्र भाखड़ा नांगल, हीराकुंड, दामोदर आदि है।

ज्वारीय ऊर्जा
समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटा की उर्जा को उपयुक्त टर्बाइन लगाकर विद्युत शक्ति में बदल दिया जाता है। इसमें दोनो अवस्थाओं में विद्युत शक्ति पैदा होती है – जब पानी ऊपर चढ़ता है तब भी और जब पानी उतरने लगता है तब भी। इसे ही ज्वारीय शक्ति कहते हैं।

बायोगैस ऊर्जा
बायोगैस ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत है, जिसका उपयोग बार-बार किया जा सकता हैं। इसका इस्तेमाल घरेलू तथा कृषि कार्यों के लिए भी किया जाता हैं। किन्तु इससे वायु प्रदूषण होता था और ऊर्जा की हानि भी। अब इनके द्वारा उत्तम गैसीय ईंधन प्राप्त किया जाता है। इन्हे जैव गैस भी कहते है।

UP Board Class 6, 7, 8 Paryavaran Notes Chapter 11 जनसंख्या एवं हमारा पर्यावरण

बढ़ती जनसंख्या, घटती सुविधाएं
1. जनसंख्या में अधिक वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति आय में कमी आती है।
2. जनसंख्या वृद्धि के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास जैसी सुविधाओं में कमी आती है।
3. जनसंख्या बढ़ने से श्रम-शक्ति में वृद्धि होती है परन्तु रोजगार के अवसर उस अनुपात में न बढ़ पाने से बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न होती है।
4. अति जनसंख्या से अपराध जैसी विभिन्न समस्याओं का उदय होता है।
5. जनसंख्या वृद्धि से उत्पादक जनसंख्या पर आश्रितों का भार बढ़ता है।


जनसंख्या वृद्धि से होने वाली समस्याएं
1. पर्यावरण प्रदूषण
2. ओजोनपरत को हानि
3. पारितंत्रीय समस्या
4. ब्रम्हांडीय तापमान का बढना
5. प्राकृतिक संसाधनो का दोहन
6. स्वास्थ्य संबंधीं समस्याएं
7. गरीबी तथा बेकारी
8. नैतिक मूल्यो का पतन तथा अपराध में वृद्धि

जनसंख्या वृद्धि से पर्यावरणीय प्रभाव
1. भोजन-कपड़ा-मकान जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति में कमी।
2. प्राकृतिक संसाधन जैसे वायु, जल, वनस्पति की सीमित उपलब्धता।
3. वनों का विनाश, प्राण वायु (ऑक्सीजन) की कमी एवं कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता।
4. प्रदूषण में वृद्धि।
5. मानव के जीवन स्तर में कमी।
6. अत्यधिक कोलाहल, ध्वनि प्रदूषण की अधिकता।
7. अनियंत्रित भीड़ आदि।

जनसंख्या वृद्धि का ऐतिहासिक इमारते पर प्रभाव
जनसंख्या बढ़ने के कारण वातावरण प्रदूषित हुआ है। वातावरणीय प्रदूषण के कारण ऐतिहासिक इमारतों की बाहरी परत खराब होने लगी है। उदाहरण के लिए वायु प्रदूषण के कारण आगरा स्थित ताजमहल का रंग पीला पड़ने लगा है इसके अतिरिक्त ऐसे स्थानों पर बढ़ती भीड़ के कारण वहाँ गंदगी भी फैलने लगी है।

जनसंख्या नियंत्रण आवश्यकता एवं महत्व
1. जनसंख्या वृद्धि भारत के विकास की धीमी दर का सबसे महत्वपूर्ण कारण है, और बिल जनसंख्या नियंत्रण की तत्काल आवश्यकता के लिए तर्क देता है।
2. भारत की सबसे गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या इसकी विशाल जनसंख्या और तीव्र विकास है।
3. तीव्र जनसंख्या वृद्धि समस्याओं और अत्यधिक गरीबी को जन्म देगी।

सामुदायिक व सरकारी प्रयास –
1. शिक्षा का व्यापक स्तर पर प्रचार प्रसार करना।
2. परिवार नियोजन के कार्यक्रमों को संचालित करना तथा इसके प्रति जागरूक करना।
3. बाल विवाह पर क़ानूनी रोक लगाना।
4. स्वास्थय सेवाओं और मनोरंजन के साधनो मे वृद्धि करना।
5. दूरसंचार के माध्यमों से लोगो को जागृत करना।
6. सामुदायिक स्तर पर चित्रकला, नुक्कड़ नाटक, संगोष्ठी व निबंध आदि के माध्यम से लोगो को जागरूक करना।

UP Board Class 6, 7, 8 Paryavaran Notes Chapter 10 पर्यावरण असंतुलन – मानव हस्तक्षेप का परिणाम

अधिक अन्न उगाने तथा मकान बनाने के लिए वनों की अन्धाधुंध कटाई की जाती है। अधिक मकानों के बनने तथा कारखानों के लगाए जाने के कारण कृषि कम हो रही है। अधिक उद्योगों, और वाहनों से वातावरण प्रदूषित होता है। इससे ऊर्जा के स्रोतों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।

ऊर्जा जीवन के लिए आवश्यक
ऊर्जा की सरल परिभाषा के अनुसार -ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा की माँग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। वर्तमान में ऊर्जा का उपयोग मुख्य रूप से खाना बनाने, प्रकाश की व्यवस्था करने और कृषि कार्य में किया जा रहा है। 75 प्रतिशत ऊर्जा की खपत खाना बनाने और प्रकाश करने हेतु, उपयोग में लाया जा रहा है। ऊर्जा प्राप्त करने के लिए बिजली के अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैव ईंधन एवं केरोसिन आदि का भी उपयोग ग्रामीण परिवारों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जाता है।
कृषि क्षेत्र में ऊर्जा का उपयोग मुख्यतः पानी निकालने के काम में किया जाता है। इन कार्यों में बिजली और डीज़ल भी उपयोग में लाया जा रहा है। देश में कृषि कार्यों में मानव शक्ति बड़े पैमाने पर व्यर्थ चला जाता है। यद्यपि ऊर्जा उपयोग का स्तर गाँव के भीतर अलग-अलग है, जैसे अमीर और गरीबों के बीच, सिंचाईपरक भूमि और सूखी भूमि के बीच, महिलाओं और पुरुषों के बीच आदि।

जल ही जीवन है
जल को हमारे जीवन का मूल्यवान धरोहर कहें या ये कहें कि इसके बिना जीवन के बारे में सोच भी नहीं सकते तो यह गलत भी नहीं होगा,क्योंकि जल है तो जीवन है। जल हमारी पृथ्वी में लगभग 71% है। इसमें से हमारी पीने योग्य केवल 3 प्रतिशत ही पानी है। जिसे अलवणीय जल कहा जाता है, और इसका बहुत छोटा भाग ही प्रयोग के लिए उपलब्ध है।

नदियों की शुद्धता और उनके प्रदूषण का कारण
हमारे प्रदेश को नदियों का प्रदेश भी कहा जाता है जहां गंगा, यमुना, गोमती, आदि कई नदियाँ बहती है। इन नदियों मे जल पहाड़ो पर जमी बर्फ से पिघलने से आती है। परन्तु हमारे देश की सभी नदियां प्रदूषित हो चुकी है जिन नदियों को हम मनुष्य पुजते भी है और मनुष्य ही प्रदूषित भी करते है जैसे गंगा, यमुना आदि।
शहरो के विस्तारीकरण और बढ़ते उद्योगों के कारण इस नदियों का प्रदूषण बढ़ रहा है। गंदे नालो और कारखानों से निकलने वाले कचरो को सींचे बडियों मे प्रवाहित कर दिया जाता है। जिससे नदियों मे फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसे जानलेवा तत्व मिल चुके है। जो हमारे स्वास्थय के लिए हानिकारक है।

समुद्र एक बड़ा भंडार
1. तटीय शहरों में रहने वाले और होटलों के नगरपालिका कचरे और सीवेज को सीधे समुद्र में छोड़ दिया जाता है।
2. कृषि से कीटनाशक और उर्वरक जो बारिश से धुल जाते हैं पानी के पाठ्यक्रमों में और अंत में समुद्र में प्रवेश करते हैं।
3. पेट्रोलियम और तेल सड़कों से हटकर आम तौर पर सीवेज सिस्टम और अंत में समुद्र में प्रवेश करते हैं।
4. इसलिए समुद्र में जहाज दुर्घटनाएं और आकस्मिक छिडक़ाव समुद्री पर्यावरण के लिए बहुत हानिकारक हो सकता है।
5. समुद्र किनारे के तेल की खोज भी समुद्र के पानी को काफी हद तक प्रदूषित करती है।

वन हमारे रक्षक
1. वन मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण है।
2. वन हवा को शुद्ध रखने मे सहायक करते है।
3. वनो से हमें ईंधन एवं इमरती लकड़ियाँ प्राप्त होती है।
4. वनो से हमें जड़ी बूटियाँ भी प्राप्त होती है।
5. अनेक आदिवासी प्रजातियाँ के जीविकोपार्जन का प्रमुख स्रोत वन ही है।

हम वनो के भक्षक
1. जनसंख्या बढ़ने के कारण मनुष्य पेड़ो को काटता जा रहा है।
2. वनो को मार्ग निर्माण व ईंधन के रूप मे उपयोग करने लगा है।
3. इस कारणो की वजह से हमारे वन नष्ट होते जा रहे है।
4. वनो के नष्ट होने से पर्यावरण सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।

UP Board Class 6, 7, 8 Paryavaran Notes Chapter 9 पर्यावरणीय प्रदुषण कारण एवं प्रभाव

पर्यावरण प्रदूषण दो शब्दों, पर्यावरण और प्रदूषण से मिलकर बना है। जैसा की हम पिछले लेख मे यह जान चुके है की पर्यावरण का तात्पर्य हमारे चारों ओर आस-पास के वातावरण एवं परिवेश से होता है, जिसमे हम, आप और अन्य जीवधारी रहते है।

पर्यावरण मे मिलने वाले हानिकारक पदार्थ, जो पर्यावरण को प्रदूषित बनाते है प्रदूषक कहलाते है तथा इस समस्या को प्रदूषण कहते है। प्रदूषण के निम्न प्रकार होते है–

1. वायू प्रदूषण
2. जल प्रदूषण
3. मृदा/भूमि प्रदूषण
4. ध्वनि प्रदूषण

विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों व उनके परिणामों को जाने-

जल प्रदूषण
जल मई किसी प्रकार के अवांछित पदार्थो की उपस्थिति, जिसके कारण जल की गुणवत्ता मे कमी आ जाती है, जल प्रदुषण कहलाता है। प्रदूषित जल अनेक बिमारियों का कारण होता है।

जल प्रदूषण के कारण

उद्योगों द्वारा जल प्रदूषण: उद्योग जल प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है, यह प्रदूषक पैदा करता है जो लोगों और पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक हैं। कारखानों और उद्योगों द्वारा जारी ये रासायनिक और अन्य अपशिष्ट जलीय जानवरों और पौधों के लिए हानिकारक हैं।

मानव की दैनिक क्रियाएं – नदी, तालाबों, आदि मे कपड़े धोने, पशुओं को नहलाने, सीवेज लाइन का गन्दा पानी इसमें परिवहन करने के कारण जल प्रदूषित होती है।

जल जनित बीमारियाँ

जल जनित रोगों से बचाव
1. भोजन और पीने के पानी को संभालने से पहले हाथ अच्छी तरह धो लें।
2. सीवेज पाइप के साथ पानी के पाइप के संदूषण से बचें। लीक हुए पाइपों को एक बार में ठीक करें।
3. बाहरी भोजन से बचें जब आपको इसकी गुणवत्ता पर संदेह हो।
4. कच्चे भस्म करने के लिए सभी खाद्य पदार्थों को बहते पानी के नीचे अच्छी तरह धो लें।
5. लक्षण बिगड़ने और व्यक्ति निर्जलित होने पर चिकित्सक से शीघ्र उपचार प्राप्त करें।
6. विभिन्न संक्रमणों के लिए अलग-अलग उपचारों की आवश्यकता होती है, इसलिए स्व-औषधि का प्रयास न करें।
7. अपने आसपास साफ-सफाई रखें। गंदे, भीड़भाड़ वाले इलाकों में रहने से बचें।
8. पीने के पानी को ढके हुए बर्तनों या साफ बोतलों में रखें।

जल प्रदूषण का नियंत्रण
1. प्रत्येक घरों में सेप्टिक टैंक होना चाहिए।
2. जल स्त्रोतों में जानवरों की सफाई न करना।
3. व्यर्थ पदार्थों को नदी , तालाब व पोखरों में न बहाना।
4. कीटनाशी व उर्वरकों का अधिकता में प्रयोग न करना।
5. नुकसानदायी कीटनाशकों पर प्रतिबन्ध लगाना।
6. पानी शुद्धिकरण इकाई के उद्योगों की स्थापना करना।


वायु प्रदूषण
वायु प्रदूषण तब होता है जब गैसें, धूल, गंदगी, पराग, कालिख, वायरस, आदि हवा को दूषित करते हैं जिससे यह अशुद्ध, अस्वास्थ्यकर और विषाक्त होता है। हवा में मौजूद वायु प्रदूषण की मात्रा मनुष्यों, जानवरों, पौधों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके प्रभाव को निर्धारित करती है। हवा में प्रदूषण की मात्रा मनुष्यों, जानवरों और पौधों को नुकसान के स्तर को प्रभावित करती है।

वायु प्रदूषण के कारण
1. बढ़ती आबादी
2. बढ़ते उद्योग
3. संचार के साधन
4. वनों की अंधाधुंध कटाई
5. परमाणु परिक्षण

वायु प्रदूषण का प्रभाव
1. कार्बन मोनोक्साइड मनुष्य के रक्त के हीमोग्लोबीन अणुओं से ऑक्सीजन की तुलना में 200 गुणा अधिक तेजी से संयुक्त हो जाती है एवं जहरीला पदार्थ कार्बोेक्सी हीमोग्लोबिन बनाती है। जिस कारण ऑक्सीजन की वायु में पर्याप्त मात्रा रहने पर भी श्वास अवरोध, दम घुटन होने लगता है।
2. ओजोन की अल्पता होने पर गोरी चमड़ी के लोगों में चर्म कैंसर होने की आशंका व्यक्त की गयी है।
3. सल्फर-डाइ-ऑक्साइड से मिश्रित नगरीय धूम कोहरे के कारण मनुष्य के शरीर में श्वसन प्रणाली अवरूद्ध हो जाती है, जिस कारण लोगों की मृत्यु हो जाती है।
4. सल्फर-डाइ-ऑक्साइड के प्रदूषण द्वारा आँख, गले एवं फेफड़े का रोग भी होता है।
5. अम्ल वर्षा के कारण धरातलीय सतह पर जलभण्डारों का जल तथा भूमिगत जल प्रदूषित हो जाता है (जल में अम्लता बढ़ जाती है), जो लोग इस तरह के प्रदूषित जल का सेवन करते हैं, उनका स्वास्थ्य दुष्प्रभावित होता है।

वायु प्रदूषण नियंत्रण
1. स्वच्छ ईंधनों, जैसे सी.एन.जी. का उपयोग करें।
2. पर्यावरण से सम्बन्धित जागरूकता कार्यक्रम सृजित करें ताकि प्रत्येक अपने उत्तरदायित्व को समझे।
3. ऊर्जा के स्वच्छ संसाधनों का उपयोग करें जैसे सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा और जल ऊर्जा।
4. कम हानिकारक उत्पादों की खोज की जानी चाहिए, यथा-सौर चलित मोटर कार।
5. ऐसे उद्योग, जो भारी प्रदूषण फैलाते हों, उन्हें रिहायशी स्थानों से काफी दूर रखना चाहिए।अधिक पौधे लगाएँ।

ध्वनि प्रदूषण
ध्वनि प्रदूषण किसी भी प्रकार के अनुपयोगी ध्वनियों को कहते हैं, जिससे मानव और जीव-जन्तुओं को परेशानी होती है। इसमें यातायात के दौरान उत्पन्न होने वाला शोर मुख्य कारण है। जनसंख्या और विकास के साथ ही यातायात और वाहनों की संख्या में भी वृद्धि होती जिसके कारण यातायात के दौरान होने वाला ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ने लगता है।

ध्वनि प्रदूषण के कारण
औद्योगिक एवं निर्माण गतिविधियाँ, मशीनरी, कारखानों के उपकरण, जनरेटर, आरी और हवाई तथा बिजली के अभ्यासों से भी ध्वनि प्रदूषण होता है। ध्वनि प्रदूषण के कारणों या स्रोतों को दो भागों में विभाजित किया जाता है:

1. प्राकृतिक स्रोत – इसके अंतर्गत बादलों की गड़गड़ाहट, तूफानी हवाएँ, भूकम्प, ऊँचे पहाड़ से गिरते पानी की आवाज, बिजली की कड़क, ज्वालामुखी के फटने से उत्पन्न भीषण शोर, कोलाहल, वन्य जीवों की आवजें, चिड़ियों की चहचहाट की ध्वनि आती है।
2. अप्राकृतिक स्रोत – यह मनुष्य के द्वारा निर्मित शोर प्रदूषण होता है इसके अन्तर्गत उद्योग धन्धे, मशीनें, स्थल, वायु, परिवहन के साधन-मोटर, ट्रक, हवाई जहाज, स्कूटर्स, बसें, एम्बुलेंस आदि।

ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव
1. ध्वनि प्रदूषक मनुष्य के स्वास्थ्य, आराम एवं कुशलता को प्रभावित करता है। इसके कारण रक्त धमनियों के संकुचन से शरीर 2. पीला पड़ जाता है, रक्त प्रवाह में अत्यधिक मात्रा में एड्रीशन हार्मोन्स का होता है।
3. ध्वनि पेशियों के संकुचन का कारण होता है जिससे तन्त्रिकीय क्षति, विसंगति, तनाव एवं पागलपन विकसित होता है।
4. शोर के कारण हृदय, मस्तिष्क, किडनी एवं यकृत को क्षति होती है और भावनात्मक विसंगतियाँ उत्पन्न होती हैं।
5. शोर का घातक प्रभाव वन्यजीवों एवं निर्जीव पदार्थों पर भी होता है।

ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण
1. कानून की सहायता से शोर करने वाले वाहन, मोटर, ट्रक, आदि पर रोक लगाकर शोर कम किया जा सकता है।
2. वायुयान, ट्रक, मोटरसायकिल, स्कूटर, औद्योगिक मशीनों एवं इंजनों को शोर नियंत्रण कवच से ढँकना चाहिए जिससे इन उपकरणों से कम से कम शोर उत्पन्न हो सके।
3. मकानों, भवनों में कमरों के दरवाजों एवं खिड़कियों को उपयुक्त रूपरेखा या डिजाइन का बनाकर बहुत कुछ शोर को कम किया जा सकता है।
4. घरेलू शोर को कम करने के लिए टी.वी. रेडियो, ट्रांजिस्टर, टेपरिकार्डर, ग्रामोफोन्स आदि को धीमी गति से चलाना चाहिए।
5. धार्मिक, सामाजिक, चुनाव, शादी कार्यक्रमों, धार्मिक उत्सवों, मेलों आदि में ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग आवश्यक होने पर करना चाहिए और वह भी कम ध्वनि के साथ।

मृदा प्रदूषण
भूमि समाज के लिए प्रकृति का अनुपम निःशुल्क उपहार है। इसमें सृजन एवं पोषण का सामर्थ्य है इस कारण यह समस्त जीवधारियों के अस्तित्व का आधार है। इसी आधारिक उपादेयता के कारण समाज में भूमि को माता सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इससे ही अनाज वनोपज, औषधि, विविध खनिज, जल आदि उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं। अतएव इसे रत्न प्रसवा’ कहा जाता है। जनसंख्या वृद्धि से भूमि उपयोग में विविधता एवं सघनता आई है। फलस्वरूप भूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में कोई भी अवांछित परिवर्तन, जिसका कुप्रभाव मानव तथा अन्य जीवों पर पड़े या जिससे भूमि की प्राकृतिक गुणवत्ता तथा उपयोगिता नष्ट होती है।

मृदा प्रदूषण के कारण
1. कृषि में उर्वरकों, रसायनों तथा कीटनाशकों का अधिक प्रयोग ।
2. औद्योगिक इकाइयों, खानों तथा खादानों द्वारा निकले ठोस कचरे का विसर्जन भवनों, सड़कों आदि के निर्माण में ठोस कचरे का विसर्जन ।
3. कागज तथा चीनी मिलों से निकलने वाले पदार्थों का निपटान, जो मिट्टी द्वारा अवशोषित नहीं हो पाते।
4. प्लास्टिक की थैलियों का अधिक उपयोग, जो जमीन में दबकर नहीं गलती ।
5. घरों, होटलों और औद्योगिक इकाइयों द्वारा निकलने वाले अवशिष्ट पदार्थों का निपटान, जिसमें प्लास्टिक, कपड़े, लकड़ी, धातु कांच, सेरामिक, सीमेंट आदि सम्मिलित हैं।

मृदा प्रदूषण के प्रभाव
1. मिटटी मे रहने वाले जीव जंतु नष्ट हो जाते है।
2. मिटटी का उपजाऊपन काम हो जाता है।
3. पेड़ पौधे एवं फसलों की वृद्धि पर दुष्प्रभाव पड़ता है।
4. प्रदूषित मृदा पर पैदा होने वाली फसलों के सेवन से मानव स्वस्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

मृदा प्रदूषण के नियंत्रण
1. वृक्षों के कटान पर प्रतिबंध लगाया जाए एवं वृक्षारोपण अधिक से अधिक किया जाए।
2. भूमि में रसायनिक उर्वरकों का आवश्यकतानुसार उचित मात्रा में ही प्रयोग किया जाए।
3. ठोस अपशिष्टों के निपटान (disposal) के लिए उचित विधियों का प्रयोग करना चाहिए।
4. परमाणु विस्फोटों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
5. पीड़ानाशकों का आवश्यकता के अनुसार ही कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।

UP Board Class 6, 7, 8 Paryavaran Notes Chapter 8 पारिस्थितिकी तंत्र

पारिस्थितिकी तंत्र की परिभाषा – जिस तंत्र में जैविक एवं अजैविक घटक परस्पर सहयोग से जीवन का निर्वहन करते हैं पारिस्थितिकी तंत्र कहलाता है। यह जैविक एवं अजैविक तत्वों का सकल योग होता है जो एक क्षेत्र के अंदर निवास करता है।

पारिस्थितिकी को अंग्रेजी में Ecology कहते हैं, Ecology शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के ‘Oikos’ एवं ‘Logos’ दो शब्दों के योग से बना है। oikos का अर्थ होता है ‘वासस्थान’ अर्थात ‘रहने की जगह’ और Logos का अर्थ होता है अध्ययन। अर्थात निवास स्थान के अध्ययन को ही Ecology (पारिस्थितिकी) कहते हैं।

पारिस्थतिक तंत्र जलीय हो अथवा स्थलीय, उसकी संरचना दो घटको से मिलकर बनती है – सजीव घटक व निर्जीव घटक।

सजीव घटक
इसके अन्तर्गत सभी जीवित प्राणी आते हैं जो कि पर्यावरण में पाये जाते हैं । जैसे पादप, जीव-जन्तु एवं सूक्ष्मजीव आते हैं। इनको जैविक (biotic) घटक भी कहा जाता है। जीवों के पारस्परिक एवं पर्यावरण के साथ उनके अंतर संबंधों के वैज्ञानिक अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।पोषण के आधार पर सजीव घटको को तीन श्रेणियाँ मे बाँटा जाता है –

1. उत्पादक
2. उपभोक्ता
(i) प्रथम चरण उपभोक्ता
(ii) द्रितीय चरण उपभोक्ता
(iii) तृतीया चरण उपभोक्ता
3. उपघटक

उत्पादक – जो सजीव घटक अपना भोजन स्वयं बनाते है वे सवपोषी कहलाती है। इन्हे उत्पादक कहते है जैसे हरे पेड़ पौधे। हरे पौधे, प्रकाश संश्लेषण की क्रिया मे सूर्य के के प्रकाश की उपस्थति मे कार्बन डाइऑक्साइड और जल लेकर लेकर क्लोरोफिल की सहायता से अपना भोजन स्वयं बनते है।

उपभोक्ता – जो जीव भोजन के लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रतयक्ष रूप से उत्पादक अथवा हरे पौधों पर निर्भर रहते है उपभोक्ता कहलते है। भोजन के लिए दुसरो पर निर्भर रहने के कारन इन्हे परपोषी भी कहते है। उपभोक्ता को तीन भागो मे बाँटा गया है –

प्रथम चरण उपभोक्ता – जो शाकाहारी जंतु भोजन के लिए सीधे उत्पादक अथवा हरे पेड़ पौधे पर निर्भर रहते है। प्रथम चरण के उपभोक्ता कहलाते है जैसे – मनुष्य, गाय, बकरी, हिरण आदि पेड़ पौधे पर निर्भर रहते है।

द्वितीय चरण उपभोक्ता – जो जानवर शाकाहारी जंतुओं को भोजन के रूप मे प्रयोग करते है द्वितीय चरण उपभोक्ता कहलाते है। जैसे शेर, चीता, भेड़िया आदि।

तृत्य चरण उपभोक्ता – इसी प्रकार द्वितीय चरण उपभोक्ता अर्थात शेर, चीता, आदि को मृत अवस्था मे भोजन के रूप मे ग्रहण करने वाले जीव तृत्य चरण उपभोक्ता या अपमार्जक कहलाते है – जैसे गिद्ध, बाज, चील तथा कौआ मृत जानवरो का मांस कहते है।

अपघटक में सूक्ष्म जीव है जो मृत पौधों और जंतुओं के मृत शरीर में उपस्थित कार्बनिक यौगिकों का अपघटन करते हैं तथा उन्हें सरल यौगिक और तत्वों में बदल देते हैं यह सरल यौगिक तथा तत्व पृथ्वी के पोषण भंडार में वापस चले जाते हैं और जी मंदिर में अब घटकों का महत्व घटक पौधों और जंतुओं के मृत शरीरों के अपघटन में सहायता करते हैं तथा इस प्रकार वातावरण को स्वच्छ रखने का ही कार्य करते है।

निर्जीव घटक
पर्यावरण के निर्जीव घटक के अंतरगर्त स्थल मंडल, जल मंडल, तथा वायु मंडल आते है। ये सभी हमें प्राकर्तिक से प्राप्त होते है। निर्जीव घटक के कारण भी सजीवों का विकास बेहतर ढंग से संभव है। किसी भी निर्जीव घटक के अधिक या काम होने से पारिथितिक तंत्र असंतुलित हो जाता है।

आहार श्रृंखला
आहार श्रृंखला या खाद्य श्रृंखला विभिन्न प्रकार के जीवों का वह क्रम होता है जिसमें जीव जन्तु भोज्य अर्थात भोजन और भक्षक अर्थात भोजन को खाने वाले के रूप में सम्बंधित होते हैं। आहार श्रृंखला में रासायनिक एवं ऊर्जा उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटनकर्ता द्वारा निर्जीव पर्यावरण में प्रवेश कर फिर से चक्रीकरण द्वारा जैविक घटकों में प्रवेश कर जाती है।

आहार जाल
हर खाद्य श्रृंखला में प्राथमिक उत्पादक, प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीयक उपभोक्ता, तृतीयक उपभोक्ता एवं उच्च उपभोक्ता में सीधा एवं सरल संबंध होता है। लेकिन जब कई प्रकार के जन्तु एक ही प्रकार के भोज्य पदार्थ खाते हैं या एक ही प्रकार की जाति कही प्रकार के भोज्य जन्तुओं का भक्षण करते हैं तो आहार श्रृंखला जटिल हो जाती है। इसी प्रकार की जटिल खाद्य श्रृंखला को ही आहार जाल कहते हैं।

ऊर्जा का प्रवाह
खाद्य श्रृंखला में खाद्य पदार्थों या ऊर्जा का क्रमबद्ध स्थानान्तरण होता है। पृथ्वी तक पहुँचने वाली सौर ऊर्जा का करीब एक प्रतिशत ही प्रकाशसंश्लेषण क्रिया में प्रयुक्त होता है। विभिन्न जीवों में जैविक ऊतकों के निर्माण की प्रक्रिया को जैव संश्लेषण कहते हैं। वास्तव में जैव संश्लेषण की प्रक्रिया सौर ऊर्जा या प्रकाश ऊर्जा के रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरण को प्रदर्शित करती है। इसके विपरीत जैविक पदार्थों के विघटन एवं वियोजन की प्रक्रिया को जैव अवनयन या जैव अवक्रमण कहते हैं। इस तरह जैव अवनयन की प्रक्रिया पोषक तत्त्वों तथा रासायनिक ऊर्जा की ऊष्मा के रूप में निर्मुक्ति को प्रदर्शित करती है।

पर्यावरण परिवर्तन : प्राणियों का अनुकूलन

अनुकूलन, एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से जीवित प्राणी अपने वातावरण में समायोजित होते हैं। जिस तरह मनुष्य पर्यावरण के अनुकूल होता है, उसी तरह उसकी सोच भी उन परिवर्तनों को स्वीकार करती है जो वे अनुभव करते हैं। इन परिवर्तनों से मानसिक योजनाओं में परिवर्तन होता है।

सजीवों में अनुकूलन
जीवों के वैसे लक्षण जो उन्हें किसी खास माहौल में जिंदा रहने में सक्षम बनाते हैं, अनुकूलन कहलाते हैं। किसी भी जीव में किसी विशेष अनुकूलन के विकसित होने में हजारों वर्ष लग जाते हैं। जिन जीवों में उचित अनुकूलन विकसित होता है वे बदले हुए परिवेश में भी जिंदा बच जाते हैं।



पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन हमारा दायित्व
पर्यावरण को संतुलित रखना प्रत्येक सजीव घटक तथा निर्जीव घटक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हम भी पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण घटक है। परन्तु हमारे क्रियाकलाप प्राकर्तिक को असंतुलित कर रहा है। किसी भी सजीव या निर्जीव घटक के कम या अधिक होने से पारिस्थितिकी असंतुलन बढ़ता है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है और मानव जीवन भी।

पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने के लिए हमें निम्नवत कार्य करना चाहिए-
1. वह वृक्षों को न काट।
2. जल के स्रोता जैसे तालाब, नदी, झील, समुद्र आदि को प्रदूषित न करे।
3. वन्य प्राणियों की संरक्षण हम सबका दायित्व है।
4. वायु जल और भूमि बहुमूल्य प्राकर्तिक संसाधन है। इन संसाधनों को प्रदूषित न करे।
5. खेतो मे जैविक खाद्य के प्रयोग को बढ़ावा दे।

UP Board Class 6, 7, 8 Paryavaran Notes Chapter 7 वन एवं वन्य जीव

वन
भू क्षेत्र जहाँ वृक्षों का घनत्व सामान्य से अधिक है उसे वन (जंगल) कहते हैं। विभिन्न मापदंडों पर आधारित जंगल की कई परिभाषाएँ हैं । वनों ने पृथ्वी के लगभग 9.5% भाग को घेर रखा है जो कुल भूमिक्षेत्र का लगभग 30% भाग है।

वन हमारे लिए किस प्रकार उपयोगी है
वनों को लोग “प्राकृतिक औषधालय” भी कहते है। वनों मई बहुत सी जड़ी बूटियाँ, औषधियाँके रूप मई मिलते है-

भारत के प्रमुख राज्यों के वन्यजीव अभ्यारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यान निम्नलिखित है –

वन्य जीवों के संरक्षण सम्बन्धी कार्यक्रम –
1. लुप्त प्रजातियॉं का प्रजनन केंद्र कुकुरैल वन, लखनऊ मई 1984 -85 मे स्थापित हुआ।
2. राष्टीय चम्बल वन्यजीव विहार योजना उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ततः राजस्थान की संयुक्त योजना है जो मगर व घड़ियाल के संरक्षण हेतु शुरू की गई है।
3. घड़ियाल प्रजनन केंद्र दो है – कुकुरैल वन (लखनऊ) तथा कतर्नियाघाट वन्यजीव विहार (बहराइच)।

सामाजिक वानिकी योजना-
1. ऑपरेशन ग्रीन योजना प्रदेश मे वृक्षारोपण के प्रोत्साहन एवं संवर्धन के लिए 01 जुलाई, 2001 से योजना शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य प्रदेश मे हरित क्षेत्र का विस्तार एवं वनो का उन्नयन करना है।
2. वन महोत्सव 1952 से देश के साथ साथ प्रदेश मे भी 01 जुलाई से 07 जुलाई तक मनाया जाता है।
3. उत्तर प्रदेश वानिकी परियोजना विश्व बैंक की सहायता से 19 मार्च 1998 से शुरू की गई थी।

हमारे जीवन मे वनो के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए 21 मार्च को विश्व वन दिवस मनाया जाता है।

 

UP Board Class 6, 7, 8 Paryavaran Notes Chapter 6 मिटटी और वायु

वायु
हमारी धरती के चारों ओर वायु का विशाल आवरण पाया जाता है जिसने सम्पूर्णधरती को ढ़का हुआ है। वायुके इस विशाल आवरण को ही वायुमंडल (atmosphere) कहा जाता है। वास्तव मेंवायुमंडल धरती को चारोंओर सेकं बल की भांति लपेटेहुए हैजो की धरती पर जीवन के लिए विभिन स्थितियोंके लिए आवश्यक है। वायुमंडल विभिन प्रकार की गैसोंका मिश्रण हैजो की धरती पर तापमान संतुलन, मौसमी घटनाओ, ग्रीनहाउस प्रभाव, पराबैंगनी किरणोंसेरक्षा एवं विभिन प्राकृतिक क्रियाओंके लिए महत्वपूर्णतत्त्व है। पृथ्वी पर वायुमंडल पृथ्वी द्वारा आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल के कारण संलग्न होता हैजिससेकी वायुमंडल मेंविभिन गैसेंस्थिर रह पाती है।

वायुमंडल का महत्व
वायुमंडल के संगठन मे कई गैसों का मिश्रण होता है जिसमे नाइट्रोजन (78 %), ऑक्सीजन (12 %), आर्गन (0.93 %), कार्बन डाइऑक्सिडे (0.03 %) आदि प्रमुख है। इनके अतिरिक्त अन्य गैस बहुत काम मरता मे पाई जाती है। पृथ्वी के वायुमंडल में कई प्रकार की रचनाएं पाई जाती है जिसमें विभिन्न तरह के काम किए जाते हैं। वायुमंडल की वजह से पृथ्वी का संतुलन बना रहता है और वायुमंडल में पाया जाने वाला ओजोन लेयर सूर्य की हानिकारक किरणों से हमें बचाता है। कुल मिलाकर कहें तो वायुमंडल के बिना किसी भी ग्रह की सुरक्षा कम हो जाती है।

जलचक्र
पृथ्वी के जलमंडल के भीतर विभिन्न रूपों में पानी का संचलन( तरल, ठोस और गैसीय अवस्थाओं ) में होता है। जल अपने विभिन्न रूपों से होते हुए महासागरों, वायुमंडल, स्थलमंडल और जीवों के बीच निरंतर आदान-प्रदान होता है, जल के इस चक्रीय संचलन को जलीय चक्र कहते है।
जल चक्र एक पर्यावरणीय घटना है जिसमें तीन प्रक्रियाएँ, वाष्पीकरण, संघनन और वर्षा होती हैं। बच्चों को स्कूल में जल चक्र घटना के बारे में पढ़ाया जाता है। लेकिन अगर आपका बच्चा जिज्ञासु है और आपसे पानी के चक्र या पानी के विभिन्न रूपों के बारे में अलग-अलग सवाल पूछता है, तो हमारे पास वह सारी जानकारी है जो आपको उसे सबसे सरल तरीके से समझाना है। इसलिए, विषय से परिचित हों और अपने बच्चे को समझाएं।

जीवन और ऑक्सीजन
1. श्वसन जीवन की मुख्य क्रिया है।
2. श्वसन क्रिया मे जीव वायु स ऑक्सीजन का उपयोग कर कार्बन डाइऑक्सिडे की बहार निकलता है।
3. ऑक्सीजन ईंधन को जलाने मे भी प्रयुक्त होती है। इसके बिन आग नहीं जल सकती है।

ऑक्सीजन के स्रोत
ऐसे में ऑक्सीजन का मुख्य स्रोत पेड़-पौधे ही हैं। यह प्रकृति और स्वास्थ्य दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस पृथ्वी पर पांच प्रकार के ऋण होते हैं देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण, भूत ऋण, लोक ऋण।

कार्बन डाइऑक्साइड पेड़ पौधों के लिए आवश्यक
पौधों को भोजन की आवश्यकता होती है ताकि वह विभिन्न चयापचय गतिविधियों के लिए ऊर्जा की आपूर्ति कर सकें. जानवरों की तरह भोजन की तलाश में पौधें एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जा सकते है. वे एक ही जगह रहकर अपना खाना बनाते हैं. हम जानते हैं कि हरे पौधें स्वपोषी होते हैं जो कि प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से अपने स्वयं के लिए भोजन का संश्लेषण करते हैं. क्लोरोफिल की उपस्थिति में पौधें कार्बन डाइऑक्साइड और पानी से भोजन तैयार करने के लिए सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा का उपयोग करते है.

जलवायु में कार्बन डाइऑक्साइड कहाँ से आती है
मानव निर्मित कार्बन डाइऑक्साइड मुख्य रूप से तेल, कोयला और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन को जलाने से उत्पन्न होती है। विश्व स्तर पर उत्सर्जन के कुछ मुख्य स्रोतों में परिवहन, उद्योग और बिजली और हीटिंग के लिए ईंधन जलाने शामिल हैं।

कार्बन डाइऑक्साइड प्राकृतिक स्रोतों जैसे जानवरों, ज्वालामुखियों, महासागरों, मिट्टी और सड़ने वाले पौधों के माध्यम से भी उत्पन्न होता है।

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