बिहार की कृषि — कृषि समस्याएँ
Bihar Agriculture: Problems, Challenges & Solutions — BPSC परीक्षा के लिए सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं सामान्य परिदृश्य
बिहार की कृषि समस्याएँ BPSC परीक्षा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है — राज्य की 76% जनसंख्या आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, फिर भी कृषि क्षेत्र अनेक संरचनागत, प्रौद्योगिकीय एवं नीतिगत बाधाओं से ग्रस्त है।
बिहार भौगोलिक दृष्टि से उपजाऊ गंगा के मैदान में स्थित है। यहाँ की मिट्टी जलोढ़ (Alluvial) एवं अत्यंत उर्वर है। बावजूद इसके, बिहार की कृषि उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से कम है। राज्य का GSDP में कृषि का योगदान लगभग 18% है, जबकि रोजगार में इसकी हिस्सेदारी 50% से अधिक है — यह असंतुलन ही कृषि संकट की जड़ है।
बिहार कृषि की प्रमुख विशेषताएँ एवं विरोधाभास
| पहलू | वास्तविकता | चुनौती |
|---|---|---|
| भूमि उर्वरता | जलोढ़ मिट्टी, गंगा-गंडक-कोसी का वरदान | मृदा क्षरण, जलजमाव, लवणता |
| जल उपलब्धता | वार्षिक वर्षा 1000-1400 मिमी | असमान वितरण, बाढ़ व सूखा एक साथ |
| श्रम शक्ति | प्रचुर कृषि श्रम | पलायन से कुशल श्रमिक अभाव |
| जोत आकार | छोटी व सीमांत जोतें अधिक | मशीनीकरण व आधुनिक तकनीक में बाधा |
| फसल विविधता | धान, गेहूँ, मक्का, लीची, मखाना | परंपरागत फसलों पर निर्भरता |
भूमि एवं जोत संबंधी समस्याएँ
बिहार में भूमि-जोत का अत्यधिक खंडन (Fragmentation of Land Holdings) कृषि उत्पादकता की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। राज्य में औसत जोत का आकार मात्र 0.39 हेक्टेयर है, जो राष्ट्रीय औसत (1.08 हेक्टेयर) से बहुत कम है।
बिहार में 85% से अधिक किसान सीमांत (Marginal: 1 हेक्टेयर से कम) एवं लघु (Small: 1-2 हेक्टेयर) श्रेणी के हैं। हिन्दू उत्तराधिकार कानून के अनुसार प्रत्येक पीढ़ी के साथ भूमि विभाजन होता रहता है, जिससे जोतें और छोटी होती जाती हैं।
एक किसान की जमीन अनेक छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरी होती है। इससे सिंचाई, जुताई और बीज-खाद का कुशल उपयोग संभव नहीं होता।
0.39 हेक्टेयर की औसत जोत पर ट्रैक्टर, हार्वेस्टर जैसी मशीनें किराये पर लेना भी अनार्थिक हो जाता है। उत्पादन लागत ऊँची व आय कम रहती है।
बिहार में 1950 के बाद जमींदारी उन्मूलन हुआ, लेकिन भूमि पुनर्वितरण अधूरा रहा। सीलिंग कानूनों का पूरी तरह क्रियान्वयन नहीं हो सका।
Cadastral सर्वे पुराने हैं। Land Records का डिजिटलीकरण अधूरा है, जिससे विवाद, धोखाधड़ी और ऋण लेने में कठिनाई होती है।
उत्तर बिहार में नदियों के कारण बड़े क्षेत्र में स्थायी जलजमाव है। लगभग 9 लाख हेक्टेयर भूमि जलजमाव से प्रभावित है।
बड़ी संख्या में किसान बटाई (Sharecropping) पर खेती करते हैं। बटाईदार को ऋण, बीमा और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता।
बिहार में भूमि जोत का वितरण
| श्रेणी | जोत आकार | % किसान | % कुल भूमि |
|---|---|---|---|
| सीमांत (Marginal) | 1 हे. से कम | ~58% | ~27% |
| लघु (Small) | 1 – 2 हे. | ~22% | ~21% |
| अर्ध-मध्यम | 2 – 4 हे. | ~12% | ~24% |
| मध्यम | 4 – 10 हे. | ~6% | ~20% |
| बड़े (Large) | 10 हे. से अधिक | ~2% | ~8% |
बिहार में चकबंदी कानून 1956 से लागू है, लेकिन इसका क्रियान्वयन अत्यंत धीमा रहा है। चकबंदी का अर्थ है — किसान की बिखरी हुई जमीन के टुकड़ों को एक स्थान पर एकत्रित करना ताकि कृषि कार्य आसान हो।
- लाभ: मशीनीकरण संभव, सिंचाई खर्च कम, बीज-खाद की बचत।
- बाधाएँ: किसानों में असंतोष, भूमि विवाद, प्रशासनिक भ्रष्टाचार।
- वर्तमान स्थिति: बिहार में अभी भी बड़े क्षेत्र में चकबंदी नहीं हुई।
- सुझाव: Digital Land Records + GIS Mapping से चकबंदी में तेजी लाई जा सकती है।
सिंचाई एवं जल-प्रबंधन समस्याएँ
बिहार में सिंचाई की उपलब्धता कृषि उत्पादन की एक निर्णायक समस्या है। राज्य की केवल 50-55% कृषि भूमि ही किसी-न-किसी स्रोत से सिंचित है, जबकि शेष भूमि पूरी तरह मानसून पर निर्भर है।
विडम्बना यह है कि बिहार से अनेक बड़ी नदियाँ — गंगा, गंडक, कोसी, बागमती, महानंदा — बहती हैं। फिर भी सिंचाई क्षमता का पूर्ण दोहन नहीं हो पाया है। उत्तर बिहार में भूजल अत्यधिक उथला है (जमीन से 2-5 मीटर पर), फिर भी आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे रसायनों की समस्या से ग्रस्त है।
सिंचाई स्रोत-वार स्थिति
आहर एक तालाब-सदृश जलाशय है जहाँ वर्षाजल एकत्र होता है। पइन वह नहर है जो आहर से खेतों तक पानी पहुँचाती है। यह प्रणाली दक्षिण बिहार (गया, पटना, नालंदा, जहानाबाद) में सदियों से प्रचलित थी।
- पारिस्थितिकी आधारित: मानसून पर निर्भर, कोई बाहरी ऊर्जा नहीं चाहिए।
- वर्तमान स्थिति: अतिक्रमण, मिट्टी भराव और उपेक्षा से नष्ट हो रही है।
- पुनरुद्धार: बिहार सरकार ने “जल-जीवन-हरियाली” अभियान के तहत आहर-पइन जीर्णोद्धार शुरू किया।
बाढ़ एवं सूखे की समस्या
बिहार एक ऐसा विरोधाभासी राज्य है जहाँ एक तरफ उत्तर बिहार हर वर्ष बाढ़ से तबाह होता है, तो दूसरी तरफ दक्षिण बिहार का बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में रहता है। यह दोहरी आपदा बिहार की कृषि के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
कोसी त्रासदी — एक विशेष परिचय
कोसी नदी को “बिहार का शोक” (Sorrow of Bihar) कहा जाता है। यह नेपाल के हिमालय से उतरती है और विशाल अवसाद (Silt) लेकर आती है। कोसी अपना मार्ग बदलती रहती है — पिछले 150 वर्षों में यह 120 किमी पश्चिम की ओर खिसक चुकी है। 2008 में कोसी का तटबंध टूटा — सुपौल जिले में विनाशकारी बाढ़ आई, लाखों हेक्टेयर फसल नष्ट हुई।
कृषि निवेश एवं ऋण संबंधी समस्याएँ
बिहार के किसान संस्थागत ऋण (Institutional Credit) की पहुँच से काफी हद तक वंचित हैं। बड़े पैमाने पर किसान आज भी महाजन (Moneylender) और गैर-संस्थागत स्रोतों से 24-36% ब्याज दर पर कर्ज लेने को मजबूर हैं।
बिहार में ग्रामीण बैंक शाखाओं की संख्या राष्ट्रीय औसत से कम है। सीमांत किसानों के पास Collateral (गिरवी) की कमी के कारण बैंक ऋण मिलना कठिन है।
महाजन से लिया कर्ज — ऊँची ब्याज दर — कर्ज न चुका पाना — जमीन गिरवी — बेदखली। यह चक्र बिहार के ग्रामीण किसानों में आज भी सामान्य है।
KCC (Kisan Credit Card) योजना का लाभ बिहार के अधिकांश सीमांत किसानों तक नहीं पहुँचा। जागरूकता और बैंकिंग ढाँचे की कमी मुख्य कारण है।
PMFBY (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) के अंतर्गत नामांकन कम है। दावों के निपटान में देरी और जटिल प्रक्रिया से किसान हतोत्साहित होते हैं।
कृषि निवेश की कमी — प्रभाव एवं समाधान
| समस्या | प्रभाव | संभावित समाधान |
|---|---|---|
| बीज की खराब गुणवत्ता | कम उपज, रोग | BRBN (Bihar Rajya Beej Nigam) के माध्यम से प्रमाणित बीज |
| रासायनिक खाद की ऊँची कीमत | उत्पादन लागत ↑ | Nano Urea, Micro-nutrients, Organic Farming |
| कीटनाशक उपयोग की जानकारी नहीं | मिट्टी प्रदूषण, लागत | KVK (Krishi Vigyan Kendra) प्रशिक्षण |
| सिंचाई के लिए डीजल पंप | ऊँची लागत | Solar Pump Scheme (PM KUSUM) |
विपणन, भंडारण एवं मूल्य की समस्या
बिहार के किसानों की उपज बाजार तक पहुँचने में अनेक बाधाएँ हैं — कमजोर परिवहन अवसंरचना, अपर्याप्त भंडारण सुविधाएँ, बिचौलियों का वर्चस्व और MSP का प्रभावी क्रियान्वयन न होना — ये सब मिलकर किसान की आय को न्यूनतम बनाए रखते हैं।
बिहार में APMC (Agricultural Produce Market Committee) कानून 2006 में समाप्त कर दिया गया था। इसका उद्देश्य था — बाजार को खोलना और बिचौलियों की भूमिका कम करना। लेकिन विकल्प में पर्याप्त Private Mandis, Cold Storage और FPO (Farmer Producer Organisations) विकसित नहीं हो सके।
मखाना और लीची — विपणन की विशेष समस्याएँ
बिहार मखाना (Fox Nut) उत्पादन में विश्व में पहले स्थान पर है — विश्व उत्पादन का 90% और भारत के उत्पादन का 80% से अधिक। मधुबनी, दरभंगा, सुपौल, पूर्णिया जिले मुख्य उत्पादक हैं। लेकिन प्रसंस्करण उद्योग (Processing Industry) का अभाव है — किसान कच्चा मखाना बेचते हैं और लाभ प्रसंस्करण करने वाले उठाते हैं। इसी तरह लीची (मुजफ्फरपुर) को GI Tag प्राप्त है, लेकिन Cold Chain की कमी से निर्यात सीमित है।
तकनीक एवं मशीनीकरण की कमी
बिहार में कृषि मशीनीकरण का स्तर देश के अन्य राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा की तुलना में बहुत कम है। छोटी जोतें, बिखरी हुई भूमि, उच्च लागत और कम आय इसके मुख्य कारण हैं। इसके परिणामस्वरूप श्रम उत्पादकता और फसल उत्पादकता दोनों प्रभावित होती हैं।
- छोटी एवं खंडित जोतें: ट्रैक्टर-हार्वेस्टर के लिए न्यूनतम जोत आकार चाहिए, जो बिहार में अधिकांश किसानों के पास नहीं है।
- पूँजी का अभाव: सीमांत किसान ट्रैक्टर, Power Tiller या Rice Transplanter खरीदने में असमर्थ हैं।
- Custom Hiring Centres की कमी: किराये पर मशीनें उपलब्ध कराने वाले केन्द्रों की राज्य में बहुत कम संख्या है।
- मरम्मत/सर्विस अवसंरचना: गाँवों में कृषि मशीनरी की मरम्मत की सुविधा नहीं है।
- बिजली की अनुपलब्धता: विद्युत-चालित सिंचाई पम्प और थ्रेशर के लिए नियमित बिजली चाहिए जो बिहार के गाँवों में पर्याप्त नहीं है।
कृषि तकनीक की कमी का प्रभाव
| क्षेत्र | बिहार की स्थिति | राष्ट्रीय/पंजाब तुलना |
|---|---|---|
| धान की उत्पादकता | ~2.5 – 3 टन/हेक्टेयर | पंजाब: ~4 – 4.5 टन/हेक्टेयर |
| गेहूँ की उत्पादकता | ~2.8 – 3.2 टन/हेक्टेयर | पंजाब: ~4.5 – 5 टन/हेक्टेयर |
| Tractor Density | कम (प्रति 1000 हेक्टेयर) | पंजाब: अत्यधिक |
| Harvester का उपयोग | ~30-35% क्षेत्र में | पंजाब: ~90%+ |
बिहार सरकार कृषि यंत्रीकरण योजना के तहत किसानों को मशीन खरीदने पर 40-50% अनुदान दे रही है। Custom Hiring Centres (CHC) — जहाँ किसान सस्ते किराये पर ट्रैक्टर, हार्वेस्टर ले सकते हैं — इनकी संख्या बढ़ाई जा रही है। FPO के माध्यम से सामूहिक मशीनरी खरीद भी एक उपाय है।
सरकारी नीतियाँ एवं समाधान
बिहार सरकार और केन्द्र सरकार ने कृषि समस्याओं के समाधान हेतु अनेक योजनाएँ चलाई हैं। जल-जीवन-हरियाली मिशन, Bihar Agriculture Road Map, PMFBY, PM-KISAN जैसी योजनाएँ BPSC परीक्षा में बार-बार पूछी जाती हैं।


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