बिहार में सूखा एवं जल संकट
सिंचाई परियोजनाएँ, जल संरक्षण एवं समाधान — BPSC परीक्षा के लिए सम्पूर्ण अध्ययन
परिचय एवं पृष्ठभूमि
बिहार में सूखा (Drought) एक बहुआयामी संकट है जो BPSC परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ एक विचित्र विरोधाभास है — उत्तर बिहार में प्रतिवर्ष बाढ़ आती है, जबकि दक्षिण एवं मध्य बिहार के विशाल क्षेत्र सूखे की मार झेलते हैं। यह “बाढ़ और सूखा” का सह-अस्तित्व बिहार की जल प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती है।
बिहार में सूखे का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
बिहार सूखे का लंबा इतिहास रहा है। 1966-67 में भीषण अकाल पड़ा था। 2009 में मानसून की भारी विफलता के कारण राज्य के 22 जिले सूखाग्रस्त घोषित किए गए। 2019 में 13 जिलों में सूखे की स्थिति बनी। यह पैटर्न दर्शाता है कि सूखा बिहार के लिए एक आवर्ती (Recurring) आपदा है, न कि कोई असाधारण घटना।
राज्य में कुल 94 लाख हेक्टेयर शुद्ध बुआई क्षेत्र (Net Sown Area) में से मात्र 55% को ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। शेष 45% कृषि भूमि पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है — यही सूखे की असली जड़ है।
सूखे के प्रकार एवं मुख्य कारण
बिहार में सूखे को समझने के लिए उसके विभिन्न प्रकारों और कारणों को जानना आवश्यक है। BPSC Mains में इस पर विश्लेषणात्मक प्रश्न आते हैं।
सूखे के प्रकार (Types of Drought)
सूखे के प्रमुख कारण
El Niño के प्रभाव में बिहार में मानसून कमजोर पड़ जाता है। 2009, 2014, 2019 — तीनों सूखे वर्ष El Niño से जुड़े थे। Bay of Bengal से आने वाली नमी में कमी दक्षिण बिहार को सर्वाधिक प्रभावित करती है।
बिहार में वन आवरण मात्र 7.7% है, जो राष्ट्रीय लक्ष्य 33% से बहुत कम है। वन कटाई से मृदा अपरदन बढ़ता है, वर्षाजल संग्रहण क्षमता घटती है और स्थानीय वर्षा पैटर्न बिगड़ता है।
राज्य की सिंचाई क्षमता का पूर्ण दोहन नहीं हुआ। बनाई गई नहरों में से कई दशकों से रखरखाव के अभाव में बेकार हो चुकी हैं। पुरानी परियोजनाओं की Completion Rate मात्र 60-65% है।
तापमान वृद्धि, अनिश्चित वर्षा एवं मानसून की अवधि में बदलाव। IPCC रिपोर्ट के अनुसार गंगा मैदान में “Wet gets wetter, dry gets drier” का पैटर्न बढ़ रहा है।
दक्षिण बिहार के गया, औरंगाबाद, नवादा जिलों में भूजल “Critical” श्रेणी में। डीजल पंपसेट द्वारा अनियंत्रित दोहन ने Water Table को खतरनाक स्तर पर पहुँचाया।
पारंपरिक तालाब एवं आहर-पइन व्यवस्था उपेक्षित। स्वतंत्रता के बाद से अब तक बिहार में 50,000+ तालाब समाप्त हो चुके हैं — भूमि अतिक्रमण एवं देखरेख के अभाव में।
प्रभावित क्षेत्र एवं आँकड़े
बिहार में सूखे का भौगोलिक वितरण असमान है। दक्षिण एवं मध्य बिहार के जिले सर्वाधिक प्रभावित हैं, जबकि उत्तर बिहार बाढ़ से जूझता है।
सूखाग्रस्त जिलों का वर्गीकरण
| # | क्षेत्र | प्रमुख जिले | सूखे की तीव्रता | मुख्य फसल क्षति |
|---|---|---|---|---|
| 1 | दक्षिण बिहार | गया, औरंगाबाद, नवादा, अरवल | अत्यधिक (Severe) | धान, मक्का, दलहन |
| 2 | मध्य बिहार | पटना, जहानाबाद, नालंदा, शेखपुरा | मध्यम (Moderate) | धान, गेहूँ, सब्जी |
| 3 | मगध क्षेत्र | बोधगया (गया), जमुई, लखीसराय | अत्यधिक (Severe) | धान, मक्का |
| 4 | पूर्वी बिहार | बाँका, मुंगेर, भागलपुर | हल्का (Mild) | मक्का, आम |
| 5 | उत्तर-पश्चिम | पश्चिम चंपारण, गोपालगंज | हल्का (Mild) | गन्ना, धान |
सिंचाई की स्थिति — आँकड़े
प्रमुख सिंचाई परियोजनाएँ
बिहार सरकार ने सूखे से निपटने के लिए अनेक सिंचाई परियोजनाएँ शुरू की हैं। BPSC Prelims में परियोजनाओं के नाम, स्थान और लाभान्वित जिले पूछे जाते हैं।
बड़ी एवं मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ
स्थापना: 1959 में Indo-Nepal संधि के तहत। बाँध: वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण)। लाभान्वित जिले: पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, सारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर। यह परियोजना नेपाल के साथ संयुक्त है — भारत और नेपाल दोनों इससे सिंचाई लाभ उठाते हैं।
- कुल नहर लंबाई: 3,800 किमी से अधिक (भारत भाग)
- सिंचाई क्षमता: लगभग 14 लाख हेक्टेयर (बिहार+UP)
- बिजली उत्पादन: 15 MW + 15 MW (दोनों तरफ)
- महत्व: उत्तर-पश्चिम बिहार की प्रमुख सिंचाई धमनी
स्थान: हनुमाननगर बाँध, नेपाल। भारत-नेपाल संधि: 1954। कोसी को “बिहार का शोक” कहा जाता है, परंतु इस परियोजना से सिंचाई भी होती है।
- लाभान्वित जिले: सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया, पूर्णिया
- सिंचाई क्षमता: लगभग 9 लाख हेक्टेयर
- बाढ़ नियंत्रण: तटबंधों द्वारा 21,000 sq km क्षेत्र की सुरक्षा
- विद्युत: 20 MW Kosi Hydel Project
ऐतिहासिक महत्व: ब्रिटिश काल में 1874 में स्थापित, यह भारत की प्राचीनतम नहर परियोजनाओं में से एक है। इंद्रपुरी बैराज (रोहतास) मुख्य संरचना है।
- लाभान्वित जिले: रोहतास, भोजपुर, बक्सर, पटना, नालंदा, गया, औरंगाबाद, अरवल
- सिंचाई क्षमता: लगभग 7 लाख हेक्टेयर
- नहर लंबाई: 1,140 किमी (पूर्वी + पश्चिमी शाखा)
- महत्व: दक्षिण बिहार की जीवनरेखा — रबी फसलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण
स्थान: कैमूर जिला, दुर्गावती नदी पर। यह दक्षिण बिहार के पठारी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण परियोजना है।
- लाभान्वित क्षेत्र: कैमूर, रोहतास के पहाड़ी इलाके
- उद्देश्य: पेयजल + सिंचाई + बिजली
- विशेषता: Rock-fill बाँध — बिहार के कैमूर पठार पर अनूठी संरचना
नदी: बागमती (Nepal से आती है)। यह परियोजना उत्तर-मध्य बिहार के लिए महत्वपूर्ण है। ढेंग बाँध प्रमुख संरचना है।
- लाभान्वित जिले: सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, समस्तीपुर
- सिंचाई क्षमता: 2.5 लाख हेक्टेयर
- बाढ़ नियंत्रण + सिंचाई दोनों उद्देश्य
स्थान: झारखंड-बिहार सीमा पर। मंडल बाँध मुख्य संरचना। यह बिहार-झारखंड की संयुक्त परियोजना है।
- लाभान्वित जिले: औरंगाबाद, गया, रोहतास (बिहार) + पलामू (झारखंड)
- सिंचाई क्षमता: 2.96 लाख हेक्टेयर (बिहार)
- स्थिति: अधूरी — झारखंड-बिहार विवाद के कारण लंबित
प्रमुख परियोजनाओं का तुलनात्मक अवलोकन
| # | परियोजना | नदी | स्थापना वर्ष | सिंचाई क्षमता (हेक्टेयर) | प्रमुख लाभान्वित जिले |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | गंडक | गंडक (नारायणी) | 1959 | 14 लाख | पश्चिम चंपारण, मुजफ्फरपुर |
| 2 | कोसी | कोसी | 1954 | 9 लाख | सुपौल, सहरसा, मधेपुरा |
| 3 | सोन नहर | सोन | 1874 | 7 लाख | रोहतास, गया, भोजपुर |
| 4 | बागमती | बागमती | 1970 के दशक | 2.5 लाख | सीतामढ़ी, दरभंगा |
| 5 | उत्तर कोयल | उत्तरी कोयल | 1972 (अधूरी) | 2.96 लाख | औरंगाबाद, गया, रोहतास |
| 6 | दुर्गावती | दुर्गावती | 1980 के दशक | 0.8 लाख | कैमूर, रोहतास |
जल संरक्षण के उपाय एवं पारंपरिक व्यवस्था
जल संरक्षण में बिहार की पारंपरिक “आहर-पइन” व्यवस्था विश्व-प्रसिद्ध थी। आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से ही सूखे का स्थायी समाधान संभव है — यह BPSC Mains का केंद्रीय विषय है।
1. पारंपरिक “आहर-पइन” व्यवस्था
2. आधुनिक जल संरक्षण तकनीकें
3. चेक डैम एवं माइक्रो-वॉटरशेड
दक्षिण बिहार के पहाड़ी एवं पठारी क्षेत्रों में छोटे-छोटे Check Dams (रोक बाँध) बनाए जा रहे हैं। ये नदी-नालों के पानी को रोककर भूजल रिचार्ज करते हैं। MGNREGS (मनरेगा) के तहत बिहार में हजारों ऐसे Check Dams बनाए गए हैं। गया जिले के फल्गु नदी बेसिन में यह विशेष रूप से प्रभावी रहा है।
4. तालाब पुनर्जीवन कार्यक्रम
बिहार सरकार का “जल-जीवन-हरियाली” अभियान (2019 में शुरू) राज्य भर में बंद पड़े तालाबों को पुनर्जीवित कर रहा है। इसके तहत 2.5 लाख तालाबों को पुनर्स्थापित करने का लक्ष्य है। साथ ही नए कुएँ, पोखर और चापाकल का निर्माण भी इस अभियान का हिस्सा है।
5. फसल-प्रणाली में बदलाव (Crop Diversification)
सूखे से बचाव का एक महत्वपूर्ण उपाय है जल-संवेदनशील फसल प्रणाली अपनाना। बिहार कृषि विभाग ने सूखाग्रस्त जिलों में धान की जगह मक्का, दलहन, तिलहन को बढ़ावा दिया है। ये फसलें 50-60% कम पानी में हो जाती हैं। SRI (System of Rice Intensification) विधि से धान में 30% कम पानी लगता है और उपज बढ़ती है।
सरकारी योजनाएँ एवं नीतियाँ
केंद्र एवं राज्य सरकार ने सूखे एवं जल संकट से निपटने के लिए अनेक महत्वपूर्ण योजनाएँ लागू की हैं। इन योजनाओं के नाम, उद्देश्य और लाभ BPSC Prelims एवं Mains दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
केंद्र सरकार की प्रमुख योजनाएँ
बिहार सरकार की प्रमुख योजनाएँ
BPSC BPSC-Box: परीक्षा के लिए विशेष तथ्य
📋 BPSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण
MCQ अभ्यास — BPSC Prelims
सारांश, PYQ एवं त्वरित-पुनरीक्षण
त्वरित-पुनरीक्षण तालिका
निष्कर्ष
बिहार में सूखे की समस्या जटिल है — इसकी जड़ें भौगोलिक, ऐतिहासिक और नीतिगत हैं। पारंपरिक “आहर-पइन” की पुनर्स्थापना, आधुनिक Drip Irrigation, सोन-गंडक-कोसी जैसी परियोजनाओं का पूर्ण उपयोग और PMKSY जैसी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन मिलकर ही इस संकट का समाधान कर सकते हैं। IWRM (Integrated Water Resource Management) ही बिहार के लिए सतत विकास का मार्ग है।


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