बिहार का जलवायु परिवर्तन
कृषि और जल संसाधनों पर प्रभाव — Bihar Govt. Competitive Exams एवं राज्य सेवा परीक्षाओं के लिए सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं पृष्ठभूमि
बिहार का जलवायु परिवर्तन Bihar Govt. Competitive Exams एवं Bihar राज्य सेवा परीक्षाओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है — यह राज्य भारत के सर्वाधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है, जहाँ कृषि एवं जल संसाधन दोनों पर इसके गम्भीर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव देखे जा रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन क्या है?
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से तात्पर्य दीर्घकालिक मौसमी प्रतिरूपों में होने वाले उन परिवर्तनों से है, जो मुख्यतः मानवीय गतिविधियों — जैसे जीवाश्म ईंधन के दहन, वनों की कटाई एवं औद्योगीकरण — के कारण वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों (CO₂, CH₄, N₂O) की बढ़ती सांद्रता से उत्पन्न होते हैं। IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) के अनुसार वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.1°C ऊपर पहुँच चुका है।
बिहार की भौगोलिक स्थिति इसे विशेष रूप से असुरक्षित बनाती है — उत्तर में हिमालय से आने वाली नदियाँ (गंगा, कोसी, गण्डक, बागमती), मध्य में उपजाऊ गंगा का मैदान, और दक्षिण में छोटानागपुर पठार की सीमा। इस विविध स्थलाकृति के कारण बिहार एक ही समय में बाढ़ एवं सूखे का सामना करता है।
बिहार में जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारक
- हिमालयी हिमखण्डों का पिघलना: ग्लेशियरों के तीव्र गति से पिघलने के कारण उत्तरी बिहार की नदियों में जल प्रवाह अनियमित हो रहा है।
- वनों की कटाई: बिहार में वन आवरण (Forest Cover) मात्र 7.6% है, जो राष्ट्रीय लक्ष्य 33% से बहुत कम है। इससे कार्बन अवशोषण क्षमता घटी है।
- भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन: कृषि हेतु बोरवेल से अनियंत्रित जल दोहन जल चक्र को प्रभावित करता है।
- नदियों का अतिक्रमण एवं प्रदूषण: गंगा एवं सहायक नदियों में बढ़ता प्रदूषण जलीय पारिस्थितिकी को नष्ट कर रहा है।
- नगरीकरण: पटना, गया, मुज़फ्फरपुर जैसे शहरों में तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण ताप-द्वीप (Urban Heat Island) प्रभाव उत्पन्न कर रहा है।
बिहार की जलवायु — वर्तमान स्थिति एवं परिवर्तन के संकेत
बिहार उपोष्ण कटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Sub-tropical Monsoon Climate) क्षेत्र में स्थित है। राज्य की औसत वार्षिक वर्षा 1,200 मिमी है, किन्तु जलवायु परिवर्तन के कारण यह प्रतिरूप तेज़ी से बदल रहा है।
| क्र. | जलवायु सूचक | पूर्व स्थिति (1960–1990) | वर्तमान स्थिति (2000–2024) | परिवर्तन का प्रभाव |
|---|---|---|---|---|
| 1 | औसत तापमान | 24.5°C | 25.3°C–25.7°C | 0.8–1.2°C की वृद्धि |
| 2 | अधिकतम तापमान (मई) | 42°C तक | 45°C–47°C तक | लू (Heat Wave) की बारम्बारता 3 गुना बढ़ी |
| 3 | वार्षिक वर्षा | 1,150–1,250 मिमी (नियमित) | अत्यधिक परिवर्तनशील | उत्तर में अतिवृष्टि, दक्षिण में अल्पवृष्टि |
| 4 | मानसून प्रारम्भ | 15–20 जून (नियमित) | 10 जून–5 जुलाई (अनिश्चित) | खरीफ बुवाई में विलम्ब |
| 5 | ठंड का मौसम | नवम्बर–फ़रवरी | दिसम्बर–जनवरी (संकुचित) | रबी फसलें प्रभावित |
| 6 | अत्यधिक वर्षा के दिन | 3–5 दिन/वर्ष | 8–15 दिन/वर्ष | अचानक बाढ़ (Flash Flood) में वृद्धि |
क्षेत्रीय जलवायु विभाजन एवं परिवर्तन
बिहार को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में तीन प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है। उत्तरी बिहार (तराई क्षेत्र) में अत्यधिक वर्षा एवं बाढ़ की समस्या गम्भीर है; यहाँ गंगा, कोसी, गण्डक, बागमती, बूढ़ी गण्डक जैसी नदियाँ नेपाल से आती हैं और हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से इनमें जल प्रवाह अनिश्चित हो गया है। मध्य बिहार (गंगा मैदान) में मानसून की अनियमितता से कृषि उत्पादन प्रभावित है। दक्षिण बिहार (छोटानागपुर पठार की सीमा) में वर्षा की कमी एवं जल संकट तीव्र है।
कृषि पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
बिहार की 76% जनसंख्या कृषि पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर है और राज्य की GDP में कृषि का योगदान लगभग 18% है। जलवायु परिवर्तन इस कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहा है।
प्रमुख फसलों पर प्रभाव
| फसल | वर्तमान उत्पादन | जलवायु खतरा | अनुमानित नुकसान (2050 तक) |
|---|---|---|---|
| धान (Paddy) | ~5–6 मिलियन टन/वर्ष | देर से मानसून, बाढ़, उच्च तापमान | उत्पादन में 20–30% गिरावट |
| गेहूँ (Wheat) | ~4–5 मिलियन टन/वर्ष | मार्च में अचानक गर्मी (Terminal Heat Stress) | 15–25% उत्पादन हानि |
| मक्का (Maize) | ~3 मिलियन टन/वर्ष | अनियमित वर्षा, जलभराव | 10–15% गिरावट |
| लीची (Muzaffarpur) | विश्व उत्पादन का ~40% | असमय फूल आना, तापमान वृद्धि | गुणवत्ता एवं मात्रा दोनों प्रभावित |
| दलहन / तिलहन | सीमित उत्पादन | लम्बा सूखा काल | क्षेत्रफल एवं उत्पादन दोनों में कमी |
कृषि पर प्रमुख दुष्प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण
बिहार में धान की रोपाई के लिए जुलाई के प्रथम सप्ताह में पर्याप्त वर्षा आवश्यक होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का आगमन अनिश्चित हो गया है — कभी 10 जून को आता है तो कभी 5 जुलाई तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इस देरी से Transplanting Window छोटी हो जाती है, किसान कम उत्पादक किस्मों का चयन करने को मजबूर होते हैं। देर से रोपाई होने पर फसल को पूरा बढ़वार काल नहीं मिलता, जिससे उत्पादन घटता है।
इसी तरह रबी फसल (गेहूँ) के लिए नवम्बर-दिसम्बर में उचित ठण्ड आवश्यक है। यदि शीतकाल देर से आए या अल्पकालिक हो तो गेहूँ की Vernalization प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन घटता है।
तापमान में प्रत्येक 1°C की वृद्धि से गेहूँ का उत्पादन 6–7% तक घट सकता है। धान के लिए परागण (Pollination) की प्रक्रिया 35°C से ऊपर तापमान पर बाधित होती है, जिससे दाने खोखले रह जाते हैं (Spikelet Sterility)। मई-जून में पड़ने वाली लू (Heat Wave) सब्जी एवं फल फसलों को नष्ट कर देती है।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर (भागलपुर) के शोध के अनुसार यदि तापमान 2°C और बढ़ा तो धान की उत्पादकता 25–30% तक घट सकती है। यह बिहार की खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत गम्भीर संकट होगा।
तापमान वृद्धि एवं आर्द्रता में परिवर्तन के कारण कृषि कीट-रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है। Brown Plant Hopper (BPH) — धान का प्रमुख कीट — उच्च तापमान में अधिक तेज़ी से प्रजनन करता है। धान में Blast एवं Bacterial Leaf Blight जैसी बीमारियाँ अधिक प्रकोप दिखा रही हैं। गेहूँ में Rust (गेरुई) का खतरा बढ़ा है।
कीटनाशकों के अधिक उपयोग से कृषि लागत बढ़ती है और मिट्टी एवं जल प्रदूषण भी होता है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति और खराब होती है।
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा अनियमित होने से सिंचाई की माँग बढ़ी है। बिहार में सिंचाई का मुख्य स्रोत भूजल (Groundwater) है — लगभग 70% कृषि क्षेत्र सिंचाई के लिए बोरवेल पर निर्भर है। बढ़ती गर्मी और अनियमित वर्षा के कारण बोरवेल से अधिक जल निकाला जाता है, जिससे भूजल स्तर तेज़ी से गिर रहा है।
गया, नवादा, जहानाबाद, औरंगाबाद जैसे दक्षिण बिहार के जिलों में भूजल स्तर 3–8 मीटर तक गिर चुका है। इससे सिंचाई लागत बढ़ रही है और किसानों का शुद्ध लाभ (Net Income) घट रहा है।
जलवायु-जनित फसल हानि से प्रतिवर्ष बिहार को ₹3,000–5,000 करोड़ की कृषि क्षति होती है। इससे किसानों का ऋण बोझ बढ़ता है।
बिहार की 33.7% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है। फसल उत्पादन में गिरावट से इस वर्ग की खाद्य सुरक्षा सीधे प्रभावित होती है।
कृषि विफलता के कारण ग्रामीण पलायन (Rural-Urban Migration) बढ़ रही है। बिहार पहले से ही देश में सर्वाधिक पलायन वाले राज्यों में से एक है।
चारे की कमी, पशुओं में ताप-तनाव (Heat Stress), पशु रोगों में वृद्धि — इन सबसे दूध उत्पादन एवं पशुधन क्षेत्र प्रभावित है।
जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
बिहार में जल की उपलब्धता एक ही समय में दो विपरीत समस्याओं का सामना कर रही है — उत्तर में जल की अधिकता (बाढ़) और दक्षिण में जल की कमी (सूखा)। जलवायु परिवर्तन इस विरोधाभास को और तीव्र कर रहा है।
बिहार की प्रमुख नदियाँ एवं जलवायु प्रभाव
| नदी | उद्गम / स्रोत | जलवायु परिवर्तन का प्रभाव | प्रभावित जिले |
|---|---|---|---|
| गंगा | हिमालयी ग्लेशियर + वर्षा | ग्लेशियर पिघलने से जलप्रवाह अनिश्चित; प्रदूषण में वृद्धि | पटना, भागलपुर, मुंगेर, सारण |
| कोसी | नेपाल हिमालय (7 धाराएँ) | “बिहार का शोक” — बाढ़ की बारम्बारता एवं तीव्रता में वृद्धि | सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया |
| गण्डक | नेपाल (काली गण्डकी) | मानसून में अत्यधिक जल; शुष्क काल में न्यून प्रवाह | गोपालगंज, सिवान, चम्पारण |
| बागमती | नेपाल (काठमाण्डू घाटी) | मानसून में भीषण बाढ़; बाढ़ चक्र में अनियमितता | सीतामढ़ी, दरभंगा, मुज़फ्फरपुर |
| फल्गु (गया) | छोटानागपुर + वर्षा | वर्षा कम होने से मौसमी नदी बन रही है; गर्मियों में सूखी | गया, नवादा |
| सोन | अमरकंटक पठार | वर्षा कम होने से जलप्रवाह घटा; सिंचाई क्षमता घटी | रोहतास, भोजपुर, पटना |
भूजल (Groundwater) संकट
बिहार में भूजल पर कृषि की अत्यधिक निर्भरता ने पहले से ही संकट उत्पन्न किया है, और जलवायु परिवर्तन इसे और गहरा कर रहा है। Central Ground Water Board (CGWB) के अनुसार बिहार के 38 में से 12 जिले भूजल के अत्यधिक दोहन की श्रेणी में हैं। गया, औरंगाबाद, जहानाबाद, नवादा एवं रोहतास जिलों में भूजल का वार्षिक दोहन वार्षिक पुनर्भरण (Recharge) से अधिक हो गया है।
तालाब, आर्द्रभूमि एवं जलाशयों पर प्रभाव
बिहार में परम्परागत रूप से तालाब (Pond) एवं आहर-पाइन (Ahar-Pyne) जल प्रबंधन की समृद्ध परम्परा रही है। जलवायु परिवर्तन एवं भूमि उपयोग परिवर्तन के कारण ये जल निकाय तेज़ी से नष्ट हो रहे हैं। पटना में 1970 में जहाँ 1,200 से अधिक तालाब थे, वहीं आज मात्र 200–250 बचे हैं। आर्द्रभूमि (Wetland) के सूखने से जैव विविधता को भी नुकसान पहुँचा है।
- आहर: नदी के पानी को संग्रहीत करने के लिए बनाए गए छोटे जलाशय/तालाब।
- पाइन: आहर से खेतों तक जल पहुँचाने वाली नहरें (Channels)।
- वितरण: मुख्यतः दक्षिण बिहार (गया, नालंदा, औरंगाबाद) में प्रचलित।
- संकट: जलवायु परिवर्तन, बाढ़, अतिक्रमण एवं उपेक्षा से यह प्रणाली तेज़ी से नष्ट हो रही है।
बाढ़ एवं सूखा — दोहरी मार
बिहार विश्व के उन विरले क्षेत्रों में से एक है जहाँ एक ही वर्ष में, कभी-कभी एक ही समय में, राज्य के उत्तरी भाग में विनाशकारी बाढ़ और दक्षिणी भाग में गम्भीर सूखे की स्थिति बनती है — जलवायु परिवर्तन इस विरोधाभास को निरंतर तीव्र कर रहा है।
- बाढ़प्रभावित क्षेत्र: बिहार का 76% उत्तरी भाग बाढ़ प्रभावित है।
- वार्षिक प्रभावित जनसंख्या: लगभग 2–3 करोड़ लोग।
- वार्षिक आर्थिक नुकसान: ₹3,000–10,000 करोड़।
- कारण: नेपाल से आने वाली नदियाँ, ग्लेशियर का पिघलना, अतिवृष्टि।
- प्रमुख बाढ़ वर्ष: 1987, 2004, 2007, 2008, 2011, 2017, 2019, 2021।
- सूखाप्रभावित जिले: मुख्यतः 17–20 दक्षिणी जिले।
- कारण: अनियमित मानसून, वन कटाई, भूजल की कमी।
- प्रमुख सूखा वर्ष: 2002, 2004, 2009, 2014, 2016।
- फसल हानि: धान, मक्का, दलहन — 30–50% तक।
- पीने के पानी का संकट: गया, औरंगाबाद, जहानाबाद में गम्भीर।
बाढ़ के कारण — जलवायु परिवर्तन की भूमिका
तापमान वृद्धि के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं। इससे नदियों में अचानक जल प्रवाह बढ़ जाता है (Glacial Lake Outburst Flood — GLOF)।
जलवायु परिवर्तन से अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ (24 घण्टे में 100 मिमी से अधिक) बढ़ी हैं, जिससे अचानक बाढ़ (Flash Flood) आती है।
जलग्रहण क्षेत्रों (Catchment Areas) में वन कटाई से वर्षा जल का अवशोषण कम हो गया है, फलतः अपवाह (Runoff) बढ़ा है।
बिहार में 3,700 किमी से अधिक तटबंध हैं, परंतु इनकी अपर्याप्त देखभाल एवं टूटने की घटनाएँ बाढ़ की विभीषिका बढ़ाती हैं।
बाढ़ एवं सूखे का कृषि-जल चक्र पर संयुक्त प्रभाव
बाढ़ के दौरान मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत बह जाती है (Soil Erosion), जिससे दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता घटती है। जलभराव के कारण मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है (Anaerobic conditions), जिससे फसल की जड़ें सड़ जाती हैं। दूसरी ओर, सूखे से मिट्टी में दरारें पड़ती हैं, जैविक पदार्थ नष्ट होते हैं और भूमि की उत्पादकता स्थायी रूप से घटती है।
सरकारी नीतियाँ, योजनाएँ एवं अनुकूलन उपाय
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र एवं बिहार राज्य सरकार ने अनेक नीतियाँ एवं योजनाएँ बनाई हैं। Bihar Govt. Competitive Exams में इन योजनाओं के नाम, उद्देश्य एवं महत्व से प्रश्न पूछे जाते हैं।
राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख नीतियाँ
बिहार राज्य सरकार की प्रमुख पहलें
BSAPCC (2015) बिहार का जलवायु परिवर्तन से निपटने का आधिकारिक राज्य दस्तावेज़ है। इसमें 6 प्राथमिकता क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं: कृषि एवं खाद्य सुरक्षा; जल संसाधन प्रबंधन; वन एवं जैव विविधता; स्वास्थ्य; आपदा प्रबंधन; एवं ऊर्जा। प्रत्येक क्षेत्र के लिए अनुकूलन (Adaptation) एवं न्यूनीकरण (Mitigation) रणनीतियाँ तय की गई हैं।
बिहार सरकार द्वारा 2019 में प्रारम्भ यह महत्वाकांक्षी अभियान जलवायु परिवर्तन से निपटने में एक ऐतिहासिक कदम है। इस अभियान के प्रमुख लक्ष्य हैं: 24 लाख पौधे लगाना; 1 लाख तालाब/पोखर का निर्माण एवं जीर्णोद्धार; सार्वजनिक कुएँ का पुनरुद्धार; चापाकल का सौरकरण; सरकारी भवनों पर Solar Panel स्थापना; एवं River Rejuvenation। यह अभियान ₹24,524 करोड़ के बजट से चलाया जा रहा है।
बिहार कृषि विभाग एवं ICAR-RCER (पटना) द्वारा जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रमुख उपाय: Sahbhagi Dhan (बाढ़-सहनशील धान किस्म) का प्रसार; Rajendra Bhagwa (सूखा-सहनशील किस्म); Zero Tillage तकनीक से गेहूँ उत्पादन — ईंधन एवं जल की बचत; SRI (System of Rice Intensification) — 40% जल बचत; IFFCO Nano Urea के उपयोग को प्रोत्साहन; एवं मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) के आधार पर खाद प्रबंधन।
बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (BSDMA) जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में बाढ़ प्रबंधन को नई दिशा दे रहा है। प्रमुख कदम: नदी तटबंधों की मरम्मत एवं सुदृढ़ीकरण; Early Warning System (EWS) — SMS के माध्यम से 72 घण्टे पूर्व बाढ़ चेतावनी; Community-based Disaster Risk Reduction (CBDRR); बाढ़ आश्रय स्थलों का निर्माण; India Meteorological Department (IMD) के साथ समन्वय।
अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ एवं बिहार
भारत ने Paris Agreement (2015) के तहत NDC (Nationally Determined Contribution) में 2070 तक Net Zero Emissions का लक्ष्य रखा है। बिहार इस दिशा में Solar Energy, वृक्षारोपण एवं जल संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। Green Climate Fund (GCF) एवं Adaptation Fund से बिहार को वित्तीय सहायता मिल सकती है।
सारांश, स्मरण-सूत्र एवं परीक्षा प्रश्न
इस खण्ड में बिहार के जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं जल संसाधन पर प्रभाव का सम्पूर्ण सारांश, परीक्षा की दृष्टि से स्मरण-सूत्र एवं Bihar Govt. Competitive Exams स्तर के प्रश्न प्रस्तुत हैं।


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