बिहार में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ
Bihar Govt. Competitive Exams के लिए
परिचय एवं वैश्विक संदर्भ
बिहार में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ Bihar Govt. Competitive Exams एवं बिहार राज्य सेवा परीक्षाओं का एक अत्यंत प्रासंगिक विषय है — यह राज्य भारत के सर्वाधिक जलवायु-संवेदनशील राज्यों में सम्मिलित है, जहाँ एक साथ बाढ़, सूखा, तापमान वृद्धि, भूजल संकट और पारिस्थितिक विनाश जैसी बहुआयामी चुनौतियाँ मौजूद हैं।
जलवायु परिवर्तन — मूल अवधारणा
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से तात्पर्य दीर्घकालिक मौसमी प्रतिरूपों में उन स्थायी परिवर्तनों से है जो मुख्यतः मानवीय गतिविधियों के कारण वायुमण्डल में ग्रीनहाउस गैसों — CO₂, CH₄, N₂O, जलवाष्प — की बढ़ती सांद्रता से उत्पन्न होते हैं। IPCC की AR6 रिपोर्ट (2021) के अनुसार वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.1°C ऊपर पहुँच चुका है और यदि उत्सर्जन इसी गति से जारी रहा तो 2100 तक 3–4°C की वृद्धि संभव है।
बिहार की विशेष भौगोलिक स्थिति — उत्तर में नेपाल हिमालय, मध्य में गंगा का उपजाऊ मैदान और दक्षिण में छोटानागपुर पठार की सीमा — इसे जलवायु परिवर्तन के लिए अत्यंत असुरक्षित बनाती है। राज्य की 76% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और इसका अधिकांश भाग गरीबी रेखा के निकट जीवनयापन करता है, जिससे जलवायु आघातों को सहन करने की क्षमता (Adaptive Capacity) अत्यंत सीमित है।
बिहार में जलवायु परिवर्तन के प्रमुख चालक (Drivers)
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन: वैश्विक स्तर पर CO₂ सांद्रता 420 ppm (2023) तक पहुँच चुकी है — औद्योगिक क्रांति से पूर्व यह 280 ppm थी।
- हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना: उत्तरी बिहार की नदियों (कोसी, गण्डक, बागमती) का जल इन ग्लेशियरों पर निर्भर है; ग्लेशियर पिघलने से जलप्रवाह अनियमित हो रहा है।
- वनों की कटाई: बिहार का वन आवरण मात्र 7.6% है, जो राष्ट्रीय लक्ष्य 33% से बहुत कम है — इससे कार्बन अवशोषण एवं जल धारण क्षमता दोनों घटे हैं।
- भूमि उपयोग परिवर्तन: तालाब, आर्द्रभूमि एवं हरित क्षेत्रों का विनाश — पटना में 1970 के 1,200+ तालाब अब घटकर ~200 रह गए हैं।
- अनियंत्रित कृषि: धान की खेती में मीथेन उत्सर्जन; रासायनिक उर्वरकों से N₂O उत्सर्जन।
- नगरीकरण: पटना, गया, मुज़फ्फरपुर में तीव्र नगरीकरण — Urban Heat Island प्रभाव एवं कंक्रीटीकरण से वर्षाजल अपवाह बढ़ा।
चुनौती-1: अनियमित मानसून एवं वर्षा प्रतिरूप
बिहार की कृषि एवं जल-व्यवस्था मानसून पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का समय, अवधि और वितरण तीनों अनियमित हो गए हैं — यह बिहार के लिए सबसे बड़ी और सबसे व्यापक चुनौती है।
| मानसून पहलू | पूर्व स्थिति (1960–1990) | वर्तमान स्थिति (2000–2024) | परिणाम |
|---|---|---|---|
| आगमन तिथि | 15–20 जून (नियमित) | 10 जून – 5 जुलाई (अनिश्चित) | खरीफ बुवाई में विलम्ब |
| कुल वर्षा | 1,150–1,250 मिमी (स्थिर) | अत्यधिक परिवर्तनशील | कृषि अनिश्चितता |
| वर्षा वितरण | समान वितरण | उत्तर में अतिवृष्टि, दक्षिण में अल्पवृष्टि | एक साथ बाढ़ + सूखा |
| अत्यधिक वर्षा दिन | 3–5 दिन/वर्ष | 8–15 दिन/वर्ष | Flash Flood में वृद्धि |
| Dry Spells | 2–3 दिन लगातार | 7–14 दिन लगातार | खड़ी फसल नष्ट |
| मानसून विदाई | अक्टूबर प्रथम सप्ताह | अक्टूबर मध्य–नवम्बर | रबी बुवाई में देरी |
मानसून अनियमितता के कारण
बंगाल की खाड़ी एवं हिन्द महासागर का तापमान बढ़ने से मानसूनी पवनों की दिशा एवं तीव्रता प्रभावित होती है। El Niño वर्षों में बिहार में मानसून कमजोर पड़ता है।
हिमालय के ग्लेशियरों एवं बर्फ की चादर में कमी से पर्वतीय वायु-प्रवाह बदल रहा है, जो मानसून के प्रवेश एवं वितरण को प्रभावित करता है।
वन एवं आर्द्रभूमि के नष्ट होने से वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) कम हुआ है, जिससे स्थानीय वर्षा चक्र बाधित हुआ है।
शहरों में बढ़ते ताप-द्वीप (Urban Heat Island) स्थानीय वायुदाब को प्रभावित करते हैं, जिससे वर्षा का स्थानिक वितरण अनियमित होता है।
कृषि एवं जल पर अनियमित मानसून का प्रभाव
धान की रोपाई के लिए जुलाई के प्रथम सप्ताह में निरंतर वर्षा आवश्यक है। मानसून देर से आने पर किसान या तो बुवाई स्थगित करते हैं या कम उत्पादक बीजों का प्रयोग करते हैं। मानसून के बीच अचानक Dry Spell आने से खड़ी फसल मर जाती है — और जब वर्षा लौटती है तो जलभराव से फसल पुनः नष्ट हो जाती है। इस प्रकार किसान को दोहरी मार झेलनी पड़ती है।
जल संसाधनों पर प्रभाव और भी गहरा है — अनियमित वर्षा से तालाबों एवं जलाशयों का पुनर्भरण (Recharge) अनिश्चित हो गया है। नदियों में मानसून के दौरान अचानक बाढ़ और शुष्क काल में न्यूनतम प्रवाह — दोनों स्थितियाँ जल प्रबंधन को कठिन बनाती हैं।
चुनौती-2: तापमान वृद्धि एवं लू (Heat Wave)
पिछले 100 वर्षों में बिहार का औसत तापमान 0.8°C–1.2°C बढ़ा है। यह वृद्धि देखने में मामूली लग सकती है, किन्तु इसके परिणाम — फसल विफलता, लू से मौतें, भूजल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन — अत्यंत गम्भीर हैं।
तापमान वृद्धि से उत्पन्न प्रमुख चुनौतियाँ
तापमान में प्रत्येक 1°C की वृद्धि से गेहूँ का उत्पादन 6–7% तक घट सकता है। धान में 35°C से ऊपर तापमान पर परागण बाधित होता है — दाने खोखले रह जाते हैं (Spikelet Sterility)। मार्च में अचानक गर्मी (Terminal Heat Stress) से गेहूँ की फसल क्षति होती है। लीची (Muzaffarpur — विश्व उत्पादन का ~40%) उच्च तापमान से असमय फूलती है, जिससे उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों घटते हैं।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के अनुसार यदि तापमान 2°C और बढ़ा तो धान की उत्पादकता 25–30% तक घट सकती है — जो बिहार की खाद्य सुरक्षा के लिए एक भयावह संकेत है।
उच्च तापमान से जल का वाष्पीकरण (Evaporation) तेज़ी से बढ़ता है — तालाब एवं जलाशय जल्दी सूखते हैं। नदियों में शुष्क काल में जलप्रवाह और कम हो जाता है। Potential Evapotranspiration (PET) बढ़ने से सिंचाई की माँग में 15–20% की वृद्धि हो रही है, जिससे भूजल पर दबाव और बढ़ता है।
लू (Heat Wave) बिहार में एक गम्भीर स्वास्थ्य आपदा बन रही है। Heat Stroke, Dehydration, Heat Exhaustion जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। सर्वाधिक प्रभावित: वृद्ध, बच्चे, बाहरी श्रमिक एवं किसान। IMD के अनुसार Heat Wave को तब घोषित किया जाता है जब अधिकतम तापमान मैदानी क्षेत्रों में 40°C या सामान्य से 4.5°C अधिक हो।
चुनौती-3: बाढ़ एवं जल-प्रलय
बाढ़ बिहार की सबसे विनाशकारी आवर्ती आपदा है। देश की कुल बाढ़प्रभावित भूमि का 17.2% बिहार में है और राज्य का 76% उत्तरी क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आता है। जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और तीव्र एवं अप्रत्याशित बना दिया है।
बाढ़ की तीव्रता एवं बारम्बारता में वृद्धि — कारण
हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) का खतरा। नेपाल में बनी ग्लेशियर झीलें फटने पर कोसी, गण्डक जैसी नदियों में अचानक जलस्तर बढ़ जाता है।
जलवायु परिवर्तन से 24 घण्टे में 100 मिमी+ वर्षा की घटनाएँ बढ़ रही हैं। एकाएक भारी वर्षा से नदियाँ उफन जाती हैं — तटबंध टूटते हैं।
नेपाल एवं उत्तरी बिहार में जलग्रहण क्षेत्रों (Catchment Areas) में वन नष्ट होने से वर्षाजल का मृदा-अवशोषण कम हुआ और सतही अपवाह (Surface Runoff) बढ़ा।
बिहार में 3,700 किमी से अधिक तटबंध हैं। अपर्याप्त रखरखाव एवं जलवायु-जनित असाधारण बाढ़ से ये तटबंध टूटते हैं — 2008 की कोसी त्रासदी इसका उदाहरण है।
प्रमुख बाढ़ घटनाएँ एवं जलवायु सम्बन्ध
| वर्ष | प्रभावित क्षेत्र | विशेषता | जलवायु कारण |
|---|---|---|---|
| 1987 | उत्तर बिहार | 20वीं सदी की सबसे बड़ी बाढ़; 2,000+ मौतें | असाधारण मानसून वर्षा |
| 2004 | 18 जिले | बाढ़ + सूखा एक साथ | अनियमित मानसून वितरण |
| 2007 | 22 जिले | 28 लाख प्रभावित; ₹1,300 करोड़ हानि | नेपाल में भारी वर्षा |
| 2008 | सुपौल, सहरसा, मधेपुरा | कोसी महाप्रलय — 22 लाख विस्थापित | नेपाल में तटबंध टूटा + GLOF |
| 2017 | 19 जिले | 1.2 करोड़ प्रभावित; 514 मौतें | Extreme Rainfall Events |
| 2021 | उत्तर बिहार | अक्टूबर में अचानक बाढ़ — असामान्य | मानसून विस्तार + नेपाल में भारी वर्षा |
बाढ़ के बहुआयामी दुष्परिणाम
- कृषि विनाश: खड़ी फसलें नष्ट, मिट्टी की उपजाऊ परत बहती है (Soil Erosion), बीज नष्ट — वार्षिक कृषि हानि ₹3,000–10,000 करोड़।
- अवसंरचना क्षति: सड़कें, पुल, स्कूल, अस्पताल — हर बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण पर अरबों खर्च।
- विस्थापन एवं पलायन: बाढ़ से हर वर्ष लाखों लोग विस्थापित — “जलवायु शरणार्थी” (Climate Refugees) की बढ़ती संख्या।
- स्वास्थ्य संकट: बाढ़ के बाद हैजा, मलेरिया, लेप्टोस्पायरोसिस, डेंगू जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।
- जल प्रदूषण: बाढ़ का पानी शौचालय, कचरा एवं कृषि रसायन मिलाकर पेयजल स्रोतों को प्रदूषित करता है।
- मनोवैज्ञानिक आघात: बार-बार बाढ़ से प्रभावित समुदायों में PTSD एवं अवसाद की समस्याएँ बढ़ रही हैं।
चुनौती-4: सूखा एवं जल-संसाधन संकट
जहाँ उत्तर बिहार बाढ़ से जूझता है, वहीं दक्षिण बिहार के 17–20 जिले प्रतिवर्ष सूखे की मार झेलते हैं। जलवायु परिवर्तन ने इस विरोधाभास को और गहरा कर दिया है — भूजल संकट, नदियों का सूखना और पारम्परिक जल-स्रोतों का विनाश इस चुनौती के मुख्य आयाम हैं।
भूजल (Groundwater) संकट — बिहार की सबसे गहरी चुनौती
बिहार में कृषि सिंचाई का 70% से अधिक भाग भूजल पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन से वर्षा अनियमित होने के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जबकि पुनर्भरण (Recharge) घट रहा है। Central Ground Water Board (CGWB) के अनुसार बिहार के 38 में से 12 जिले भूजल के “अत्यधिक दोहन” की श्रेणी में हैं।
आर्सेनिक संकट — जलवायु परिवर्तन की अदृश्य चुनौती
बिहार के 12 जिलों के भूजल में आर्सेनिक (Arsenic) की मात्रा WHO की निर्धारित सीमा 10 μg/L से अधिक पाई गई है। भोजपुर, बक्सर, पटना, वैशाली, सारण, बेगूसराय आदि जिले सर्वाधिक प्रभावित हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भूजल स्तर में उतार-चढ़ाव से आर्सेनिक की सांद्रता और बढ़ सकती है। दीर्घकालिक आर्सेनिक सेवन से त्वचा रोग, कैंसर, तंत्रिका-तंत्र क्षति जैसी गम्भीर बीमारियाँ होती हैं।
पारम्परिक जल-स्रोतों का विनाश
- आहर: नदी जल संग्रहण हेतु निर्मित पारम्परिक जलाशय — मुख्यतः दक्षिण बिहार में।
- पाइन: आहर से खेतों तक जल पहुँचाने वाली चैनल (नहर)।
- वर्तमान स्थिति: जलवायु परिवर्तन, भूमि अतिक्रमण एवं सरकारी उपेक्षा से यह प्रणाली तेज़ी से नष्ट हो रही है।
- पटना के तालाब: 1970 में 1,200+ → अब मात्र 200–250 शेष।
सूखे के प्रभाव — बहुआयामी संकट
सूखे वर्षों में धान, मक्का, दलहन की फसलें 30–50% तक नष्ट। 2002, 2009, 2014, 2016 — ये सभी बिहार में भीषण सूखे के वर्ष थे।
सूखे से फसल नष्ट होने पर किसान ऋण लेते हैं किन्तु अगले वर्ष बाढ़ से फिर नुकसान — यह ऋण-चक्र किसान-परिवारों को गरीबी में धकेलता है।
कृषि विफलता से बिहार में ग्रामीण पलायन देश में सर्वाधिक है। जलवायु-प्रेरित पलायन से शहरी क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है।
गर्मियों में दक्षिण बिहार के कई गाँवों में पेयजल की भीषण कमी। चापाकल (Hand Pumps) सूखते हैं — महिलाओं को किलोमीटर दूर से जल लाना पड़ता है।
सामाजिक-आर्थिक एवं स्वास्थ्य प्रभाव
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ केवल पर्यावरणीय नहीं हैं — ये बिहार के सामाजिक ताने-बाने, आर्थिक विकास और जन-स्वास्थ्य को भी गहराई से प्रभावित कर रही हैं। इस बहुआयामी प्रभाव को समझना Bihar Govt. Competitive Exams के लिए अनिवार्य है।
आर्थिक प्रभाव
| क्षेत्र | जलवायु चुनौती | आर्थिक प्रभाव |
|---|---|---|
| कृषि | बाढ़, सूखा, Heat Wave | वार्षिक ₹3,000–10,000 करोड़ हानि |
| अवसंरचना | बाढ़ से सड़क, पुल, भवन क्षति | पुनर्निर्माण पर अरबों रुपये व्यय |
| मत्स्य पालन | जलाशय सूखना, प्रदूषण | मत्स्य उत्पादन में 20–30% गिरावट |
| पर्यटन | बाढ़ से धार्मिक-ऐतिहासिक स्थल प्रभावित | पर्यटन राजस्व में कमी |
| श्रम उत्पादकता | Heat Wave से कार्य-क्षमता घटी | GDP में 2–3% वार्षिक हानि का अनुमान |
सामाजिक असमानता एवं जलवायु न्याय
जलवायु परिवर्तन का बोझ समाज में समान रूप से नहीं पड़ता — सबसे अधिक पीड़ित वे होते हैं जिनके पास सबसे कम संसाधन हैं। बिहार के संदर्भ में यह विशेष रूप से सत्य है। महिलाएँ सूखे में पानी लाने और बाढ़ में परिवार बचाने की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी उठाती हैं। SC/ST एवं OBC समुदाय जो भूमि-अधिकारों से वंचित हैं, बाढ़ के बाद राहत एवं पुनर्वास में भेदभाव झेलते हैं। बच्चे एवं वृद्ध Heat Wave और बाढ़-जनित बीमारियों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील हैं।
वेक्टर-जनित रोग (Vector-borne diseases): तापमान वृद्धि से मच्छरों की प्रजनन-दर बढ़ती है — मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जापानी इन्सेफेलाइटिस (JE) के मामले बढ़ रहे हैं। उत्तर बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी जिले JE के हॉटस्पॉट हैं।
जलजनित रोग (Water-borne diseases): बाढ़ के बाद दूषित पानी से हैजा, टाइफाइड, पीलिया, लेप्टोस्पायरोसिस फैलते हैं। प्रतिवर्ष बाढ़ के बाद बिहार में जलजनित रोगों से हज़ारों लोग प्रभावित होते हैं।
कुपोषण: फसल विफलता से खाद्य असुरक्षा बढ़ती है — बच्चों में कुपोषण की दर बढ़ती है। बिहार पहले से ही कुपोषण के मामले में देश के सबसे कमज़ोर राज्यों में है।
बिहार भारत का सर्वाधिक पलायन-प्रभावित राज्य है। जबकि पलायन के अनेक कारण हैं, जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख कारक बन रहा है। बाढ़ से स्थायी विस्थापन — कोसी महाप्रलय (2008) के बाद हज़ारों परिवार आज भी पुनर्वास की प्रतीक्षा में हैं। सूखाग्रस्त दक्षिण बिहार के किसान रोज़गार हेतु दिल्ली, मुम्बई, पंजाब पलायन करते हैं। IDMC (Internal Displacement Monitoring Centre) के अनुसार बिहार में प्रतिवर्ष 10–15 लाख लोग बाढ़ से अस्थायी रूप से विस्थापित होते हैं।
नीतिगत प्रतिक्रिया, योजनाएँ एवं समाधान
बिहार में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार, नागरिक समाज और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ — सभी मिलकर कार्य कर रही हैं। नीति एवं समाधान के इस ढाँचे को दो स्तम्भों में समझें: Adaptation (अनुकूलन) एवं Mitigation (न्यूनीकरण)।
प्रमुख नीतिगत ढाँचा
अनुकूलन (Adaptation) रणनीतियाँ
Sahbhagi Dhan — बाढ़-सहनशील धान (17 दिन तक जलमग्न रह सकता है); Rajendra Bhagwa — सूखा-सहनशील किस्म; SRI (System of Rice Intensification) — 35–40% जल बचत; Zero Tillage — गेहूँ में ईंधन, जल एवं समय की बचत; Crop Diversification — धान-गेहूँ के स्थान पर दलहन, तिलहन, सब्जी; Soil Health Card — उर्वरक प्रबंधन।
आहर-पाइन पुनरुद्धार — पारम्परिक जल प्रणाली की बहाली; तालाब संरक्षण — जल-जीवन-हरियाली के तहत 1 लाख तालाब; Rainwater Harvesting — छत पर वर्षाजल संचयन; Micro-irrigation (Drip/Sprinkler) — PMKSY; River Rejuvenation — गंगा एवं सहायक नदियाँ; Wetland Conservation — काबर झील (Begusarai) जैसी Ramsar साइट।
बिहार का वन आवरण 7.6% से बढ़ाकर 17% (राज्य लक्ष्य) करने के लिए सामाजिक वानिकी (Social Forestry) एवं Agroforestry को बढ़ावा दिया जा रहा है। जल-जीवन-हरियाली के तहत 24 लाख वृक्षारोपण। वाल्मीकि नगर Tiger Reserve एवं अन्य संरक्षित क्षेत्रों को जलवायु-अनुकूल बनाना।
BSDMA (Bihar State Disaster Management Authority) — बाढ़ एवं Heat Wave प्रबंधन; Early Warning System (EWS) — 72 घण्टे पूर्व SMS चेतावनी; NDRF एवं SDRF — राहत एवं बचाव; Flood Shelter — बाढ़ आश्रय स्थल; Community-based Disaster Risk Reduction (CBDRR); IMD के साथ समन्वय।
न्यूनीकरण (Mitigation) रणनीतियाँ
- नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy): बिहार में Solar Energy का तेज़ी से विस्तार — PM-KUSUM, Rooftop Solar; लक्ष्य: 2030 तक 3,000 MW Solar क्षमता।
- ऊर्जा दक्षता: LED बल्ब, ऊर्जा-कुशल उपकरण — उत्सर्जन में कमी।
- कृषि में उत्सर्जन कटौती: SRI तकनीक से धान में CH₄ उत्सर्जन कम; Nano Urea से N₂O कम।
- Carbon Sequestration: वृक्षारोपण एवं वन संरक्षण से कार्बन अवशोषण बढ़ाना।
- Waste Management: नगर पालिकाओं में Bio-gas Plant — मीथेन उत्सर्जन कटौती।
सारांश, स्मरण-सूत्र एवं परीक्षा प्रश्न
इस खण्ड में बिहार में जलवायु परिवर्तन की सम्पूर्ण चुनौतियों का परीक्षा-केंद्रित सारांश, स्मरण-सूत्र एवं विगत वर्षों के प्रकार के प्रश्न प्रस्तुत हैं।


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