बिहार की जलवायु — वर्षा
वर्षा के स्रोत, वितरण, ऋतुएँ, मानसून तंत्र और परीक्षोपयोगी तथ्य — सम्पूर्ण विश्लेषण
परिचय एवं जलवायविक स्थिति
बिहार की जलवायु को समझने में वर्षा सबसे केन्द्रीय तत्व है। BPSC परीक्षा में प्रत्येक वर्ष बिहार के वर्षा वितरण, मानसून की प्रविष्टि, सूखाग्रस्त और अधिक वर्षा वाले जिलों से प्रश्न पूछे जाते हैं। बिहार की जलवायु आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय (Humid Subtropical) प्रकार की है जो कोपेन वर्गीकरण में Cwa श्रेणी में आती है।
जलवायु किसी क्षेत्र के दीर्घकालिक (सामान्यतः 30 वर्ष) मौसमी औसत का विवरण है। बिहार की जलवायु मुख्यतः मानसून तंत्र द्वारा नियंत्रित होती है जो ग्रीष्म काल में अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर आती है।
बिहार की जलवायु की प्रमुख ऋतुएँ
| ऋतु | समय | प्रमुख लक्षण | वर्षा |
|---|---|---|---|
| शीत ऋतु | नवम्बर – फरवरी | शुष्क, ठंडी हवाएँ; पश्चिमी विक्षोभ से कभी-कभी वर्षा | न्यूनतम (2–5%) |
| ग्रीष्म ऋतु | मार्च – मई | तीव्र गर्मी, धूल भरी आँधी, “नॉर्वेस्टर/काल बैसाखी” | 5–10% |
| वर्षा ऋतु | जून – सितम्बर | दक्षिण-पश्चिम मानसून, भारी वर्षा | 75–80% |
| मानसून उपरांत | अक्टूबर – नवम्बर | मानसून की वापसी, आंशिक वर्षा | 5–8% |
बिहार की चार ऋतुओं में वर्षा ऋतु (जून–सितम्बर) में कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 80% जल प्राप्त होता है। यह तथ्य प्रारम्भिक परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है।
वर्षा के स्रोत एवं मानसून तंत्र
बिहार में वर्षा के तीन प्रमुख स्रोत हैं — दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा, पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances), तथा स्थानीय संवहनीय वर्षा (Convectional Rain)। इनमें से बंगाल की खाड़ी शाखा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
1. दक्षिण-पश्चिम मानसून — बंगाल की खाड़ी शाखा
दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा बिहार की वर्षा का मुख्य स्रोत है। यह शाखा म्यांमार तट से उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ती हुई सबसे पहले बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है। इसके बाद यह बिहार में प्रवेश करती है। नमी से भरपूर यह शाखा पूर्वी बिहार के किशनगंज, अररिया, पूर्णिया जैसे जिलों में अत्यधिक वर्षा कराती है। जैसे-जैसे यह पश्चिम की ओर बढ़ती है, नमी घटती जाती है, इसलिए पश्चिमी बिहार (रोहतास, कैमूर) में वर्षा अपेक्षाकृत कम होती है।
2. दक्षिण-पश्चिम मानसून — अरब सागर शाखा
अरब सागर शाखा मुख्यतः पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान) में वर्षा करती है। बिहार पर इसका प्रभाव सीमित है क्योंकि विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी इसे रोक देती है। तथापि, मानसून की यह शाखा बिहार के दक्षिण-पश्चिमी जिलों में कुछ वर्षा अवश्य करती है।
3. पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances)
शीत ऋतु में भूमध्यसागर से उत्पन्न पश्चिमी विक्षोभ बिहार में आंशिक वर्षा और कोहरा लाते हैं। यह वर्षा रबी फसलों (गेहूँ, दलहन) के लिए लाभदायक होती है। इस वर्षा को “माउसम” या “मावठ” भी कहते हैं।
4. काल बैसाखी / नॉर्वेस्टर
काल बैसाखी (Kalbaisakhi) या नॉर्वेस्टर ग्रीष्म ऋतु (मार्च–मई) में आने वाले तड़ित-झंझावात हैं। ये तेज आँधी, बिजली और भारी वर्षा के साथ आते हैं। ये पश्चिम बंगाल और बिहार के पूर्वी भाग में सामान्य हैं। आम की फसल के लिए हानिकारक किन्तु जूट की खेती के लिए लाभकारी।
- बिहार की मुख्य वर्षा का स्रोत
- जून के अंत में बिहार में प्रवेश
- पूर्व → पश्चिम: वर्षा घटती है
- किशनगंज, अररिया — सर्वाधिक प्रभावित
- मार्च–मई में संवहनीय वर्षा
- पूर्वी बिहार में अधिक प्रभाव
- पश्चिम बंगाल से पश्चिम दिशा में आता है
- स्थानीय नाम: “काल बैसाखी” / “आम्र वर्षा”
मानसून की प्रविष्टि एवं वापसी — बिहार में
बिहार में मानसून की प्रविष्टि बंगाल की खाड़ी शाखा से पूर्व दिशा से होती है — यह उत्तर-पश्चिम भारत से भिन्न है जहाँ अरब सागर शाखा प्रमुख होती है। BPSC Mains में यह विभेद अक्सर पूछा जाता है।
ऋतु के अनुसार वर्षा का विस्तृत विश्लेषण
बिहार में वर्षा ऋतुओं के अनुसार स्पष्ट रूप से विभाजित होती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून–सितम्बर) सर्वाधिक वर्षा देता है, जबकि शेष महीनों में वर्षा बहुत कम होती है। इस असमान वितरण के कारण ही बिहार में बाढ़ और सूखा दोनों समस्याएँ साथ-साथ विद्यमान हैं।
वर्षा ऋतु (June–September) — मुख्य मानसून काल
जून से सितम्बर के बीच बिहार को कुल वार्षिक वर्षा का 75–80% प्राप्त होता है। जुलाई और अगस्त सर्वाधिक वर्षा के महीने हैं। इस काल में उत्तरी बिहार (तराई क्षेत्र) में नेपाल की नदियों से बाढ़ आती है क्योंकि नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है जो कोसी, गंडक, बागमती आदि नदियों को उफनाती है।
ग्रीष्म ऋतु वर्षा (March–May)
ग्रीष्म ऋतु में संवहनीय वर्षा (Convectional Rain) होती है। अत्यधिक गर्मी से वायु गर्म होकर ऊपर उठती है, संघनित होती है और तड़ित-झंझावात के साथ वर्षा होती है। काल बैसाखी इसी प्रक्रिया का परिणाम है। यह वर्षा अल्पकालिक किन्तु तीव्र होती है। बिहार के पूर्वी जिलों में मार्च–मई में कुल वर्षा का 8–10% प्राप्त होता है।
शीत ऋतु वर्षा (November–February)
शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभ के कारण बिहार में हल्की वर्षा और कोहरा होता है। इसे मावठ (Mawath) कहते हैं। यह रबी फसल (गेहूँ, चना, सरसों) के लिए अत्यंत लाभकारी होती है। दिसम्बर–जनवरी में उत्तरी बिहार में घना कोहरा और शीतलहर (Cold Wave) की स्थिति रहती है।
बिहार में मानसून की अनिश्चितता एक गम्भीर समस्या है। कुछ वर्षों में मानसून देर से आता है (Late Onset), कुछ वर्षों में समय से पहले वापस चला जाता है (Early Withdrawal), और कभी-कभी मानसून के बीच में लम्बे शुष्क अंतराल (Break in Monsoon) आते हैं।
- सामान्य से अधिक वर्षा: उत्तरी बिहार में बाढ़, नेपाल की नदियों में उफान।
- सामान्य से कम वर्षा: दक्षिण बिहार (गया, औरंगाबाद, जहानाबाद) में सूखा।
- El Niño का प्रभाव: El Niño वर्षों में बिहार में मानसून कमजोर रहता है।
- La Niña का प्रभाव: La Niña वर्षों में सामान्य से अधिक वर्षा होती है।
बिहार में सूखा और बाढ़ दोनों एक साथ आते हैं — उत्तरी बिहार में बाढ़ और दक्षिणी बिहार में सूखा। यह विरोधाभास BPSC Mains में विश्लेषणात्मक प्रश्नों में पूछा जाता है।
जुलाई बिहार का सर्वाधिक वर्षा वाला महीना है। मानसून के दौरान बिहार में वर्षा की दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर घटती है।
क्षेत्रीय वर्षा वितरण — जिलेवार विश्लेषण
बिहार में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। पूर्वी बिहार में 150–200 सेमी तक वर्षा होती है जबकि पश्चिमी और दक्षिणी बिहार के कुछ जिलों में यह 80–100 सेमी से भी कम रह जाती है। यह असमानता कृषि, बाढ़ और सूखे की समस्याओं का मूल कारण है।
- किशनगंज — सर्वाधिक वर्षा (~200 cm), “बिहार का चेरापूँजी”
- अररिया — 160–180 cm
- पूर्णिया — 150–170 cm
- कटिहार — 150–165 cm
- सुपौल, सहरसा — 140–160 cm
- रोहतास — सबसे कम (~80–90 cm)
- कैमूर — 85–95 cm
- औरंगाबाद — 90–100 cm
- गया — 95–105 cm
- जहानाबाद — 95–105 cm
क्षेत्रवार विस्तृत तुलना
| क्षेत्र | प्रमुख जिले | औसत वर्षा (cm) | मुख्य समस्या |
|---|---|---|---|
| उत्तर-पूर्वी बिहार | किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार | 150–200 | बाढ़ |
| उत्तरी बिहार (तराई) | पश्चिम चम्पारण, सीतामढ़ी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर | 120–160 | नदी बाढ़ |
| मध्य बिहार (गंगा मैदान) | पटना, नालंदा, बेगूसराय, लखीसराय | 100–130 | सीमित |
| दक्षिण बिहार | गया, नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद | 85–110 | सूखा |
| पश्चिमी बिहार | रोहतास, कैमूर, भोजपुर, सारण | 80–100 | सूखा |
वर्षा वितरण का पैटर्न — पूर्व से पश्चिम
बिहार में वर्षा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती है। इसका कारण यह है कि बंगाल की खाड़ी शाखा पूर्व से प्रवेश करती है और पश्चिम की ओर जाते-जाते नमी खोती जाती है। किशनगंज (पूर्वतम जिला) में जहाँ 200 सेमी वर्षा होती है, वहीं रोहतास (पश्चिमतम) में मात्र 80–90 सेमी।
कि – अ – पू – ग – रो
उपरोक्त आँकड़े IMD (भारत मौसम विज्ञान विभाग), बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण एवं BSDMA (Bihar State Disaster Management Authority) के प्रतिवेदनों पर आधारित हैं।
वर्षा को प्रभावित करने वाले कारक
बिहार में वर्षा की मात्रा और वितरण अनेक भौगोलिक, वायुमण्डलीय और स्थलाकृतिक कारकों पर निर्भर करती है। इन नियंत्रण कारकों (Controlling Factors) को समझना BPSC Mains के लिए आवश्यक है क्योंकि विश्लेषणात्मक उत्तरों में इनकी व्याख्या करनी होती है।
हिमालय मानसून की नम हवाओं को रोककर वर्षा कराता है। नेपाल के पहाड़ों में भारी वर्षा से उत्पन्न बाढ़ उत्तरी बिहार को प्रभावित करती है।
पूर्वी बिहार बंगाल की खाड़ी के करीब है इसलिए अधिक नमी प्राप्त करता है। पश्चिम की ओर यह निकटता घटती है, वर्षा भी घटती है।
दक्षिणी बिहार में छोटानागपुर पठार की ऊँचाई कुछ ओरोग्राफिक वर्षा देती है परन्तु यह क्षेत्र सामान्यतः कम वर्षा वाला है।
जब मानसून ट्रफ बिहार के ऊपर से गुजरता है तो भारी वर्षा होती है। ट्रफ के उत्तर या दक्षिण खिसकने से वर्षा में उतार-चढ़ाव आता है।
El Niño वर्षों में प्रशान्त महासागर गर्म होता है जिससे मानसून कमजोर होता है। बिहार में कम वर्षा और सूखे की आशंका बढ़ती है।
वन भूमि वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन को बढ़ाती है जिससे स्थानीय वर्षा बढ़ सकती है। बिहार में वन क्षेत्र कम होने से यह लाभ सीमित है।
मानसून ट्रफ (Monsoon Trough) एक निम्न वायुदाब की रेखा है जो ग्रीष्मकाल में थार मरुस्थल से बंगाल की खाड़ी तक फैली रहती है। यह रेखा मानसून की सक्रियता का सूचक है। जब यह रेखा बिहार के ऊपर से गुजरती है तो:
- सक्रिय मानसून: ट्रफ हिमालय तलहटी के पास — उत्तरी बिहार में भारी वर्षा।
- कमजोर मानसून (Break): ट्रफ दक्षिण में — बिहार में शुष्क दौर।
- चक्रवात का सहयोग: बंगाल की खाड़ी में चक्रवात ट्रफ को सक्रिय करते हैं।
“बिहार में वर्षा की असमानता के कारण” पूछे जाने पर तीन स्तरों पर उत्तर दें: (1) स्थलाकृतिक — हिमालय, छोटानागपुर; (2) समुद्री दूरी — पूर्व-पश्चिम अन्तर; (3) वायुमण्डलीय — मानसून ट्रफ, El Niño।
सूखा, बाढ़ एवं जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
बिहार एक ऐसा राज्य है जहाँ एक ही वर्ष में एक हिस्से में बाढ़ और दूसरे में सूखा हो सकता है। उत्तरी बिहार की नदियाँ (कोसी, गंडक, बागमती) प्रतिवर्ष बाढ़ लाती हैं जबकि दक्षिण बिहार (गया, रोहतास) में वर्षा की कमी से सूखे की स्थिति रहती है।
बाढ़-प्रभावित क्षेत्र — उत्तरी बिहार
बिहार भारत का सबसे अधिक बाढ़-प्रभावित राज्य है। राज्य का 76% उत्तरी भाग बाढ़ की चपेट में आता है। बाढ़ की मुख्य वजह नेपाल में भारी मानसून वर्षा और उत्तर बिहार की नदियों का उफान है।
- नेपाली नदियाँ: कोसी, गंडक, बागमती, कमला-बालान — नेपाल में भारी वर्षा से उफनती हैं।
- समतल मैदान: उत्तरी बिहार का ढाल बहुत कम है — पानी जमा होता है।
- तटबंधों की विफलता: कोसी की “तटबंध व्यवस्था” अपर्याप्त सिद्ध हुई है।
- वनों की कटाई: हिमालय तलहटी में वनों के कटने से मृदा अपरदन बढ़ा, नदी का तल उठा।
- अवसाद भराव: कोसी “सोरो नदी” है — अत्यधिक अवसाद लाती है, तल ऊँचा होता है।
सूखा-प्रभावित क्षेत्र — दक्षिण एवं पश्चिम बिहार
दक्षिणी और पश्चिमी बिहार के जिले जैसे गया, नवादा, औरंगाबाद, रोहतास, कैमूर सूखे की दृष्टि से संवेदनशील हैं। यहाँ वर्षा 80–100 सेमी के बीच है जो कृषि के लिए पर्याप्त नहीं है। मगध क्षेत्र को बिहार का “सूखा बेल्ट” कहा जाता है।
| पहलू | बाढ़ (उत्तरी बिहार) | सूखा (दक्षिणी/पश्चिमी बिहार) |
|---|---|---|
| प्रमुख जिले | दरभंगा, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिम चम्पारण | गया, औरंगाबाद, रोहतास, कैमूर |
| मुख्य कारण | नेपाली नदियों का उफान, भारी वर्षा | कम वर्षा, वर्षा की परिवर्तनशीलता |
| फसल प्रभाव | खरीफ फसल नष्ट | धान, मक्का की कमी |
| वर्षा | >150 cm (समस्या अधिक) | <100 cm (समस्या कम वर्षा) |
| प्रमुख नदी | कोसी (“बिहार का शोक”) | सोन (सिंचाई आधार) |
जलवायु परिवर्तन और वर्षा पर प्रभाव
हाल के दशकों में बिहार में जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव देखे गए हैं। वर्षा कम दिनों में अधिक मात्रा में होने लगी है (Extreme Rainfall Events), जबकि शुष्क दिनों की संख्या बढ़ी है। IMD के अनुसार बिहार में Extreme Rainfall Events की आवृत्ति बढ़ रही है।
कोसी को “बिहार का शोक” कहा जाता है। 2008 में कोसी ने तटबंध तोड़कर 18 जिलों को प्रभावित किया था — यह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी बाढ़ आपदाओं में से एक थी। BPSC Mains में नदी और बाढ़ प्रबंधन पर विस्तृत उत्तर के लिए यह उदाहरण अनिवार्य है।
BPSC Mains — विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
BPSC Mains परीक्षा में जलवायु और वर्षा से सम्बन्धित विश्लेषणात्मक एवं वर्णनात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। इन प्रश्नों में कारण-प्रभाव, तुलना, उपाय और नीतिगत सुझाव अपेक्षित होते हैं।
मुख्य विश्लेषण बिंदु
कारण:
- बंगाल की खाड़ी से दूरी — पूर्व से पश्चिम वर्षा घटती है।
- हिमालय का प्रभाव — उत्तरी बिहार में अधिक नमी।
- विन्ध्य-छोटानागपुर — दक्षिण में वृष्टि-छाया।
- मानसून की परिवर्तनशीलता — El Niño, मानसून ट्रफ।
प्रभाव:
- उत्तर में बाढ़ — कृषि, आजीविका, स्वास्थ्य को हानि।
- दक्षिण में सूखा — पेयजल संकट, पलायन, खाद्य असुरक्षा।
- जल संसाधन प्रबंधन में असंतुलन।
बिहार की 76% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। मानसून की विफलता का अर्थ है:
- धान उत्पादन में गिरावट — खरीफ फसल पर सीधा प्रभाव।
- सिंचाई की माँग बढ़ना — भूजल का अत्यधिक दोहन।
- ग्रामीण पलायन — रोजगार की तलाश में शहरों की ओर।
- किसानों पर कर्ज — फसल बीमा की माँग।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, बिहार कृषि रोडमैप, राष्ट्रीय बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम, और कोसी परियोजना जैसी नीतियाँ इस समस्या से निपटने के प्रयास हैं।
जलवायु परिवर्तन बिहार के वर्षा चक्र को निम्न प्रकार प्रभावित कर रहा है:
- Extreme Rainfall Events: कम दिनों में अधिक वर्षा — शहरी जलभराव, अचानक बाढ़।
- मानसून विलम्ब: मानसून की प्रविष्टि और वापसी दोनों अनिश्चित होती जा रही हैं।
- हिमालयी हिमनदों का पिघलना: अल्पकाल में नदियों में अधिक जल, दीर्घकाल में कमी।
- तापमान वृद्धि: वाष्पीकरण बढ़ता है, भूजल घटता है।
किसी भी वर्षा सम्बन्धी प्रश्न का उत्तर तीन भागों में दें: (1) परिचय — तथ्यात्मक स्थिति; (2) कारण-विश्लेषण — भौगोलिक, वायुमण्डलीय; (3) प्रभाव एवं समाधान — कृषि, आपदा प्रबंधन, सरकारी नीतियाँ।
🎯 BPSC परीक्षा के लिए अनिवार्य तथ्य
किशनगंज (~200 cm) — “बिहार का चेरापूँजी”
रोहतास (~80–90 cm)
जून के मध्य (पूर्वी जिले पहले)
~80% वार्षिक वर्षा
“बिहार का शोक” (Sorrow of Bihar)
ग्रीष्म (मार्च–मई) में पूर्वी बिहार में तड़ित-झंझावात
Cwa — आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय
शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभ से वर्षा — रबी के लिए लाभकारी
सारांश, MCQ अभ्यास एवं परीक्षा प्रश्न
🧪 Interactive MCQ अभ्यास
नीचे दिए गए प्रश्नों पर क्लिक करके उत्तर जाँचें। यह BPSC Prelims के स्तर के प्रश्न हैं।
BPSC परीक्षा प्रश्न (PYQ एवं सम्भावित प्रश्न)
प्र. 1: बिहार में दक्षिण-पश्चिम मानसून की किस शाखा से सर्वाधिक वर्षा प्राप्त होती है?
प्र. 2: निम्नलिखित में से कौन-सा जिला बिहार में न्यूनतम वर्षा प्राप्त करता है?
प्र. 3: “कोसी” को किस नाम से जाना जाता है?
प्र. 4: बिहार में मानसून की प्रविष्टि कब और किस दिशा से होती है? (2 अंक)
प्र. 5: “बिहार में एक ओर बाढ़ और दूसरी ओर सूखा — इस विरोधाभास के कारणों एवं समाधानों की विवेचना करें।” (15 अंक)
प्र. 6: काल बैसाखी क्या है? इसका कृषि पर क्या प्रभाव है? (5 अंक)
प्र. 7: जलवायु परिवर्तन बिहार के वर्षा चक्र को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है? (10 अंक)
BPSC Prelims में “किशनगंज = सर्वाधिक” और “रोहतास = न्यूनतम” वर्षा वाले जिले याद रखें। Mains में वर्षा असमानता को भौगोलिक + वायुमण्डलीय + मानवीय तीनों कोणों से विश्लेषित करें। “बिहार का शोक = कोसी” अनिवार्य तथ्य है।


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