बिहार की ऋतुएँ
शीत · ग्रीष्म · वर्षा · मानसून उपरांत — चारों ऋतुओं का सम्पूर्ण विश्लेषण, परीक्षोपयोगी तथ्य एवं Mains उत्तर-सामग्री
परिचय एवं जलवायु वर्गीकरण
बिहार की ऋतुएँ BPSC परीक्षा के भूगोल खण्ड का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। बिहार की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है और इसे कोपेन वर्गीकरण में Cwa (आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय) श्रेणी में रखा गया है। राज्य में वर्ष भर चार स्पष्ट ऋतुएँ अनुभव की जाती हैं जो तापमान, वर्षा, आर्द्रता और हवाओं में स्पष्ट अंतर प्रकट करती हैं।
चारों ऋतुओं का एक दृष्टि में तुलनात्मक विवरण
| ऋतु | समयावधि | तापमान (°C) | वर्षा | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| शीत ऋतु | नवम्बर – फरवरी | 5°C – 22°C | न्यूनतम (~2–5%) | घना कोहरा, शीतलहर, मावठ |
| ग्रीष्म ऋतु | मार्च – मई | 30°C – 45°C+ | 5–10% | लू, काल बैसाखी, धूल-भरी आँधी |
| वर्षा ऋतु | जून – सितम्बर | 28°C – 35°C | 75–80% | दक्षिण-पश्चिम मानसून, बाढ़ |
| मानसून उपरांत | अक्टूबर – नवम्बर | 20°C – 32°C | 5–8% | मानसून वापसी, सुहाना मौसम |
शीत ऋतु — नवम्बर से फरवरी
शीत ऋतु नवम्बर से फरवरी तक रहती है। इस काल में सूर्य दक्षिणायन (Tropic of Capricorn की ओर) होता है, जिससे उत्तर भारत में तापमान गिरता है। बिहार में जनवरी सबसे ठंडा महीना है जब औसत तापमान 8°C से 14°C तक रहता है और कभी-कभी रात में 5°C या उससे नीचे भी गिर जाता है।
शीत ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ
- तापमान: दिन में 15–22°C, रात में 5–10°C। उत्तरी बिहार में अधिक ठंड।
- शुष्कता: उत्तर-पूर्वी व्यापारिक हवाएँ (NE Monsoon) शुष्क और ठंडी होती हैं।
- घना कोहरा: दिसम्बर-जनवरी में दृश्यता 50 मीटर से भी कम।
- शीतलहर (Cold Wave): उत्तरी बिहार विशेषकर सीतामढ़ी, मधुबनी में।
- पाला (Frost): रात के तापमान के कारण फसलों पर पाला पड़ता है।
- मावठ वर्षा: पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) से हल्की बारिश।
पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances)
शीत ऋतु में भूमध्यसागर क्षेत्र से चलने वाले पश्चिमी विक्षोभ भारत के उत्तर-पश्चिम से होते हुए बिहार पहुँचते हैं। इनसे होने वाली हल्की वर्षा को “मावठ” या “मावट” कहते हैं। यह वर्षा गेहूँ, चना, मटर, सरसों जैसी रबी फसलों के लिए अत्यंत लाभदायक होती है।
शीत ऋतु में क्षेत्रीय भिन्नता
| क्षेत्र | न्यूनतम तापमान | विशेषता |
|---|---|---|
| उत्तरी बिहार (तराई) | 3°C – 7°C | सर्वाधिक ठंड, घना कोहरा, शीतलहर |
| मध्य बिहार (गंगा मैदान) | 7°C – 12°C | मध्यम ठंड, पटना, नालंदा |
| दक्षिणी बिहार (पठार) | 8°C – 14°C | गया, रोहतास में अपेक्षाकृत कम ठंड |
बिहार में शीतलहर और कोहरे से अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जो BPSC Mains के लिए महत्वपूर्ण हैं:
- कृषि हानि: पाला पड़ने से सब्जियाँ, फूल, आम की बौर नष्ट।
- परिवहन: कोहरे से रेल और वायु सेवाएँ बाधित।
- स्वास्थ्य: श्वसन रोग, हाइपोथर्मिया से मृत्यु।
- बेघर आबादी: रात्रि में अत्यधिक ठंड से बेघर लोगों को खतरा।
- पशुधन: गाय, भैंस, बकरी की देखभाल अतिरिक्त।
ग्रीष्म ऋतु — मार्च से मई
ग्रीष्म ऋतु मार्च से मई तक रहती है। सूर्य के उत्तरायण होने के साथ तापमान तेजी से बढ़ता है। मई-जून बिहार के सबसे गर्म महीने हैं जब अधिकतम तापमान 40°C से 45°C तक या उससे भी अधिक पहुँच जाता है। यह ऋतु कृषि, जल संसाधन और जन-स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालती है।
ग्रीष्म ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ
- उच्च तापमान: दिन में 38–45°C; गया, डेहरी, औरंगाबाद सबसे गर्म।
- लू (Loo): गर्म-शुष्क पश्चिमी हवाएँ जो राजस्थान-उत्तर प्रदेश से आती हैं।
- आर्द्रता न्यूनतम: वातावरण शुष्क, पानी की वाष्पीकरण दर अधिक।
- धूल भरी आँधी: पश्चिम से उठने वाली धूल भरी तेज हवाएँ।
- काल बैसाखी: पूर्वी बिहार में तड़ित-झंझावात (Thunderstorm)।
- नदियाँ उथली: जल प्रवाह कम, गर्मी में नदी तट चौड़े।
लू (Loo) — क्या होती है?
लू एक गर्म, शुष्क और धूल-भरी हवा है जो मई-जून में राजस्थान और उत्तर प्रदेश से बिहार की ओर चलती है। इसकी गति 30–40 km/h तक होती है। लू में बाहर निकलना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है — Heat Stroke (लू लगना) से मृत्यु भी हो सकती है। पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम बिहार (रोहतास, भोजपुर) में लू का प्रकोप सर्वाधिक होता है।
काल बैसाखी (Kalbaisakhi / Nor’wester)
काल बैसाखी या नॉर्वेस्टर ग्रीष्म ऋतु के अंत (मार्च–मई) में पश्चिम बंगाल और बिहार के पूर्वी जिलों में आने वाले हिंसक तड़ित-झंझावात हैं। ये शाम को अचानक उठते हैं और आँधी, बिजली, ओला और तीव्र वर्षा लाते हैं। “काल बैसाखी” का अर्थ है — “बैसाख माह की मृत्युदायिनी आँधी”।
- जूट की खेती के लिए नमी
- भीषण गर्मी से अस्थायी राहत
- भूजल पुनर्भरण में सहायक
- खरीफ बुआई के पूर्व नमी
- आम की बौर और फल को नुकसान
- कच्चे मकानों को क्षति
- वृक्षों का उखड़ना
- बिजली गिरने से जनहानि
तापमान का क्षेत्रीय वितरण — ग्रीष्म में
वर्षा ऋतु (मानसून) — जून से सितम्बर
वर्षा ऋतु बिहार की सबसे महत्वपूर्ण ऋतु है। जून से सितम्बर के मध्य दक्षिण-पश्चिम मानसून बिहार में प्रवेश करता है और कुल वार्षिक वर्षा का 75–80% इसी काल में प्राप्त होता है। यह ऋतु बिहार की खरीफ फसल, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
मानसून की प्रविष्टि एवं प्रगति
वर्षा ऋतु की प्रमुख विशेषताएँ
- तापमान में गिरावट: भारी वर्षा से गर्मी घटती है — 28°C–35°C।
- आर्द्रता अधिकतम: सापेक्षिक आर्द्रता 80–95% तक पहुँचती है।
- बाढ़: उत्तरी बिहार में कोसी, गंडक, बागमती से बाढ़।
- मृदा कटाव: तीव्र वर्षा से नदी किनारों का कटाव।
- कृषि: धान, मक्का, जूट की बुआई और वृद्धि।
- मानसून ब्रेक: बीच-बीच में शुष्क अंतराल (Break in Monsoon)।
मानसून की परिवर्तनशीलता — Active और Break अवस्था
कारण:
- नेपाली नदियाँ: कोसी, गंडक, बागमती — नेपाल में मानसून वर्षा से उफनती हैं।
- समतल ढाल: उत्तरी बिहार का ढाल बहुत कम → जल निकासी धीमी।
- तटबंधों की कमजोरी: पुराने तटबंध जर्जर, कभी-कभी टूट जाते हैं।
- वनों की कटाई: हिमालय तलहटी में वनों के ह्रास से मृदा अपरदन, नदी का तल ऊँचा।
प्रबंधन उपाय:
- राष्ट्रीय बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम (NFMP)
- BSDMA (Bihar State Disaster Management Authority)
- कोसी परियोजना तटबंध सुदृढ़ीकरण
- Early Warning System — IMD और BSDMA
मानसून उपरांत ऋतु — अक्टूबर से नवम्बर
मानसून उपरांत ऋतु (Post-Monsoon / Retreating Monsoon) अक्टूबर और नवम्बर में होती है। इस काल में मानसून पश्चिमोत्तर भारत से वापस लौटता है। बिहार में इस दौरान आकाश स्वच्छ, वायु हल्की और तापमान सुखद रहता है। इसे भारतीय साहित्य में “शरद ऋतु” कहा जाता है — यह बिहार की सबसे सुहानी ऋतु मानी जाती है।
मानसून उपरांत ऋतु की विशेषताएँ
- तापमान: दिन में 25–32°C, रात में 15–20°C — सुखद।
- आकाश: स्वच्छ नीला आकाश — बादल हट जाते हैं।
- आर्द्रता: धीरे-धीरे घटती है।
- वर्षा: बहुत कम — कभी-कभी हल्की बारिश (5–8%)।
- नदियाँ: बाढ़ का पानी उतरने लगता है।
- फसल: खरीफ फसल की कटाई, रबी की बुआई की तैयारी।
उत्तर-पूर्वी मानसून (NE Monsoon)
मानसून की वापसी के साथ उत्तर-पूर्वी व्यापारिक हवाएँ प्रभावी होने लगती हैं। ये हवाएँ बिहार में शुष्क और ठंडी होती हैं। दक्षिण भारत (तमिलनाडु) में यही मौसम “उत्तर-पूर्वी मानसून” के नाम से जाना जाता है और वहाँ वर्षा लाता है।
शरद ऋतु — सांस्कृतिक महत्व
बिहार में मानसून उपरांत ऋतु यानी शरद काल त्योहारों का मौसम है। दुर्गापूजा, दशहरा, दीपावली और बिहार का प्रसिद्ध छठ पर्व इसी काल में मनाए जाते हैं। छठ पूजा में सूर्य की उपासना इसी ऋतु की स्वच्छ धूप और नदी जल के संयोग का उत्सव है। इस ऋतु में न अधिक गर्मी, न ठंड — इसीलिए इसे बिहार की “सर्वोत्तम ऋतु” कहा जाता है।
- छठ पूजा: बिहार का सर्वप्रमुख त्योहार इसी ऋतु में — कार्तिक माह।
- खरीफ कटाई: धान, मक्का, अरहर की कटाई प्रारम्भ।
- रबी बुआई: गेहूँ, चना, मटर की बुआई शुरू।
- पर्यटन: बोधगया, नालन्दा, राजगीर यात्रा के लिए आदर्श मौसम।
ऋतुओं का कृषि एवं अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
बिहार की कृषि पूरी तरह ऋतु-चक्र पर निर्भर है। 76% से अधिक जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़ी है। प्रत्येक ऋतु एक विशेष फसल-चक्र और आर्थिक गतिविधि को परिभाषित करती है।
| ऋतु | प्रमुख फसलें | कृषि गतिविधि | चुनौती |
|---|---|---|---|
| शीत ऋतु (नवम्बर–फरवरी) | गेहूँ, चना, मटर, सरसों, आलू, मसूर | रबी बुआई (नवम्बर), सिंचाई, देखभाल | पाला, कोहरा, शीतलहर |
| ग्रीष्म ऋतु (मार्च–मई) | रबी कटाई, खरीफ की तैयारी, सब्जियाँ | गेहूँ कटाई (मार्च–अप्रैल), खेत जुताई | लू, जल की कमी, काल बैसाखी |
| वर्षा ऋतु (जून–सितम्बर) | धान, मक्का, जूट, अरहर, मूँग, उड़द | खरीफ बुआई (जून), धान रोपाई (जुलाई) | बाढ़, मृदा अपरदन, मानसून ब्रेक |
| मानसून उपरांत (अक्टूबर–नवम्बर) | खरीफ कटाई, आलू, मटर, सरसों बुआई | धान कटाई, रबी की तैयारी | अवशिष्ट बाढ़, भंडारण समस्या |
ऋतु-परिवर्तन एवं कृषि संकट
देर से या कम मानसून — धान रोपाई में विलम्ब, उत्पादन घटता है। El Niño वर्षों में विशेष चिंता।
दिसम्बर-जनवरी में पाला सब्जियों और गेहूँ की बाली को नुकसान पहुँचाता है। राज्य में लाखों रुपये की फसल हानि।
ग्रीष्म में सिंचाई जल की माँग बढ़ती है। भूजल स्तर गिरता है। दक्षिण बिहार में सूखे की स्थिति।
उत्तरी बिहार में प्रतिवर्ष खरीफ फसल बाढ़ में डूबती है। खड़ी धान की फसल नष्ट। किसानों को मुआवजे की माँग।
BPSC Mains — विश्लेषणात्मक सामग्री
BPSC Mains में ऋतुओं से सम्बन्धित प्रश्न केवल विवरण नहीं, बल्कि कारण-प्रभाव, तुलना, नीति-विश्लेषण की माँग करते हैं। नीचे दी गई सामग्री Mains उत्तरों के लिए सीधे प्रयोग करने योग्य है।
हाल के दशकों में बिहार में जलवायु परिवर्तन के कारण ऋतुओं के स्वरूप में निम्न बदलाव देखे गए हैं:
- मानसून की अनिश्चितता: कभी देर से, कभी जल्दी — किसान भ्रमित।
- Extreme Heat Events: ग्रीष्म ऋतु लम्बी होती जा रही है, Heat Wave की आवृत्ति बढ़ी।
- अनियमित शीत: कभी कड़ाके की ठंड, कभी शीत ऋतु कम ठंडी।
- Extreme Rainfall: कम दिनों में अधिक वर्षा — शहरी जलभराव।
- फसल-चक्र में परिवर्तन: किसान पारम्परिक फसल कैलेंडर बदलने को मजबूर।
वर्षा ऋतु में ही बिहार दो विपरीत आपदाओं का सामना करता है:
यह विरोधाभास बिहार के जल संसाधन प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती है। समाधान के लिए इंटर-बेसिन जल अंतरण, चेक डैम और वाटरशेड प्रबंधन आवश्यक हैं।
- शीत ऋतु: श्वसन रोग (Pneumonia), हाइपोथर्मिया, बेघर आबादी को खतरा।
- ग्रीष्म ऋतु: Heat Stroke (लू), निर्जलीकरण, मलेरिया की शुरुआत।
- वर्षा ऋतु: मलेरिया, डेंगू, जापानी इन्सेफेलाइटिस (AES), हैजा, डायरिया।
- मानसून उपरांत: बाढ़ के बाद जल-जनित रोगों का प्रकोप।


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