बिहार में सूखा — कारण एवं प्रभाव
Drought in Bihar: Causes & Effects — BPSC परीक्षा के लिए विश्लेषणात्मक अध्ययन
परिचय एवं परिभाषा
बिहार में सूखा (Drought) एक जटिल प्राकृतिक एवं मानवनिर्मित आपदा है, जो राज्य की कृषि, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढाँचे को प्रतिवर्ष गंभीर रूप से प्रभावित करती है। BPSC Prelims और Mains दोनों परीक्षाओं में सूखे के कारण एवं प्रभाव का विश्लेषण नियमित रूप से पूछा जाता है।
सूखे की परिभाषाएँ — IMD वर्गीकरण
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्षा की कमी के आधार पर सूखे को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण BPSC Prelims में सीधे MCQ के रूप में पूछा जाता है इसलिए इसे ध्यान से याद करें।
| सूखे का प्रकार | वर्षा में कमी | उदाहरण — बिहार |
|---|---|---|
| सामान्य सूखा (Drought) | सामान्य वर्षा का 26–50% कमी | अधिकांश वर्ष दक्षिण बिहार के कुछ जिले |
| गंभीर सूखा (Severe Drought) | 51–75% कमी | 2009, 2019 के वर्ष |
| अत्यंत गंभीर (Extreme Drought) | 75% से अधिक कमी | 1966–67 का भीषण सूखा |
सूखे के चार प्रकार — वैज्ञानिक वर्गीकरण
सूखे के प्राकृतिक कारण
दक्षिण बिहार में सूखे की प्रवृत्ति मुख्यतः उसकी भौगोलिक संरचना, मानसून के स्वभाव और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होती है। इन प्राकृतिक कारणों को समझना BPSC Mains के 15–20 अंक वाले प्रश्नों के लिए आवश्यक है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा उत्तर बिहार से गुजरने के बाद दक्षिण बिहार तक कमजोर पड़ जाती है। El Niño वर्षों में यह कमजोरी और बढ़ती है। मानसून का देरी से आना या जल्दी लौटना खरीफ फसल को नष्ट कर देता है। वर्षा की spatial variability बहुत अधिक है — एक ही जिले में कहीं सूखा, कहीं सामान्य।
दक्षिण बिहार छोटानागपुर पठार की उत्तरी सीमा से लगा है। यहाँ की भूमि पथरीली, कठोर और लाल-पीली मिट्टी से युक्त है। वर्षाजल जमीन में रिसने (infiltration) के बजाय तेजी से बह जाता है (runoff)। भूजल भरण (recharge) बेहद धीमा होता है क्योंकि hard rock aquifer (ग्रेनाइट, नीस) की भंडारण क्षमता बहुत सीमित है।
दक्षिण बिहार की नदियाँ — सोन, फल्गु, पुनपुन, निरंजना, कर्मनाशा — पूरी तरह वर्षा पर निर्भर हैं। उत्तर बिहार की हिमालयी नदियों (कोसी, गंडक) की तरह इनमें बर्फ पिघलने से साल भर जल नहीं रहता। मानसून समाप्त होते ही ये नदियाँ सूखने लगती हैं। फल्गु नदी (गया) तो गर्मियों में भूमि के अंदर बहती है — ऊपर से बिल्कुल रेतीली दिखती है।
गया और औरंगाबाद में ग्रीष्मकालीन तापमान 45–48°C तक पहुँचता है। इतने उच्च तापमान पर मिट्टी की नमी बहुत तेजी से वाष्पित होती है — जिसे Evapotranspiration कहते हैं। जलाशयों का जल तेजी से कम होता है। उच्च Potential Evapotranspiration (PET) के कारण वर्षा जल का अधिकांश भाग वाष्प बन जाता है।
IPCC रिपोर्ट के अनुसार बिहार में मानसून की variability बढ़ रही है। अब कम दिनों में अधिक वर्षा होती है (बाढ़) और फिर लंबा शुष्क काल आता है (सूखा) — इसे Flash Flood-Drought Cycle कहते हैं। औसत वार्षिक वर्षा में उतनी कमी नहीं है, लेकिन वितरण अत्यंत असमान हो गया है।
दक्षिण बिहार के कुछ जिले जैसे गया, औरंगाबाद, कैमूर पहाड़ियों के कारण वर्षा-छाया (Rain Shadow Zone) में पड़ते हैं। पहाड़ियाँ मानसून की नमी को रोक लेती हैं। इन जिलों में वार्षिक वर्षा मात्र 600–700 mm तक ही होती है, जो राज्य के उत्तरी भागों (1,200 mm+) से बहुत कम है।
सूखे के मानवीय एवं संरचनात्मक कारण
प्राकृतिक भेद्यता को मानवीय कुप्रबंधन ने कई गुना गंभीर बना दिया है। BPSC Mains में अक्सर पूछा जाता है — “क्या बिहार का सूखा प्राकृतिक है या मानवनिर्मित?” इसका उत्तर देने के लिए मानवीय कारणों की गहरी समझ जरूरी है।
बिहार का वन आवरण मात्र 7.7% है जबकि राष्ट्रीय औसत 24% और राष्ट्रीय लक्ष्य 33% है (India State of Forest Report 2021)। 1950 की तुलना में गया जिले का वन क्षेत्र 40% घट चुका है। वनों के नाश से तीन बड़े परिणाम हुए:
- वर्षा चक्र बाधित — वन वाष्पीकरण से बादल बनाते हैं, वन नष्ट = कम वर्षा
- मिट्टी की जल-धारण क्षमता घटी — bare soil पर जल तेजी से बह जाता है
- भूजल रिचार्ज न्यूनतम — वृक्षों की जड़ें जल को गहरे तक ले जाती थीं
दक्षिण बिहार में आहर-पाइन प्रणाली मगध काल से प्रचलित थी। आहर = वर्षाजल संचयन का तालाबनुमा जलाशय; पाइन = उससे खेतों तक जल पहुँचाने की नहर। 1950 में बिहार में 90,000 से अधिक तालाब और आहर थे — अब 40,000 से कम बचे हैं। कारण:
- अतिक्रमण — आहर भूमि पर अवैध निर्माण
- सरकारी उपेक्षा — रखरखाव न होने से गाद भर गई
- भूमि सुधार की उलझन — आहर जमीन का स्वामित्व विवादास्पद
इस प्रणाली के नष्ट होने से वर्षाजल का भंडारण असंभव हो गया और भूजल रिचार्ज भी ठप हो गया।
हरित क्रांति के बाद से किसान डीजल पंप से भूजल निकालकर धान (सर्वाधिक जल-गहन फसल) उगाते हैं। दक्षिण बिहार के hard rock क्षेत्र में भूजल रिचार्ज बहुत धीमा है, दोहन बहुत तेज। परिणाम:
- भूजल स्तर (Water Table) प्रतिवर्ष 1–2 फीट गिर रहा है
- गया, औरंगाबाद, नवादा — CGWB द्वारा ‘Over-exploited’ घोषित
- कुएँ और हैंडपंप गर्मियों में सूख जाते हैं — पेयजल संकट
- गहरे ट्यूबवेल की लागत छोटे किसान वहन नहीं कर सकते
दक्षिण बिहार में ब्रिटिशों द्वारा बनाई सोन नहर प्रणाली (19वीं सदी) अब जर्जर हो चुकी है। नहरों में लाइनिंग नहीं — जल रिसाव अत्यधिक। कुल सिंचाई क्षमता का मात्र 45–50% ही उपयोग हो पाता है। तुलना के लिए — पंजाब में 90%+ क्षमता उपयोग होती है। Micro-irrigation (drip/sprinkler) का विस्तार अत्यंत धीमा।
दक्षिण बिहार के किसान धान उगाते हैं — जिसे प्रति किलो उत्पादन के लिए 3,000–5,000 लीटर जल चाहिए। यह एक सूखाग्रस्त क्षेत्र के लिए अत्यंत अनुचित फसल चयन है। मक्का, अरहर, मूंग जैसी कम जल-गहन फसलों को प्रोत्साहन नहीं मिला। MSP नीति ने धान को अत्यधिक लाभकारी बना दिया — किसान दूसरी फसल क्यों उगाएँ?
दशकों तक राज्य सरकार का ध्यान उत्तर बिहार की बाढ़ पर केंद्रित रहा। दक्षिण बिहार के सूखे को “कम महत्वपूर्ण” माना गया। आपदा घोषणा में विलंब — फसल नष्ट होने के महीनों बाद मुआवजा। Drought Early Warning System की कमी। जिला-स्तर पर सूखा प्रबंधन कोशिकाओं का अभाव।
- सूखा → फसल नष्ट → किसान कर्जदार → जमीन बेचना → बटाईदार बनना → और अधिक गरीबी
- सूखा → पलायन → खेत बंजर → वनस्पति नाश → और अधिक सूखा
- सूखा → भूजल दोहन → Water Table गिरना → अगले सूखे में और कम जल
कृषि एवं आर्थिक प्रभाव
सूखे का सबसे तात्कालिक प्रभाव कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। बिहार जैसे कृषि-प्रधान राज्य में, जहाँ 60% से अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, सूखे का आर्थिक विनाश समग्र और दीर्घकालिक होता है।
तत्काल कृषि प्रभाव
आर्थिक प्रभाव — किसान से राज्य तक
| स्तर | प्रभाव | विवरण |
|---|---|---|
| व्यक्तिगत किसान | आय शून्य + ऋण संकट | साहूकारों से 30–40% ब्याज पर ऋण; चुकाने में असमर्थता पर जमीन की बिक्री; किसान आत्महत्या की प्रवृत्ति |
| कृषि मजदूर | बेरोजगारी | खेती बंद = मजदूरी नहीं। दिहाड़ी मजदूर शहरों की ओर पलायन करते हैं। ग्रामीण मजदूरी दर 30% गिरती है। |
| ग्रामीण बाजार | माँग ठप | किसानों के पास पैसे नहीं = बाजार में खरीद नहीं = छोटे व्यापारी, दुकानदार सब प्रभावित। ग्रामीण अर्थव्यवस्था collapse। |
| राज्य सरकार | कर-राजस्व हानि + राहत व्यय | कृषि-आधारित करों में कमी। राहत, मुआवजा, MNREGA पर अतिरिक्त व्यय। SDRF/NDRF से वित्तीय दबाव। |
| बिहार की GSDP | कृषि विकास दर ऋणात्मक | बिहार की GSDP में कृषि का ~25% योगदान। सूखे वर्ष में यह क्षेत्र ऋणात्मक वृद्धि दर दर्ज करता है — पूरी GSDP प्रभावित। |
उत्पादन में गिरावट — आँकड़ों की भाषा
सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभाव
सूखे के सामाजिक प्रभाव दीर्घकालिक और अदृश्य होते हैं — लेकिन ये आर्थिक प्रभावों से कहीं अधिक गहरे होते हैं। पलायन, कुपोषण, सामाजिक असमानता और पर्यावरण का क्षरण — ये सब सूखे की छुपी हुई कीमत हैं।
सामाजिक प्रभाव
स्वास्थ्य प्रभाव
- जल-जनित रोग: दूषित जल पीने से डायरिया, हैजा, टाइफॉइड — विशेषतः बच्चों में मृत्यु-दर बढ़ती है
- श्वसन रोग: सूखी भूमि से उठती धूल — Dust Pneumonia और Silicosis का खतरा
- मानसिक स्वास्थ्य: फसल हानि, ऋण और परिवार-विच्छेद से किसानों में अवसाद (Depression) और आत्महत्या की प्रवृत्ति
- मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य: खाद्य असुरक्षा से गर्भवती माताओं में कुपोषण — कम वजन के बच्चे जन्म लेते हैं
- हीट स्ट्रोक: 45°C+ तापमान में काम करने वाले किसान और मजदूर Heat Stroke के शिकार होते हैं
पर्यावरणीय प्रभाव
तुलनात्मक विश्लेषण एवं समाधान की राह
सूखे के कारणों और प्रभावों को समझने के बाद BPSC Mains में समाधान और तुलनात्मक विश्लेषण पूछा जाता है। इस खण्ड में हम प्राकृतिक बनाम मानवीय कारणों की तुलना और प्रमुख उपायों का विश्लेषण करेंगे।
प्राकृतिक बनाम मानवीय कारण — तुलनात्मक विश्लेषण
| आधार | प्राकृतिक कारण | मानवीय कारण |
|---|---|---|
| नियंत्रण | नियंत्रण असंभव (मानसून, El Niño) | नीति से नियंत्रण संभव |
| गंभीरता | भूगोल स्थायी — परिवर्तन सीमित | कुप्रबंधन ने समस्या को 3–4 गुना बढ़ाया |
| समाधान | Adaptation (जलवायु-अनुकूलन) | Mitigation (नीति सुधार, PMKSY, MNREGA) |
| जिम्मेदार | प्रकृति | सरकार + समाज + किसान |
| उदाहरण | 1966 — El Niño + कम वर्षा | 2009 — कम वर्षा + आहर-पाइन नष्ट + भूजल दोहन |
प्रमुख समाधान
- Drought Early Warning System: IMD + ISRO satellite data से प्रखंड स्तर पर पूर्व चेतावनी — किसान समय पर वैकल्पिक फसल लगा सकें
- PMFBY का प्रभावी क्रियान्वयन: फसल बीमा का enrolment बढ़ाना — दक्षिण बिहार में बेहद कम
- Solar Pump योजना: डीजल पंप की जगह Solar Pump — भूजल दोहन कम, लागत कम
- Atal Bhujal Yojana: Community-based भूजल प्रबंधन — दक्षिण बिहार में विस्तार जरूरी
- नदी जोड़ परियोजना: उत्तर बिहार के अधिशेष जल को दक्षिण की ओर — Koshi-Mechi Link
- जलवायु-अनुकूल कृषि: Climate Smart Agriculture — ICAR और BAU Sabour का सहयोग


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