बिहार में सूखा — दक्षिण बिहार की विशेष समस्या
Bihar Drought Problem — BPSC परीक्षा के लिए सम्पूर्ण विश्लेषण
परिचय एवं परिभाषा
बिहार में सूखा (Drought) एक जटिल और बहुआयामी समस्या है, जो विशेष रूप से दक्षिण बिहार के जिलों को प्रतिवर्ष प्रभावित करती है। BPSC परीक्षा की दृष्टि से यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था, जल संसाधन नीति और आपदा प्रबंधन तीनों को एक साथ स्पर्श करता है।
सूखे की परिभाषाएँ
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार किसी क्षेत्र में जब सामान्य वर्षा का 75% से कम वर्षा होती है तो उसे मौसम-विज्ञान सूखा (Meteorological Drought) कहते हैं। यदि यह कमी लगातार बनी रहे और भूजल स्तर गिर जाए, तो वह जलवैज्ञानिक सूखा (Hydrological Drought) बन जाता है। जब फसलें नष्ट होती हैं और किसानों की आय प्रभावित होती है तो उसे कृषि-सूखा (Agricultural Drought) कहते हैं।
बिहार में सूखे का प्रकार — “बाढ़ और सूखा दोनों एक साथ”
बिहार की भौगोलिक विचित्रता यह है कि उत्तर बिहार में बाढ़ और दक्षिण बिहार में सूखा एक ही मानसून सत्र में देखा जाता है। उत्तर बिहार हिमालय की नदियों (कोसी, गंडक, बागमती) से बाढ़-प्रभावित रहता है, जबकि दक्षिण बिहार की नदियाँ (सोन, पुनपुन, फल्गु) वर्षा पर निर्भर होने के कारण प्रायः सूख जाती हैं।
भौगोलिक संदर्भ — दक्षिण बिहार क्यों अधिक प्रभावित?
दक्षिण बिहार का क्षेत्र छोटानागपुर पठार की उत्तरी सीमा से लगा हुआ है। यहाँ की भूमि मुख्यतः पथरीली और कठोर है, जिससे वर्षाजल का भूमि में संचयन (infiltration) कम होता है और अपवाह (runoff) अधिक होता है।
सूखाग्रस्त जिले — दक्षिण बिहार
बिहार सरकार और NDMA (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) के अनुसार दक्षिण बिहार के निम्नलिखित जिले सूखे के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं:
- गया: सर्वाधिक सूखाग्रस्त — फल्गु नदी प्रायः सूखी रहती है
- औरंगाबाद: कम वर्षा और भूजल की गंभीर कमी
- जहानाबाद: पठारी किनारे — वर्षा विचलन अधिक
- अरवल: लघु जिला, कृषि पूर्णतः वर्षा-निर्भर
- नवादा: पहाड़ी क्षेत्र — मानसून अनिश्चित
- बांका: पठारी सीमा — जल संचयन न्यूनतम
- मुंगेर, लखीसराय: गंगा के दक्षिण — वर्षा अनियमित
- शेखपुरा, नालंदा: भूजल अत्यधिक गहरा
दक्षिण बिहार की नदियाँ — वर्षाकालीन और मौसमी
| नदी | उद्गम | विशेषता | सूखे में स्थिति |
|---|---|---|---|
| सोन | अमरकंटक (MP) | बिहार की सबसे बड़ी दक्षिणी नदी | ग्रीष्म में प्रवाह बहुत कम |
| फल्गु | हजारीबाग पठार | गया में पवित्र; प्रायः भूमिगत प्रवाह | अधिकांश समय सूखी/रेतीली |
| पुनपुन | पलामू (झारखंड) | पटना के दक्षिण में गंगा में मिलती है | मानसून बाद जल-स्तर गिरता है |
| निरंजना | बोधगया क्षेत्र | ऐतिहासिक नदी — बुद्ध से संबंधित | गर्मी में पूरी तरह सूख जाती है |
| कर्मनाशा | कैमूर पहाड़ी | UP-Bihar सीमा पर | वर्षा पर पूरी तरह निर्भर |
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — प्रमुख सूखा वर्ष
बिहार में सूखे का इतिहास बहुत पुराना है। ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्र भारत तक, दक्षिण बिहार ने बार-बार भीषण अकाल और सूखे का सामना किया है। इन घटनाओं ने बिहार की सामाजिक-आर्थिक संरचना को गहरे तक प्रभावित किया।
सूखे के कारण — बहुआयामी विश्लेषण
दक्षिण बिहार में सूखे के कारण केवल प्राकृतिक नहीं हैं — मानवीय कारण भी उतने ही जिम्मेदार हैं। BPSC Mains में इन कारणों का विश्लेषणात्मक विवेचन अपेक्षित होता है।
क. प्राकृतिक कारण
दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल शाखा पहले उत्तर बिहार को पार करती है। दक्षिण बिहार तक पहुँचते-पहुँचते वर्षा की तीव्रता घट जाती है। El Niño वर्षों में यह कमी और बढ़ जाती है।
छोटानागपुर पठार की सीमा से लगे होने के कारण भूमि कठोर और पथरीली है। जल रिसाव (infiltration) कम, runoff अधिक। भूजल भरण (recharge) बहुत धीमी गति से होता है।
गया और औरंगाबाद में ग्रीष्मकालीन तापमान 45–48°C तक पहुँचता है। उच्च तापमान से मिट्टी की नमी तेजी से वाष्पित होती है। जलाशयों का जल भी तेजी से सूखता है।
सोन, फल्गु, पुनपुन — सभी वर्षाधारित (Rain-fed) नदियाँ हैं। हिमालयी बर्फ पिघलने पर निर्भर नहीं। मानसून बाद ये नदियाँ मृतप्राय हो जाती हैं, सिंचाई संभव नहीं।
IPCC रिपोर्ट के अनुसार बिहार में मानसून की variability बढ़ रही है। कम दिनों में अधिक वर्षा होती है जिससे बाढ़ आती है, और फिर लंबा शुष्क काल आता है — इसे Flash Flood-Drought Cycle कहते हैं।
दक्षिण बिहार में hard rock aquifer (ग्रेनाइट, नीस) पाये जाते हैं जिनमें जल भंडारण क्षमता बहुत सीमित है। उत्तर बिहार के alluvial aquifer से बिल्कुल अलग।
ख. मानवीय एवं संरचनात्मक कारण
बिहार में वन आवरण राष्ट्रीय औसत (24%) से बहुत कम है — मात्र 7.7% (India State of Forest Report 2021)। दक्षिण बिहार में कोयलांचल और लकड़ी माफिया ने अवैध कटाई की। वनों के नष्ट होने से वर्षा चक्र बाधित हुआ, मिट्टी की नमी घटी और भूजल रिचार्ज कम हुआ।
दक्षिण बिहार में सिंचाई का कुल नहर नेटवर्क बेहद सीमित है। सोन नहर प्रणाली — 19वीं सदी में ब्रिटिशों द्वारा बनाई गई — अब जर्जर हो चुकी है। नहरों की लाइनिंग नहीं, रखरखाव नहीं। कुल सिंचाई क्षमता का मात्र 45% ही उपयोग हो पाता है।
हरित क्रांति के बाद से किसान डीजल पंप से भूजल निकालकर धान की खेती कर रहे हैं। दक्षिण बिहार के hard rock क्षेत्र में भूजल रिचार्ज कम होने से Water Table प्रतिवर्ष 1–2 फीट गिर रहा है। गया, औरंगाबाद और नवादा में Over-exploitation की श्रेणी में आते हैं।
परंपरागत जल संचयन के साधन — आहर-पाइन प्रणाली, तालाब, पोखर — अतिक्रमण और उपेक्षा के कारण नष्ट हो गए। बिहार में 1950 में 90,000 से अधिक तालाब थे, जो अब घटकर 40,000 से कम रह गए हैं। इससे वर्षाजल का भंडारण असंभव हो गया।
- नीतिगत उपेक्षा: दशकों तक सरकारी ध्यान उत्तर बिहार की बाढ़ पर रहा, दक्षिण की सूखा-समस्या उपेक्षित रही
- जनसंख्या दबाव: अधिक जनसंख्या से प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव
- एकल-फसल निर्भरता: किसान धान पर निर्भर हैं — सर्वाधिक जल-गहन फसल
- पलायन का दुष्चक्र: सूखे से पलायन → श्रम की कमी → खेत बंजर → और अधिक सूखा
सूखे के प्रभाव एवं परिणाम
दक्षिण बिहार में सूखे के प्रभाव केवल कृषि तक सीमित नहीं हैं — वे अर्थव्यवस्था, समाज, स्वास्थ्य और पर्यावरण को समग्र रूप से प्रभावित करते हैं। BPSC Mains में इन प्रभावों का विश्लेषण 15-20 अंकों के प्रश्नों में पूछा जाता है।
कृषि एवं आर्थिक प्रभाव
सामाजिक प्रभाव — पलायन और विस्थापन
सूखे का सबसे दीर्घकालिक प्रभाव श्रम पलायन (Migration) है। दक्षिण बिहार के गया, औरंगाबाद, जहानाबाद और नवादा जिलों से लाखों लोग दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और सूरत की ओर पलायन करते हैं। यह पलायन बिहार की मानव पूँजी को बाहर भेजता है।
स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय प्रभाव
- कुपोषण: फसल नष्ट होने पर परिवारों की खाद्य सुरक्षा खतरे में — बच्चों में कुपोषण और एनीमिया
- जल-जनित बीमारियाँ: दूषित जल पीने से डायरिया, हैजा, टाइफॉइड का प्रकोप
- मानसिक स्वास्थ्य: फसल हानि, ऋण और पलायन से किसानों में अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति
- मृदा क्षरण: वनस्पति आवरण के अभाव में wind erosion और water erosion — भूमि बंजर होती है
- जैव विविधता हानि: जलाशय सूखने से जलीय जीव, पक्षी और स्थलीय पारितंत्र प्रभावित
- धूल-भरी आँधियाँ: गया और औरंगाबाद में Dust Storms — सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव
सरकारी योजनाएँ एवं समाधान
बिहार सरकार और केंद्र सरकार ने दक्षिण बिहार के सूखे से निपटने के लिए अनेक योजनाएँ चलाई हैं। इन योजनाओं का विश्लेषण BPSC Mains के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
केंद्रीय योजनाएँ
| योजना | उद्देश्य | दक्षिण बिहार में प्रभाव |
|---|---|---|
| MNREGA (2005) | 100 दिन रोजगार गारंटी | सूखे वर्षों में माँग 70% बढ़ जाती है; तालाब, कुआँ निर्माण में उपयोग |
| PMKSY (2015) Pradhan Mantri Krishi Sinchai Yojana | “हर खेत को पानी, पानी का सही उपयोग” | Micro-irrigation (drip/sprinkler) प्रोत्साहन; गया-औरंगाबाद में विस्तार |
| PMFBY (2016) Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana | फसल बीमा — सूखा/बाढ़ से क्षतिपूर्ति | दक्षिण बिहार में enrolment कम; जागरूकता की कमी |
| NDRF/SDRF राहत कोष | आपदा राहत — नकद सहायता, अनाज वितरण | सूखाग्रस्त घोषणा के बाद किसानों को input subsidy |
| Atal Bhujal Yojana (2020) | भूजल प्रबंधन — community participation | बिहार में Pilot phase; दक्षिण बिहार शामिल नहीं अभी तक |
| जल जीवन मिशन (2019) | हर घर नल जल — Har Ghar Jal | पेयजल संकट में राहत; लेकिन सिंचाई जल अलग समस्या |
बिहार सरकार की विशेष योजनाएँ
परंपरागत एवं दीर्घकालिक समाधान
आहर एक प्रकार का तालाब-नुमा जलाशय है जो वर्षाजल को रोकता है। पाइन उस जल को खेतों तक पहुँचाने वाली नहर है। यह प्रणाली दक्षिण बिहार में सैकड़ों वर्षों से प्रचलित थी। मगध राजवंश के काल से इसके प्रमाण मिलते हैं। इसे पुनर्जीवित करना सूखे का सर्वोत्तम दीर्घकालिक समाधान है।
Watershed Development Programme के तहत दक्षिण बिहार के पहाड़ी और पठारी क्षेत्रों में वनीकरण। Check Dams और Contour Bunds से मिट्टी और जल का संचयन। WB-IWDP (Integrated Watershed Development Programme) बिहार में सक्रिय।
PMKSY के तहत drip irrigation और sprinkler system से जल की बचत 40–50% तक। गया, औरंगाबाद में सब्जी और फल-उत्पादन में micro-irrigation से क्रांति की संभावना। Solar Pump योजना से बिना डीजल सिंचाई।
- नदी जोड़ परियोजना: कोसी-मेची लिंक — उत्तर बिहार के अधिशेष जल को दक्षिण ले जाना
- Rainwater Harvesting: हर घर और खेत पर छत-वर्षा संचयन अनिवार्य
- फसल विविधीकरण: धान छोड़कर कम जल वाली फसलें — मक्का, ज्वार, दलहन
- Digital Drought Monitoring: IoT Sensors से real-time soil moisture और groundwater data
- Community Seed Banks: सूखा-सहिष्णु देशी बीजों का संरक्षण और वितरण


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