नालंदा एवं विक्रमशिला का ऐतिहासिक महत्व
विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों का इतिहास, संरचना, पतन एवं BPSC परीक्षा उपयोगी सम्पूर्ण विश्लेषण
परिचय एवं त्वरित तथ्य
नालंदा एवं विक्रमशिला का महत्व BPSC परीक्षा की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ये दोनों विश्वविद्यालय न केवल बिहार बल्कि समस्त विश्व की शैक्षिक परंपरा के गौरवशाली प्रतीक हैं — नालंदा को विश्व का प्रथम आवासीय अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय माना जाता है जबकि विक्रमशिला तांत्रिक बौद्ध धर्म एवं दर्शन का सर्वोच्च केन्द्र था।
नालंदा विश्वविद्यालय — इतिहास एवं संरचना
नालंदा विश्वविद्यालय विश्व का प्रथम आवासीय अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय माना जाता है। यह वर्तमान बिहार के नालंदा जिले में राजगीर के समीप स्थित था। इसकी स्थापना गुप्त काल में हुई और यह लगभग 800 वर्षों तक ज्ञान का सर्वोच्च केन्द्र बना रहा।
🏛️ स्थापना एवं विकास
📐 परिसर संरचना एवं विशेषताएँ
🧑🏫 प्रमुख आचार्य एवं विद्वान
- नागार्जुन — महायान बौद्ध दर्शन के महान आचार्य; शून्यवाद के प्रतिपादक। नालंदा से सम्बद्ध।
- आर्यभट्ट — महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री (476 ई.); नालंदा से सम्बद्ध। शून्य एवं दशमलव प्रणाली के प्रणेता।
- धर्मकीर्ति — बौद्ध तर्कशास्त्र के प्रमुख आचार्य (7वीं सदी)।
- शीलभद्र — ह्वेनसांग के काल में नालंदा के प्रमुख आचार्य (कुलपति)।
- नालंदा के दीपंकर श्रीज्ञान (अतिश) — 11वीं सदी के महान बौद्ध विद्वान जो तिब्बत गए।
- ह्वेनसांग — चीनी बौद्ध भिक्षु जिन्होंने नालंदा में 5 वर्ष अध्ययन किया (629–645 ई.)।
विक्रमशिला विश्वविद्यालय — इतिहास एवं संरचना
विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के शासक धर्मपाल (770–810 ई.) ने की थी। यह वर्तमान भागलपुर जिले के अंतीचक गाँव (कहलगाँव के निकट, गंगा तट पर) में स्थित था। यह तांत्रिक बौद्ध धर्म (Vajrayana Buddhism) का सर्वोच्च केन्द्र था और नालंदा के बाद बिहार का दूसरा सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था।
🏛️ स्थापना एवं विकास
📐 परिसर संरचना एवं विशेषताएँ
🧑🏫 प्रमुख आचार्य
- दीपंकर श्रीज्ञान (अतिश) — सर्वाधिक प्रसिद्ध आचार्य; तिब्बत में बौद्ध धर्म पुनरुद्धार के प्रणेता। तिब्बत ने इन्हें “अतिश” की उपाधि दी।
- रत्नाकरशांति — तांत्रिक बौद्ध धर्म के महान विद्वान; प्रज्ञापारमिता के व्याख्याकार।
- ज्ञानश्रीमित्र — तर्कशास्त्र एवं योगाचार दर्शन के प्रमुख आचार्य।
- अभयंकरगुप्त — बौद्ध तंत्र परंपरा के महाचार्य; अनेक ग्रंथों की रचना की।
- शाक्यश्रीभद्र — अंतिम प्रमुख आचार्य; विनाश से पूर्व तिब्बत भाग गए और वहाँ विद्या का प्रसार किया।
नालंदा बनाम विक्रमशिला — तुलनात्मक अध्ययन
BPSC Mains में नालंदा एवं विक्रमशिला की तुलना पर प्रश्न पूछे जाते हैं। नीचे दी गई तालिका परीक्षा की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी है।
| बिन्दु | नालंदा विश्वविद्यालय | विक्रमशिला विश्वविद्यालय |
|---|---|---|
| स्थापना काल | 5वीं सदी ई. (कुमारगुप्त प्रथम) | 8वीं सदी ई. (धर्मपाल — पाल वंश) |
| स्थान | राजगीर के निकट, नालंदा जिला | अंतीचक, भागलपुर जिला (गंगा तट) |
| संरक्षक वंश | गुप्त वंश → पाल वंश → हर्षवर्धन | मुख्यतः पाल वंश |
| विशेषज्ञता | बौद्ध दर्शन, व्याकरण, तर्क, चिकित्सा, खगोल, गणित | वज्रयान / तांत्रिक बौद्ध धर्म, तर्कशास्त्र |
| छात्र संख्या | 10,000+ | लगभग 3,000 |
| शिक्षक संख्या | 1,500–2,000 | 108 आचार्य |
| प्रसिद्ध यात्री | ह्वेनसांग (629 ई.), इत्सिंग (671 ई.) | तिब्बती विद्वान; धर्मस्वामिन |
| पुस्तकालय | धर्मगंज — 9 मंजिला (रत्नसागर, रत्नोदधि, रत्नरंजक) | विशाल पुस्तकालय (नाम अज्ञात) |
| प्रसिद्ध आचार्य | नागार्जुन, आर्यभट्ट, शीलभद्र, धर्मकीर्ति | अतिश दीपंकर, रत्नाकरशांति, शाक्यश्रीभद्र |
| विनाश | 1193 ई. — बख्तियार खिलजी | 1203 ई. — मुहम्मद शिरान खिलजी |
| आधुनिक स्थिति | UNESCO विश्व धरोहर (2016); पुनर्स्थापित (2010 Act) | ASI संरक्षित; उत्खनन स्थल; संग्रहालय |
| अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव | चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, फारस (70 देश) | मुख्यतः तिब्बत, नेपाल, भूटान |
पतन के कारण एवं बख्तियार खिलजी
नालंदा एवं विक्रमशिला का पतन केवल एक सैनिक घटना नहीं थी — यह भारत में बौद्ध धर्म एवं उच्च शिक्षा के क्षरण की प्रतीक घटना भी थी। इतिहासकारों ने पतन के अनेक कारण गिनाए हैं।
1193 ई. में तुर्क सेनापति बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर आक्रमण किया। उसने पुस्तकालय में आग लगाई जो महीनों तक जलती रही। हजारों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या की गई। 1203 ई. में विक्रमशिला भी नष्ट हुआ।
पाल वंश के पतन के बाद 12वीं सदी में राजकीय संरक्षण कमजोर हो गया। स्थानीय राजाओं ने हिन्दू धर्म की ओर रुचि दिखाई और बौद्ध संस्थाओं को अनुदान कम हुआ।
भारत में शंकराचार्य (8वीं सदी) के नेतृत्व में हिन्दू पुनरुत्थान से बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हुआ। बड़े दानदाता कम हो गए और संस्थाओं की आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ने लगी।
महायान एवं वज्रयान बौद्ध परंपराओं के बीच दार्शनिक मतभेद। संस्थाओं में आंतरिक राजनीति और प्रशासनिक शिथिलता भी पतन के सहायक कारण थे।
नालंदा एवं विक्रमशिला — दोनों उत्तर भारत के उन मार्गों पर थे जिनसे तुर्क सेनाएँ गुजरती थीं। कोई सुरक्षा व्यवस्था न होने के कारण ये आसान लक्ष्य बने।
पुस्तकालयों के जलने से लाखों पांडुलिपियाँ नष्ट हुईं। बचे हुए विद्वान तिब्बत, नेपाल, बर्मा भाग गए। भारत में बौद्ध दर्शन की अनेक शाखाएँ लुप्त हो गईं।
⚔️ बख्तियार खिलजी — कौन था?
बख्तियार खिलजी दिल्ली सल्तनत के संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनापति था। उसने 1193 ई. में बिहार पर आक्रमण किया और नालंदा, उदंतपुरी (ओदंतपुरी) जैसे बौद्ध केन्द्रों को नष्ट किया।
तिब्बती इतिहासकार धर्मस्वामिन के अनुसार नालंदा के पुस्तकालय में आग लगाने के बाद जब उससे पूछा गया कि ये इमारतें क्या हैं, तो उसे बताया गया कि ये “पुस्तकों से भरी इमारतें” हैं — यह सुनकर उसने आग और तेज करवाई।
बख्तियार खिलजी ने बाद में बंगाल पर भी विजय प्राप्त की और 1203 ई. में उसके उत्तराधिकारियों ने विक्रमशिला को भी ध्वस्त किया।
नालंदा का पुनरुद्धार (2010)
नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का विचार 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति Dr. A.P.J. Abdul Kalam ने रखा था। इसके बाद East Asia Summit देशों की सहमति से यह परियोजना आगे बढ़ी।
MCQ अभ्यास प्रश्न
नीचे दिए गए पाँच MCQ BPSC Prelims के स्तर पर आधारित हैं। किसी भी विकल्प पर क्लिक करें — सही उत्तर हरे रंग में और गलत उत्तर लाल रंग में प्रदर्शित होगा।


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