बिहार में ममलूक शासन की स्थापना
बिहार पर मुस्लिम आक्रमणों की पृष्ठभूमि — पाल-सेन काल से बख्तियार खिलजी तक
परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बिहार में ममलूक शासन की स्थापना BPSC परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। यह घटना भारत के मध्यकालीन इतिहास की एक निर्णायक कड़ी है जिसमें मुहम्मद बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में तुर्क-अफगान आक्रमणकारियों ने बिहार की समृद्ध बौद्ध-हिंदू सभ्यता को नष्ट करते हुए मुस्लिम शासन की नींव रखी।
ऐतिहासिक संदर्भ
8वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम के सिंध आक्रमण (712 ई.) के बाद भारत में मुस्लिम आक्रमणों की एक लंबी श्रृंखला आरंभ हुई। 10वीं-11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी (998–1030) ने भारत पर 17 बार आक्रमण किए, परंतु उसका उद्देश्य लूट था, स्थायी शासन नहीं। 12वीं शताब्दी में मुहम्मद गोरी (1173–1206) ने उत्तर भारत पर स्थायी मुस्लिम शासन की नींव रखी। उसी के सेनापति बख्तियार खिलजी ने बिहार और बंगाल को जीता।
बिहार की पूर्व-आक्रमण स्थिति — पाल एवं सेन काल
बख्तियार खिलजी के आक्रमण से पूर्व बिहार पाल वंश और सेन वंश के शासन में था। यह काल बिहार के सांस्कृतिक एवं बौद्धिक उत्कर्ष का समय था, परंतु राजनीतिक दृष्टि से यह क्षेत्र कमज़ोर एवं विभाजित हो रहा था।
पाल वंश (750–1162 ई.) — बौद्ध संरक्षक
सेन वंश (1097–1225 ई.) — हिंदू पुनरुत्थान
पाल वंश के पतन के बाद सेन वंश ने बंगाल और बिहार पर अधिकार किया। विजयसेन, बल्लालसेन और लक्ष्मणसेन इस वंश के प्रमुख शासक थे। लक्ष्मणसेन (1178–1206) के शासनकाल में ही बख्तियार खिलजी ने आक्रमण किया। लक्ष्मणसेन नदिया (नवद्वीप) से शासन करते थे और वृद्धावस्था में अत्यंत कमज़ोर हो गए थे।
| शासक | काल | वंश | विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 धर्मपाल | 775–812 | पाल | विक्रमशिला की स्थापना, नालंदा का विस्तार |
| 2 देवपाल | 812–850 | पाल | ओदंतपुरी विहार निर्माण |
| 3 महिपाल-I | 988–1038 | पाल | पाल पुनरुद्धार, अंतिम शक्तिशाली राजा |
| 4 रामपाल | 1077–1130 | पाल | संधिविग्रहीक कवि लिखित जीवनी |
| 5 लक्ष्मणसेन | 1178–1206 | सेन | बख्तियार के आक्रमण के समय शासक |
प्रारंभिक मुस्लिम आक्रमण — पृष्ठभूमि
बिहार पर बख्तियार खिलजी के आक्रमण को समझने के लिए भारत में मुस्लिम आक्रमणों की पूरी श्रृंखला को जानना आवश्यक है। अरब, गजनवी, घुरिद — तीन चरणों में यह आक्रमण भारत को प्रभावित करते हुए अंततः बिहार तक पहुँचे।
मुहम्मद गोरी — भारत में स्थायी विजय का प्रणेता
मुहम्मद गोरी घुर (अफगानिस्तान) का शासक था। वह महमूद गजनवी की तुलना में अधिक महत्वाकांक्षी था — उसका लक्ष्य भारत में स्थायी मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करना था। उसने अपने योग्य दासों को प्रांतपाल नियुक्त किया। कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली, यिल्दिज को गजनी, और बख्तियार खिलजी को पूर्वी अभियान का नेतृत्व दिया।
बख्तियार खिलजी और बिहार-बंगाल विजय
मुहम्मद बख्तियार खिलजी बिहार और बंगाल का पहला मुस्लिम विजेता था। एक साधारण सैनिक से लेकर पूर्वी भारत के विजेता तक की उसकी यात्रा असाधारण है। उसके आक्रमण ने बिहार की हज़ारों साल पुरानी बौद्ध सभ्यता को जड़ से उखाड़ दिया।
बख्तियार खिलजी अफगानिस्तान के गर्मसीर क्षेत्र का मूल निवासी था। वह शारीरिक रूप से अत्यंत बलशाली था — अपनी लंबी भुजाओं के कारण पहचाना जाता था जो घुटनों तक पहुँचती थीं। प्रारंभ में गजनी और गोरी के दरबार में नौकरी न मिलने पर वह दिल्ली और फिर मलिक हिजबुद्दीन के यहाँ नियुक्त हुआ। बाद में उसे भूमि अनुदान (इक्ता) मिला — बिहार के अवध सीमा क्षेत्र में। यहीं से उसने अपनी विजय-यात्रा आरंभ की।
बिहार विजय के चरण
नालंदा विनाश — एक ऐतिहासिक त्रासदी
मिन्हाज के अनुसार जब बख्तियार के सैनिकों ने नालंदा में हज़ारों पुस्तकें जलते देखीं तो उन्होंने एक बंदी से पूछा कि ये क्या हैं। बंदी ने बताया कि ये बौद्ध धार्मिक ग्रंथ हैं। इस पर बख्तियार ने आदेश दिया कि सब जला दो। कहा जाता है कि पुस्तकालय की आग तीन माह तक जलती रही। इस घटना ने भारत में बौद्ध धर्म के पतन को अंतिम रूप दे दिया क्योंकि बौद्ध धर्म के विद्वान और ग्रंथ दोनों नष्ट हो गए।
ममलूक (दास) वंश की स्थापना — 1206 ई.
1206 ई. में मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद उसके दास कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में ममलूक (दास) वंश की स्थापना की। यह भारत का प्रथम मुस्लिम राजवंश था जिसे सल्तनत काल का प्रारंभ माना जाता है। बिहार इसी सल्तनत के अधीन आ गया।
ममलूक वंश के प्रमुख शासक
कुतुबुद्दीन ऐबक
1206–1210 ई.शम्सुद्दीन इल्तुतमिश
1210–1236 ई.रज़िया सुल्तान
1236–1240 ई.बिहार का प्रशासन — ममलूक काल में
ममलूक काल में बिहार को लखनौती (गौड़, बंगाल) के सूबेदार के अधीन रखा गया। बख्तियार खिलजी के बाद उसके खिलजी अमीरों ने बिहार-बंगाल पर शासन किया। इस काल में बिहार का प्रशासनिक केंद्र बिहारशरीफ (ओदंतपुरी का नया नाम) बना। बाद में पटना महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र बना। इक्ता प्रथा के तहत बिहार को विभिन्न तुर्क सरदारों में बाँटा गया।
बिहार पर मुस्लिम आक्रमण के प्रभाव एवं परिणाम
बख्तियार खिलजी के आक्रमण और ममलूक शासन की स्थापना ने बिहार की सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और राजनीतिक संरचना को आमूल बदल दिया। इन परिवर्तनों के दूरगामी प्रभाव थे जो सदियों तक महसूस किए गए।
- नालंदा का विनाश (1193 ई.) — विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालय का सदा के लिए अंत। हज़ारों पांडुलिपियाँ जल गईं।
- विक्रमशिला का विनाश (1203 ई.) — तांत्रिक बौद्ध धर्म का मुख्य केंद्र नष्ट। भिक्षु तिब्बत और नेपाल भाग गए।
- ओदंतपुरी का नाशकरण — बिहारशरीफ नाम पड़ा। बौद्ध विद्या परंपरा का बिहार से विलोप।
- बौद्ध धर्म का पतन — भारत में बौद्ध धर्म व्यावहारिक रूप से समाप्त। जो बचे वे तिब्बत, श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया चले गए।
- फारसी-अरबी शिक्षा का प्रसार — मदरसों की स्थापना। नई शिक्षा प्रणाली लागू।
- इस्लाम का प्रसार — मस्जिदों का निर्माण, नए मुस्लिम शासक वर्ग का उदय।
- सूफी संतों का आगमन — चिश्ती, सुहरावर्दी सिलसिलों के संत बिहार में आए। शेख मखदूम शाह जहाँनिया बिहार के प्रमुख सूफी संत बने।
- हिंदू मंदिरों पर आक्रमण — कुछ मंदिर मस्जिदों में बदले। हालाँकि बाद के शासकों ने अधिक सहिष्णु नीति अपनाई।
- बौद्ध स्थलों का परिवर्तन — बोधगया और अन्य बौद्ध तीर्थ स्थलों पर कुछ समय के लिए प्रभाव। बाद में हिंदू मठ स्थापित हुए।
- सेन वंश का अंत — बिहार में हिंदू राजनीतिक सत्ता समाप्त। 700 वर्षों तक (1206–1912) बिहार किसी न किसी मुस्लिम शासक के अधीन रहा।
- नई प्रशासनिक व्यवस्था — इक्ता प्रणाली लागू। तुर्क-अफगान अमीर प्रांतपाल बने।
- नई राजधानी — बिहारशरीफ और बाद में पटना प्रशासनिक केंद्र बने।
- कर प्रणाली में बदलाव — जज़िया कर (गैर-मुस्लिमों पर), खराज (भूमि कर) आदि लागू।
- नए सामाजिक वर्ग का उदय — मुस्लिम शासक, अमीर, उलेमा वर्ग का उदय। हिंदू-मुस्लिम समाज का सह-अस्तित्व।
- व्यापार में बदलाव — अरब-मध्य एशियाई व्यापार मार्गों से संपर्क। नई वस्तुओं का आगमन।
- हिंदी-उर्दू का विकास — फारसी-अरबी और स्थानीय भाषाओं के मेल से नई भाषाई परंपरा।
- स्थापत्य में बदलाव — मेहराब, गुम्बद और मीनार की नई स्थापत्य शैली का आगमन।
मुस्लिम आक्रमणों की सफलता के कारण — विश्लेषण
BPSC Mains की दृष्टि से यह जानना महत्वपूर्ण है कि बख्तियार खिलजी जैसे तुलनात्मक रूप से छोटी सेना वाले सेनापति ने बिहार जैसे समृद्ध एवं बड़े क्षेत्र को कैसे इतनी आसानी से जीत लिया। इसके लिए हमें दोनों पक्षों — आक्रमणकारी और रक्षक — की स्थिति का विश्लेषण करना होगा।
आक्रमणकारियों की शक्ति के कारण
तुर्क-खिलजी घुड़सवार सेना अत्यंत तेज़, अनुशासित और युद्ध-कुशल थी। वे मध्य एशियाई युद्ध तकनीक में पारंगत थे। बिहार की सेना इस प्रकार की लड़ाई के लिए तैयार नहीं थी।
तुर्क-अफगान सैनिकों में धार्मिक उत्साह था। वे गाज़ी (धर्म-योद्धा) बनने की भावना से लड़ते थे। इससे उनमें मृत्यु का भय कम था।
बख्तियार खिलजी ने अचानक आक्रमण (raid) की रणनीति अपनाई। वह दुश्मन को संगठित होने का मौका नहीं देता था। नदिया में उसने घोड़ों के व्यापारियों के भेष में प्रवेश किया।
बख्तियार स्वयं अत्यंत महत्वाकांक्षी था। वह जानता था कि लूट और विजय ही उसकी प्रतिष्ठा बढ़ाएगी और दिल्ली दरबार में उसकी स्थिति मजबूत होगी।
बिहार की कमज़ोरियाँ
पाल-सेन वंश के बीच संघर्ष। कोई केंद्रीय शक्ति नहीं। राजपूत सामंतों में आपसी एकता का अभाव। हर राजा अपने क्षेत्र की रक्षा में लगा था।
बिहार के शासकों के पास आधुनिक सैन्य तकनीक का अभाव। भारी हाथी सेना तेज घुड़सवारों का मुकाबला नहीं कर सकती थी।
बौद्ध भिक्षु अहिंसा में विश्वास करते थे। बड़े-बड़े विहारों में निहत्थे भिक्षु थे जो सशस्त्र आक्रमण का प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं थे।
बिहार के शासकों को तराइन की लड़ाई से सबक नहीं मिला। वे तुर्क आक्रमणकारियों की युद्ध-शैली से अपरिचित थे।


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