बिहार की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
परिचय एवं अवधारणा
बिहार की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों में स्थलाकृति (Topography) सबसे महत्त्वपूर्ण भौगोलिक कारक है — BPSC Prelims एवं Mains दोनों परीक्षाओं में यह विषय बार-बार पूछा जाता है। किसी प्रदेश की स्थलाकृति अर्थात् भू-आकृति, ऊँचाई, ढाल एवं भूमि की बनावट उस क्षेत्र के तापमान, वर्षा, आर्द्रता तथा पवन की दिशा को सीधे नियंत्रित करती है।

जलवायु (Climate) किसी स्थान की दीर्घकालीन वायुमंडलीय दशाओं का औसत होता है। जबकि स्थलाकृति उस भू-भाग की त्रि-आयामी संरचना — पहाड़, मैदान, पठार, घाटी — को कहते हैं। दोनों के बीच अंतःक्रिया (Interaction) से ही किसी प्रदेश की विशिष्ट जलवायु निर्मित होती है।
बिहार की स्थलाकृतिक संरचना
बिहार की स्थलाकृति तीन स्पष्ट भागों में विभाजित है जो इसकी जलवायु को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करते हैं। उत्तर में हिमालय की तराई, मध्य में गंगा का विशाल मैदान और दक्षिण में छोटानागपुर पठार का उत्तरी विस्तार — ये तीनों भाग बिहार की जलवायु के तीन अलग-अलग आयाम बनाते हैं।
| क्र | स्थलाकृतिक क्षेत्र | भौगोलिक स्थिति | ऊँचाई (मीटर) | जलवायु प्रभाव |
|---|---|---|---|---|
| 1 | हिमालय की तराई (Terai) | उत्तर बिहार — नेपाल सीमा के निकट | 60–100 मीटर | अत्यधिक वर्षा, उच्च आर्द्रता |
| 2 | गंगा का मध्यवर्ती मैदान | मध्य बिहार — गंगा के दोनों ओर | 40–80 मीटर | मानसूनी जलवायु, गर्म ग्रीष्म |
| 3 | दक्षिणी पठार (छोटानागपुर) | दक्षिण बिहार — गया, नवादा, जमुई | 150–400 मीटर | अपेक्षाकृत कम वर्षा, ठंडी सर्दी |
| 4 | नदी घाटियाँ एवं दोआब | सम्पूर्ण बिहार में वितरित | 30–70 मीटर | स्थानीय आर्द्रता, बाढ़ प्रवण क्षेत्र |
🗺️ तीन प्रमुख स्थलाकृतिक क्षेत्र

हिमालय का जलवायु पर प्रभाव
बिहार की उत्तरी सीमा के परे स्थित हिमालय पर्वत शृंखला बिहार की जलवायु का सबसे बड़ा नियंत्रक है। यह विशाल पर्वत दीवार दो महत्त्वपूर्ण कार्य करती है — मानसून पवनों को रोककर वर्षा कराना तथा साइबेरियाई शीत लहर को सीमित करना।

❄️ शीत ऋतु पर हिमालय का प्रभाव
मध्य एशिया व साइबेरिया से आने वाली अत्यंत शीतल पवनें हिमालय की ऊँची चोटियों (औसत ऊँचाई 5000–8800 मीटर) से आगे नहीं बढ़ पातीं। इस कारण बिहार में शीत ऋतु मध्य एशियाई देशों की तुलना में कम कठोर होती है। यदि हिमालय न होता तो बिहार का जनवरी तापमान वर्तमान 10–12°C से बहुत नीचे गिर जाता।
दक्षिण-पश्चिम मानसून जब बंगाल की खाड़ी से आता है, तब वह उत्तर की ओर बढ़ते हुए हिमालय की दक्षिणी ढलानों से टकराता है। इस ओरोग्राफिक (Orographic) प्रभाव के कारण —

- तराई क्षेत्र में भारी वर्षा: पश्चिम चम्पारण, सीतामढ़ी, किशनगंज जैसे क्षेत्रों में 1400–1800 mm तक वर्षा होती है।
- पूर्वी बिहार में अधिक वर्षा: किशनगंज-अररिया क्षेत्र में बंगाल की खाड़ी शाखा + उत्तर-पूर्वी हिमालय की सन्निधि से अत्यधिक वर्षा (~1800 mm+)।
- वर्षा का असमान वितरण: हिमालय की अनुपस्थिति में मानसून बिना रुके आगे निकल जाता — अतः तराई में वर्षा नहीं होती।
पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) भूमध्यसागर से भारत की ओर आते हैं और हिमालय की दक्षिणी ढलानों से टकराकर उत्तर बिहार में जनवरी-फरवरी में हल्की वर्षा (15–25 mm) कराते हैं। यह रबी फसल (गेहूँ) के लिए अत्यंत लाभकारी है। इसे स्थानीय भाषा में ‘माघी बयार’ भी कहते हैं।
🌡️ हिमालय एवं तापमान — तुलनात्मक विश्लेषण
| ऋतु | हिमालय के कारण प्रभाव | औसत तापमान (°C) | परिणाम |
|---|---|---|---|
| शीत ऋतु (दिसम्बर-फरवरी) | शीत लहर अवरुद्ध | 8–15°C | मध्यम शीतल, कोहरा अधिक |
| ग्रीष्म ऋतु (मार्च-जून) | गर्म पश्चिमी हवाएँ (लू) अप्रभावित | 35–45°C | तीव्र गर्मी, लू (Loo) का प्रकोप |
| मानसून (जुलाई-सितम्बर) | मानसून को ऊपर उठाकर वर्षा | 28–32°C | उच्च आर्द्रता, बाढ़ |
| शरद ऋतु (अक्टूबर-नवम्बर) | मानसून की वापसी, शुष्क | 20–30°C | सुखद मौसम |
गंगा के मैदानी भाग का जलवायु पर प्रभाव
बिहार का 70% से अधिक भाग गंगा के विशाल जलोढ़ मैदान में आता है। यह समतल मैदान स्वयं एक महत्त्वपूर्ण जलवायु नियामक है जो पवन की गति, तापमान के चरम मान तथा आर्द्रता के वितरण को नियंत्रित करता है।
🌬️ मैदान एवं पवन प्रवाह
समतल मैदान में पवनों की गति को रोकने वाली कोई स्थलाकृतिक बाधा नहीं है। इस कारण:
- लू (Loo) का प्रकोप: मई-जून में राजस्थान व मध्य भारत से आने वाली गर्म व शुष्क पश्चिमी हवाएँ बिना किसी अवरोध के बिहार के मैदानों में तेज़ी से प्रवेश करती हैं। बक्सर, भोजपुर, रोहतास जिलों में तापमान 44–46°C तक पहुँच जाता है।
- मानसून का तीव्र प्रसार: मैदानी समतल भूमि पर मानसून पवनें बिना घर्षण के तेज़ी से फैलती हैं जिससे मानसून के आगमन के बाद तापमान में तीव्र गिरावट होती है।
- नॉर्वेस्टर (Nor’wester): पूर्वी बिहार (भागलपुर, मुंगेर, पूर्णिया) में पश्चिम-उत्तर से आने वाले तूफ़ानी तेज़ झोंके — जिन्हें काल बैसाखी भी कहते हैं — मैदानी उफान के कारण ही संभव होते हैं।

🌡️ मैदान एवं तापमान का वार्षिक परिसर
गंगा का मैदान समुद्र से दूर (महाद्वीपीय स्थिति) है, अतः यहाँ तापमान का वार्षिक परिसर (Annual Range) अधिक है। ग्रीष्म में 45°C और शीत में 5°C तक के अंतर का मुख्य कारण यही महाद्वीपीय स्थलाकृति है।
- समतल मैदान में सूर्य की गर्मी का तीव्र अवशोषण
- लू (Hot-dry wind) बिना अवरोध के चलती है
- तापमान 40–46°C तक — गया, औरंगाबाद में सर्वाधिक
- मृदा का त्वरित ताप (Rapid heating) — उच्च तापमान
- रात्रि में तीव्र विकिरण (Radiation Cooling) से तापमान गिरता है
- कोहरा (Dense Fog) — पटना, गया, दरभंगा में प्रमुख
- तापमान 5–8°C तक गिरता है — विशेषकर उत्तर बिहार में
- पाला (Frost) — तराई व उत्तरी मैदान में दिसम्बर-जनवरी में
दक्षिणी पठार का जलवायु पर प्रभाव
बिहार के दक्षिण में छोटानागपुर पठार का उत्तरी विस्तार — जो मुख्यतः गया, नवादा, जमुई, बाँका, औरंगाबाद एवं रोहतास जिलों में फैला है — एक महत्त्वपूर्ण जलवायु विभाजक का काम करता है। 150 से 400 मीटर की ऊँचाई वाला यह पठार मध्य बिहार की जलवायु को शेष बिहार से भिन्न बनाता है।

🌧️ पठार और वर्षा का वितरण
दक्षिणी पठार एक वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) बनाने में भूमिका निभाता है। बंगाल की खाड़ी से आने वाला मानसून जब छोटानागपुर पठार को पार करता है तो पठार के उत्तर में (दक्षिण बिहार के मैदानों में) वर्षा की मात्रा घट जाती है।
🌡️ पठार एवं तापमान पर प्रभाव
पठारी क्षेत्र की अधिक ऊँचाई के कारण यहाँ का तापमान मैदानी बिहार की तुलना में 2–4°C कम होता है। गया (100 मीटर) की तुलना में रोहतास जिले के पठारी क्षेत्र (300 मीटर) में शीत ऋतु में पाला पड़ना सामान्य है।
नदी तंत्र एवं जलवायु पर प्रभाव
बिहार की स्थलाकृति का एक महत्त्वपूर्ण पहलू उसका सघन नदी तंत्र है। गंगा, कोसी, गंडक, घाघरा, सोन, पुनपुन जैसी नदियाँ बिहार की जलवायु को आर्द्र, नम एवं बाढ़-प्रवण बनाती हैं। नदी घाटियाँ भी स्वयं एक स्थलाकृतिक इकाई हैं जो स्थानीय जलवायु को प्रभावित करती हैं।
| नदी | स्रोत / उद्गम | जलवायु पर प्रभाव | संबंधित जिले |
|---|---|---|---|
| गंगा | हिमालय (गंगोत्री) | मध्य अक्ष, आर्द्रता वितरण का केंद्र | पटना, भागलपुर, बक्सर, मुंगेर |
| कोसी | नेपाल हिमालय | वार्षिक बाढ़, उत्तर-पूर्व में उच्च आर्द्रता | सहरसा, सुपौल, मधेपुरा |
| गंडक | नेपाल हिमालय (धौलागिरी) | पश्चिम चम्पारण-मुज़फ़्फ़रपुर में बाढ़ व आर्द्रता | चम्पारण, सारण, मुज़फ़्फ़रपुर |
| सोन | अमरकंटक पठार (MP) | दक्षिण बिहार — अपेक्षाकृत कम वर्षा, गर्म घाटी | रोहतास, भोजपुर, पटना |
| पुनपुन / फल्गु | छोटानागपुर पठार | मौसमी नदियाँ — वर्षा में प्रवाह, शीत में सूखी | गया, पटना, अरवल |

🌊 नदी घाटियों का स्थानीय जलवायु पर प्रभाव
- स्थानीय आर्द्रता वृद्धि: नदियों के निकट वाष्पीकरण (Evaporation) अधिक होता है जिससे स्थानीय आर्द्रता बढ़ती है और बादल निर्माण की संभावना अधिक होती है।
- बाढ़ मैदान (Flood Plain) का प्रभाव: कोसी, गंडक, बागमती के बाढ़ मैदान वर्षा ऋतु में जलमग्न होते हैं — यह विशाल जल-क्षेत्र स्थानीय तापमान को कम करता है।
- नदी घाटियों में Cold Air Drainage: रात में ठंडी हवा पहाड़ी ढलानों से नदी घाटियों में उतरती है — इसीलिए गंगा घाटी में सर्दी में घना कोहरा होता है।
- सोन घाटी — शुष्क जलवायु: सोन नदी छोटानागपुर से आती है और इसकी घाटी अपेक्षाकृत संकरी व गहरी है। यहाँ वर्षा-छाया प्रभाव के कारण वर्षा कम होती है।

स्थलाकृति-जलवायु — विस्तृत कारण विश्लेषण
बिहार की जलवायु पर स्थलाकृति के प्रभाव को 6 प्रमुख कारण-प्रभाव श्रृंखलाओं में समझा जा सकता है। BPSC Mains में इन्हें विश्लेषणात्मक रूप से लिखना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
हिमालय की दक्षिणी ढलानें मानसून पवनों को ऊपर उठाकर उत्तर बिहार में भारी वर्षा (1400–1800 mm) कराती हैं। यह प्रक्रिया Relief Rainfall कहलाती है।
हिमालय की ऊँची चोटियाँ (5000–8800 मीटर) मध्य एशिया की शीत लहर को रोकती हैं जिससे बिहार की शीत ऋतु अपेक्षाकृत सहनीय रहती है।
समतल मैदान में कोई अवरोध न होने से राजस्थान से आने वाली गर्म-शुष्क लू (Loo) बिना रुके पश्चिम से पूर्व की ओर बिहार के मैदानों में बहती है।
छोटानागपुर पठार की उत्तरी ढलान पर मानसून उतरते समय गर्म व शुष्क होती है — दक्षिण बिहार में वर्षा घटकर 800–1000 mm रह जाती है।
गंगा, कोसी, गंडक आदि नदियाँ वाष्पीकरण द्वारा स्थानीय आर्द्रता बढ़ाती हैं जो मानसून के दौरान अतिरिक्त वर्षा और शीत में कोहरे का कारण बनती हैं।
Lapse Rate (0.65°C/100 मीटर) के अनुसार दक्षिणी पठार और तराई की ऊँचाई पर तापमान कम होता है — इसीलिए पठारी क्षेत्र मैदान से 2–4°C ठंडा रहता है।


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