बिहार की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
मानसून पवनें — दक्षिण-पश्चिम एवं उत्तर-पूर्व मानसून, वर्षा वितरण, परीक्षा-केंद्रित विश्लेषण
परिचय एवं भौगोलिक संदर्भ
बिहार की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों में मानसून पवनें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं — यह तथ्य Bihar Govt. Competitive Exams एवं राज्य सरकार की अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बारंबार पूछा जाता है। बिहार एक आंतरिक (Inland) राज्य है जो उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical Monsoon Climate) के अंतर्गत आता है।
जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक
बिहार की जलवायु एकल कारण से नहीं, बल्कि अनेक भौगोलिक, वायुमंडलीय एवं स्थलाकृतिक कारकों की अंतःक्रिया से निर्मित होती है। इन्हें समझना परीक्षा के लिए अत्यावश्यक है।
बिहार उष्णकटिबंधीय पेटी में स्थित है। कर्क रेखा के निकट होने से ग्रीष्म ऋतु में सूर्य लगभग लंबवत् चमकता है, जिससे तापमान ऊँचा रहता है एवं मानसूनी पवनों को आकर्षित करने वाला निम्न वायुदाब क्षेत्र बनता है।
उत्तर में हिमालय पर्वत श्रृंखला एक प्राकृतिक अवरोध (Natural Barrier) का कार्य करती है। यह दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों को रोककर बिहार में प्रचुर वर्षा कराती है और साइबेरियाई शीतल पवनों को भी प्रवेश से रोकती है।
बिहार की 75–80% वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा से होती है। यह मुख्य जलवायवीय कारक है। इसकी विस्तृत चर्चा खण्ड 3 में की गई है।
शीत ऋतु में भूमध्यसागर क्षेत्र से आने वाले Extratropical Cyclones (पश्चिमी विक्षोभ) बिहार में हल्की वर्षा (मावठ/सीठी) एवं शीतलहर लाते हैं। रबी फसलों (गेहूँ, चना) के लिए यह लाभकारी है।
मार्च–मई में बंगाल की खाड़ी से उठने वाले स्थानीय तड़ित-झंझा (Thunderstorm) उत्तर-पश्चिम दिशा से आते हैं। ये उत्तर बिहार में तीव्र वर्षा, ओला एवं तेज़ हवाएँ लाते हैं। स्थानीय नाम — आम्रपाली वर्षा भी कहा जाता है।
दक्षिण बिहार में रोहतास पठार, कैमूर श्रेणी की ऊँचाई से वर्षा छाया (Rain Shadow) क्षेत्र बनता है। नेपाल की तराई एवं उत्तरी मैदान में ऊँचाई के कारण वर्षा अधिक होती है।
| कारक | प्रकार | मुख्य प्रभाव | मौसम |
|---|---|---|---|
| दक्षिण-पश्चिम मानसून | वायुमंडलीय | 75–80% वर्षा, कृषि आधार | जून–सितम्बर |
| हिमालय | स्थलाकृतिक | वर्षा रोकना, शीत अवरोध | वार्षिक |
| कालबैसाखी | स्थानीय तूफ़ान | पूर्व-मानसून वर्षा, ओलावृष्टि | मार्च–मई |
| पश्चिमी विक्षोभ | बाह्यकटिबंधीय चक्रवात | मावठ वर्षा, रबी लाभ | दिसम्बर–फरवरी |
| अक्षांश / कर्क रेखा | खगोलीय | उच्च तापमान, निम्न दाब | ग्रीष्म |
| स्थलाकृति | भू-आकृतिक | वर्षा वितरण की विषमता | मानसून ऋतु |
दक्षिण-पश्चिम मानसून — विस्तृत विश्लेषण
दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) बिहार की जलवायु का मेरुदण्ड है। यह जून से सितम्बर के बीच बिहार में सक्रिय रहता है और राज्य की कृषि, नदियों, एवं पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है।
मानसून की उत्पत्ति एवं तंत्र
ग्रीष्म ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप अत्यधिक गर्म हो जाता है, जिससे निम्न वायुदाब (Low Pressure) का क्षेत्र बनता है। हिंद महासागर के ऊपर अपेक्षाकृत उच्च वायुदाब (High Pressure) की पवनें इस निम्न दाब क्षेत्र की ओर दौड़ती हैं। पृथ्वी के कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis Effect) के कारण ये पवनें उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर मुड़ जाती हैं और दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में प्रवाहित होती हैं।
दो शाखाएँ एवं बिहार पर प्रभाव
बंगाल की खाड़ी शाखा
Bay of Bengal Branch — मुख्य शाखाअरब सागर शाखा
Arabian Sea Branch — द्वितीयक शाखामानसून का बिहार में प्रवेश — चरणबद्ध समयरेखा
मानसून को नियंत्रित करने वाले विशिष्ट कारक
Inter-Tropical Convergence Zone (ITCZ) — वह पेटी जहाँ उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवनें मिलती हैं। ग्रीष्म में यह पेटी उत्तर की ओर खिसककर 20°–25°N अक्षांश तक पहुँच जाती है। बिहार इसी ITCZ के प्रभाव क्षेत्र में आ जाता है, जिससे तीव्र वर्षा होती है। ITCZ की उत्तरी स्थिति ही मानसून की सक्रियता का मूल कारण है।
बंगाल की खाड़ी का जल 28°C से अधिक तापमान तक गर्म होता है, जिससे प्रचुर मात्रा में जलवाष्प वायुमंडल में मिलती है। इस आर्द्र पवन के बिहार की ओर बढ़ने पर हिमालय की पाद-भूमि (Foothills) एवं गंगा के मैदान में प्रचुर वर्षा होती है। यदि बंगाल की खाड़ी का तापमान सामान्य से कम हो, तो बिहार में मानसून कमज़ोर पड़ जाता है।
El Niño (प्रशांत महासागर में असामान्य ताप वृद्धि) वर्षों में बिहार सहित पूरे भारत में मानसून कमज़ोर होता है — सूखे (Drought) की संभावना बढ़ती है। इसके विपरीत La Niña वर्षों में मानसून अत्यधिक सक्रिय होता है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। 1987, 2002, 2009 के El Niño वर्षों में बिहार में गंभीर सूखा पड़ा था।
उत्तर-पूर्व मानसून, पश्चिमी विक्षोभ एवं स्थानीय पवनें
दक्षिण-पश्चिम मानसून के अतिरिक्त उत्तर-पूर्व मानसून (शीतकालीन मानसून), पश्चिमी विक्षोभ तथा कालबैसाखी भी बिहार की जलवायु को प्रभावित करते हैं — परंतु इनका योगदान तुलनात्मक रूप से कम है।
उत्तर-पूर्व मानसून (Retreating / Winter Monsoon)
अक्टूबर–नवम्बर में जब दक्षिण-पश्चिम मानसून वापस लौटता है, तो उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थल पवनें प्रवाहित होती हैं। ये पवनें शुष्क स्थलीय होती हैं क्योंकि ये उत्तरी मैदानों के ऊपर से आती हैं। इसीलिए बिहार में इस मौसम में अत्यंत कम वर्षा होती है।
पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances)
कालबैसाखी (Nor’westers / Kal-baisakhi)
वैशाख माह (अप्रैल–मई) में बंगाल की खाड़ी के तटीय क्षेत्रों में थर्मल निम्न दाब बनने से तेज़ तड़ित-झंझा उत्पन्न होते हैं जो उत्तर-पश्चिम दिशा से आते हैं। इन्हें पश्चिम बंगाल में काल-बैसाखी तथा बिहार में आँधी-पानी कहते हैं।
लू (Loo) — स्थानीय शुष्क पवन
मई–जून में राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश से आने वाली गर्म, शुष्क स्थानीय पवन को ‘लू’ कहते हैं। इसका तापमान 45–48°C तक पहुँच सकता है। पश्चिमी बिहार (सासाराम, गया, नालंदा, पटना) में इसका प्रभाव अधिक रहता है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए घातक होती है।
| पवन/परिघटना | दिशा | मौसम | बिहार में प्रभाव |
|---|---|---|---|
| SW मानसून (Bay of Bengal) | दक्षिण-पश्चिम → उत्तर-पूर्व | जून–सितम्बर | 80% वर्षा, कृषि का आधार |
| SW मानसून (Arabian Sea) | दक्षिण-पश्चिम → उत्तर | जून–सितम्बर | नगण्य वर्षा |
| उत्तर-पूर्व मानसून | उत्तर-पूर्व → दक्षिण-पश्चिम | अक्टूबर–नवम्बर | नगण्य वर्षा (शुष्क) |
| पश्चिमी विक्षोभ | पश्चिम → पूर्व | दिसम्बर–फरवरी | मावठ वर्षा 50–75 mm |
| कालबैसाखी | उत्तर-पश्चिम → दक्षिण-पूर्व | मार्च–मई | तड़ित-झंझा, पूर्व-मानसून वर्षा |
| लू | पश्चिम → पूर्व | मई–जून | 45–48°C तापमान, स्वास्थ्य हानि |
वर्षा का वितरण एवं बिहार की ऋतुएँ
बिहार में वर्षा का वितरण असमान है — पूर्व में अधिक, पश्चिम में कम। यह असमानता मुख्यतः बंगाल की खाड़ी से दूरी के कारण है। उत्तर बिहार दक्षिण बिहार की तुलना में अधिक वर्षा प्राप्त करता है।
जिलावार वर्षा वितरण
| क्षेत्र | जिले | औसत वार्षिक वर्षा | विशेषता |
|---|---|---|---|
| सर्वाधिक वर्षा | किशनगंज, पूर्णिया, अररिया, कटिहार | 1,500–2,000 mm | उप-हिमालयी, बंगाल के निकट |
| अधिक वर्षा | सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, भागलपुर | 1,200–1,500 mm | तराई क्षेत्र |
| सामान्य वर्षा | पटना, नालंदा, गया, मुजफ्फरपुर | 1,000–1,200 mm | मध्य मैदान |
| न्यूनतम वर्षा | रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, बक्सर | 700–900 mm | Rain Shadow, पश्चिमी सीमा |
बिहार की चार ऋतुएँ
🌸 वसंत / ग्रीष्म ऋतु
मार्च – मई🌧️ वर्षा ऋतु (मानसून)
जून – सितम्बर🍂 शरद ऋतु
अक्टूबर – नवम्बर❄️ शीत ऋतु
दिसम्बर – फरवरीमासिक वर्षा वितरण — प्रतिशत
मानसून का कृषि, नदी एवं पारिस्थितिकी पर प्रभाव
मानसून पवनें केवल वर्षा ही नहीं लातीं, बल्कि बिहार के कृषि उत्पादन, नदी जलस्तर, जैव-विविधता एवं सामाजिक-आर्थिक जीवन को सम्पूर्ण रूप से नियंत्रित करती हैं।
कृषि पर प्रभाव
नदियों पर प्रभाव
बिहार की नदियाँ — गंगा, कोसी, गंडक, बागमती, महानंदा — मानसून ऋतु में अत्यधिक जलग्रहण करती हैं। उत्तर बिहार की नदियाँ हिमालय से उद्गम होने के कारण मानसून वर्षा + हिमनद-पिघलाव दोनों से प्रभावित होती हैं। कोसी नदी को ‘बिहार का शोक’ इसीलिए कहते हैं — यह प्रतिवर्ष मार्ग बदलती है और मानसून में तीव्र बाढ़ लाती है।
- बाढ़ (Flood): उत्तर बिहार के दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सुपौल में प्रतिवर्ष बाढ़ की स्थिति। 2008 का कोसी बाढ़ — भारत की भीषणतम बाढ़ आपदाओं में एक।
- सूखा (Drought): दक्षिणी एवं पश्चिमी बिहार में मानसून की विफलता पर सूखे की स्थिति। गया, औरंगाबाद, नवादा सर्वाधिक संवेदनशील।
- मृदा अपरदन: तीव्र वर्षा से उपजाऊ तराई भूमि का अपरदन।
- कृषि अनिश्चितता: मानसून के देर से आने या जल्दी वापस जाने से फसल नुकसान।
- जल भंडारण: भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) — बिहार की 70% जनसंख्या भूजल पर निर्भर।
- पारिस्थितिकी: वन, वन्यजीव एवं आर्द्रभूमि (Wetlands) का पोषण।
- जलविद्युत: कोसी, सोन, पुनपुन नदियों में जल प्रवाह — लघु जलविद्युत के अवसर।
- आर्थिक आधार: बिहार की GDP का 18–20% कृषि क्षेत्र से — जो मानसून पर निर्भर है।


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