बिहार की जलवायु को
प्रभावित करने वाले कारक
हिमालय की भूमिका, मानसून, नदियाँ और भौगोलिक स्थिति — BPSC Prelims + Mains के लिए सम्पूर्ण विश्लेषण
परिचय — बिहार की जलवायु का स्वरूप
बिहार की जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक BPSC Prelims एवं Mains दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। बिहार उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु (Tropical Monsoon Climate) वाला राज्य है, जिसकी विशेषताएँ भौगोलिक स्थिति, हिमालय की उपस्थिति, नदी-तंत्र और वायु-प्रवाह से मिलकर निर्धारित होती हैं।
बिहार 24°20’N से 27°31’N अक्षांश और 83°19’E से 88°17’E देशांतर के बीच स्थित है। इसके उत्तर में नेपाल और हिमालय, दक्षिण में झारखंड का पठार, पूर्व में पश्चिम बंगाल और पश्चिम में उत्तर प्रदेश है। यह भौगोलिक स्थिति इसकी जलवायु को गहराई से प्रभावित करती है।
हिमालय की निर्णायक भूमिका
हिमालय पर्वत-श्रृंखला बिहार की जलवायु का सबसे महत्वपूर्ण नियंत्रक है। यह न केवल शीत लहरों से रक्षा करता है, बल्कि मानसून को रोककर वर्षा करवाता है, नदियों को जल देता है और तापमान के चरम को नियंत्रित करता है।
1. उत्तरी शीत हवाओं से सुरक्षा (Cold Wave Barrier)
हिमालय मध्य एशिया और साइबेरिया से आने वाली अत्यंत ठंडी, शुष्क ध्रुवीय हवाओं को भारत में प्रवेश करने से रोकता है। यदि हिमालय न होता, तो बिहार का शीतकालीन तापमान -20°C से -30°C तक गिर सकता था, जैसा कि समान अक्षांश पर स्थित मध्य एशियाई मैदानों में होता है। हिमालय की यह भूमिका बिहार को कृषि योग्य एवं मानव-बसाव योग्य बनाती है।
2. मानसून अवरोध एवं वर्षा (Orographic Rainfall)
दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा जब उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ती है, तो हिमालय की तलहटी से टकराकर ऊपर उठती है। इस पर्वतीय/संवहनीय वर्षा (Orographic Rain) से उत्तरी बिहार — विशेषकर किशनगंज, अररिया, पूर्णिया जैसे जिलों — में भारी वर्षा होती है। किशनगंज में 2,000 mm से अधिक वार्षिक वर्षा होती है।
3. हिमालयी नदियों द्वारा जल-आपूर्ति (Perennial Rivers)
हिमालय की हिमनदियों (Glaciers) से निकलने वाली गंगा, कोसी, गंडक, बागमती, कमला, महानंदा आदि नदियाँ बारहमासी (Perennial) हैं। ये नदियाँ बिहार की भूमि में नमी बनाए रखती हैं, जो तापमान को मध्यम रखती है और कृषि को संभव बनाती है। हिमालय के बिना ये नदियाँ मौसमी (Seasonal) हो जातीं।
4. तराई क्षेत्र का निर्माण (Terai Belt)
हिमालय की तलहटी में तराई क्षेत्र बना है — पश्चिम चंपारण से किशनगंज तक। यह क्षेत्र अत्यधिक आर्द्र, घने वनों से आच्छादित एवं उच्च वर्षा वाला है। यहाँ का तापमान मैदानी भागों की तुलना में कुछ कम रहता है क्योंकि वन आवरण वाष्पोत्सर्जन द्वारा स्थानीय तापमान को नियंत्रित करता है।
| हिमालय की भूमिका | प्रभाव का तंत्र | बिहार पर प्रत्यक्ष प्रभाव |
|---|---|---|
| 1 शीत हवा अवरोध | साइबेरियाई हवाओं को रोकना | शीतकाल में तापमान सहनीय रहता है (5°–15°C) |
| 2 मानसून संग्रह | आर्द्र हवाओं को ऊपर उठाना | उत्तरी बिहार में 1,500–2,000 mm वर्षा |
| 3 बारहमासी नदियाँ | हिमनद-पोषित जलस्रोत | गंगा, कोसी, गंडक — वर्षभर जल |
| 4 तराई निर्माण | जलोढ़ निक्षेपण + आर्द्रता | उच्च वर्षा, वन आवरण, ठंडा स्थानीय तापमान |
| 5 आर्द्रता नियंत्रण | नदी वाष्पीकरण + मानसून | उत्तरी बिहार में उच्च सापेक्षिक आर्द्रता |
मानसून एवं वर्षा वितरण
बिहार में वर्षा का मुख्य स्रोत दक्षिण-पश्चिम मानसून (SW Monsoon) है जो जून से सितम्बर तक सक्रिय रहता है। इस अवधि में राज्य की लगभग 75–80% वार्षिक वर्षा होती है। मानसून की दो शाखाएँ — बंगाल की खाड़ी शाखा और अरब सागर शाखा — बिहार को अलग-अलग प्रकार से प्रभावित करती हैं।
बंगाल की खाड़ी शाखा (Bay of Bengal Branch)
यह बिहार की जलवायु के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण शाखा है। यह शाखा पश्चिम बंगाल से होती हुई बिहार में प्रवेश करती है। इसके कारण पूर्वी बिहार (पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार, भागलपुर) में सर्वाधिक वर्षा होती है। यह शाखा जैसे-जैसे पश्चिम की ओर बढ़ती है, नमी खोती जाती है, इसलिए पश्चिमी बिहार (गया, रोहतास, कैमूर) में कम वर्षा होती है।
अरब सागर शाखा (Arabian Sea Branch)
अरब सागर की शाखा मुख्यतः पश्चिमी भारत को प्रभावित करती है। बिहार तक पहुँचते-पहुँचते इसकी नमी काफी कम हो जाती है। यह पश्चिमी बिहार में कुछ अतिरिक्त वर्षा करती है किंतु इसका प्रभाव सीमित रहता है।
| क्षेत्र / जिले | औसत वार्षिक वर्षा | कारण |
|---|---|---|
| किशनगंज, अररिया | 1,800–2,200 mm | हिमालय की तलहटी + बंगाल शाखा का पहला पड़ाव |
| पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर | 1,400–1,600 mm | बंगाल शाखा की आर्द्रता |
| मध्य बिहार (पटना, मुजफ्फरपुर) | 1,000–1,200 mm | मानसून कमजोर होने लगता है |
| पश्चिमी बिहार (गया, रोहतास, कैमूर) | 700–900 mm | वर्षा छाया क्षेत्र (Rain Shadow), नमी कम |
जलवायु को प्रभावित करने वाले अन्य प्रमुख कारक
हिमालय और मानसून के अलावा बिहार की जलवायु को भौगोलिक स्थिति, स्थलाकृति, नदी-तंत्र, दक्षिणी पठार और महाद्वीपीय प्रभाव भी प्रभावित करते हैं। इन सभी कारकों की समझ BPSC Mains के लिए अनिवार्य है।
बिहार उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (23.5°N–27.5°N) में स्थित है। इससे सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत् पड़ती हैं, जिससे तापमान अधिक रहता है। समुद्र से दूरी (लैंडलॉक्ड) होने के कारण महाद्वीपीय जलवायु के लक्षण — गर्मी में अत्यधिक गर्म, सर्दी में ठंडा — प्रकट होते हैं।
बिहार के दक्षिण में छोटानागपुर पठार (अब झारखंड) स्थित है। यह पठार दक्षिण से आने वाली आर्द्र हवाओं को कुछ हद तक रोकता है। साथ ही, पठारी क्षेत्र की उच्च भूमि गया, नवादा, जहानाबाद जैसे जिलों के तापमान को प्रभावित करती है।
गंगा और उसकी सहायक नदियाँ बिहार के मैदान में बड़े पैमाने पर जल वाष्पीकरण करती हैं। इससे स्थानीय आर्द्रता बढ़ती है और तापमान थोड़ा नियंत्रित रहता है। नदियों के आसपास के क्षेत्रों में “नदी प्रभाव” (River Effect) स्पष्ट देखा जाता है।
लू (Loo) — गर्म, शुष्क, पश्चिमी हवा जो ग्रीष्म में उत्तर-पश्चिम से आती है। गया, औरंगाबाद, रोहतास जिलों को सर्वाधिक प्रभावित करती है। तापमान 45°C तक पहुँचाती है। यह राजस्थान और उत्तर प्रदेश से होकर आती है।
बिहार में वन आवरण कम (~7%) है। पहले जब यहाँ अधिक वन थे, जलवायु अधिक संतुलित थी। वन वर्षा को आकर्षित करते हैं और तापमान नियंत्रित करते हैं। वनों की कटाई से आज बिहार में तापमान एवं अनिश्चित वर्षा की समस्या बढ़ी है।
बिहार का अधिकांश भाग निम्न मैदान है (30–100 मीटर)। उत्तर-पश्चिम में वाल्मीकि नगर क्षेत्र कुछ ऊँचा है। ऊँचाई में अंतर के कारण विभिन्न जिलों के तापमान में 2°–5°C का अंतर देखा जाता है।
बिहार समुद्र से बहुत दूर है — निकटतम समुद्र (बंगाल की खाड़ी) लगभग 500–600 km दूर है। इस कारण समुद्र का मध्यमकारी प्रभाव (Moderating Influence) यहाँ कमजोर है। परिणामतः:
- ग्रीष्म ऋतु अत्यंत गर्म होती है — 40°C से 45°C तक तापमान।
- शीत ऋतु अपेक्षाकृत ठंडी होती है — 5°C से 10°C तक।
- दैनिक तापान्तर (Diurnal Range) भी अधिक है — एक ही दिन में 15°C तक का अंतर।
- तटीय क्षेत्रों (जैसे मुंबई, चेन्नई) की तुलना में बिहार की जलवायु अधिक विषम (Extreme) है।
बिहार के उत्तरी और दक्षिणी भागों में स्पष्ट जलवायु अंतर देखा जाता है:
| विशेषता | उत्तरी बिहार (गंगा के उत्तर) | दक्षिणी बिहार (गंगा के दक्षिण) |
|---|---|---|
| वर्षा | 1,200–2,200 mm (अधिक) | 700–1,200 mm (कम) |
| आर्द्रता | अधिक (75–85%) | कम (60–70%) |
| बाढ़ का खतरा | अधिक (हिमालयी नदियाँ) | कम |
| तापमान | थोड़ा कम | थोड़ा अधिक (लू का प्रभाव) |
| मुख्य समस्या | बाढ़, जलजमाव | सूखा (वर्षा न्यूनता) |
बिहार का ऋतु चक्र एवं तापमान विश्लेषण
बिहार में मुख्यतः चार ऋतुएँ होती हैं — ग्रीष्म, वर्षा, शरद और शीत। इनका क्रम, अवधि और तापमान विशेषताएँ BPSC Prelims में प्रायः पूछी जाती हैं।
- तापमान: 35°–45°C
- लू का प्रकोप — पश्चिमी बिहार
- शुष्क एवं गर्म हवाएँ
- मई सबसे गर्म माह
- कभी-कभी आँधी (Nor’westers/Kalbaisakhi)
- SW मानसून से 75–80% वार्षिक वर्षा
- तापमान: 25°–35°C
- उच्च आर्द्रता (80–90%)
- उत्तरी बिहार में बाढ़
- जुलाई–अगस्त सर्वाधिक वर्षा
- मानसून वापसी का काल
- तापमान: 20°–30°C
- आर्द्रता धीरे-धीरे कम होती है
- आकाश स्वच्छ, मौसम सुहावना
- खरीफ फसल कटाई का समय
- तापमान: 5°–15°C
- जनवरी सबसे ठंडा माह
- पश्चिमी विक्षोभ से वर्षा
- घना कोहरा — यातायात बाधित
- रबी फसल (गेहूँ, सरसों) का समय
काल-बैसाखी (Kalbaisakhi / Nor’westers)
वैशाख (अप्रैल-मई) माह में बिहार के पूर्वी जिलों में काल-बैसाखी नामक तूफानी वर्षा होती है। यह पश्चिम बंगाल से आने वाली thunderstorm प्रणाली है। यह अचानक, तेज हवाओं और भारी वर्षा के साथ आती है। यह आम और लीची की फसल के लिए उपयोगी है।
- सबसे गर्म माह: मई (औसत तापमान 38°–42°C)
- सबसे ठंडा माह: जनवरी (औसत तापमान 8°–12°C)
- सर्वाधिक वर्षा: जुलाई–अगस्त
- वार्षिक तापान्तर (Annual Range): लगभग 25°–30°C
- सापेक्षिक आर्द्रता: वर्षा ऋतु में 85–90%, शीत ऋतु में 55–65%
जलवायु का कृषि एवं जनजीवन पर प्रभाव
बिहार की जलवायु और हिमालय की भूमिका का सीधा असर यहाँ की कृषि प्रणाली, फसल चक्र और लोगों के जीवन पर पड़ता है। बिहार कृषि प्रधान राज्य है और इसकी कृषि पूर्णतः मानसून एवं हिमालयी नदियों पर निर्भर है।
हिमालय-नदी-जलवायु-कृषि का अन्तर्सम्बन्ध
हिमालय → बारहमासी नदियाँ → सिंचाई की सुविधा → कृषि उत्पादन — यह श्रृंखला बिहार की अर्थव्यवस्था का आधार है। गंगा नहर प्रणाली, सोन नहर, त्रिवेणी नहर जैसी सिंचाई परियोजनाएँ हिमालयी नदियों के जल से संचालित हैं। यदि हिमालय न होता और ये नदियाँ मौसमी होतीं, तो बिहार की कृषि व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाती।
- उत्तरी बिहार में वार्षिक बाढ़: हिमालयी नदियाँ (कोसी, गंडक, बागमती) मानसून में उफान पर आती हैं। कोसी को “बिहार का शोक” कहा जाता है।
- दक्षिणी बिहार में सूखा: गया, औरंगाबाद, अरवल जैसे जिले कम वर्षा के कारण सूखे की चपेट में रहते हैं।
- लू से जनहानि: मई-जून में लू से प्रतिवर्ष दर्जनों लोगों की मृत्यु।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: अनिश्चित मानसून, घटती नदी जल-मात्रा और बढ़ता तापमान भविष्य में कृषि संकट पैदा कर सकता है।


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