बिहार की बाढ़ एवं
बाढ़ नियंत्रण उपाय
तटबंध · बांध · जल निकासी — सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं बिहार में बाढ़ की स्थिति
बिहार की बाढ़ BPSC परीक्षा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय है — यह राज्य भारत का सर्वाधिक बाढ़-प्रभावित राज्य है जहाँ देश की कुल बाढ़-प्रभावित भूमि का लगभग 17.2% बिहार में है, जबकि बिहार का क्षेत्रफल देश का मात्र 2.86% है।
उत्तरी बिहार के मैदान विशेष रूप से बाढ़-संवेदनशील हैं। कोसी, गंडक, बागमती, कमला-बलान, महानंदा जैसी नदियाँ प्रतिवर्ष जून से सितम्बर के बीच भयंकर बाढ़ लाती हैं। बाढ़ से न केवल जन-धन की हानि होती है, बल्कि फसलें नष्ट होती हैं, सड़कें-पुल टूटते हैं और हजारों गाँव जलमग्न हो जाते हैं।
बाढ़-प्रभावित क्षेत्र — नदी-वार विभाजन
| नदी | प्रभावित जिले | विशेषता | बाढ़ का प्रकार |
|---|---|---|---|
| 1 कोसी | सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया | “बिहार का शोक”, 115 किमी विस्थापन | अत्यन्त विनाशकारी |
| 2 गंडक | पश्चिम चम्पारण, सारण, मुजफ्फरपुर | नेपाल से आने वाली तेज़ नदी | आकस्मिक बाढ़ |
| 3 बागमती | सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा | नेपाल में उद्गम, अत्यधिक गाद | दीर्घकालिक जलजमाव |
| 4 कमला-बलान | मधुबनी, दरभंगा, झंझारपुर | बार-बार मार्ग बदलना | मैदानी बाढ़ |
| 5 महानंदा | किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार | पूर्वी बिहार की प्रमुख नदी | मौसमी बाढ़ |
| 6 घाघरा | सारण, सीवान, गोपालगंज | पश्चिमी सीमा पर | मध्यम बाढ़ |
बिहार में बाढ़ के प्रमुख कारण
बिहार की बाढ़ केवल प्राकृतिक घटना नहीं है — यह भौगोलिक, जलवैज्ञानिक और मानवीय कारणों का सम्मिश्रण है। BPSC Mains में इन कारणों का विश्लेषण करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
नेपाल की पहाड़ियों से आने वाली नदियाँ अत्यधिक गति से बहती हैं। मानसून में वर्षा का पानी कुछ ही घंटों में मैदानी भाग में पहुँचता है। नदियों की वहन-क्षमता से अधिक जल-प्रवाह बाढ़ का मुख्य कारण है।
उत्तरी बिहार में वार्षिक वर्षा 1000–1400 मिमी है, जिसका 80% भाग मात्र 3 महीनों (जुलाई–सितम्बर) में होता है। अचानक अधिक वर्षा नदियों को उफनाती है।
हिमालय की तराई से बड़ी मात्रा में गाद आती है। नदी-तल ऊँचा हो जाता है जिससे नदी की जल-धारण क्षमता घटती है और बाढ़ की आवृत्ति बढ़ती है। कोसी नदी में सर्वाधिक गाद जमाव होता है।
कोसी नदी ने पिछले 250 वर्षों में लगभग 115 किमी पश्चिम की ओर मार्ग परिवर्तित किया है। बागमती, कमला-बलान भी बार-बार मार्ग बदलती हैं, जिससे नई भूमि बाढ़-प्रभावित होती है।
नेपाल और बिहार की तराई में वन-कटाई से मृदा अपरदन बढ़ा है, गाद का प्रवाह बढ़ा है और वर्षाजल का अवशोषण घटा है। इससे अपवाह (runoff) की मात्रा कई गुना बढ़ गई है।
तटबंधों के निर्माण से नदियों का प्राकृतिक बाढ़ मैदान (floodplain) अवरुद्ध हुआ है। इससे कुछ क्षेत्रों में बाढ़ की तीव्रता बढ़ी है। तटबंध टूटने पर विनाशकारी बाढ़ आती है।
नेपाल-बिहार सम्बन्ध और बाढ़
बिहार की अधिकांश प्रमुख नदियाँ नेपाल से आती हैं। नेपाल में जब भारी वर्षा होती है या बाँधों से जल छोड़ा जाता है, तो बिहार में अचानक बाढ़ आती है। कोसी बैराज (भीमनगर), गंडक बैराज (वाल्मीकिनगर) और तिनाऊ बाँध के संचालन पर नेपाल का नियंत्रण है, इसलिए भारत-नेपाल जल-सहयोग बाढ़ प्रबंधन के लिए अनिवार्य है।
तटबंध — बाढ़ नियंत्रण का परम्परागत उपाय
तटबंध (Embankment) बिहार में बाढ़ नियंत्रण का सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से प्रयुक्त उपाय है। वर्तमान में बिहार में 3,465 किलोमीटर लम्बे तटबंध हैं जो विश्व में किसी भी राज्य के लिए सर्वाधिक हैं।
तटबंध — परिभाषा एवं प्रकार
तटबंध नदी के दोनों किनारों पर निर्मित मिट्टी या पत्थर की ऊँची दीवारें होती हैं जो नदी के जल को एक निश्चित सीमा में रखती हैं। बिहार में मुख्यतः तीन प्रकार के तटबंध हैं।
प्रमुख तटबंध परियोजनाएँ
| तटबंध | नदी | लम्बाई | निर्माण वर्ष | संरक्षित क्षेत्र |
|---|---|---|---|---|
| कोसी पूर्वी तटबंध | कोसी | 160 किमी | 1955–59 | पूर्णिया, सहरसा |
| कोसी पश्चिमी तटबंध | कोसी | 128 किमी | 1955–59 | सुपौल, मधेपुरा |
| गंडक पश्चिमी तटबंध | गंडक | 245 किमी | 1965–70 | पश्चिम चम्पारण |
| बागमती तटबंध | बागमती | 380 किमी | 1960–75 | सीतामढ़ी, दरभंगा |
| बूढ़ी गंडक तटबंध | बूढ़ी गंडक | 280 किमी | 1975–85 | मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर |
| कमला-बलान तटबंध | कमला-बलान | 120 किमी | 1965–70 | मधुबनी, झंझारपुर |
तटबंधों की सीमाएँ एवं समस्याएँ
1. तटबंध टूटना (Breaching): तटबंध टूटने पर अचानक बड़ी मात्रा में जल प्रवाहित होता है जो सामान्य बाढ़ से कई गुना अधिक विनाशकारी होता है। बिहार में प्रतिवर्ष औसतन 30–40 तटबंध टूटते हैं। 2008 में कुसहा (नेपाल) में तटबंध टूटना इसका सबसे भयावह उदाहरण है।
2. नदी-तल का ऊँचा होना: तटबंधों के बीच गाद जमा होने से नदी-तल प्राकृतिक मैदान से ऊँचा हो जाता है जिससे “लटकती नदियाँ” (Perched Rivers) बनती हैं। कोसी नदी का तल आसपास के मैदान से 3–4 मीटर ऊँचा हो गया है।
3. आंतरिक जल-निकासी की समस्या: तटबंध बनाने से बारिश का पानी बाहर नहीं जा पाता, जिससे “आंतरिक बाढ़” (Interior Drainage Problem) उत्पन्न होती है। तटबंध के अंदर लाखों हेक्टेयर भूमि जलमग्न रहती है।
4. रख-रखाव की कमी: तटबंधों का समुचित रख-रखाव न होने से इनकी संरचनात्मक मजबूती कम हो जाती है। भ्रष्टाचार के कारण घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग भी एक बड़ी समस्या है।
5. पारिस्थितिक असंतुलन: तटबंध मछलियों के प्रवास मार्ग को अवरुद्ध करते हैं, नदी के बाढ़ मैदान में उपजाऊ गाद नहीं पहुँच पाती और कृषि उत्पादकता घटती है।
बांध एवं जलाशय — बाढ़ नियंत्रण में भूमिका
बड़े बांध बाढ़ के जल को संचित करके उसे नियंत्रित तरीके से छोड़ते हैं। बिहार में हालाँकि बड़े बांध बनाने की भौगोलिक सीमाएँ हैं, फिर भी कुछ प्रमुख परियोजनाएँ बाढ़ नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रमुख बैराज एवं बांध परियोजनाएँ
बांधों की सीमाएँ एवं चुनौतियाँ
जल निकासी एवं आधुनिक बाढ़ प्रबंधन उपाय
बाढ़ का जल जल्दी निकाल पाना उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना बाढ़ रोकना। बिहार की “आंतरिक जल-निकासी समस्या” — जहाँ तटबंधों के कारण वर्षाजल बाहर नहीं निकल पाता — एक गंभीर चुनौती है।
जल निकासी की प्रमुख विधियाँ
बाढ़ के जल को नियंत्रित नहरों और नालों के माध्यम से बड़ी नदियों में छोड़ने की व्यवस्था। बिहार में Western Kosi Canal और Eastern Kosi Canal इसके प्रमुख उदाहरण हैं। तटबंधों में स्लुइस गेट (sluice gates) लगाकर जल निकासी की जाती है।
बाढ़ के मैदानों में निर्माण और बसाव पर प्रतिबंध लगाकर जल-प्रवाह के लिए प्राकृतिक स्थान उपलब्ध कराना। National Flood Commission (Rashtriya Barh Ayog, 1980) ने इसकी सिफारिश की थी। बिहार में अभी तक इसका पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो सका है।
ताल, चौर, पोखर जैसी आर्द्रभूमियाँ (wetlands) प्राकृतिक बाढ़-अवशोषक (natural flood sponges) हैं। इनका संरक्षण और पुनरुद्धार बाढ़ प्रबंधन का महत्त्वपूर्ण अंग है। बिहार में काँवर झील (बेगूसराय), सिमरिया ताल आदि महत्त्वपूर्ण हैं।
बाढ़ की पूर्व सूचना देने के लिए Central Water Commission (CWC) और Bihar State Disaster Management Authority (BSDMA) मिलकर कार्य करती हैं। नदियों पर जल-स्तर मापक (gauge stations) स्थापित हैं। उपग्रह आधारित मौसम पूर्वानुमान और SMS अलर्ट से लोगों को समय पर सतर्क किया जाता है।
पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा जैसे शहरों में भूमिगत नाले और पम्पिंग स्टेशन बनाए गए हैं। पटना नगर निगम ने पटना शहर में 6 पम्पिंग स्टेशन बनाए हैं। पटना की गंगा तटबंध योजना शहर को बाढ़ से सुरक्षित रखती है।
आधुनिक तकनीकी उपाय
| तकनीक / उपाय | कार्यप्रणाली | लाभ |
|---|---|---|
| LiDAR सर्वेक्षण | लेज़र तकनीक से नदी-तल और बाढ़-क्षेत्र का मानचित्रण | सटीक बाढ़-मानचित्र |
| Remote Sensing | उपग्रह चित्रों से बाढ़-क्षेत्र की पहचान | त्वरित आपदा प्रतिक्रिया |
| Flood Modelling (HEC-RAS) | कम्प्यूटर सिमुलेशन से बाढ़ भविष्यवाणी | वैज्ञानिक योजना निर्माण |
| GIS आधारित मानचित्रण | भौगोलिक सूचना प्रणाली से जोखिम-क्षेत्र चिह्नित | निवारक उपाय |
| Interlinking of Rivers | अधिक जल वाली नदियों का जल कम जल वाली नदियों में | दीर्घकालिक समाधान |
प्रमुख सरकारी योजनाएँ एवं नीतियाँ
केन्द्र एवं राज्य सरकार ने बाढ़ नियंत्रण के लिए अनेक योजनाएँ और नीतियाँ बनाई हैं। इनका BPSC Prelims और Mains दोनों में महत्त्व है।
राष्ट्रीय बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम (NFMP)
केन्द्र सरकारFlood Management Programme (FMP)
XI, XII पंचवर्षीय योजनाBSDMA — Bihar State DMA
2010 में गठितKosi River Basin Management
भारत-नेपालमहत्त्वपूर्ण नीतिगत पहलें
| योजना / नीति | वर्ष | उद्देश्य | संस्था |
|---|---|---|---|
| National Water Policy | 2012 | एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन | MoWR, GoI |
| Flood Plain Zoning Bill | प्रस्तावित | बाढ़-मैदान में निर्माण प्रतिबंध | राज्य सरकारें |
| NDRF की तैनाती | 2006 से | त्वरित बाढ़ राहत एवं बचाव | NDMA |
| Integrated Flood Management | WMO सिफारिश | बाढ़ को संसाधन मानना | UN/WHO |
| मुख्यमंत्री बाढ़ राहत कोष | बिहार | पीड़ितों को तत्काल सहायता | बिहार सरकार |


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