बिहार का भूगर्भीय कालक्रम आर्कियन युग
BPSC Prelims + Mains के लिए सम्पूर्ण अध्ययन — आर्कियन महाकल्प की प्राचीनतम चट्टानें, उनकी विशेषताएँ, बिहार में वितरण एवं परीक्षा-उपयोगी तथ्य।
परिचय — भूगर्भीय कालक्रम (Geological Time Scale)
बिहार का भूगर्भीय कालक्रम (Geological Time Scale) BPSC परीक्षा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण विषय है — इसके अंतर्गत आर्कियन युग की प्राचीनतम चट्टानें, गया, नवादा, जमुई, बाँका, मुंगेर जैसे जिलों में उनका वितरण एवं उनसे प्राप्त खनिज सम्पदा का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।
पृथ्वी की आयु लगभग 4,600 मिलियन वर्ष (4.6 Billion Years) है। इस विशाल समय को भूवैज्ञानिकों ने एक भूगर्भीय कालक्रम (Geological Time Scale) में व्यवस्थित किया है जिसे महाकल्प (Eon) → कल्प (Era) → युग (Period) → काल (Epoch) में बाँटा जाता है। बिहार की भूमि पर इस कालक्रम के लगभग सभी प्रमुख चरण प्रतिबिंबित होते हैं।
भूगर्भीय कालक्रम का संक्षिप्त परिचय
| महाकल्प (Eon) | आयु (Ma = Million Years) | प्रमुख विशेषता | बिहार में प्रतिनिधित्व |
|---|---|---|---|
| हेडियन (Hadean) | 4,600 – 4,000 Ma | पृथ्वी का निर्माण, तरल अवस्था, कोई चट्टान नहीं | नहीं |
| आर्कियन (Archaean) | 4,000 – 2,500 Ma | प्रथम ठोस चट्टानें, प्राथमिक जीवन के चिह्न | गया, नवादा, जमुई, बाँका |
| प्रोटेरोज़ोइक (Proterozoic) | 2,500 – 541 Ma | कुडप्पा, विंध्यन शैल समूह | रोहतास, कैमूर |
| फेनेरोज़ोइक (Phanerozoic) | 541 Ma – आज तक | बहुकोशिकीय जीव, गोंडवाना, जलोढ़ | औरंगाबाद, संपूर्ण उत्तर बिहार |
आर्कियन युग — परिभाषा, काल एवं पृथ्वी की स्थिति
आर्कियन युग (Archaean Eon) पृथ्वी के इतिहास का वह चरण है जो लगभग 4,000 मिलियन वर्ष पूर्व से 2,500 मिलियन वर्ष पूर्व तक चला। यह पृथ्वी पर प्रथम स्थायी ठोस चट्टानों के निर्माण का काल था और इसी से भारत सहित बिहार की भूगर्भीय नींव रखी गई।
Archaean शब्द ग्रीक भाषा के “Archaios” से बना है जिसका अर्थ है प्राचीन। इसे पहले Azoic Era (निर्जीव युग) भी कहा जाता था क्योंकि प्रारंभ में यह माना जाता था कि इस काल में कोई जीवन नहीं था। परंतु बाद में शोधों से पता चला कि इस काल के अंत में सूक्ष्म एककोशिकीय जीव (Prokaryotes) अस्तित्व में आए। भारत में आर्कियन चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत (Peninsular India) में व्यापक रूप से पाई जाती हैं।
आर्कियन युग में पृथ्वी की दशा
आर्कियन युग के उप-विभाजन
| # | उप-विभाजन | आयु (Ma) | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 | ईओआर्कियन (Eoarchaean) | 4,000 – 3,600 | प्रथम क्रस्ट का निर्माण, ज्वालामुखी विस्फोट |
| 2 | पेलिओआर्कियन (Palaeoarchaean) | 3,600 – 3,200 | ग्रीनस्टोन बेल्ट, प्रथम महाद्वीपीय नाभिक |
| 3 | मेसोआर्कियन (Mesoarchaean) | 3,200 – 2,800 | स्ट्रोमेटोलाइट, प्रथम जैविक अवशेष |
| 4 | नियोआर्कियन (Neoarchaean) | 2,800 – 2,500 | ऑक्सीजन उत्पादन, धात्विक खनिज निर्माण — बिहार प्रासंगिक |
आर्कियन युग की प्रमुख चट्टानें — प्रकार एवं विशेषताएँ
आर्कियन युग की चट्टानें दो प्रमुख प्रकार की होती हैं — आग्नेय (Igneous) जो मैग्मा के ठंडे होने से बनीं, और रूपांतरित (Metamorphic) जो उच्च ताप-दाब के प्रभाव से परिवर्तित हुईं। बिहार में ये दोनों प्रकार के शैल पाए जाते हैं।
ग्रेनाइट (Granite)
अंतर्भेदी आग्नेय — 2,700–3,200 Maनाइस (Gneiss)
रूपांतरित — ग्रेनाइट से निर्मितमाइका शिस्ट (Mica Schist)
रूपांतरित — शेल/बेसाल्ट सेग्रीनस्टोन (Greenstone)
आग्नेय+रूपांतरित बेल्टआर्कियन शैल समूह — भारतीय वर्गीकरण
भारत में आर्कियन युग की चट्टानों को दो प्रमुख समूहों में बाँटा जाता है — धारवाड़ समूह (Dharwar Group) और आर्कियन नाइस एवं ग्रेनाइट। बिहार एवं झारखंड के संदर्भ में छोटानागपुर नाइस कॉम्प्लेक्स (Chotanagpur Gneissic Complex — CGC) सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जो दक्षिण बिहार की भूमि को भी प्रभावित करता है।
| शैल समूह | चट्टान प्रकार | क्षेत्र (बिहार/भारत) | महत्वपूर्ण खनिज |
|---|---|---|---|
| छोटानागपुर नाइस कॉम्प्लेक्स (CGC) | नाइस, ग्रेनाइट, माइग्माटाइट | गया, नवादा, जमुई, बाँका (बिहार) | अभ्रक, ग्रेनाइट, क्वार्टज़ |
| सिंघभूम क्रेटन (Singhbhum Craton) | ग्रेनाइट-नाइस, ग्रीनस्टोन बेल्ट | मुंगेर, बाँका (बिहार) + पूर्वी झारखंड | लोहा, ताँबा, यूरेनियम |
| धारवाड़ समूह (Dharwar) | फिलाइट, क्वार्टज़ाइट, शिस्ट | मुख्यतः दक्षिण भारत | सोना, मैंगनीज़ |
| बुंदेलखंड नाइस | ग्रेनाइट-नाइस | उत्तर भारत (MP, UP) | ग्रेनाइट पत्थर |
- प्राथमिक चट्टानें (Primary Rocks) — ये पृथ्वी पर सर्वप्रथम बनी चट्टानें हैं। इन्हें आधार चट्टानें (Basement Rocks) भी कहते हैं।
- जीवाश्म-रहित (Fossil-free) — 4,000–2,500 Ma की अवधि में बहुकोशिकीय जीव नहीं थे, इसलिए इन चट्टानों में कोई जीवाश्म नहीं मिलता।
- अत्यंत कठोर (Highly Resistant) — दीर्घकालीन ताप-दाब के कारण ये कठोर एवं घने हो गए हैं। क्षरण (Erosion) के प्रति प्रतिरोधी।
- रवेदार संरचना (Crystalline) — धीमी गति से ठंडे होने के कारण बड़े-बड़े क्रिस्टल बने। ग्रेनाइट का मोटा दाना (coarse grain) इसी का परिणाम है।
- धातु खनिज युक्त — सोना, ताँबा, लोहा, निकल, माइका, क्रोमाइट आदि आर्कियन चट्टानों में पाए जाते हैं।
- भूकंप एवं ज्वालामुखी से कम प्रभावित — ये स्थिर क्रेटन (Stable Cratons) हैं जो आज भी भूगर्भीय रूप से स्थिर हैं।
बिहार में आर्कियन चट्टानों का वितरण — जिलेवार विवरण
बिहार में आर्कियन युग की चट्टानें मुख्यतः दक्षिण बिहार के जिलों में पाई जाती हैं। ये क्षेत्र छोटानागपुर पठार (Chotanagpur Plateau) के उत्तरी विस्तार का भाग हैं। झारखंड विभाजन (2000) के बाद बिहार में आर्कियन शैलों का क्षेत्रफल सीमित हो गया किंतु गया, नवादा, जमुई, बाँका और मुंगेर में ये अभी भी महत्वपूर्ण हैं।
जिलेवार वितरण — विस्तृत विवरण
गया जिला बिहार में आर्कियन चट्टानों का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। यहाँ छोटानागपुर नाइस कॉम्प्लेक्स (CGC) की चट्टानें धरातल पर प्रकट हैं। गया में मुख्य रूप से काला ग्रेनाइट (Black Granite) पाया जाता है जो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में “Galaxy Black” या “Black Pearl” के नाम से बिकता है। गया का ग्रेनाइट यूरोप, अमेरिका, जापान को निर्यात होता है। बोधगया की पहाड़ियाँ इसी आर्कियन ग्रेनाइट से बनी हैं। गया की फल्गु नदी घाटी में ग्रेनाइट की कटान से बने खड्ड (gorges) दिखाई देते हैं।
- मुख्य चट्टान — काला ग्रेनाइट, नाइस
- आयु — 2,700–3,000 Ma
- आर्थिक उपयोग — निर्यात, भवन निर्माण, मूर्तिकला
- प्रसिद्ध स्थल — बोधगया, राजगीर के आसपास
नवादा जिले में नाइस (Gneiss) और ग्रेनाइट दोनों पाए जाते हैं। यह जिला छोटानागपुर पठार का उत्तरी किनारा है। नवादा में गिरियक पहाड़ी तथा आसपास के क्षेत्रों में कठोर आर्कियन चट्टानें धरातल पर उभरी हैं। नवादा और गया की सीमा पर बराबर पहाड़ियाँ (Barabar Hills) हैं जो आर्कियन ग्रेनाइट से बनी हैं। इन्हीं पहाड़ियों में मौर्यकालीन गुफाएँ काटी गई हैं — जो इस चट्टान की स्थायित्व का प्रमाण है।
- मुख्य चट्टान — नाइस, ग्रेनाइट
- प्रसिद्ध स्थल — बराबर गुफाएँ (अशोककालीन)
- भू-आकृति — मोनाडनॉक (Monadnock) पहाड़ियाँ
जमुई जिला बिहार में अभ्रक (Mica) खनन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ माइका शिस्ट (Mica Schist) — एक रूपांतरित आर्कियन चट्टान — प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। जमुई झारखंड की mica belt का बिहार की ओर विस्तार है। इस जिले में नाइस, शिस्ट, ग्रेनाइट तीनों प्रकार की आर्कियन चट्टानें मिलती हैं। जमुई में सोने (Gold) के संकेत भी मिले हैं जो ग्रीनस्टोन बेल्ट से जुड़े हैं। नागी एवं नकटी बाँध इसी क्षेत्र में आर्कियन चट्टानों पर बने हैं।
- मुख्य चट्टान — माइका शिस्ट, नाइस, ग्रेनाइट
- मुख्य खनिज — अभ्रक (Mica)
- आर्थिक महत्व — विद्युत उपकरण, अंतरिक्ष उद्योग
बाँका और मुंगेर जिले सिंघभूम क्रेटन (Singhbhum Craton) के उत्तरी विस्तार पर स्थित हैं। यह क्रेटन 3,200–3,400 Ma पुराना है और भारत के प्राचीनतम स्थिर भूखंडों में से एक है। बाँका में नाइस, शिस्ट और क्वार्टज़ाइट पाई जाती हैं। मुंगेर में गंगा नदी इन्हीं कठोर आर्कियन चट्टानों को काटकर बहती है जिससे गंगा का मार्ग संकुचित हो जाता है — यह एक महत्वपूर्ण भूगोल तथ्य है।
- मुख्य चट्टान — नाइस, शिस्ट, क्वार्टज़ाइट
- क्रेटन — सिंघभूम क्रेटन
- विशेषता — मुंगेर में गंगा का संकीर्ण मार्ग
बिहार में आर्कियन चट्टानों का सारांश मानचित्र (तालिका)
| जिला | मुख्य चट्टान | क्रेटन / समूह | मुख्य खनिज | विशेष महत्व |
|---|---|---|---|---|
| गया | काला ग्रेनाइट, नाइस | CGC | ग्रेनाइट | अंतर्राष्ट्रीय ग्रेनाइट निर्यात |
| नवादा | ग्रेनाइट, नाइस | CGC | ग्रेनाइट | बराबर गुफाएँ (मौर्यकाल) |
| जमुई | माइका शिस्ट, नाइस | CGC + Singhbhum | अभ्रक (Mica) | mica belt — विद्युत उद्योग |
| बाँका | नाइस, शिस्ट | Singhbhum Craton | अभ्रक, क्वार्टज़ | झारखंड सीमावर्ती खनिज |
| मुंगेर | ग्रेनाइट, नाइस | Singhbhum Craton | ग्रेनाइट | गंगा का संकीर्ण मार्ग |
| औरंगाबाद | ग्रेनाइट (+ गोंडवाना) | CGC | ग्रेनाइट, बॉक्साइट | दक्षिण-पश्चिम सीमांत |
| अरवल | ग्रेनाइट (आंशिक) | CGC (किनारा) | निर्माण पत्थर | सीमित विस्तार |
आर्कियन चट्टानों की भौतिक, रासायनिक एवं आर्थिक विशेषताएँ
आर्कियन चट्टानों की विशेषताएँ उनकी प्राचीनता, उत्पत्ति की परिस्थितियों एवं दीर्घकालीन भूगर्भीय प्रक्रियाओं का परिणाम हैं। ये विशेषताएँ BPSC Prelims में MCQ और Mains में वर्णनात्मक प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
भौतिक विशेषताएँ
- अत्यंत कठोरता — ग्रेनाइट और नाइस Mohs scale पर 6–7 कठोरता। दीर्घकालीन क्षरण के बाद भी टिके रहते हैं।
- रवेदार संरचना (Crystalline) — मोटे दाने वाले क्रिस्टल। धीमे ठंडे होने का परिणाम।
- बंधित/धारीदार (Banded) — नाइस में हल्की और गहरी पट्टियाँ। ताप-दाब के प्रभाव का परिणाम।
- घना (Dense) — उच्च घनत्व, 2.6–3.0 g/cm³। जलोढ़ मिट्टी की तुलना में बहुत भारी।
- रंध्रहीन (Non-porous) — जल अवशोषण बहुत कम। भूजल संग्रह कठिन।
रासायनिक विशेषताएँ
- सिलिकेट खनिज प्रधान — क्वार्ट्ज़ (SiO₂), फेल्सपार, अभ्रक प्रमुख घटक।
- धात्विक तत्व — लोहा, ताँबा, निकल, क्रोमियम, सोना।
- रासायनिक स्थिरता — ये चट्टानें अम्ल और क्षार से कम प्रभावित होती हैं।
- उच्च सिलिका सामग्री — ग्रेनाइट में 70–75% SiO₂। इसीलिए इसे Felsic चट्टान कहते हैं।
- रेडियोधर्मी तत्व — यूरेनियम, थोरियम के सूक्ष्म अंश। आयु-निर्धारण (Radiometric Dating) में उपयोगी।
आर्कियन चट्टानों की भूआकृतिक विशेषताएँ — बिहार
बिहार के दक्षिणी जिलों में आर्कियन चट्टानों के कारण कई विशिष्ट भूआकृतियाँ बनी हैं। मोनाडनॉक (Monadnock) — जो कठोर चट्टानों का बचा हुआ ऊँचा टीला होता है — बराबर, गिरियक, गुरपा की पहाड़ियों में दिखता है। इन चट्टानों की कठोरता के कारण नदियाँ इन पर गहरे खड्ड (Gorges) बनाती हैं। मुंगेर में गंगा इसी कारण संकीर्ण है।
आर्कियन चट्टानों से खनिज सम्पदा — बिहार में आर्थिक महत्व
बिहार में आर्कियन युग की चट्टानें खनिज सम्पदा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अभ्रक, ग्रेनाइट, क्वार्टज़, फेल्सपार जैसे खनिज इन्हीं प्राचीन चट्टानों में पाए जाते हैं और बिहार के औद्योगिक विकास का आधार हैं।
जमुई, बाँका में माइका शिस्ट से। मस्कोवाइट और बायोटाइट अभ्रक मिलता है। विद्युत उपकरण, अंतरिक्ष यान, सौंदर्य प्रसाधन में उपयोग। भारत विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक।
गया (काला ग्रेनाइट) — अंतर्राष्ट्रीय निर्यात। नवादा, औरंगाबाद में भी। भवन, फर्श, मूर्ति, सड़क निर्माण। बिहार का प्रमुख निर्यात पत्थर।
गया, जमुई, नवादा में। उच्च शुद्धता वाला क्वार्ट्ज़। काँच उद्योग, सेमीकंडक्टर, सिलिकॉन निर्माण में। आधुनिक उद्योगों में माँग बढ़ रही है।
ग्रेनाइट और नाइस का प्रमुख घटक। मिट्टी के बर्तन (Ceramics), काँच उद्योग, साबुन उद्योग में उपयोग। जमुई, गया से प्राप्त।
जमुई जिले में ग्रीनस्टोन बेल्ट में स्वर्ण के संकेत मिले हैं। GSI (Geological Survey of India) ने सर्वेक्षण किया है। अभी खनन स्तर पर नहीं।
समस्त दक्षिण बिहार में आर्कियन पत्थर सड़क, पुल, भवन, बाँध निर्माण में। नागी एवं नकटी बाँध (जमुई) इसी पर निर्मित।
झारखंड विभाजन का प्रभाव — आर्थिक दृष्टिकोण
वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने से बिहार ने आर्कियन शैल क्षेत्र का बड़ा भाग खो दिया। छोटानागपुर पठार में आर्कियन चट्टानों पर स्थित लोहा (SAIL), ताँबा (HCL, Ghatsila), यूरेनियम (Jaduguda) और कोलकाता-रांची औद्योगिक गलियारा सब झारखंड के भाग बन गए। बिहार के पास केवल गया-नवादा-जमुई-बाँका-मुंगेर के सीमित आर्कियन क्षेत्र बचे।
विश्लेषण — आर्कियन युग का बिहार पर व्यापक प्रभाव
आर्कियन युग की चट्टानें केवल भूवैज्ञानिक महत्व तक सीमित नहीं हैं — ये बिहार के भूगोल, कृषि, उद्योग, पर्यटन एवं संस्कृति पर गहरा प्रभाव डालती हैं। BPSC Mains में इस बहु-आयामी दृष्टिकोण की अपेक्षा की जाती है।
भूगोल पर प्रभाव
दक्षिण बिहार की पहाड़ी एवं उबड़-खाबड़ भूमि का मूल कारण आर्कियन चट्टानें हैं। ये चट्टानें कठोर होने के कारण क्षरण का प्रतिरोध करती हैं और पहाड़ियाँ, टीले, संकीर्ण नदी घाटियाँ बनाती हैं। गया, नवादा, जमुई, बाँका की भूमि उत्तर बिहार के मैदान की तुलना में ऊँची, कठोर और कम उपजाऊ है।
कृषि पर प्रभाव
आर्कियन चट्टानों वाले दक्षिणी जिलों में मिट्टी पतली, पथरीली और कम उर्वर है। वर्षा का जल शीघ्र बह जाता है (Runoff अधिक) क्योंकि ये चट्टानें रंध्रहीन हैं। इसके विपरीत उत्तर बिहार का जलोढ़ मैदान कृषि के लिए आदर्श है। यही कारण है कि धान, गेहूँ, मक्का की उपज उत्तर में अधिक और दक्षिण में कम है।
धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व
बिहार की प्राचीन धार्मिक-ऐतिहासिक स्थलों का गहरा संबंध आर्कियन चट्टानों से है। बोधगया की पहाड़ियाँ, बराबर गुफाएँ (अशोककालीन — नवादा), राजगीर की पंचपहाड़ी और गुरपा (गया) सभी आर्कियन ग्रेनाइट-नाइस पर बने हैं। इन कठोर चट्टानों में प्राचीन मूर्तिकारों ने 2,300 वर्ष पूर्व गुफाएँ काटीं जो आज भी अक्षुण्ण हैं।
- अवैध खनन: दक्षिण बिहार में ग्रेनाइट और बालू के अवैध खनन से पर्यावरणीय क्षति।
- जल संकट: रंध्रहीन आर्कियन चट्टानें भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) को कठिन बनाती हैं। गया, नवादा में जल संकट गंभीर।
- कम कृषि उत्पादकता: पतली, पथरीली मिट्टी के कारण दक्षिण बिहार में कृषि पिछड़ी।
- झारखंड विभाजन का नुकसान: बड़े आर्कियन खनिज भंडार झारखंड में चले गए।


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