बिहार का भूगर्भीय कालक्रम
बिहार की धरती में छिपे युगों का विज्ञान — BPSC Prelims एवं Mains के लिए सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं भूगर्भीय अवलोकन
बिहार का भूगर्भीय कालक्रम (Geological Chronology of Bihar) अत्यंत विविध एवं जटिल है — इस राज्य की भूमि में आर्कियन महाकल्प के प्राचीनतम आग्नेय-रूपांतरित शैलों से लेकर चतुर्थक काल के आधुनिक जलोढ़ निक्षेपों तक का क्रमबद्ध इतिहास छिपा हुआ है। BPSC Prelims एवं Mains दोनों परीक्षाओं के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भूगर्भीय दृष्टि से बिहार को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाता है: दक्षिण बिहार का पठारी क्षेत्र (छोटानागपुर पठार का उत्तरी विस्तार — अब झारखंड में) तथा उत्तरी बिहार का विशाल जलोढ़ मैदान। इन दोनों क्षेत्रों की भूगर्भीय आयु और शैल-संरचना में आकाश-पाताल का अंतर है।
| महाकल्प / Eon | काल (वर्ष पूर्व) | बिहार में क्षेत्र | प्रमुख शैल-प्रकार |
|---|---|---|---|
| 1 आर्कियन | 250–400 करोड़ वर्ष | दक्षिण बिहार / गया, नवादा, जमुई | ग्रेनाइट, नीस, शिस्ट |
| 2 प्रोटेरोज़ोइक (धारवाड़) | 60–250 करोड़ वर्ष | दक्षिण बिहार, सोन घाटी | क्वार्टज़ाइट, स्लेट, संगमरमर |
| 3 विंध्यन (पुराकल्प) | 57–100 करोड़ वर्ष | सोन नदी घाटी, रोहतास, कैमूर | बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, शेल |
| 4 गोंडवाना (पुराकल्प-मध्यकल्प) | 20–30 करोड़ वर्ष | दामोदर घाटी क्षेत्र | कोयला, बालुका पत्थर |
| 5 चतुर्थक (Quaternary) | 26 लाख वर्ष–अद्यतन | संपूर्ण उत्तरी बिहार | जलोढ़, दोमट, बालू, कंकड़ |
आर्कियन महाकल्प — प्राचीनतम शैल समूह
आर्कियन महाकल्प (Archean Eon) पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास का सबसे पुराना अध्याय है। बिहार के दक्षिणी जिलों — गया, नवादा, जमुई, बाँका, औरंगाबाद में इस काल के प्राचीनतम शैल अभी भी धरातल पर उपस्थित हैं, जो छोटानागपुर पठार के उत्तरी भाग का विस्तार हैं।
आर्कियन शैलों की विशेषताएँ
ये शैल मूलतः रूपांतरित एवं आग्नेय (Metamorphic and Igneous) प्रकार के हैं। लाखों-करोड़ों वर्षों में ताप एवं दाब के कारण इनमें रासायनिक एवं संरचनात्मक परिवर्तन आ गया। ग्रेनाइट-नीस इस क्षेत्र का सर्वाधिक पाया जाने वाला शैल है। इसके अतिरिक्त शिस्ट (Schist), क्लोराइट शिस्ट, माइका शिस्ट तथा क्वार्टज़ाइट भी मिलते हैं।
छोटानागपुर नीस Complex (CNGC)
बिहार के दक्षिणी भाग में फैला छोटानागपुर नीस Complex भूगर्भीय दृष्टि से भारत के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। यह मुख्यतः ग्रेनाइट-नीस, मिग्मेटाइट तथा विभिन्न प्रकार के रूपांतरित शैलों से बना है। वर्तमान में यह क्षेत्र अधिकांशतः झारखंड में है, किन्तु बिहार के जमुई, बाँका, नवादा, गया जिलों में इसका उत्तरी सिरा दिखता है।
प्रोटेरोज़ोइक एवं विंध्यन कल्प
आर्कियन के बाद प्रोटेरोज़ोइक महाकल्प (Proterozoic Eon) का दौर आया जिसमें बिहार के सोन घाटी क्षेत्र में अवसादी एवं रूपांतरित शैलों का जमाव हुआ। इसी काल में विंध्यन शैल क्रम का निर्माण हुआ जो आज रोहतास, कैमूर, सोनभद्र सीमा पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।
धारवाड़ क्रम (Dharwar System)
प्रोटेरोज़ोइक काल के शैलों को भारत में सामान्यतः धारवाड़ क्रम कहा जाता है। ये शैल आर्कियन शैलों की तुलना में कम रूपांतरित हैं। बिहार में इस काल के शैल मुख्यतः क्वार्टज़ाइट, स्लेट, फाइलाइट और संगमरमर (Marble) के रूप में मिलते हैं। सोन नदी घाटी इस क्रम के शैलों का प्रमुख क्षेत्र है।
विंध्यन शैल क्रम (Vindhyan System) — बिहार का दृष्टिकोण
विंध्यन शैल क्रम बिहार में सोन घाटी के साथ-साथ रोहतास पठार और कैमूर श्रेणी में फैला हुआ है। इसकी आयु लगभग 57 से 100 करोड़ वर्ष के बीच आँकी गई है। यह अवसादी शैल क्रम (Sedimentary) है जिसमें बड़े पैमाने पर जीवाश्म भी प्राप्त होते हैं।
| विंध्यन उपसमूह | प्रमुख शैल | बिहार में स्थान | आर्थिक महत्व |
|---|---|---|---|
| उच्च विंध्यन | बलुआ पत्थर, शेल, चूना पत्थर | रोहतास, कैमूर | सीमेंट उद्योग, भवन निर्माण |
| निम्न विंध्यन (कैमूर) | क्वार्टज़ाइट, बलुआ पत्थर | कैमूर पठार | निर्माण सामग्री |
| सेमरी समूह | शेल, चूना पत्थर, डोलोमाइट | सोन घाटी, डेहरी | चूना उद्योग, डालमियानगर सीमेंट |
विंध्यन शैल क्रम को भूगर्भशास्त्रियों ने अवर विंध्यन (Lower Vindhyan) और उच्च विंध्यन (Upper Vindhyan) में विभाजित किया है। डेहरी-ऑन-सोन और डालमियानगर के आसपास मिलने वाले चूना पत्थर के भंडार विंध्यन काल के ही उत्पाद हैं। यहाँ सीमेंट उद्योग की स्थापना इसी कारण हुई।
कैमूर पठार पूर्णतः विंध्यन बलुआ पत्थर से निर्मित है। इस क्षेत्र में अनेक जलप्रपात (Waterfalls) हैं — जैसे करकट जलप्रपात — क्योंकि विंध्यन बलुआ पत्थर की क्षैतिज परतें अपरदन के विरुद्ध असमान प्रतिरोध दिखाती हैं।
- डोलोमाइट: सोन घाटी में सेमरी समूह में पाया जाता है — इस्पात उद्योग में Flux के रूप में उपयोगी।
- चूना पत्थर (Limestone): रोहतास, डेहरी क्षेत्र में — सीमेंट एवं चूना उद्योग का आधार।
- बलुआ पत्थर (Sandstone): कैमूर पठार का प्रमुख शैल — निर्माण एवं पाषाण कला में प्रयुक्त।
गोंडवाना शैल एवं मध्यकल्पीय युग
गोंडवाना शैल क्रम (Gondwana System) भारत के कोयला भंडारों का सबसे प्रमुख स्रोत है। यह पुराकल्प के पर्मियन काल से लेकर मध्यकल्प के जुरासिक काल तक (लगभग 20–30 करोड़ वर्ष पूर्व) फैला हुआ शैल क्रम है। बिहार (तथा वर्तमान झारखंड) में यह मुख्यतः दामोदर, सोन एवं महानदी घाटियों में पाया जाता है।
गोंडवाना का नामकरण और संदर्भ
“गोंडवाना” नाम मध्य प्रदेश के गोंड जनजाति के क्षेत्र से लिया गया है। भूगर्भशास्त्रीय दृष्टि से यह उस महाद्वीप का भी नाम है जो लाखों वर्ष पूर्व टूटकर भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका बना था। इस काल के शैलों में ग्लोसोप्टेरिस (Glossopteris) नामक पौधे के जीवाश्म सर्वत्र मिलते हैं, जो गोंडवाना भूखंड की एकता के प्रमाण हैं।
निम्न गोंडवाना
पर्मियन काल — 25–30 करोड़ वर्ष पूर्वउच्च गोंडवाना
ट्राइएसिक-जुरासिक — 15–20 करोड़ वर्ष पूर्वराजमहल ट्रैप — बिहार का विशिष्ट ज्वालामुखीय क्षेत्र
राजमहल ट्रैप (Rajmahal Traps) बिहार के भूगर्भीय इतिहास की एक अत्यंत रोचक घटना का प्रतिफल है। लगभग 11.7 करोड़ वर्ष पूर्व (क्रिटेशियस काल) में इस क्षेत्र में ज्वालामुखी उद्गार हुए और बेसाल्टिक लावा की मोटी परतें जम गईं। ये परतें आज साहिबगंज, पाकुड़ (झारखंड), संथाल परगना क्षेत्र में राजमहल पहाड़ियों के रूप में दिखती हैं। यहाँ डायनासोर के जीवाश्म भी मिले हैं।
चतुर्थक काल एवं जलोढ़ मैदान — बिहार की आत्मा
वर्तमान बिहार का लगभग 80% भाग चतुर्थक काल (Quaternary Period) के जलोढ़ निक्षेपों (Alluvial Deposits) से ढका हुआ है। गंगा एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा लाए गए इन निक्षेपों ने बिहार के विशाल उपजाऊ मैदान का निर्माण किया है। यह भारत के सर्वाधिक घनी जनसंख्या वाले कृषि-क्षेत्रों में से एक है।
चतुर्थक काल की उपश्रेणियाँ
चतुर्थक काल को दो प्रमुख उपकालों में बाँटा जाता है — प्लीस्टोसीन (Pleistocene) और होलोसीन (Holocene)। बिहार के जलोढ़ मैदान में इन दोनों कालों के निक्षेप मिलते हैं जिन्हें स्थानीय रूप से बाँगर (Bhangar) और खादर (Khadar) कहा जाता है।
| जलोढ़ प्रकार | काल | विशेषताएँ | बिहार में क्षेत्र | कृषि उपयुक्तता |
|---|---|---|---|---|
| बाँगर (Bhangar) | पुराना जलोढ़ (Pleistocene) | ऊँचाई अधिक, बाढ़ नहीं आती, कैल्केरियस नोड्यूल (कंकर) युक्त | गंगा के दक्षिणी उच्च मैदान | अच्छी — रबी फसलें |
| खादर (Khadar) | नया जलोढ़ (Holocene) | निम्न, नदियों के समीप, बाढ़-प्रभावित, रेतीला-दोमट | गंगा-कोसी-गंडक के बाढ़ मैदान | अत्यंत उपजाऊ — धान, जूट |
| तराई जलोढ़ | Holocene-Recent | हिमालयी नदियाँ लाए मोटे कण, दलदली, नम | उत्तरी बिहार — चम्पारण, सीतामढ़ी | घने जंगल, चाय बागान संभव |
| डेल्टाई जलोढ़ | Recent | बारीक कण, जलाक्रांत भूमि | भागलपुर-कटिहार (गंगा डेल्टा मार्ग) | जूट, मछलीपालन |
उत्तरी और दक्षिणी बिहार के जलोढ़ में अंतर
भूगर्भीय संरचना एवं खनिज सम्पदा
बिहार की भूगर्भीय संरचना सीधे उसके खनिज संसाधनों को नियंत्रित करती है। आर्कियन-प्रोटेरोज़ोइक शैलों वाले दक्षिणी क्षेत्र धात्विक खनिजों से और विंध्यन शैल वाले क्षेत्र अधात्विक खनिजों से समृद्ध हैं। 2000 के बाद अधिकांश खनिज-क्षेत्र झारखंड में चले गए किन्तु बिहार में अभी भी महत्वपूर्ण खनिज भंडार हैं।
रोहतास, कैमूर, गया जिलों में। विंध्यन काल का। भवन निर्माण, शिल्प कला में। पटना का प्राचीन शहर इसी पत्थर पर खड़ा है।
डेहरी-ऑन-सोन, रोहतास क्षेत्र। विंध्यन एवं सेमरी काल। डालमियानगर सीमेंट कारखाना इसी पर निर्भर था।
चतुर्थक जलोढ़ में असीमित भूजल भंडार। पूरे उत्तरी बिहार में। नलकूप सिंचाई का आधार।
चतुर्थक जलोढ़ में कहीं-कहीं Arsenic की अधिक मात्रा। भागलपुर, भोजपुर क्षेत्र प्रभावित। पेयजल संकट।
अमझोर (शाहाबाद / रोहतास) में विश्व के बड़े पाइराइट भंडारों में से एक। सल्फ्यूरिक अम्ल एवं उर्वरक उद्योग में उपयोगी।
गंगा नदी की बालू में उच्च शुद्धता का सिलिका। काँच उद्योग के लिए उपयुक्त। भागलपुर, जमुई में।
अमझोर पाइराइट — बिहार का महत्वपूर्ण खनिज
रोहतास जिले का अमझोर क्षेत्र विश्व के सबसे बड़े पाइराइट भंडारों में से एक है। यहाँ का पाइराइट प्रोटेरोज़ोइक काल के रूपांतरित शैलों से संबंधित है। इससे सल्फ्यूरिक अम्ल बनाया जाता है जो उर्वरक उद्योग का आधार है। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड यहाँ खनन कार्य करती थी।
Mains विश्लेषण — भूगर्भ एवं विकास का संबंध
BPSC Mains परीक्षा में बिहार की भूगर्भीय संरचना को आर्थिक, कृषि, पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन के संदर्भ में समझना आवश्यक है। भूगर्भ केवल पत्थरों का अध्ययन नहीं है — यह बिहार के विकास-अवसरों और चुनौतियों दोनों का मूल है।
भूगर्भीय संरचना और कृषि का संबंध
उत्तरी बिहार के चतुर्थक जलोढ़ ने यहाँ की कृषि को विश्व की सर्वोत्तम भूमि में से एक बनाया है। हिमालयी नदियाँ हर वर्ष नई उपजाऊ मिट्टी लाती हैं। धान, गेहूँ, मक्का, दलहन, सब्जियाँ, केला, लीची — सब इसी जलोढ़ की देन है। दक्षिणी बिहार के विंध्यन-आर्कियन क्षेत्र में काली मिट्टी और लाल मिट्टी मिलती है जो दलहन और तिलहन के लिए उपयुक्त है।
- बाढ़ (Flood): चतुर्थक काल के ढीले जलोढ़ में नदियाँ बाधा मुक्त बहती हैं और बाढ़ मैदान बदलती हैं। कोसी, गंडक, बागमती सबसे खतरनाक। उत्तरी बिहार भारत का सर्वाधिक बाढ़-प्रभावित क्षेत्र है।
- भूकंप (Earthquake): बिहार Seismic Zone IV एवं V में आता है। 1934 में आए विनाशकारी भूकंप का संबंध हिमालयी टेक्टोनिक प्लेट सीमा और चतुर्थक जलोढ़ से था।
- भूमि क्षरण (Soil Erosion): कोसी-गंडक क्षेत्र में नदी-मार्ग परिवर्तन से भूमि क्षरण। भूगर्भीय दृष्टि से यह जलोढ़ की अस्थिरता का परिणाम।
- आर्सेनिक दूषण: जलोढ़ में स्थित पाइराइट खनिजों के आक्सीकरण से भूजल में आर्सेनिक मिश्रण। भोजपुर, भागलपुर, सारण जिले प्रभावित।
- भूमि धँसाव (Land Subsidence): अत्यधिक भूजल दोहन से कुछ क्षेत्रों में भूमि धँसाव की समस्या।
भूगर्भीय कालक्रम और बिहार की खनिज-नीति
2000 में बिहार-झारखंड विभाजन के बाद बिहार ने खनिज सम्पदा का बड़ा हिस्सा खो दिया। किन्तु वर्तमान बिहार में अमझोर पाइराइट, रोहतास चूना पत्थर, कैमूर बलुआ पत्थर और गंगाघाटी सिलिका बालू महत्वपूर्ण खनिज हैं। बिहार खनिज नीति 2019 के तहत इनके वैज्ञानिक दोहन की योजना है।
- नदी-अपरदन: जलोढ़ भूमि में नदियाँ अपना मार्ग बदलती हैं — कृषि-भूमि का नुकसान।
- भूजल-अतिदोहन: चतुर्थक जलोढ़ जल-स्तर तेजी से गिर रहा है।
- बालू खनन: गंगा के जलोढ़ से अनियंत्रित बालू खनन भूगर्भीय संतुलन बिगाड़ रहा है।
- पर्यावरणीय प्रभाव: रासायनिक खनन से जमुई-नवादा क्षेत्र में भूमि-क्षरण।
इंटरैक्टिव MCQ अभ्यास
नीचे दिए गए प्रश्नों पर क्लिक करके अपना उत्तर जाँचें। BPSC Prelims स्तर के ये प्रश्न बिहार भूगर्भ के सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आधारित हैं।


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