बिहार का भूगर्भीय परिचय
बिहार की भूगर्भीय संरचना, शैल समूह, खनिज संपदा एवं स्थलाकृतिक विशेषताएँ — BPSC Prelims + Mains के लिए सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं भौगोलिक स्थिति
बिहार का भूगर्भीय परिचय BPSC परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है — यह राज्य भारत के पूर्वी भाग में स्थित है और इसकी भूगर्भीय संरचना अत्यंत विविध एवं जटिल है, जो इसे भौगोलिक दृष्टि से एक अद्वितीय क्षेत्र बनाती है।
बिहार उत्तर में नेपाल, दक्षिण में झारखण्ड, पूर्व में पश्चिम बंगाल और पश्चिम में उत्तर प्रदेश से घिरा हुआ है। यह राज्य मूलतः गंगा के विशाल जलोढ़ मैदान पर स्थित है, जिसके दक्षिण में छोटानागपुर पठार की अवशिष्ट पहाड़ियाँ हैं और उत्तर में हिमालय की तराई एवं भाबर पट्टी है।
बिहार की स्थिति का भूगर्भीय महत्व
बिहार का भूगर्भीय महत्व कई दृष्टियों से है। गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों ने यहाँ अत्यंत उर्वर जलोढ़ मिट्टी का निर्माण किया है। दक्षिणी बिहार की पहाड़ियाँ प्राचीन आर्कियन शैलों से निर्मित हैं, जो खनिज सम्पदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। उत्तरी बिहार में हिमालय से आने वाली नदियों ने उत्तर की ओर क्रमशः मोटे से बारीक अवसाद जमा किए हैं।
भूगर्भीय इतिहास एवं शैल समूह
बिहार की भूगर्भीय संरचना अरबों वर्षों के भूगर्भीय इतिहास का परिणाम है। यहाँ आर्कियन महाकल्प से लेकर नूतनकल्प (Holocene) तक के शैल समूह पाए जाते हैं, जो इसे भूवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं।
बिहार में प्रमुख शैल समूह
| शैल समूह | भूगर्भीय काल | स्थान (बिहार में) | प्रमुख खनिज / विशेषता |
|---|---|---|---|
| आर्कियन नीस एवं शिस्ट | 4,000–600 मिलियन वर्ष | गया, नवादा, जमुई, बाँका | अभ्रक, ग्रेनाइट, क्वार्टज़ |
| धारवाड़ शैल | प्रोटेरोज़ोइक | दक्षिण बिहार की पहाड़ियाँ | लोहा, मैंगनीज, ताँबा |
| गोंडवाना शैल | कार्बोनिफेरस–पर्मियन | दक्षिणी बिहार / झारखण्ड सीमा | कोयला, शेल |
| विन्ध्यन शैल | प्रोटेरोज़ोइक–कैम्ब्रियन | रोहतास, कैमूर | बलुआ पत्थर, चूना पत्थर |
| जलोढ़ / अलूवियल | क्वाटर्नरी–होलोसीन | सम्पूर्ण गंगा मैदान | उर्वर कृषि भूमि, भूजल |
बिहार की भौतिक भू-भाग की इकाइयाँ
बिहार को मुख्यतः तीन प्रमुख भौतिक इकाइयों में विभाजित किया जाता है — उत्तर का तराई एवं हिमालयी तलहटी प्रदेश, मध्य का विशाल गंगा का मैदान और दक्षिण की अवशिष्ट पहाड़ियाँ। प्रत्येक इकाई अपनी विशिष्ट भूगर्भीय संरचना रखती है।
उत्तरी तराई प्रदेश — भूगर्भीय विशेषताएँ
बिहार का उत्तरी क्षेत्र नेपाल की सीमा से लगा हुआ है। यह क्षेत्र हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए मोटे कंकड़, बजरी एवं रेत से निर्मित है। भाबर पट्टी में नदियाँ भूमिगत हो जाती हैं क्योंकि यहाँ की मिट्टी अत्यंत पारगम्य है। तराई में ये नदियाँ पुनः धरातल पर आती हैं और दलदली क्षेत्रों का निर्माण करती हैं। पश्चिमी चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज जिले इसी पट्टी में आते हैं।
दक्षिणी पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र
बिहार के दक्षिणी भाग में छोटानागपुर पठार की उत्तरी विस्तृति है। यहाँ प्राचीन आर्कियन शैलें पाई जाती हैं जो भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी शैलें मानी जाती हैं। राजगीर की पहाड़ियाँ (नालंदा), गिरियक, बराबर पहाड़ियाँ (गया), खड़गपुर पहाड़ी (मुंगेर), और मंदार हिल्स (भागलपुर) इसी श्रेणी में हैं। ये पहाड़ियाँ ग्रेनाइट, नीस और क्वार्टज़ाइट से बनी हैं।
गंगा का मैदान — विस्तृत भूगर्भीय अध्ययन
गंगा का मैदान बिहार का सबसे महत्वपूर्ण एवं विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र है। यह जलोढ़ मैदान (Alluvial Plain) हिमालयी नदियों और प्रायद्वीपीय भारत की नदियों के अवसादों से निर्मित है। इसकी औसत ऊँचाई समुद्र तल से केवल 50 से 100 मीटर के मध्य है।
गंगा मैदान का उपविभाजन
उत्तर बिहार का मैदान गण्डक, बूढ़ी गण्डक, बागमती, कमला-बलान, कोसी, महानंदा जैसी हिमालयी नदियों द्वारा निर्मित है। यह क्षेत्र प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित होता है जिससे नई जलोढ़ परतें जमा होती हैं। यहाँ Khadar (नई जलोढ़) और Bhangar (पुरानी जलोढ़) दोनों प्रकार की मिट्टी पाई जाती है। नदियाँ यहाँ अत्यंत वक्राकार (Meandering) हैं और अपना मार्ग बदलती रहती हैं। चाप झीलें (Oxbow Lakes) यहाँ सामान्य दृश्य हैं।
- कोसी नदी: “बिहार का शोक” — अत्यधिक तलछट जमाव के कारण अपना मार्ग बदलती रहती है; पिछले 200 वर्षों में 120 km पश्चिम की ओर खिसक गई है।
- गण्डक: हिमालय से आने वाली प्रमुख नदी; पश्चिमी चम्पारण से प्रवेश करती है।
- बागमती: नेपाल से आती है; मधुबनी-दरभंगा क्षेत्र की प्रमुख नदी।
- महानंदा: किशनगंज से गुज़रती है; गंगा की पूर्वी सहायक नदी।
दक्षिण बिहार का मैदान सोन, पुनपुन, फल्गु, किऊल, चानन जैसी प्रायद्वीपीय नदियों द्वारा निर्मित है। ये नदियाँ तुलनात्मक रूप से कम अवसाद लाती हैं। इस क्षेत्र की भूमि उत्तर बिहार की तुलना में कुछ अधिक ऊँची एवं समतल है। यहाँ की मिट्टी में कंकर (Kankar) — कैल्शियम कार्बोनेट की गांठें — अधिक पाई जाती हैं, जो पुरानी जलोढ़ (Bhangar) की विशेषता है।
- सोन नदी: अमरकंटक (मध्यप्रदेश) से निकलती है; बिहार में पटना के पास गंगा में मिलती है।
- फल्गु नदी: गया जिले में बहती है; हिंदू धर्म में पवित्र।
- पुनपुन नदी: पटना के दक्षिण में गंगा में मिलती है।
| विशेषता | भांगर (Bhangar) | खादर (Khadar) |
|---|---|---|
| आयु | पुरानी जलोढ़ — प्लीस्टोसीन काल | नई जलोढ़ — होलोसीन काल |
| स्थिति | नदी के बाढ़ क्षेत्र से ऊपर | नदी के बाढ़ क्षेत्र में |
| कंकर | अधिक मात्रा में | नहीं के बराबर |
| उर्वरता | तुलनात्मक रूप से कम | अत्यधिक उर्वर |
| बाढ़ जोखिम | कम | प्रतिवर्ष बाढ़ का खतरा |
| रंग | पीलापन लिए भूरा | भूरा-काला |
प्रमुख भू-आकृतियाँ एवं नदी तंत्र
बिहार में विविध प्रकार की भू-आकृतियाँ पाई जाती हैं — चाप झीलें, दियारा भूमि, नदी-द्वीप, पहाड़ी श्रृंखलाएँ, जलप्रपात और दलदली क्षेत्र। इन सभी का निर्माण भूगर्भीय प्रक्रियाओं एवं नदियों की गतिविधियों का परिणाम है।
प्रमुख पहाड़ियाँ एवं श्रृंखलाएँ
बिहार की प्रमुख नदियाँ — वर्गीकरण
| वर्ग | प्रमुख नदियाँ | उद्गम | बिहार में प्रवेश |
|---|---|---|---|
| हिमालयी नदियाँ (उ. बिहार) | गण्डक, बूढ़ी गण्डक, बागमती, कमला, कोसी, महानंदा | नेपाल हिमालय | उत्तर से |
| प्रायद्वीपीय नदियाँ (द. बिहार) | सोन, पुनपुन, फल्गु, किऊल, चानन, अजय | छोटानागपुर पठार / विंध्याचल | दक्षिण से |
| मुख्य अक्षीय नदी | गंगा | गंगोत्री हिमनद (उत्तराखण्ड) | पश्चिम (बक्सर) से |
विशेष भू-आकृतियाँ
- दियारा भूमि: गंगा, सोन, गण्डक नदियों के बीच बनी नम, उर्वर भूमि। विशेषतः पटना, भोजपुर, सारण जिलों में। केले, सब्जियों की खेती प्रमुख।
- चाप झीलें (Oxbow Lakes): नदियों के मार्ग परिवर्तन से बनी। उत्तर बिहार में विशेषतः कोसी क्षेत्र में अनेक चाप झीलें हैं।
- दहा / ताल: निम्न भूमि में जल का स्थायी जमाव। मिथिला क्षेत्र में ‘पाट’ कहलाते हैं।
- हिमालयी जलप्रपात: सासाराम के पास देव कुण्ड जलप्रपात, गया में ककोलत जलप्रपात (नवादा) प्रसिद्ध हैं।
- समतल मैदान: बिहार के मध्यवर्ती क्षेत्र में लगभग 90% भूमि मैदानी है, जो कृषि के लिए अनुकूल है।
खनिज संपदा एवं भूगर्भीय महत्व
बिहार (विशेषतः झारखण्ड अलग होने से पहले) खनिज सम्पदा में अत्यंत समृद्ध था। वर्तमान बिहार में भी कुछ महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं, विशेषकर दक्षिणी जिलों और रोहतास-कैमूर क्षेत्र में।
| खनिज | प्रमुख जिले | शैल प्रकार | उपयोग |
|---|---|---|---|
| चूना पत्थर (Limestone) | रोहतास, कैमूर | विन्ध्यन अवसादी शैल | सीमेंट उद्योग — सबसे महत्वपूर्ण |
| पायराइट (Pyrite) | रोहतास (अमझोर) | कायांतरित शैल | सल्फ्यूरिक एसिड उत्पादन |
| अभ्रक (Mica) | गया, नवादा, जमुई | आर्कियन शैल | विद्युत उद्योग, सौंदर्य प्रसाधन |
| सिलिका बालू | भागलपुर, मुंगेर | नदी जलोढ़ | काँच उद्योग |
| बॉक्साइट | मुंगेर (सीमित) | अपक्षयित आर्कियन शैल | एल्युमीनियम उत्पादन |
| बलुआ पत्थर (Sandstone) | रोहतास, कैमूर, सासाराम | विन्ध्यन | निर्माण कार्य |
| फेल्सपार | गया, नवादा | ग्रेनाइट शैल | काँच, चीनी मिट्टी उद्योग |
| प्राकृतिक गैस (संभावित) | गंगा मैदान | जलोढ़ अवसाद | अन्वेषण जारी |
रोहतास — बिहार का खनिज जिला
रोहतास जिला बिहार का सबसे खनिज-समृद्ध जिला है। यहाँ डालमियानगर, बंजारी और शाहाबाद क्षेत्रों में चूना पत्थर के विशाल भंडार हैं। डालमिया सीमेंट फैक्ट्री इसी चूना पत्थर पर आधारित है। अमझोर (रोहतास) में हिन्दुस्तान फर्टिलाइज़र कॉर्पोरेशन का कारखाना पायराइट पर आधारित था।
भूकंप जोखिम एवं पर्यावरणीय भूविज्ञान
बिहार भूकंप की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील राज्य है। 1934 का बिहार-नेपाल भूकंप (रिक्टर पैमाने पर 8.1 की तीव्रता) भारतीय इतिहास के सबसे विनाशकारी भूकंपों में से एक था। भूगर्भीय संरचना की दृष्टि से बिहार के अधिकांश भाग भूकंप-प्रवण जोन में आते हैं।
बिहार में भूकंप जोन वर्गीकरण
1934 का बिहार-नेपाल भूकंप
15 जनवरी 1934 को आए इस विनाशकारी भूकंप का अधिकेंद्र (Epicentre) नेपाल की तराई में था। इसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.1 थी। इस भूकंप में 20,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई। पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा और मुंगेर सबसे अधिक प्रभावित हुए। इस भूकंप में भू-द्रवण (Liquefaction) की घटनाएँ बड़े पैमाने पर हुईं — जलोढ़ मिट्टी भूकंप के दौरान तरल की तरह व्यवहार करने लगी।
अन्य पर्यावरणीय भूवैज्ञानिक मुद्दे
कोसी, गण्डक, बागमती नदियों द्वारा प्रतिवर्ष नदी मार्ग परिवर्तन। हर वर्ष लाखों हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित। नदी तट कटाव (Bank Erosion) एक गम्भीर समस्या।
उत्तर बिहार के भूजल में आर्सेनिक (As) की अत्यधिक मात्रा। भोजपुर, बक्सर, सारण, वैशाली जिले प्रभावित। WHO की सीमा 10 ppb से अधिक सांद्रता।
अत्यधिक भूजल दोहन, मृदा अपरदन और जलजमाव से भूमि की उत्पादकता घट रही है। विशेषतः उत्तर बिहार में जल-जमाव (Waterlogging) गम्भीर समस्या है।
गंगा और सहायक नदियों में चूर (मध्य-धारा द्वीप / Char Islands) का बनना। ये टापू कृषि के काम आते हैं किंतु बाढ़ में डूब जाते हैं। भूमि अधिकार का विवाद।


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