बिहार का भूगर्भीय परिचय
भूगर्भीय संरचना का अर्थ, शैल-समूह, भूवैज्ञानिक काल एवं BPSC परीक्षा की दृष्टि से सम्पूर्ण विश्लेषण
भूगर्भीय संरचना का अर्थ एवं परिचय
बिहार का भूगर्भीय परिचय — अर्थात् इसकी भूगर्भीय संरचना (Geological Structure) का अध्ययन — BPSC Prelims एवं Mains दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राज्य के भूगोल, खनिज सम्पदा, मृदा प्रकार, नदी-तन्त्र एवं प्राकृतिक आपदाओं की जड़ में है।
भूगर्भीय संरचना का अर्थ क्या है?
भूगर्भीय संरचना (Geological Structure) से अभिप्राय पृथ्वी की सतह के नीचे पाई जाने वाली शैलों (Rocks) की व्यवस्था, उनके प्रकार, आयु, निर्माण-काल एवं वे बल जिन्होंने उन्हें वर्तमान स्वरूप प्रदान किया — इन सभी के समग्र अध्ययन से है। सरल शब्दों में कहें तो यह बताती है कि:
- धरती किन पदार्थों से बनी है? — शैल, मृदा, खनिज, जल आदि का भूमिगत वितरण।
- ये शैलें कब बनीं? — भूवैज्ञानिक काल (Geological Time Scale) के किस युग में।
- कैसे बनीं? — ज्वालामुखी, अवसादन, दाब-ताप से कायांतरण आदि प्रक्रियाओं से।
- किस दिशा में झुकी हैं? — शैल-स्तर का ढाल (Dip), दिशा (Strike) एवं भ्रंश (Fault) आदि।
- इनका आर्थिक महत्व क्या है? — कोयला, अभ्रक, लौह-अयस्क, बालू, चूना-पत्थर आदि।
भूगर्भ विज्ञान (Geology) क्यों पढ़ें?
Geology वह विज्ञान है जो पृथ्वी की उत्पत्ति, संरचना, संघटन तथा इतिहास का अध्ययन करता है। बिहार के संदर्भ में इसका अध्ययन इसलिए आवश्यक है क्योंकि राज्य की उत्तरी तराई नवीन जलोढ़ से निर्मित है, मध्यवर्ती गांगेय मैदान पुरानी एवं नई जलोढ़ से बना है, जबकि दक्षिणी पठार अत्यंत प्राचीन प्रायद्वीपीय शैलों से — इस विभिन्नता को समझे बिना बिहार का सम्पूर्ण भूगोल अधूरा है।
भूगर्भीय इतिहास एवं काल-विभाजन
बिहार की शैलें अत्यंत विविध भूवैज्ञानिक युगों का प्रतिनिधित्व करती हैं — दक्षिण में आर्कियन युग (Archaean Era) की प्राचीनतम शैलें हैं जो लगभग 250–600 करोड़ वर्ष पुरानी हैं, जबकि उत्तर में क्वाटरनेरी युग (Quaternary Period) की नवीन जलोढ़ मात्र कुछ लाख वर्ष पुरानी है।
भूवैज्ञानिक काल-मापक्रम (Geological Time Scale) एवं बिहार
बिहार की भौगोलिक इकाइयाँ — भूगर्भीय दृष्टि से
भूगर्भीय संरचना के आधार पर बिहार को तीन-चार प्रमुख इकाइयों में विभाजित किया जाता है — प्रत्येक इकाई की शैलें, आयु, खनिज एवं भूमि-उपयोग एक-दूसरे से भिन्न हैं। यह विभाजन BPSC Mains के लिए मानचित्र-सहित उत्तर के लिए आवश्यक है।
| भूगर्भीय इकाई | क्षेत्र | शैल-प्रकार | भूवैज्ञानिक युग | प्रमुख जिले |
|---|---|---|---|---|
| उत्तरी तराई क्षेत्र | नेपाल सीमा से 30-50 किमी चौड़ी पट्टी | नई जलोढ़, कंकड़, बजरी, रेत | Recent/Holocene | पश्चिमी-पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज |
| गांगेय मैदान (उत्तर) | तराई के दक्षिण में गंगा तक | जलोढ़ (बाँगर+खादर), दोमट, चीका | Pleistocene–Holocene | सारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगूसराय, सहरसा |
| गांगेय मैदान (दक्षिण) | गंगा के दक्षिण से पठार तक | जलोढ़ + सोन नदी की जमा मिट्टी | Pleistocene–Holocene | पटना, गया, नालंदा, औरंगाबाद, अरवल, जहानाबाद |
| दक्षिणी पठारी क्षेत्र | झारखंड से लगा हुआ पठारी भाग | ग्रेनाइट, नीस, विंध्यन बलुआ पत्थर, चूना पत्थर | आर्कियन + प्रोटेरोजोइक | रोहतास, कैमूर, गया (दक्षिण), नवादा, जमुई, बांका, मुंगेर |
भूगर्भीय इकाइयों का तुलनात्मक विश्लेषण
तराई: भाभर के दक्षिण में दलदली, नम, घनी वनस्पति वाली पट्टी — नदियाँ यहाँ पुनः प्रकट होती हैं। यह क्षेत्र जैव-विविधता (Valmiki Tiger Reserve) के लिए प्रसिद्ध है।
खादर: नई जलोढ़ — निम्न भूमि, बहुत उपजाऊ, प्रतिवर्ष नई मिट्टी जमती है — बाढ़-ग्रस्त लेकिन कृषि के लिए आदर्श।
शैल-समूह एवं उनकी विशेषताएँ
भूगर्भीय संरचना के अध्ययन में शैल-समूहों (Rock Systems) की पहचान केंद्रीय है। बिहार में मुख्यतः तीन प्रकार की शैलें पाई जाती हैं — आग्नेय (Igneous), अवसादी (Sedimentary) एवं कायांतरित (Metamorphic) — और इनसे मिलकर विशिष्ट भूगर्भीय इकाइयाँ बनती हैं।
1. आग्नेय शैलें (Igneous Rocks)
ये शैलें मैग्मा (Magma) या लावा (Lava) के ठंडे होने से बनती हैं। बिहार में ये मुख्यतः दक्षिणी पठारी क्षेत्र में मिलती हैं।
- ग्रेनाइट (Granite): गया, नवादा, जमुई — कठोर, निर्माण कार्य के लिए उपयोगी
- बेसाल्ट (Basalt): कुछ क्षेत्रों में डाइक (Dyke) के रूप में
- Rhyolite: सिलिका-युक्त ज्वालामुखी शैल — दुर्लभ
2. अवसादी शैलें (Sedimentary Rocks)
ये शैलें अवसादों के जमाव से बनती हैं और स्तरीकृत होती हैं। बिहार में ये दो रूपों में मिलती हैं:
- विंध्यन शैलें: रोहतास, कैमूर — बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, शेल — प्राचीन अवसादी
- जलोढ़ (Alluvium): सम्पूर्ण गांगेय मैदान — नई एवं पुरानी जलोढ़ — आधुनिक अवसादी
- गोंडवाना शैलें: कोयला-युक्त अवसादी — बिहार के दक्षिणी हिस्सों में (झारखंड विभाजन से पूर्व अधिक)
3. कायांतरित शैलें (Metamorphic Rocks)
अत्यधिक दाब एवं ताप के कारण मूल शैल का रूपांतरण होने से बनती हैं। बिहार में ये भी दक्षिणी क्षेत्र में पाई जाती हैं।
- नीस (Gneiss): ग्रेनाइट का कायांतरण — गया, मुंगेर, भागलपुर
- शिस्ट (Schist): अभ्रक-युक्त परतदार शैल — नवादा, जमुई
- क्वार्टजाइट (Quartzite): बलुआ पत्थर का कायांतरण — कैमूर, रोहतास
- मार्बल (Marble): चूना पत्थर का कायांतरण — दुर्लभ
- फाइलाइट (Phyllite): मुंगेर जिले में — अभ्रक (Mica) का स्रोत
विंध्यन शैल-समूह — विशेष महत्व
विंध्यन शैल-समूह (Vindhyan System) बिहार के भूगर्भीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह प्रोटेरोजोइक काल (~60–100 करोड़ वर्ष पूर्व) की अवसादी शैलें हैं जो मुख्यतः रोहतास (डेहरी-ऑन-सोन क्षेत्र) एवं कैमूर जिलों में पाई जाती हैं। इनमें चूना-पत्थर की प्रचुरता के कारण इस क्षेत्र में सीमेंट उद्योग फला-फूला है — डालमियानगर, जपला (अब झारखंड) इसके उदाहरण हैं। सोन नदी इन्हीं विंध्यन शैलों को काटते हुए प्रवाहित होती है और उसकी घाटी में बलुआ पत्थर के प्रमुख भंडार हैं जो निर्माण कार्य में उपयोग होते हैं।
दक्षिण बिहार का पठारी क्षेत्र — भूगर्भीय विश्लेषण
दक्षिण बिहार का पठारी क्षेत्र — जिसे छोटा नागपुर पठार का उत्तरी विस्तार भी कहा जाता है — बिहार का सबसे प्राचीन भूगर्भीय क्षेत्र है। यह प्रायद्वीपीय भारत (Peninsular India) का भाग है और इसकी नींव में अरबों वर्ष पुरानी Archaean शैलें हैं।
प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ एवं उनकी शैलें
कैमूर पठार
रोहतास, कैमूर जिलेराजगीर पर्वत
नालंदा जिलाखड़गपुर पहाड़ी
मुंगेर-बांका जिलेगया-नवादा पठार
गया, नवादा, औरंगाबादराजगीर के ताप-जल स्रोत — भूगर्भीय महत्व
राजगीर (नालंदा) में स्थित ब्रह्मकुंड के गर्म जल के स्रोत (Thermal Springs) अत्यंत महत्वपूर्ण भूगर्भीय साक्ष्य हैं। इन स्रोतों का तापमान 45°C तक होता है। ये स्रोत तब बनते हैं जब भूजल भूमिगत गर्म शैलों (Geothermal Activity) से होकर गुजरता है। राजगीर की कायांतरित शैलों में भ्रंश (Fault Lines) के माध्यम से यह गर्म जल सतह पर आता है। यह बिहार में भूतापीय ऊर्जा की संभावना का भी संकेत है।
गांगेय मैदान की भूगर्भीय संरचना
बिहार का गांगेय मैदान भारत के महान उत्तरी मैदान (Great Northern Plains) का पूर्वी हिस्सा है। यह मैदान टेथिस सागर के अग्रगर्त (Tethys Foredeep) में हिमालय एवं प्रायद्वीपीय नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ के जमाव से बना है। इसकी गहराई स्थान-स्थान पर 1,000 से 4,000 मीटर तक है।
जलोढ़ की संरचना एवं परतें
सबसे ऊपरी परत — मुख्यतः बालू, गाद (Silt) एवं मृत्तिका (Clay) का मिश्रण। नदियों के बाढ़ क्षेत्र में प्रतिवर्ष नई परत जमती है। उत्तर बिहार में यह परत सबसे मोटी है क्योंकि कोसी, गंडक, बागमती, बूढ़ी गंडक जैसी हिमालयी नदियाँ भारी मात्रा में अवसाद लाती हैं। इस परत में जैविक पदार्थ (Humus) भी मिला होता है जो इसे उपजाऊ बनाता है।
पुरानी जलोढ़ — सतह से 20-50 मीटर नीचे। इसमें कंकड़ (Kankar) की परतें पाई जाती हैं जो कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) के अवक्षेप से बनती हैं। यह परत अपेक्षाकृत कम उपजाऊ है। दक्षिण बिहार के मैदानी भागों में (गया, नालंदा, पटना के पठारी किनारे) यह परत अधिक पाई जाती है।
जलोढ़ के नीचे अत्यंत गहराई पर प्रायद्वीपीय आधार-शैलें (Basement Rocks) हैं जो आर्कियन या विंध्यन युग की हैं। इनतक सामान्यतः 1,000-4,000 मीटर की गहराई पर पहुँचा जा सकता है। तेल एवं प्राकृतिक गैस की खोज के लिए ONGC ने बिहार के मैदानी भागों में ड्रिलिंग की है।
उत्तर बिहार एवं दक्षिण बिहार की जलोढ़ में अंतर
| पहलू | उत्तर बिहार (हिमालयी जलोढ़) | दक्षिण बिहार (प्रायद्वीपीय जलोढ़) |
|---|---|---|
| स्रोत नदियाँ | गंडक, बागमती, कोसी, बूढ़ी गंडक | सोन, पुनपुन, फल्गु |
| मूल | हिमालयी शैलें — कम कठोर, खनिज-युक्त | प्रायद्वीपीय शैलें — कठोर, लोहे का अंश |
| रंग | हल्की भूरी, पीली-भूरी | अधिक गहरी, लालिमायुक्त |
| उपजाऊपन | अत्यधिक उपजाऊ — धान, गेहूँ, मक्का | मध्यम उपजाऊ — गेहूँ, दलहन |
| बाढ़ प्रवणता | अत्यधिक — कोसी, गंडक में प्रतिवर्ष बाढ़ | कम — सोन नियंत्रित |
| जलभृत (Aquifer) | गहरे एवं उथले — भूजल प्रचुर | कम गहरे, कम प्रचुर |
भूगर्भीय संरचना का आर्थिक महत्व
बिहार की भूगर्भीय संरचना उसके खनिज संसाधनों, मृदा प्रकारों, भूजल उपलब्धता एवं उद्योगों को सीधे निर्धारित करती है। 2000 में झारखंड के अलग होने से बिहार ने अपने अधिकांश खनिज भंडार खो दिए — यह एक महत्वपूर्ण BPSC Mains बिंदु है।
खनिज संसाधन — भूगर्भ का उपहार
| खनिज | क्षेत्र / जिला | शैल-समूह | उपयोग |
|---|---|---|---|
| पाइराइट (Pyrite) | अमझोर (रोहतास) | विंध्यन-कायांतरित | सल्फ्यूरिक अम्ल निर्माण; उर्वरक उद्योग |
| चूना-पत्थर (Limestone) | रोहतास, कैमूर | विंध्यन शैल-समूह | सीमेंट उद्योग — डालमियानगर |
| बलुआ-पत्थर (Sandstone) | रोहतास, कैमूर, गया | विंध्यन शैल-समूह | निर्माण कार्य, इमारतें |
| अभ्रक (Mica) | मुंगेर (फाइलाइट क्षेत्र) | कायांतरित — फाइलाइट | विद्युत उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स |
| बॉक्साइट (Bauxite) | गया, नवादा (सीमित) | लेटेराइट — ग्रेनाइट अपक्षय | एल्युमिनियम उत्पादन |
| काँच-बालू (Silica Sand) | मुंगेर, भागलपुर | अवसादी | काँच उद्योग |
| फेल्सपार (Feldspar) | जमुई, नवादा | ग्रेनाइट से | सिरेमिक, चीनी मिट्टी |
| प्राकृतिक गैस (Natural Gas) | मुंगेर (ONGC ब्लॉक) | गहरी अवसादी परतें | ऊर्जा उत्पादन — अन्वेषण चरण |
झारखंड विभाजन का प्रभाव — एक विश्लेषण
कोयला, लोहा, ताँबा, बॉक्साइट के विशाल भंडार झारखंड में चले गए। बिहार अब खनिज-दृष्टि से सीमित राज्य रह गया।
बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर — ये सभी झारखंड में। बिहार का औद्योगिक आधार नगण्य हो गया। SAIL, TISCO झारखंड में।
विभाजन के बाद बिहार का GSDP में खनिज-आधारित योगदान शून्य के करीब। कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था और अधिक निर्भर।
अभी भी रोहतास का पाइराइट, कैमूर का चूना पत्थर, मुंगेर का अभ्रक एवं प्राकृतिक गैस की संभावना बची है।
भूगर्भीय संरचना एवं मृदा
बिहार में मृदा-प्रकार सीधे भूगर्भीय संरचना से निर्धारित होते हैं। जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) — जो सर्वाधिक विस्तृत है — गांगेय मैदान में पाई जाती है और धान, गेहूँ, मक्का, तम्बाकू, गन्ना जैसी फसलों के लिए उपयुक्त है। लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil) दक्षिणी पठारी क्षेत्र में आग्नेय एवं कायांतरित शैलों के अपक्षय से बनती है — कम उपजाऊ लेकिन मोटे अनाज के लिए उचित। लेटेराइट मृदा (Laterite Soil) कुछ उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों (बांका, जमुई) में मिलती है।
भूगर्भीय संरचना एवं प्राकृतिक आपदाएँ
बिहार की भूगर्भीय संरचना उसे भूकंप, बाढ़, भूमि-धंसाव (Land Subsidence) जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। भूकंप के दृष्टिकोण से बिहार Zone III एवं Zone IV में आता है — यह एक BPSC Prelims की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य है।
भूकंप एवं भूगर्भीय भ्रंश
बिहार भूकंप के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है। 1934 का बिहार भूकंप (Richter Scale: 8.4) इतिहास के सबसे विनाशकारी भूकंपों में से एक था जिसमें मुंगेर-मधुबनी क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ। इसका कारण है:
- हिमालयी भ्रंश रेखाएँ (Himalayan Fault Lines): मुख्य सीमा भ्रंश (Main Boundary Thrust), मुख्य अग्रगर्त भ्रंश (Main Frontal Thrust) उत्तर बिहार के समीप।
- नवीन जलोढ़ का द्रवीकरण (Liquefaction): भूकंप के समय उत्तर बिहार की नम जलोढ़ मिट्टी द्रव की तरह व्यवहार करती है — भारी क्षति का कारण।
- इंडो-गंगेटिक ट्रफ: प्रायद्वीपीय प्लेट एवं हिमालयी ब्लॉक के बीच — भूकंपीय तनाव का केंद्र।
बाढ़ एवं भूगर्भीय कारण
उत्तर बिहार में बाढ़ का सीधा संबंध भूगर्भ से है — नई जलोढ़ (खादर) की कम ऊँचाई एवं अधिक जल-धारण क्षमता के कारण नदियाँ अपनी तलहटी बदलती हैं। कोसी नदी को “बिहार का शोक” कहा जाता है — यह अपना मार्ग परिवर्तन करती रहती है क्योंकि यह भारी मात्रा में अवसाद लाकर अपनी तलहटी ऊँची कर लेती है।
- भूमि-धंसाव (Land Subsidence): पटना एवं दरभंगा में भूजल के अत्यधिक दोहन से भूमि धँस रही है।
- आर्सेनिक प्रदूषण: उत्तर बिहार में भूजल में आर्सेनिक (Arsenic) की उच्च मात्रा — भूगर्भीय संरचना से संबद्ध।
- फ्लोराइड: कुछ जिलों (मुंगेर, नवादा) में भूजल में फ्लोराइड — शैलों के अपक्षय से।
- नदी-मार्ग परिवर्तन: जलोढ़ की ढीली संरचना से नदियाँ आसानी से अपना मार्ग बदलती हैं — कोसी इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण।
सारांश — बिहार की भूगर्भीय संरचना
निष्कर्ष
बिहार की भूगर्भीय संरचना एक अनूठी विविधता प्रस्तुत करती है — एक ओर अरबों वर्ष पुरानी प्रायद्वीपीय शैलें, दूसरी ओर लाखों वर्ष पुरानी जलोढ़ मिट्टी। यह विविधता ही बिहार की कृषि-समृद्धि, खनिज-संपदा (सीमित), प्राकृतिक आपदाओं एवं पर्यावरणीय चुनौतियों की जड़ में है। BPSC परीक्षार्थी के लिए इस संरचना की समझ राज्य के समग्र भूगोल को जोड़ने की कुंजी है।


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