भारत के भूगर्भीय विभाजन में बिहार का स्थान
भारत के तीन प्रमुख भूगर्भीय विभाग, प्लेट विवर्तनिकी एवं बिहार की भूगर्भीय स्थिति — BPSC Prelims + Mains सम्पूर्ण अध्ययन
भारत के भूगर्भीय विभाग — परिचय
भारत के भूगर्भीय विभाजन में बिहार का स्थान BPSC परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भूवैज्ञानिकों ने भारत को उसकी शैल-संरचना, आयु एवं उत्पत्ति के आधार पर मुख्यतः तीन वृहद भूगर्भीय विभागों में विभाजित किया है, जिनमें से प्रत्येक का बिहार की भूगर्भीय संरचना से सीधा सम्बंध है।
भारत का भूगर्भीय इतिहास — संक्षिप्त
भारत मूलतः गोंडवाना महाद्वीप का भाग था, जो लगभग 13 करोड़ वर्ष पूर्व दक्षिणी गोलार्ध में स्थित था। इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट के उत्तर की ओर खिसकने से लगभग 5 से 6 करोड़ वर्ष पूर्व यह यूरेशियन प्लेट से टकराई और हिमालय पर्वत का उत्थान हुआ। इस टकराव के परिणामस्वरूप उत्तर में हिमालय और दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार के बीच एक विशाल भू-अभिनति (Geosyncline) का निर्माण हुआ, जो कालक्रम में नदियों के अवसाद से भरती गई और आज का गंगा-सिंधु मैदान बना। बिहार इसी मैदान के केन्द्र में स्थित है।
भारत का भूगर्भीय कालक्रम एवं बिहार
| भूगर्भीय काल | अनुमानित आयु | बिहार में प्रतिनिधित्व | महत्व |
|---|---|---|---|
| आर्कियन (Archaean) | 400–250 करोड़ वर्ष पूर्व | गया, नवादा, जमुई — ग्रेनाइट, नीस | प्राचीनतम शैलें, खनिज-समृद्ध |
| प्रोटेरोज़ोइक (Proterozoic) | 250–57 करोड़ वर्ष पूर्व | रोहतास-कैमूर — विन्ध्यन शैल | चूना पत्थर, बलुआ पत्थर |
| पुराकल्प / पेलियोज़ोइक | 57–23 करोड़ वर्ष पूर्व | गोंडवाना शैल (झारखण्ड सीमा) | कोयला भंडार (अब झारखण्ड में) |
| मेसोज़ोइक (Mesozoic) | 23–6.5 करोड़ वर्ष पूर्व | हिमालय उत्थान प्रारम्भ | टेथिस सागर का ह्रास |
| सीनोज़ोइक (Cenozoic) | 6.5 करोड़ वर्ष — वर्तमान | गंगा मैदान निर्माण | जलोढ़ मिट्टी, कृषि आधार |
प्रायद्वीपीय पठार एवं बिहार की भूमिका
भारत का प्रायद्वीपीय पठार विश्व की प्राचीनतम भूगर्भीय संरचनाओं में से एक है। यह गोंडवाना महाद्वीप का हिस्सा है और इसकी शैलें मुख्यतः आर्कियन एवं धारवाड़ काल की हैं। बिहार का दक्षिणी भाग — विशेषकर गया, नवादा, जमुई और बाँका जिले — इसी प्रायद्वीपीय पठार की उत्तरी सीमा को प्रतिबिम्बित करते हैं।
प्रायद्वीपीय पठार की मुख्य विशेषताएँ
आर्कियन शैलें भारत की सबसे प्राचीन शैलें हैं, जिनकी आयु 400 करोड़ वर्ष से अधिक तक है। ये मुख्यतः आग्नेय एवं कायांतरित शैलें हैं — ग्रेनाइट, नीस (Gneiss), शिस्ट (Schist) और क्वार्टज़ाइट। बिहार में ये शैलें दक्षिणी जिलों में पाई जाती हैं:
- गया जिला: बराबर पहाड़ियाँ, गिरियक क्षेत्र — ग्रेनाइट एवं नीस शैलें। अशोककालीन गुफाएँ इन्हीं कठोर शैलों में उत्कीर्ण हैं।
- नवादा जिला: ककोलत जलप्रपात क्षेत्र — आर्कियन ग्रेनाइट। ककोलत एक प्रसिद्ध भूगर्भीय एवं पर्यटन स्थल है।
- जमुई जिला: छोटानागपुर पठार से लगा हुआ। धारवाड़ एवं आर्कियन शैलों का मिश्रण।
- बाँका जिला: मंदार पहाड़ी — ग्रेनाइट-नीस। ऊँचाई लगभग 700 फीट।
- मुंगेर जिला: खड़गपुर पहाड़ी — आर्कियन शैलें। गंगा के दक्षिण तट पर स्थित।
विन्ध्यन शैल समूह प्रोटेरोज़ोइक काल की अवसादी शैलें हैं। ये मुख्यतः बलुआ पत्थर (Sandstone), चूना पत्थर (Limestone) और शेल (Shale) से बनी हैं। बिहार में ये रोहतास और कैमूर जिलों में पाई जाती हैं। कैमूर पठार इन्हीं शैलों से बना है जो विन्ध्याचल पर्वत श्रृंखला का पूर्वी विस्तार है।
- रोहतास किला: विन्ध्यन बलुआ पत्थर की चट्टानों पर बना — ऐतिहासिक एवं भूगर्भीय दृष्टि से महत्वपूर्ण।
- चूना पत्थर भंडार: डालमियानगर (रोहतास) — सीमेंट उद्योग का आधार।
- कर्मनाशा नदी: कैमूर पहाड़ियों से निकलती है — विन्ध्यन शैलों के अपक्षय से बनी घाटी।
- देवदारी-राजदरी जलप्रपात: कैमूर में, बलुआ पत्थर की सतह से गिरता है।
प्रायद्वीपीय पठार एवं बिहार — तुलनात्मक दृष्टि
प्रायद्वीपीय पठार का मुख्य भाग झारखण्ड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और दक्षिण भारत में फैला है। बिहार इस पठार की उत्तरी परिधि पर स्थित है। झारखण्ड के अलग राज्य बनने (2000) से पहले बिहार इस भूगर्भीय विभाग में अधिक भागीदार था। वर्तमान बिहार में प्रायद्वीपीय संरचना केवल दक्षिणी सीमावर्ती जिलों तक सीमित है।
अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वत एवं बिहार का उत्तरी क्षेत्र
भारत के दूसरे भूगर्भीय विभाग — अतिरिक्त-प्रायद्वीपीय पर्वत या हिमालय — का बिहार के उत्तरी क्षेत्र से प्रत्यक्ष सम्बंध है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बिहार में प्रवेश करके विशाल जलोढ़ मैदान का निर्माण करती हैं। बिहार की उत्तरी सीमा सीधे नेपाल हिमालय से सटी हुई है।
हिमालय का भूगर्भीय परिचय
उत्तर बिहार — हिमालयी प्रभाव क्षेत्र
बिहार का उत्तरी भाग हिमालयी भूगर्भीय विभाग का तलहटी क्षेत्र (Foothills Zone) है। यहाँ हिमालय से उतरने वाली नदियाँ अत्यधिक कंकड़, बजरी और मोटे रेत (Boulders) जमा करती हैं। इस क्षेत्र को भाबर एवं तराई पट्टी कहते हैं।
हिमालयी भ्रंश तंत्र एवं बिहार
हिमालय में कई प्रमुख भ्रंश (Faults) हैं जो बिहार की भूकंपीय संवेदनशीलता के लिए उत्तरदायी हैं। मुख्य सीमा भ्रंश (Main Boundary Thrust — MBT) और हिमालयी अग्र भ्रंश (Himalayan Frontal Thrust — HFT) बिहार की उत्तरी सीमा के निकट स्थित हैं। इन भ्रंशों के कारण उत्तर बिहार भूकंप जोन V में आता है — भारत का सर्वाधिक भूकंप-संवेदनशील क्षेत्र।
विशाल मैदान — बिहार का हृदय
भारत के तीसरे भूगर्भीय विभाग — विशाल उत्तरी मैदान — में बिहार का लगभग 90% क्षेत्र आता है। यह मैदान भूगर्भीय दृष्टि से क्वाटर्नरी काल का जलोढ़ निक्षेप है। इसकी उत्पत्ति हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार के बीच बनी भू-अभिनति (Foredeep/Geosyncline) के भरने से हुई है।
विशाल मैदान की उत्पत्ति — प्लेट विवर्तनिकी दृष्टिकोण
इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट के यूरेशियन प्लेट से टकराने पर प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर में एक गहरा गर्त (Trough) बना — यही भू-अभिनति है।
हिमालयी एवं प्रायद्वीपीय दोनों नदियाँ इस गर्त में अवसाद भरती रहीं। करोड़ों वर्षों में जलोढ़ परतें जमती गईं, जिनकी गहराई कहीं-कहीं 6,000 मीटर से अधिक है।
क्वाटर्नरी काल (20 लाख वर्ष पूर्व से) में यह गर्त पूरी तरह भर गया और आज के गंगा-सिंधु-ब्रह्मपुत्र मैदान का रूप लेने लगा।
यह मैदान विश्व के सबसे उर्वर क्षेत्रों में से एक है। बिहार की जलोढ़ मिट्टी कृषि के लिए अनुकूलतम है और यहाँ धान, गेहूँ, मक्का, दलहन प्रमुखता से उगाए जाते हैं।
गंगा मैदान की भूगर्भीय संरचना — परतें
| परत | भूगर्भीय काल | प्रकार | बिहार में स्थिति |
|---|---|---|---|
| ऊपरी परत — खादर (Khadar) | होलोसीन (10,000 वर्ष — वर्तमान) | नई जलोढ़ — बारीक, उर्वर | नदी किनारे, बाढ़ मैदान |
| मध्य परत — भांगर (Bhangar) | प्लीस्टोसीन (20 लाख — 10,000 वर्ष) | पुरानी जलोढ़ — कंकर युक्त | नदी तट से ऊँचे भाग |
| निचली परत — कठोर शैल | प्री-क्वाटर्नरी | प्रायद्वीपीय शैल — बेसमेंट | अत्यंत गहराई में (हजारों मीटर) |
बिहार में गंगा मैदान का उप-विभाजन
बिहार का गंगा मैदान गंगा नदी द्वारा दो भागों में विभाजित है। उत्तरी गंगा मैदान में हिमालयी नदियाँ (गण्डक, कोसी, बागमती आदि) बहती हैं जो अत्यधिक तलछट लाती हैं — यहाँ की मिट्टी बारीक एवं अत्यंत उर्वर है। दक्षिणी गंगा मैदान में प्रायद्वीपीय नदियाँ (सोन, पुनपुन, फल्गु) बहती हैं — यह क्षेत्र अपेक्षाकृत ऊँचा, कम बाढ़ प्रभावित और कंकर-युक्त भांगर मिट्टी प्रधान है।
प्लेट विवर्तनिकी एवं बिहार की भूगर्भीय स्थिति
भारत की भूगर्भीय संरचना को समझने के लिए प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (Theory of Plate Tectonics) का ज्ञान अनिवार्य है। इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी की भूपर्पटी (Crust) कई कठोर प्लेटों में विभाजित है जो धीरे-धीरे गतिशील रहती हैं। बिहार की वर्तमान भूगर्भीय स्थिति इसी प्लेट गति का प्रत्यक्ष परिणाम है।
भारत की प्लेट गति — इतिहास
बिहार की भूगर्भीय स्थिति का प्लेट विवर्तनिकी में महत्व
बिहार इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट के उत्तरी किनारे पर स्थित है। यह क्षेत्र प्लेट की सीमा से निकट होने के कारण भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत सक्रिय है। दक्षिण बिहार की कठोर प्राचीन शैलें प्रायद्वीपीय प्लेट का हिस्सा हैं, जबकि उत्तर बिहार में जलोढ़ निक्षेप यूरेशियन-इंडियन प्लेट संघर्ष का परिणाम है।
तुलनात्मक भूगर्भीय विश्लेषण — बिहार के तीनों विभाग
बिहार की अनूठी भूगर्भीय विशेषता यह है कि यहाँ तीनों प्रमुख भूगर्भीय विभागों का प्रतिनिधित्व होता है। इन तीनों विभागों की विशेषताओं, उनसे उत्पन्न भू-संसाधनों और उनके परीक्षा महत्व को समझना BPSC की दृष्टि से अनिवार्य है।
तीनों विभागों का तुलनात्मक अध्ययन
| विशेषता | 🪨 प्रायद्वीपीय पठार (दक्षिण बिहार) | 🏔️ हिमालयी क्षेत्र (उत्तर बिहार) | 🌾 विशाल मैदान (मध्य बिहार) |
|---|---|---|---|
| शैल प्रकार | आग्नेय, कायांतरित (ग्रेनाइट, नीस) | कंकड़, बजरी, मोटी रेत | जलोढ़ (Alluvium) |
| भूगर्भीय काल | आर्कियन (400+ करोड़ वर्ष) | सीनोज़ोइक (6.5 करोड़ वर्ष से) | क्वाटर्नरी (20 लाख वर्ष से) |
| स्थिरता | अत्यंत स्थिर, कठोर | अस्थिर, भूकंप-प्रवण | अपेक्षाकृत स्थिर |
| प्रमुख जिले | गया, नवादा, जमुई, रोहतास, कैमूर, मुंगेर | चम्पारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया | पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर |
| खनिज | चूना पत्थर, अभ्रक, पायराइट, बलुआ पत्थर | बहुत कम — मुख्यतः जलोढ़ | भूजल, उर्वर मिट्टी (कृषि संसाधन) |
| भूकंप जोन | Zone III (मध्यम) | Zone V (सर्वोच्च) | Zone IV (उच्च) |
| नदी प्रकार | प्रायद्वीपीय — सोन, फल्गु, पुनपुन | हिमालयी — गण्डक, कोसी, बागमती | मुख्य अक्षीय — गंगा |
| भू-उपयोग | खनन, पर्यटन, सीमित कृषि | वन, धान कृषि, पशुपालन | गहन कृषि, घनी जनसंख्या |
बिहार की भूगर्भीय स्थिति का आर्थिक महत्व
बिहार की भूगर्भीय विविधता उसे आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। प्रायद्वीपीय क्षेत्र में रोहतास के चूना पत्थर से डालमिया सीमेंट उद्योग, गया के ग्रेनाइट से निर्माण सामग्री, और अमझोर के पायराइट से उर्वरक उद्योग को आधार मिला। हिमालयी तराई में नमी एवं उर्वर भूमि से वन सम्पदा एवं धान उत्पादन होता है। गंगा के मैदान में जलोढ़ मिट्टी की उर्वरता से बिहार देश के प्रमुख कृषि राज्यों में से एक है — चावल, गेहूँ, मक्का, दलहन सभी यहाँ प्रचुर मात्रा में उगते हैं।
- बाढ़ की समस्या: हिमालयी नदियाँ (कोसी, गण्डक, बागमती) प्रतिवर्ष भारी तलछट लाती हैं। नदियाँ अपना मार्ग बदलती रहती हैं। उत्तर बिहार में लाखों हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित।
- भूकंप जोखिम: MBT एवं HFT भ्रंशों के निकट होने से उत्तर बिहार Zone V में। 1934 जैसे महाभूकंप की पुनरावृत्ति की सम्भावना।
- आर्सेनिक प्रदूषण: गंगा मैदान के जलोढ़ में आर्सेनिक का अत्यधिक जमाव। भोजपुर, बक्सर, सारण, वैशाली जिले गम्भीर रूप से प्रभावित।
- खनिज-रिक्तता: झारखण्ड अलग होने (2000) के बाद बिहार का खनिज आधार अत्यंत सीमित हो गया।
- भूमि अपरदन: नदियों द्वारा तटीय अपरदन (Bank Erosion) एक निरंतर समस्या है।


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