बिहार का गोंडवाना संरचना एवं कोयला भंडार
BPSC Prelims + Mains — भूगोल एवं अर्थव्यवस्था | झारखंड विभाजन के बाद बिहार की स्थिति · दामोदर घाटी · सोन-महानदी बेसिन · कोयले के प्रकार
परिचय एवं भूमिका
बिहार का गोंडवाना संरचना एवं कोयला भंडार BPSC परीक्षा के भूगोल खंड का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है — विशेषकर इसलिए कि वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने के बाद बिहार के अधिकांश कोयला क्षेत्र उससे अलग हो गए, जो परीक्षार्थियों के लिए एक सामान्य भ्रम का कारण बनता है।
गोंडवाना संरचना का भौगोलिक विस्तार
गोंडवाना शैल-समूह भारत में मुख्यतः प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर-पूर्वी किनारे पर नदी घाटियों — विशेषकर दामोदर, सोन, महानदी, गोदावरी और वर्धा घाटियों — में पाया जाता है। इन घाटियों में नदी-अपरदन ने ऊपरी कठोर चट्टानों को काटकर नीचे की गोंडवाना परतों को उजागर किया है, जहाँ विशाल कोयला भंडार विद्यमान हैं।
प्राचीन काल में जब Gondwanaland नामक महाद्वीप अस्तित्व में था, तब घने उष्णकटिबंधीय वन इन क्षेत्रों में पाए जाते थे। लाखों वर्षों में भूगर्भीय दबाव और ताप के कारण ये वन-अवशेष कोयले में परिवर्तित हो गए।
गोंडवाना भूविज्ञान — संरचना एवं निर्माण
गोंडवाना संरचना भारतीय भूविज्ञान की सर्वाधिक महत्वपूर्ण शैल-श्रृंखलाओं में से एक है। इसका निर्माण Upper Carboniferous से Cretaceous काल (लगभग 30–6.5 करोड़ वर्ष पूर्व) के मध्य हुआ और यह मुख्यतः नदी घाटी बेसिनों में जमा अवसादी शैलों से बनी है।
गोंडवाना शैलों की विशेषताएँ
| विशेषता | Lower Gondwana | Upper Gondwana |
|---|---|---|
| काल | Permian (~28 करोड़ वर्ष) | Triassic–Jurassic (~22–18 करोड़ वर्ष) |
| शैल प्रकार | कोयला, शेल, बलुआ पत्थर | बलुआ पत्थर, चीका मिट्टी (Clay) |
| वनस्पति अवशेष | Glossopteris (प्रमुख) | Ptilophyllum (प्रमुख) |
| कोयला गुणवत्ता | Bituminous — उच्च कोटि | निम्न कोटि / नगण्य |
| आर्थिक महत्व | अत्यधिक — कोयला खनन | सीमित |
Gondwana संरचना और प्रायद्वीपीय भारत
प्रायद्वीपीय भारत मुख्यतः Archaean (आर्कियन) आग्नेय एवं कायांतरित शैलों से बना है। गोंडवाना शैल इन प्राचीन शैलों के ऊपर नदी-निक्षेप (Fluvial deposits) के रूप में जमा हुए। इसीलिए गोंडवाना कोयला क्षेत्र नदी घाटियों तक सीमित हैं — जैसे दामोदर घाटी, सोन घाटी आदि।
प्रमुख कोयला क्षेत्र एवं बेसिन — बिहार एवं झारखंड
2000 से पहले जब झारखंड बिहार का अभिन्न अंग था, तब यह क्षेत्र भारत के कोयला उत्पादन में सर्वोच्च स्थान पर था। दामोदर घाटी को भारत की “कोयला राजधानी” कहा जाता है और यह तत्कालीन बिहार का सबसे बड़ा खनिज संसाधन था।
दामोदर घाटी भारत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कोयला बेसिन है। यह झारखंड और पश्चिम बंगाल में विस्तृत है। 2000 से पूर्व यह तत्कालीन बिहार में था।
- झरिया कोयला क्षेत्र (Jharia Coalfield) — भारत का सबसे बड़ा Bituminous कोयला क्षेत्र; धनबाद जिले में स्थित। Coking Coal का प्रमुख स्रोत।
- बोकारो कोयला क्षेत्र — झारखंड के बोकारो जिले में; Non-Coking Coal प्रचुर मात्रा में।
- गिरिडीह कोयला क्षेत्र — झारखंड में; उच्च गुणवत्ता वाला कोयला।
- रामगढ़ कोयला क्षेत्र — झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित।
- करनपुरा कोयला क्षेत्र — झारखंड; हजारीबाग-लोहरदगा क्षेत्र।
सोन घाटी में कोयले के भंडार भारत के दक्षिणी बिहार / उत्तरी झारखंड सीमा पर विस्तृत हैं। यह क्षेत्र तुलनात्मक रूप से कम विकसित है।
- औरंगाबाद-पलामू क्षेत्र — सोन नदी के दक्षिण में; Gondwana शैलों में Bituminous कोयला।
- नॉर्थ कर्णपुरा बेसिन — झारखंड के हजारीबाग में; सोन घाटी का विस्तार।
- महत्व — इस क्षेत्र के कोयला भंडार तुलनात्मक रूप से अनुसंधान-चरण में हैं।
झारखंड के अलग होने के बाद वर्तमान बिहार में कोयला संसाधन अत्यंत सीमित हो गए हैं।
- पश्चिमी चंपारण — उत्तर-पश्चिम बिहार में Gondwana प्रकार की शैलें पाई जाती हैं परंतु व्यावसायिक कोयला खनन नहीं होता।
- रोहतास-औरंगाबाद — सोन घाटी के उत्तरी किनारे पर गोंडवाना शैल अवशिष्ट मात्रा में हैं।
- खनिज मानचित्र — GSI (Geological Survey of India) के अनुसार वर्तमान बिहार में कोयला व्यावसायिक खनन हेतु उपयुक्त नहीं है।
प्रमुख कोयला क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन
| # | कोयला क्षेत्र | स्थिति (2000 के बाद) | बेसिन | कोयला प्रकार | विशेषता |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | झरिया | झारखंड | दामोदर घाटी | Bituminous (Coking) | भारत का सबसे बड़ा कोकिंग कोल क्षेत्र |
| 2 | बोकारो | झारखंड | दामोदर घाटी | Bituminous (Non-Coking) | SAIL के इस्पात संयंत्र को कोयला आपूर्ति |
| 3 | करनपुरा | झारखंड | दामोदर घाटी | Bituminous | हजारीबाग के पश्चिम में |
| 4 | गिरिडीह | झारखंड | दामोदर घाटी | Bituminous (उत्तम) | सबसे पुराना खनन क्षेत्र (1860 से) |
| 5 | उत्तरी कर्णपुरा | झारखंड | सोन घाटी | Bituminous | अर्ध-विकसित क्षेत्र |
| 6 | पश्चिमी चंपारण | बिहार (वर्तमान) | सोन-गंगा क्षेत्र | Sub-Bituminous | व्यावसायिक खनन नहीं |
कोयले के प्रकार — वर्गीकरण एवं गुण
कोयले का वर्गीकरण उसमें Carbon की मात्रा, कैलोरी मान (Calorific Value), नमी की मात्रा और निर्माण-काल के आधार पर किया जाता है। Gondwana संरचना में मुख्यतः Bituminous कोयला मिलता है जो उद्योगों के लिए सर्वाधिक उपयोगी है।
Anthracite (एंथ्रेसाइट)
Carbon: 80–95% | सर्वोच्च कोटिBituminous (बिटुमिनस)
Carbon: 45–86% | सर्वाधिक उपयोगीLignite (लिग्नाइट)
Carbon: 25–35% | भूरा कोयलाPeat (पीट)
Carbon: 60% से कम | सबसे निम्नCoking Coal बनाम Non-Coking Coal
| आधार | Coking Coal | Non-Coking Coal |
|---|---|---|
| उपयोग | इस्पात (Steel) उद्योग में Coke बनाने हेतु | ताप-विद्युत संयंत्र (Thermal Power Plants) |
| Volatile Matter | 15–40% | 40% से अधिक |
| Ash Content | कम | अधिक (कभी-कभी 40%+) |
| प्रमुख क्षेत्र | झरिया (झारखंड) | बोकारो, करनपुरा (झारखंड) |
| महत्व | राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु महत्वपूर्ण; आयात पर निर्भरता | विद्युत उत्पादन में प्रमुख भूमिका |
2000 के बाद बिहार — खनिज संसाधनों की स्थिति
15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन ने बिहार की खनिज संरचना को मूलतः बदल दिया। बिहार के अधिकांश खनिज संसाधन — कोयला, लौह-अयस्क, मैंगनीज, बॉक्साइट — झारखंड में चले गए। यह BPSC परीक्षा का एक महत्वपूर्ण विभाजन-रेखा बिंदु है।
वर्तमान बिहार में उपलब्ध खनिज संसाधन
| खनिज | जिला / क्षेत्र | स्थिति |
|---|---|---|
| पाइराइट (Pyrite) | रोहतास (अमझोर) | उल्लेखनीय भंडार — सल्फर उर्वरक निर्माण हेतु |
| चूना-पत्थर (Limestone) | रोहतास, कैमूर | सीमेंट उद्योग के लिए उपयोगी |
| अभ्रक (Mica) | गया, नवादा, मुंगेर | सीमित मात्रा |
| बालू-पत्थर (Sandstone) | रोहतास, कैमूर, सासाराम | निर्माण सामग्री के रूप में |
| कोयला (Coal) | पश्चिमी चंपारण (सीमित) | व्यावसायिक खनन नहीं |
| सिलिका (Silica Sand) | मुंगेर, जमुई | कांच उद्योग हेतु |
बिहार में Gondwana शैलों का भौगोलिक वितरण
वर्तमान बिहार में Gondwana संरचना की शैलें मुख्यतः कैमूर पठार के दक्षिणी किनारे, रोहतास पठार और पश्चिमी चंपारण में पाई जाती हैं। ये शैलें मुख्यतः बलुआ पत्थर, चीका मिट्टी और क्वार्टज़ाइट हैं जिनमें व्यावसायिक स्तर पर कोयला नहीं मिलता। कैमूर पठार में Gondwana और Vindhyan शैलों का अन्तर्मिश्रण देखा जाता है।
आर्थिक महत्व, चुनौतियाँ एवं पर्यावरणीय प्रभाव
गोंडवाना कोयला भारत की ऊर्जा सुरक्षा, इस्पात उद्योग और रेलवे की रीढ़ है। किंतु इसके दोहन से पर्यावरणीय समस्याएँ, विस्थापन और स्वास्थ्य-संकट भी उत्पन्न हुए हैं जो BPSC Mains के लिए विश्लेषणात्मक प्रश्नों का आधार बनते हैं।
🟢 आर्थिक महत्व — कारण
भारत की लगभग 55% विद्युत उत्पादन कोयले पर निर्भर है। Gondwana Bituminous कोयला ताप-विद्युत संयंत्रों का प्रमुख ईंधन है।
झरिया का Coking Coal SAIL, TATA Steel जैसी कंपनियों को कोक (Coke) प्रदान करता है जो इस्पात निर्माण की अनिवार्य सामग्री है।
कोयला खनन से झारखंड को भारी राजस्व प्राप्त होता है। Coal India Limited (CIL) विश्व की सबसे बड़ी कोयला कंपनी है जिसका मुख्यालय कोलकाता में है।
ऐतिहासिक रूप से कोयले ने भारतीय रेलवे को ईंधन दिया। आज भी माल-ढुलाई में कोयला सर्वाधिक ट्रांसपोर्टेड खनिज है।
🔴 प्रमुख चुनौतियाँ
- भूमिगत आग (Underground Fire): झरिया कोयला क्षेत्र में दशकों से जमीन के नीचे आग जल रही है जिससे भूमि धँसाव और वायु प्रदूषण हो रहा है।
- विस्थापन (Displacement): खनन कार्यों के लिए जनजातीय (Adivasi) समुदायों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है।
- पर्यावरण क्षरण: खुली खदानें (Open Cast Mining) वन-विनाश, जल-प्रदूषण और भूमि-क्षरण का कारण बनती हैं।
- स्वास्थ्य समस्याएँ: कोयला धूल (Coal Dust) से फेफड़े के रोग, कैंसर और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- अवैध खनन: झारखंड-बिहार सीमा क्षेत्र में अवैध कोयला खनन (Coal Mafia) की गंभीर समस्या है।


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