बिहार की गोंडवाना संरचना
गोंडवाना काल की शैल-विशेषताएँ, कोयला भंडार, राजमहल ट्रैप एवं महाद्वीपीय विचलन — BPSC Prelims + Mains सम्पूर्ण अध्ययन
परिचय एवं पृष्ठभूमि
बिहार की गोंडवाना संरचना (Gondwana Formation) भूगर्भीय दृष्टि से भारत की सबसे महत्वपूर्ण अवसादी शैल श्रृंखलाओं में से एक है। यह संरचना पर्मियन काल से जुरासिक काल तक — अर्थात् लगभग 20 से 30 करोड़ वर्ष पूर्व — निर्मित हुई। BPSC Prelims एवं Mains दोनों परीक्षाओं में इस विषय से प्रतिवर्ष प्रश्न पूछे जाते हैं।
गोंडवाना शैल क्रम भारत के कोयला भंडारों का मूल स्रोत है। बिहार (एवं वर्तमान झारखंड) में यह संरचना मुख्यतः दामोदर घाटी, सोन घाटी और राजमहल पहाड़ियों में पाई जाती है। 2000 में झारखंड के अलग होने के बाद बिहार में गोंडवाना क्षेत्र का केवल राजमहल ट्रैप का पूर्वी किनारा (साहिबगंज-पाकुड़ सीमा क्षेत्र) बचा है।
गोंडवाना महाद्वीप — भूगर्भीय अवधारणा
गोंडवाना केवल एक शैल क्रम का नाम नहीं है — यह उस प्राचीन महाद्वीप का नाम भी है जिससे भारत, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और अरब प्रायद्वीप टूटकर बने। इस महाद्वीप के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है — गोंडवाना शैलों में पाया जाने वाला ग्लोसोप्टेरिस जीवाश्म, जो इन सभी क्षेत्रों में समान रूप से मिलता है।
महाद्वीपीय विचलन सिद्धांत और गोंडवाना
Alfred Wegener ने 1912 में महाद्वीपीय विचलन सिद्धांत (Continental Drift Theory) प्रस्तुत किया। उन्होंने तर्क दिया कि एक समय पृथ्वी पर एकल महाद्वीप “पैंजिया” (Pangaea) था जो दो भागों में विभाजित हो गया — उत्तरी भाग लॉरेशिया (Laurasia) और दक्षिणी भाग गोंडवाना (Gondwana)। गोंडवाना के टूटने की प्रक्रिया जुरासिक काल में प्रारम्भ हुई और क्रिटेशियस काल में तेज हुई।
निम्न गोंडवाना — तालचीर एवं दामुदा श्रृंखला
निम्न गोंडवाना (Lower Gondwana) गोंडवाना शैल क्रम का वह भाग है जो पर्मियन काल (लगभग 25–30 करोड़ वर्ष पूर्व) में निर्मित हुआ। इसमें दो प्रमुख श्रृंखलाएँ हैं — तालचीर श्रृंखला (हिमानी जमाव) और दामुदा श्रृंखला (कोयला-युक्त अवसादी शैल)। ये बिहार के कोयला इतिहास का आधार हैं।
तालचीर श्रृंखला (Talchir Series)
यह गोंडवाना की सबसे निचली और सबसे प्राचीन श्रृंखला है। इसके शैलों में हिमानी (Glacial) उत्पत्ति के प्रमाण हैं। इस काल में गोंडवाना क्षेत्र (जिसमें बिहार-झारखंड भी था) दक्षिणी ध्रुव के निकट था और वहाँ बर्फ की मोटी चादर थी। तालचीर बोल्डर बेड (Boulder Bed) इसका सबसे विशिष्ट तत्व है — इसमें हिमनदी द्वारा घसीटे गए बड़े-बड़े पत्थर पाए जाते हैं।
| तालचीर की विशेषता | विवरण | महत्व |
|---|---|---|
| बोल्डर बेड | हिमनदी द्वारा लाए विशाल पत्थर | प्राचीन हिमानी का प्रमाण |
| वार्वड शेल | मौसमी परतें — गर्मी और सर्दी की बारी-बारी परतें | जलवायु क्रम का रिकॉर्ड |
| स्ट्राइएटेड पावेमेंट | हिमनदी द्वारा खरोंचे गए तल की सतह | हिमनदी की दिशा का पता |
| ड्रॉपस्टोन | बर्फ पिघलने पर तल में गिरे पत्थर | Periglacial पर्यावरण का साक्ष्य |
दामुदा श्रृंखला (Damuda Series) — कोयले की जननी
दामुदा श्रृंखला भारत के कोयले का सबसे बड़ा स्रोत है। यह तालचीर के ऊपर जमी है और इसमें कोयले की मोटी परतें हैं। दामुदा को तीन उपसमूहों में बाँटा जाता है — कारहरबारी, बराकर और रानीगंज। इन परतों में प्राचीन उष्णकटिबंधीय वनों के अवशेष कोयले के रूप में संरक्षित हैं।
दामुदा श्रृंखला में कोयले की उत्पत्ति का कारण यह था कि उस समय गोंडवाना भूमि पर विशाल उष्णकटिबंधीय दलदली वन थे। ये वन मर कर दलदल में दब गए और लाखों वर्षों में ताप-दाब के कारण कोयले में बदल गए — यह प्रक्रिया Coalification कहलाती है।
उच्च गोंडवाना एवं राजमहल ट्रैप
उच्च गोंडवाना (Upper Gondwana) का निर्माण ट्राइएसिक से जुरासिक काल (लगभग 15–22 करोड़ वर्ष पूर्व) में हुआ। इसमें महादेव श्रृंखला, पंचेत श्रृंखला और बिहार के संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण — राजमहल श्रृंखला — सम्मिलित हैं। इसी काल में महाद्वीपीय विखंडन तेज हुआ और ज्वालामुखीय गतिविधि प्रारम्भ हुई।
पंचेत श्रृंखला (Panchet Series)
पंचेत श्रृंखला दामुदा और राजमहल के बीच की कड़ी है। इसमें लाल-भूरे रंग के बालुका पत्थर एवं शेल प्रमुख हैं। इस काल में ग्लोसोप्टेरिस वनस्पति समाप्त होने लगी और नई प्रजातियाँ आईं। यहाँ Dicynodon (स्तनधारी-सदृश सरीसृप) के जीवाश्म मिले हैं।
राजमहल श्रृंखला (Rajmahal Series) — बिहार का केंद्र-बिंदु
राजमहल श्रृंखला उच्च गोंडवाना का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। इसके तहत दो प्रकार की संरचनाएँ मिलती हैं — अवसादी शैल (बालुका पत्थर, शेल) और राजमहल ट्रैप (ज्वालामुखीय बेसाल्ट)। बिहार के साहिबगंज जिले की राजमहल पहाड़ियाँ इसी श्रृंखला का हिस्सा हैं।
राजमहल ट्रैप (Rajmahal Traps)
क्रिटेशियस काल — ~11.7 करोड़ वर्ष पूर्वराजमहल ट्रैप वस्तुतः गोंडवाना श्रृंखला के भीतर की ज्वालामुखीय घटना है। जब भारतीय प्लेट गोंडवाना से अलग होकर उत्तर की ओर खिसकने लगी, तब पृथ्वी की पपड़ी में दरारें पड़ीं और उनसे बेसाल्टिक लावा बाहर निकला। यह लावा राजमहल क्षेत्र में परत-दर-परत जमता गया।
🌋 बेसाल्ट लावा 🦕 डायनासोर जीवाश्म 🌿 Plant Fossils 💎 अर्ध-बहुमूल्य पत्थरराजमहल ट्रैप की विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण | महत्व |
|---|---|---|
| शैल प्रकार | बेसाल्ट (Basalt) — काले रंग का ज्वालामुखीय शैल | निर्माण सामग्री, सड़क निर्माण |
| स्थान | साहिबगंज, पाकुड़ (झारखंड), राजमहल पहाड़ियाँ | पर्यटन, खनन |
| जीवाश्म | डायनासोर के अंडे व अवशेष, Ottokaria, Glossopteris | पुराजीवविज्ञान शोध |
| खनिज | Agates, Carnelians (लाल-पीले रत्न), Chalcedony | आभूषण उद्योग, निर्यात |
| मोटाई | 300–600 मीटर तक लावा परत | भूगर्भीय महत्व |
| Hot Spot संबंध | Kerguelen Hot Spot से जुड़ा माना जाता है | Plate Tectonics अध्ययन |
भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार राजमहल ट्रैप का ज्वालामुखी उद्गार Kerguelen Plume (Hot Spot) से संबंधित था। जब भारतीय प्लेट इस Hot Spot के ऊपर से गुजरी, तो पृथ्वी की पपड़ी पिघल गई और बेसाल्टिक मैग्मा बाहर निकला। यही कारण है कि राजमहल ट्रैप और Kerguelen Plateau (हिंद महासागर) एक ही Hot Spot की देन हैं।
इस ज्वालामुखीय घटना का बिहार-झारखंड की भूमि पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। बेसाल्ट की मोटी परतें जमने से राजमहल पहाड़ियों की ऊँचाई बढ़ी। यहाँ की काली मिट्टी (Regur) इन्हीं बेसाल्ट शैलों के अपक्षय का परिणाम है।
- Columnar Jointing: ठंडे होते समय बेसाल्ट में षट्भुजाकार (Hexagonal) दरारें पड़ीं — यह प्राकृतिक स्तंभों जैसी संरचना बनाती है।
- Intertrappean Beds: लावा परतों के बीच-बीच में झीलों के तलछट जमे जिनमें पौधों एवं मछलियों के जीवाश्म संरक्षित हैं।
- Plant Fossils: राजमहल की Intertrappean परतों से 150 से अधिक पौधों की प्रजातियाँ जीवाश्म के रूप में मिली हैं — यह विश्व के महत्वपूर्ण Fossil Sites में से एक है।
गोंडवाना जीवाश्म एवं जैव-विविधता
गोंडवाना काल के शैलों में पाए जाने वाले जीवाश्म (Fossils) पुराजीवविज्ञान (Palaeontology) के लिए अत्यंत बहुमूल्य हैं। बिहार-झारखंड की राजमहल पहाड़ियाँ विश्व के कुछ सर्वोत्तम Fossil Sites में गिनी जाती हैं। यहाँ पौधों, मछलियों, कीड़ों और डायनासोर के अवशेष मिले हैं।
ग्लोसोप्टेरिस (Glossopteris) — सबसे महत्वपूर्ण जीवाश्म
ग्लोसोप्टेरिस एक जीभ के आकार की पत्तियों वाला वृक्ष था जो गोंडवाना काल में पूरे दक्षिणी महाद्वीप पर फैला था। इसका नाम ग्रीक शब्द “Glossa” (जीभ) से आया है। यह पौधा भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका — सभी में एक ही रूप में मिलता है। यह महाद्वीपीय विचलन सिद्धांत का सबसे बड़ा वानस्पतिक प्रमाण है।
राजमहल Hills — Fossil Site का महत्व
राजमहल पहाड़ियों की Intertrappean Beds (लावा परतों के बीच की तलछट परतें) में जीवाश्म असाधारण रूप से अच्छी तरह संरक्षित हैं। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) और विदेशी वैज्ञानिकों ने यहाँ से 150+ पौधों की प्रजातियाँ, मछली, कीड़े, घोंघे के जीवाश्म एकत्र किए हैं। यह एशिया के सर्वोत्तम Jurassic-Cretaceous Fossil Sites में से एक है।
बिहार में गोंडवाना कोयला एवं खनिज सम्पदा
गोंडवाना काल का सबसे बड़ा आर्थिक उपहार है — कोयला (Coal)। भारत के कुल कोयला भंडार का 90% से अधिक गोंडवाना शैलों से ही प्राप्त होता है। 2000 से पहले बिहार में झरिया, बोकारो, गिरिडीह, करनपुरा जैसे विश्व-प्रसिद्ध कोयला क्षेत्र थे — अब ये सब झारखंड में हैं।
| कोयला क्षेत्र | वर्तमान राज्य | गोंडवाना श्रृंखला | कोयला प्रकार | विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| झरिया | झारखंड (पूर्व बिहार) | बराकर | Coking Coal | भारत का सर्वश्रेष्ठ कोकिंग कोयला |
| बोकारो | झारखंड | बराकर | Coking + Steam | SAIL इस्पात कारखाने का आधार |
| गिरिडीह | झारखंड | बराकर | Steam Coal | भारत का पहला कोयला खनन क्षेत्र (1856) |
| करनपुरा | झारखंड | बराकर-रानीगंज | Bituminous | बड़े अनुपयुक्त भंडार |
| राजमहल क्षेत्र | झारखंड (साहिबगंज) | राजमहल श्रृंखला | Sub-bituminous | ECL खनन, बेसाल्ट भी |
कोयले के प्रकार और गोंडवाना
गोंडवाना शैलों में पाया जाने वाला कोयला मुख्यतः बिटुमिनस (Bituminous) और एन्थ्रेसाइट (Anthracite) श्रेणी का है। झरिया का कोकिंग कोयला भारत के इस्पात उद्योग की रीढ़ है। इसकी कार्बन-मात्रा 80–90% है जो इसे उच्च-कैलोरी ईंधन बनाती है।
झरिया (झारखंड) में। बराकर श्रृंखला का। इस्पात उद्योग में अनिवार्य। कार्बन 80–90%। भारत में एकमात्र प्रमुख स्रोत।
बोकारो, करनपुरा में। कार्बन 70–80%। ताप विद्युत संयंत्रों में प्रयुक्त। सर्वाधिक उत्पादन इसी का होता है।
राजमहल ट्रैप से। सड़क निर्माण, भवन में। काली मिट्टी का स्रोत। Agates और Carnelian रत्न भी।
राजमहल क्षेत्र में Agate, Carnelian, Chalcedony। निर्यात योग्य। आभूषण उद्योग में मूल्यवान।
Mains विश्लेषण — आर्थिक, पर्यावरण एवं नीति
BPSC Mains में गोंडवाना संरचना को केवल भूगर्भ-विज्ञान तक सीमित नहीं रखा जाता — इसे आर्थिक विकास, पर्यावरण समस्याएँ, औद्योगिक इतिहास और वर्तमान नीति के साथ जोड़कर पूछा जाता है। इस खण्ड में उन सभी आयामों का विश्लेषण किया गया है।
गोंडवाना संरचना और बिहार का औद्योगिक इतिहास
गोंडवाना काल के कोयला भंडारों ने बिहार-झारखंड को भारत के औद्योगिक मानचित्र पर रखा। दामोदर घाटी विश्व के सबसे घने औद्योगिक क्षेत्रों में से एक बनी। Damodar Valley Corporation (DVC) की स्थापना 1948 में इसी कोयले के दोहन को नियंत्रित करने के लिए की गई। टाटा स्टील (जमशेदपुर, 1907) और SAIL-बोकारो इस्पात संयंत्र — सब गोंडवाना कोयले की देन हैं।
- झरिया की आग (Jharia Coal Fire): झरिया कोयला क्षेत्र में 1916 से भूमिगत आग जल रही है। यह आग अभी तक नहीं बुझी — लाखों टन कोयला नष्ट। 1 लाख से अधिक लोगों को विस्थापित करना पड़ा। यह भारत की सबसे लम्बी पर्यावरणीय आपदाओं में से एक है।
- भूमि धँसाव: अत्यधिक भूमिगत खनन से धनबाद-झरिया क्षेत्र में भूमि धँसाव।
- जल-प्रदूषण: कोयला खदानों से निकला अम्लीय पानी (Acid Mine Drainage) दामोदर एवं अन्य नदियों को प्रदूषित कर रहा है।
- वायु-प्रदूषण: खनन धूल और कोयला जलने से आसपास के क्षेत्रों में श्वास रोग।
- जनजाति विस्थापन: कोयला खनन क्षेत्रों में संथाल, हो, मुंडा जनजातियों का व्यापक विस्थापन।
राजमहल क्षेत्र — वर्तमान बिहार-झारखंड का साझा हित
हालाँकि राजमहल पहाड़ियाँ मुख्यतः झारखंड (साहिबगंज, पाकुड़) में हैं, किन्तु बिहार के भागलपुर और साहिबगंज से इनका घनिष्ठ सम्पर्क है। Eastern Coalfields Limited (ECL) यहाँ खनन करती है। गंगा नदी का फरक्का बैराज तक का मार्ग इसी क्षेत्र से गुजरता है — Inland Waterways के लिए यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- UNESCO Geopark: राजमहल पहाड़ियों को UNESCO Global Geopark का दर्जा दिलाने की माँग है। यहाँ के Fossil Sites विश्व-स्तरीय हैं।
- Ecotourism: राजमहल के डायनासोर जीवाश्म, अर्ध-बहुमूल्य पत्थर और प्राकृतिक सौन्दर्य से पर्यटन की अपार संभावना।
- शोध केंद्र: Botanical Survey of India (BSI) और GSI के लिए महत्वपूर्ण शोध स्थल।
उत्तर ढाँचा: (1) परिचय — गोंडवाना की परिभाषा एवं भौगोलिक विस्तार, (2) आर्थिक योगदान — कोयला, बेसाल्ट, अर्ध-बहुमूल्य पत्थर, (3) वैज्ञानिक महत्व — जीवाश्म, महाद्वीपीय विचलन, (4) झारखंड विभाजन का प्रभाव, (5) पर्यावरणीय समस्याएँ, (6) भविष्य की सम्भावनाएँ — Geopark, Ecotourism, (7) निष्कर्ष।
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