बिहार का मध्यकालीन इतिहास
पाल वंश से ब्रिटिश अधिग्रहण तक — बख्तियार खिलजी, शेरशाह सूरी, सूफी-भक्ति आंदोलन एवं मुगल बिहार का सम्पूर्ण BPSC विश्लेषण
परिचय एवं बिहार का मध्यकालीन भौगोलिक महत्व
बिहार का मध्यकालीन इतिहास BPSC परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। 800 ई. से 1765 ई. तक के इस काल में बिहार ने पाल वंश की बौद्ध संस्कृति, बख्तियार खिलजी के विनाशकारी आक्रमण, शेरशाह सूरी की प्रशासनिक क्रांति तथा मुगल सूबेदारी का साक्ष्य किया।
बिहार की मध्यकालीन भौगोलिक स्थिति
पाल वंश एवं सेन वंश — बिहार में मध्यकाल की प्रारम्भिक पृष्ठभूमि
मध्यकाल के प्रारम्भ में बिहार-बंगाल पर पाल वंश (750–1162 ई.) का शासन था। यह वंश बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था। पाल वंश के पतन के बाद सेन वंश ने शासन किया जो हिंदू धर्म का समर्थक था। इन दोनों वंशों ने बिहार को शैक्षिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विश्वस्तरीय बनाया।
पाल काल में बिहार के प्रमुख शिक्षण संस्थान
बख्तियार खिलजी एवं बिहार पर तुर्क आक्रमण (1193–1206 ई.)
इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी बिहार के इतिहास का सबसे विनाशकारी व्यक्तित्व है। उसके आक्रमण ने बिहार की हजार वर्ष पुरानी बौद्ध-शैक्षणिक परंपरा को नष्ट कर दिया। 1203 ई. में नालंदा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का विध्वंस भारतीय ज्ञान-परंपरा के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है।
बख्तियार खिलजी मूलतः अफगानिस्तान के गरमसीर क्षेत्र का रहने वाला था। वह मुहम्मद गोरी का एक सामान्य सैनिक था जिसे दिल्ली में नौकरी नहीं मिली। कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे बिहार अभियान की जिम्मेदारी दी। वह अत्यंत तेज घुड़सवारी के लिए प्रसिद्ध था — उसकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी थीं जिससे वह घोड़े पर तलवार चलाने में माहिर था।
बिहार आक्रमण की कालक्रम
- तबकात-ए-नासिरी (मिनहाज-ए-सिराज) — बख्तियार के आक्रमण का प्राथमिक स्रोत; किंतु अतिरंजित भी माना जाता है।
- आधुनिक इतिहासकारों का मत — नालंदा का ह्रास बख्तियार से पहले ही प्रारम्भ हो गया था; बौद्ध धर्म की आंतरिक कमजोरियाँ भी उत्तरदायी थीं।
- पुरातात्विक साक्ष्य — उत्खनन में जले अवशेष मिले हैं जो विध्वंस की पुष्टि करते हैं।
- Mains में लिखें — एकपक्षीय दृष्टिकोण से बचें; बहुकारणीय विश्लेषण प्रस्तुत करें।
दिल्ली सल्तनत काल में बिहार (1206–1526 ई.)
दिल्ली सल्तनत काल में बिहार एक प्रांत (इक्ता/सूबा) के रूप में शासित था। केंद्र की राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा प्रभाव बिहार पर पड़ता था। इस काल में बिहार ने अनेक स्वतंत्र अफगान सरदारों, तुर्क सूबेदारों तथा हिंदू राजाओं के संघर्ष का साक्ष्य किया।
| काल/वंश | बिहार में प्रशासन | प्रमुख घटनाएँ | BPSC महत्व |
|---|---|---|---|
| 1 दास वंश 1206–1290 | इक्ता प्रणाली — सूबेदार नियुक्त | बख्तियार के उत्तराधिकारी — अली मर्दान, इज्जुद्दीन तुगरल तुगान खान। स्थानीय विद्रोह। | ★★★ |
| 2 खिलजी वंश 1290–1320 | अलाउद्दीन का सुदृढ़ नियंत्रण | बिहार में मूल्य नियंत्रण लागू। अफगान सरदारों को दबाया। मलिक इब्राहीम — बिहार सूबेदार। | ★★ |
| 3 तुगलक वंश 1320–1414 | सूबेदारी — केंद्र से अर्ध-स्वतंत्र | फिरोज तुगलक का बिहार दौरा। जौनपुर सल्तनत का प्रभाव बिहार के पूर्वी क्षेत्र पर। | ★★★ |
| 4 सैय्यद-लोदी 1414–1526 | अफगान सरदारों का बढ़ता प्रभाव | बहलूल लोदी का बिहार पर नियंत्रण। जौनपुर का पतन (1479)। शेरखान (शेरशाह) का उदय। | ★★★★ |
जौनपुर सल्तनत का बिहार पर प्रभाव (1394–1479 ई.)
फिरोज तुगलक के पुत्र मलिक सरवर (ख्वाजा-ए-जहाँ) ने 1394 ई. में जौनपुर (उत्तर प्रदेश) में स्वतंत्र सल्तनत स्थापित की। जौनपुर ने बिहार के पश्चिमी भाग पर प्रभाव बनाए रखा। हुसैन शाह शर्की (अंतिम शासक) ने बिहार में विस्तार का प्रयास किया किंतु 1479 ई. में बहलूल लोदी ने जौनपुर जीत लिया।
सल्तनत काल में बिहार के अनेक हिंदू राजाओं ने केंद्रीय सत्ता को चुनौती दी। ये राजा मुख्यतः बिहार के दक्षिणी पहाड़ी क्षेत्र तथा उत्तरी तराई में सक्रिय थे।
- तिरहुत (मिथिला) के राजा — ओइनवार वंश ने दिल्ली की अधीनता स्वीकार नहीं की; विद्यापति (महाकवि, “मैथिल कोकिल”) इसी काल में हुए।
- पालामू के चेरो राजा — छोटानागपुर क्षेत्र में स्वतंत्र शासन; मुगल काल में भी संघर्ष जारी रहा।
- बिहार के दक्षिण में रक्सेल राजपूत — सल्तनत काल में अर्ध-स्वतंत्र।
- विद्यापति (1352–1448) — तिरहुत में रहकर मैथिली में काव्य रचना; “अभिनव जयदेव” कहलाए; शिव-शक्ति भक्ति के प्रतीक।
शेरशाह सूरी — बिहार का महान पुत्र (1486–1545 ई.)
शेरशाह सूरी का नाम भारतीय इतिहास में सबसे कुशल प्रशासकों में आता है। वे बिहार के सासाराम (रोहतास जिले) से थे और उन्होंने मात्र 5 वर्ष के अल्प शासनकाल में ऐसे सुधार किए जो अकबर के लिए भी प्रेरणास्रोत बने। BPSC Prelims एवं Mains — दोनों में शेरशाह सूरी से सर्वाधिक प्रश्न पूछे जाते हैं।
शेरशाह सूरी के प्रमुख सुधार
चाँदी का रुपया (178 ग्रेन) एवं ताँबे का दाम चलाया। आधुनिक भारतीय मुद्रा का पूर्वज। सोने का मोहर भी प्रचलित। एकसमान वजन और शुद्धता।
सड़क-ए-आजम — पेशावर से सोनारगाँव (बंगाल) तक; 1500 मील लंबी। हर 2 कोस पर सराय; पेड़, कुएँ, मस्जिद। 1700 सरायें बनाईं।
पट्टा (किसान को भूमि-अधिकार पत्र) एवं कबूलियत (किसान की राज्य से संविदा)। मसाहत (जमीन की माप) — उपज का 1/3 भाग राजकीय कर।
घुड़सवार डाक प्रणाली — हर सराय पर घोड़े तैयार। सूचना एवं आदेश शीघ्र पहुँचाना। गुप्तचर व्यवस्था का भाग।
स्वयं प्रजा की फरियाद सुनते थे। अब्बास खान सर्वानी (तारीख-ए-शेरशाही) के अनुसार न्याय अंधा नहीं था। कानूनगो (स्थानीय राजस्व अधिकारी) नियुक्त किए।
सासाराम मकबरा (बिहार) — अफगानी-भारतीय शैली; झील के बीच स्थित; अष्टकोणीय संरचना। रोहतास किला (बिहार) — अभेद्य सैनिक दुर्ग। किला-ए-कुहना मस्जिद (दिल्ली)।
- भूराजस्व: शेरशाह का पट्टा-कबूलियत → अकबर का दहसाला बंदोबस्त (टोडरमल के माध्यम से) का आधार।
- सड़क व्यवस्था: शेरशाह की GT Road → मुगल साम्राज्य का उपयोग।
- सिक्का: शेरशाह का चाँदी रुपया → अकबर ने जारी रखा।
- सैन्य सुधार: शेरशाह का दाग-हुलिया → अकबर की मनसबदारी का पूर्वज।
- अंतर: शेरशाह ने 5 वर्ष में किया; अकबर को 50 वर्ष मिले।
मुगल काल में बिहार (1556–1707 ई.)
मुगल साम्राज्य में बिहार एक महत्वपूर्ण सूबा था। पटना (अजीमाबाद) मुगल बिहार की राजधानी थी। यह काल बिहार के लिए आर्थिक समृद्धि, व्यापारिक उन्नति तथा धार्मिक-सांस्कृतिक विविधता का काल था।
मुगल काल में बिहार के प्रमुख सूबेदार
| सूबेदार | काल | विशेषता |
|---|---|---|
| मुनइम खान | 1556–1575 | बिहार में मुगल शासन सुदृढ़ किया; अफगान विद्रोह दबाया। |
| राजा मान सिंह | 1589–1604 | अकबर का प्रमुख सेनापति; बिहार-बंगाल-उड़ीसा का सूबेदार; पटना में राजमहल बनाया। |
| इस्लाम खान | 1608–1613 | बंगाल-बिहार का संयुक्त सूबेदार; बारो-भुईयाँ विद्रोह दबाया। |
| शाहजादा अजीम | 1703–1712 | औरंगजेब का पोता; पटना का नाम “अजीमाबाद” रखा; इस काल में यूरोपीय व्यापारियों का आगमन। |
बिहार में अफगान विद्रोह
मुगल बिहार में अफगान सरदारों ने बार-बार विद्रोह किए। दाऊद खान कर्रानी (बंगाल-बिहार का स्वतंत्र सुल्तान) ने अकबर की अधीनता नकारी। 1576 ई. में राजमहल (तुकारोई) के युद्ध में मुगल सेनापति मुनइम खान ने दाऊद को पराजित किया। बिहार पूर्णतः मुगल साम्राज्य में मिला।
मुगल काल में बिहार की आर्थिक समृद्धि
बिहार में सूफी एवं भक्ति आंदोलन
मध्यकालीन बिहार में सूफी संतों एवं भक्ति कवियों ने हिंदू-मुस्लिम सामाजिक सेतु का निर्माण किया। बिहार का मनेर (पटना), बिहारशरीफ (नालंदा) तथा पटना साहिब इस काल के प्रमुख धार्मिक केंद्र थे जो आज भी सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक हैं।
शेख शर्फुद्दीन यहया मनेरी
1263–1381 ई. | फिरदौसी सिलसिलामखदूम शाह दौलत
16वीं–17वीं सदी | चिश्ती सिलसिलाशेख बिहारी (बिहारशरीफ)
14वीं सदी | सुहरावर्दी सिलसिलाशेख मुज़फ्फर (हाजीपुर)
15वीं सदी | चिश्ती सिलसिलामध्यकालीन बिहार की अर्थव्यवस्था एवं समाज
मध्यकालीन बिहार की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान थी, परंतु व्यापार-वाणिज्य भी समृद्ध था। गंगा मार्ग के कारण बिहार पूर्व-पश्चिम व्यापार का केंद्र था। पटना — रेशम, नील, अफीम, शोरा (नमक पेट्रे) का महत्वपूर्ण बाजार था।
प्रमुख व्यापारिक वस्तुएँ
- नील (Indigo) — चंपारण, तिरहुत; यूरोप को निर्यात।
- अफीम — पटना केंद्र; डच-ब्रिटिश व्यापार।
- रेशम — भागलपुर (टसर रेशम); बंगाल से आगे निर्यात।
- शोरा (Saltpetre) — बारूद का कच्चा माल; यूरोपीय खरीदार।
- चावल — बिहार का चावल पूर्वी व्यापार में महत्वपूर्ण।
- सूती वस्त्र — गया, औरंगाबाद; स्थानीय बाजार।
यूरोपीय व्यापारियों का आगमन
| कंपनी | पटना में कोठी | प्रमुख वस्तु |
|---|---|---|
| डच (VOC) | 1632 ई. | शोरा, रेशम |
| ब्रिटिश (EIC) | 1620 के दशक | नील, अफीम, शोरा |
| फ्रांसीसी | 17वीं सदी | नील, मसाले |
मध्यकालीन बिहार का सामाजिक ढाँचा
मध्यकालीन बिहार की समाज-व्यवस्था जटिल थी। हिंदू वर्णाश्रम, इस्लामी सामाजिक मानदंड एवं स्थानीय जनजातीय परंपराएँ साथ-साथ चलती रहीं।
- उच्च वर्ग — तुर्क-अफगान अमीर, हिंदू राजपूत जमींदार, ब्राह्मण पुजारी-विद्वान।
- व्यापारी वर्ग — बनिया, मारवाड़ी, बंगाली व्यापारी; यूरोपीय व्यापारी।
- किसान वर्ग — कुर्मी, कोइरी, भूमिहार — कृषि की रीढ़।
- शिल्पकार — जुलाहा (कपड़ा), कुम्हार, लोहार — ग्रामीण अर्थव्यवस्था।
- दास प्रथा — फिरोज तुगलक काल में दास प्रथा का प्रसार; बिहार से भी दास मंगाए जाते थे।
- महिलाएँ — विद्यापति की कविता में स्त्री-सौंदर्य; पर्दा प्रथा मुस्लिम समाज में; हिंदू समाज में भी स्त्री-स्वतंत्रता सीमित।
मुगल बिहार का पतन एवं ब्रिटिश प्रवेश (1707–1765 ई.)
औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद बिहार में नवाबी शासन स्थापित हुआ। बंगाल के नवाबों के अधीन बिहार का प्रशासन कमजोर होता गया। अंततः 1764 ई. में बक्सर युद्ध (बिहार में ही) और 1765 ई. में बंगाल दीवानी से बिहार ब्रिटिश अधिकार में आ गया।


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