बिहार के अभिलेखीय स्रोत: अशोक के शिलालेख
मौर्य साम्राज्य की पत्थर पर लिखी आवाज़ — BPSC Prelims & Mains के लिए सम्पूर्ण अध्ययन
परिचय एवं ऐतिहासिक महत्व
बिहार के अभिलेखीय स्रोतों में अशोक के शिलालेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। BPSC परीक्षा की दृष्टि से ये अभिलेख मौर्यकालीन प्रशासन, धर्म-नीति एवं सामाजिक स्थिति को समझने के प्राथमिक स्रोत हैं।
अशोक (राज्यकाल: 269–232 ईपू) मौर्य वंश का तीसरा सम्राट था। कलिंग युद्ध (261 ईपू) के पश्चात उसने बौद्ध धर्म अपनाया और अपने साम्राज्य में धम्म (नैतिक आचरण) का प्रचार-प्रसार शुरू किया। इसी प्रचार का माध्यम बने उसके प्रसिद्ध अभिलेख — पत्थर की चट्टानों, स्तम्भों एवं गुहाओं पर उत्कीर्ण आदेश और संदेश।
अभिलेखों की खोज का इतिहास
अशोक के अभिलेख सदियों तक अपठित रहे क्योंकि उनकी लिपि — ब्राह्मी — विस्मृत हो चुकी थी। 1837 ई. में ब्रिटिश अधिकारी एवं भाषाशास्त्री James Prinsep ने ब्राह्मी लिपि का सफलतापूर्वक पाठोद्धार किया और दिल्ली के स्तम्भ लेखों को पढ़ा। इससे भारतीय इतिहास के एक नए अध्याय का उद्घाटन हुआ। इससे पहले 1750 के दशक में ये शिलालेख देखे और दर्ज किए गए थे, परन्तु उनका अर्थ अज्ञात था।
अभिलेखों की लिपि, भाषा एवं वर्गीकरण
अशोक ने अपने अभिलेखों में विभिन्न लिपियों एवं भाषाओं का प्रयोग किया — यह इस बात का प्रमाण है कि वे अपना संदेश साम्राज्य के प्रत्येक नागरिक तक पहुँचाना चाहते थे।
प्रयुक्त लिपियाँ
| लिपि | क्षेत्र | विशेषता | दिशा |
|---|---|---|---|
| 1 ब्राह्मी | भारत का अधिकांश भाग (बिहार सहित) | सर्वाधिक प्रचलित; आधुनिक भारतीय लिपियों की जननी | बाएँ से दाएँ |
| 2 खरोष्ठी | उत्तर-पश्चिम (पाकिस्तान, अफगानिस्तान) | शाहबाजगढ़ी, मानसेहरा अभिलेख | दाएँ से बाएँ |
| 3 अरामाइक / ग्रीक | कंधार (अफगानिस्तान) | द्विभाषी अभिलेख; विदेशी प्रभाव | — |
प्रयुक्त भाषाएँ
अधिकांश अभिलेखों की भाषा प्राकृत है — जो उस काल की जन-भाषा थी। पश्चिमोत्तर क्षेत्र के अभिलेखों में अरामाइक एवं यूनानी (Greek) भाषा का भी प्रयोग हुआ है। अशोक ने संस्कृत का प्रयोग नहीं किया — यह जानबूझकर किया गया निर्णय था ताकि आम जनता इन्हें समझ सके।
अभिलेखों का वर्गीकरण
शिला अभिलेख (Rock Edicts) — विस्तृत विवरण
14 प्रमुख शिला लेख (Major Rock Edicts) अशोक के विचारों एवं नीतियों का व्यापक संग्रह हैं। ये उसके राज्याभिषेक के लगभग 12 से 14 वर्ष बाद (लगभग 257–255 ईपू) जारी किए गए।
| लेख संख्या | मुख्य विषय | BPSC महत्व |
|---|---|---|
| प्रथम (I) | पशु-बलि का निषेध; अशोक के महल में भोजन हेतु पशुवध बंद | ⭐⭐⭐ |
| द्वितीय (II) | चिकित्सा सुविधाएँ — मनुष्य और पशुओं के लिए; जड़ी-बूटियाँ रोपना | ⭐⭐⭐ |
| तृतीय (III) | राजुक, प्रादेशिक, युत पदाधिकारियों का दौरा (हर 5 वर्ष में); धम्म प्रचार | ⭐⭐⭐ |
| चतुर्थ (IV) | भेरीघोष के स्थान पर धम्मघोष; युद्ध त्याग की घोषणा | ⭐⭐⭐⭐ |
| पञ्चम (V) | धम्ममहामात्र पद की स्थापना; सभी सम्प्रदायों की देखभाल | ⭐⭐⭐⭐⭐ |
| षष्ठ (VI) | राजा की सदैव उपलब्धता; जनकल्याण सर्वोपरि | ⭐⭐ |
| सप्तम (VII) | सभी सम्प्रदायों में सहिष्णुता एवं आत्म-संयम की इच्छा | ⭐⭐⭐ |
| अष्टम (VIII) | अशोक की पहली धम्मयात्रा — बोधगया (बोधिवृक्ष दर्शन) | ⭐⭐⭐⭐ |
| नवम (IX) | जन्म, विवाह संस्कारों की आलोचना; धम्म-अनुष्ठान श्रेष्ठ | ⭐⭐ |
| दशम (X) | यश एवं कीर्ति की निंदा; धम्म पालन ही सच्ची महिमा | ⭐⭐ |
| एकादश (XI) | धम्म का दान — सर्वश्रेष्ठ दान | ⭐⭐ |
| द्वादश (XII) | सभी सम्प्रदायों का सम्मान; सारप्रवृद्धि (essential growth) का आह्वान | ⭐⭐⭐ |
| त्रयोदश (XIII) | कलिंग युद्ध का पश्चाताप; धम्मविजय की घोषणा; विदेशी राजाओं का उल्लेख | ⭐⭐⭐⭐⭐ |
| चतुर्दश (XIV) | अभिलेखों के प्रसार का कारण — संक्षिप्त विस्तृत दोनों संस्करण | ⭐⭐ |
13वाँ शिलालेख BPSC परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसमें अशोक ने कलिंग युद्ध के दौरान हुई तबाही का हृदयस्पर्शी वर्णन किया है — डेढ़ लाख लोग बन्दी बनाए गए, एक लाख मारे गए और इससे भी अधिक मृत्यु को प्राप्त हुए। इसी के बाद अशोक ने भेरीघोष (युद्ध-नगाड़े) का त्याग कर धम्मघोष (धर्म-प्रचार की आवाज़) अपनाने की घोषणा की।
लघु शिला लेख (Minor Rock Edicts)
इनकी संख्या कम है परन्तु महत्व अधिक है। इनमें अशोक ने व्यक्तिगत रूप से बताया कि उसने बौद्ध धर्म अपनाया, संघ से जुड़ा और धम्म के प्रचार में सक्रिय हुआ। मास्की (कर्नाटक) के लघु शिला लेख में पहली बार “अशोक” नाम का उल्लेख मिला, जिससे इन अभिलेखों के प्रवर्तक की पहचान निश्चित हुई। इससे पहले ये अभिलेख केवल “देवानांपिय पियदस्सि” (देवताओं के प्रिय, प्रियदर्शी) के नाम से जाने जाते थे।
स्तम्भ लेख (Pillar Edicts) — विस्तृत विवरण
स्तम्भ लेख अशोक के राज्यकाल के उत्तरार्ध में (लगभग 242–232 ईपू) जारी किए गए। ये पॉलिश किए गए बलुआ पत्थर के विशाल स्तम्भों पर उत्कीर्ण हैं और तकनीकी उत्कृष्टता के अद्भुत नमूने हैं।
| स्तम्भ लेख | स्थान | मुख्य विषय |
|---|---|---|
| प्रथम (I) | दिल्ली-मेरठ / दिल्ली-टोपरा | धम्म का उद्देश्य |
| द्वितीय (II) | दिल्ली-मेरठ | धम्म की परिभाषा |
| तृतीय (III) | दिल्ली-मेरठ | बुराइयों से बचने का आदेश |
| चतुर्थ (IV) | दिल्ली-मेरठ | राजुकों को अधिकार — जनता की भलाई के लिए |
| पञ्चम (V) | दिल्ली-मेरठ | जीवों को मुक्त करना; हत्या पर रोक (25 प्रजातियों की रक्षा) |
| षष्ठ (VI) | दिल्ली-मेरठ | पिछले 5 स्तम्भ लेखों का सारांश |
| सप्तम (VII) | दिल्ली-टोपरा (एकमात्र पूर्ण) | धम्म की प्रगति का सम्पूर्ण विवरण; सभी सम्प्रदायों को आदर |
लघु स्तम्भ लेख (Minor Pillar Edicts) — बिहार से सम्बन्धित
बिहार के प्रमुख अशोक अभिलेख स्थल
बिहार मौर्य साम्राज्य का केन्द्र था — पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) राजधानी थी। इसलिए बिहार में अशोक के अभिलेखों की संख्या सर्वाधिक है और ये ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
1. बराबर की गुफाएँ (Barabar Caves), गया जिला
ये भारत की सबसे प्राचीन जीवित चट्टान-कटी गुफाएँ हैं। अशोक ने ये गुफाएँ आजीविक सम्प्रदाय (Ajivikas) को दान में दी थीं। यहाँ चार गुफाएँ हैं — कर्णचौपड़, चोपड़, सुदामा, विश्वामित्र। इनकी भीतरी दीवारें दर्पण जैसी चमकदार पॉलिश से युक्त हैं — मौर्यकालीन शिल्पकला का उत्कृष्ट नमूना। अशोक के गुहा अभिलेख यहाँ उत्कीर्ण हैं जिनमें इन गुफाओं को आजीविकों को दान देने का उल्लेख है।
2. लौरिया-नंदनगढ़ (Lauriya-Nandangarh), पश्चिम चम्पारण
यहाँ का अशोक स्तम्भ 18.3 मीटर ऊँचा है और आज भी अपने मूल स्थान पर खड़ा है। यह बिहार में सर्वोत्तम संरक्षित अशोक स्तम्भ है। शीर्ष पर सिंह की मूर्ति सुरक्षित है। यहाँ पहले 6 प्रमुख स्तम्भ लेख उत्कीर्ण हैं।
3. लौरिया-अरेराज (Lauriya-Areraj), पूर्वी चम्पारण
यह स्तम्भ भी अपने मूल स्थान पर है। ऊँचाई लगभग 10.6 मीटर। यहाँ का स्तम्भ लेख अशोक के धम्म-सिद्धान्तों को प्रतिबिम्बित करता है।
4. रामपुरवा (Rampurva), पश्चिम चम्पारण
1876 ई. में खोजे गए। यहाँ दो स्तम्भ थे — एक पर बैल शीर्ष (Zebu Bull Capital) और दूसरे पर सिंह शीर्ष। वर्तमान में ये दोनों शीर्ष नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में प्रदर्शित हैं।
5. पाटलिपुत्र / कुम्हरार (Kumhrar, Patna)
हालाँकि यहाँ कोई बड़ा उत्कीर्ण शिलालेख नहीं मिला, परन्तु उत्खनन में 80-स्तम्भीय महासभागार (Asokan Palace Hall) के अवशेष मिले हैं जो मौर्यकालीन प्रशासन के प्रमाण हैं। पटना के आसपास कई अभिलेख-खंड प्राप्त हुए हैं।
6. बोधगया (Bodh Gaya), गया जिला
8वें प्रमुख शिला लेख में अशोक ने बोधगया की अपनी धम्मयात्रा का उल्लेख किया है जहाँ उसने बोधिवृक्ष के दर्शन किए। बोधगया में अशोक द्वारा निर्मित एक वज्रासन (Diamond Throne) के अवशेष मिले हैं।
| स्थल | जिला | अभिलेख प्रकार | विशेषता |
|---|---|---|---|
| बराबर गुफाएँ | गया | गुहा अभिलेख | आजीविकों को दान; सबसे प्राचीन गुफाएँ |
| लौरिया-नंदनगढ़ | पश्चिम चम्पारण | स्तम्भ लेख (6 लेख) | 18.3 मी. ऊँचा; मूल स्थान पर खड़ा |
| लौरिया-अरेराज | पूर्वी चम्पारण | स्तम्भ लेख | मूल स्थान पर; 10.6 मी. ऊँचा |
| रामपुरवा | पश्चिम चम्पारण | स्तम्भ लेख | बैल शीर्ष + सिंह शीर्ष; राष्ट्रपति भवन में |
| बोधगया | गया | सन्दर्भित (8वें लेख में) | धम्मयात्रा का प्रमाण |
| वैशाली | वैशाली | स्तम्भ (लेख आंशिक) | अशोक स्तम्भ; लायन पिलर |
धम्म का संदेश — विषयवस्तु विश्लेषण
अशोक के अभिलेखों का केन्द्रीय विषय है — धम्म। यह बौद्ध धर्म के समान नहीं बल्कि एक व्यापक नैतिक संहिता है जिसे सभी सम्प्रदायों के लोग पालन कर सकते थे।
धम्म के प्रमुख तत्व
पशु-बलि का निषेध; शिकार पर रोक; जीवों की रक्षा। 5वें स्तम्भ लेख में 25 प्रजातियों को संरक्षित घोषित किया।
सभी धर्मों का सम्मान। 12वें शिला लेख में स्पष्ट — अपने धर्म की अत्यधिक प्रशंसा और दूसरों की निन्दा न करें।
बड़ों का आदर; शिक्षकों की सेवा; दासों एवं सेवकों के साथ उचित व्यवहार।
सड़कों पर छाँव के लिए वृक्षारोपण; कुएँ खुदवाना; विश्रामगृह; मनुष्यों एवं पशुओं के लिए चिकित्सालय।
मृत्युदंड पाए व्यक्तियों को 3 दिन की मोहलत; राजुकों को न्यायिक अधिकार; जेल सुधार।
धम्ममहामात्र पदाधिकारियों की नियुक्ति। पड़ोसी देशों — सीरिया, मिस्र, मेसीडोनिया तक धम्मदूत भेजे।
धम्म-प्रचार के माध्यम
- धम्ममहामात्र: 5वें शिला लेख में उल्लिखित विशेष पदाधिकारी जो सभी सम्प्रदायों के कल्याण की देखरेख करते थे।
- राजुक: ग्रामीण न्याय एवं प्रशासन के अधिकारी जिन्हें 4वें स्तम्भ लेख में विशेष अधिकार दिए गए।
- धम्मयात्राएँ: शिकार यात्राओं के स्थान पर धर्म-तीर्थ यात्राएँ — 8वें शिला लेख में उल्लेख।
- अभिलेख: चट्टानों एवं स्तम्भों पर उत्कीर्ण आदेश — सार्वजनिक स्थानों पर पठनीय।
- धम्मदूत: विदेशी राज्यों में भेजे गए दूत। 13वें शिला लेख में एण्टियोकस (सीरिया), टॉलमी (मिस्र), एण्टीगोनस (मेसीडोनिया) का नाम है।
- घोषक (Announcer): धम्म का मौखिक प्रचार करने वाले अधिकारी।
अभिलेखों का ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक महत्व
अशोक के शिलालेख केवल धार्मिक दस्तावेज नहीं हैं — ये मौर्य साम्राज्य के प्रशासनिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के अमूल्य प्राथमिक स्रोत हैं।
- प्रशासनिक इकाइयों की जानकारी — राज्य, विषय, जनपद
- पदाधिकारियों के नाम — राजुक, युत, प्रादेशिक, धम्ममहामात्र
- कल्याण-राज्य की अवधारणा का प्रमाण
- सड़क-निर्माण, कुओं, विश्रामगृहों का उल्लेख
- बौद्ध धर्म के प्रसार का इतिहास
- आजीविक एवं ब्राह्मण धर्म का उल्लेख
- पशु-चिकित्सा का सबसे प्राचीन प्रमाण
- धार्मिक सहिष्णुता की परम्परा
- मौर्य साम्राज्य की सीमाओं का प्रमाण
- 13वें लेख में 5 यवन राजाओं का उल्लेख — विदेश नीति का प्रमाण
- कलिंग युद्ध की पुष्टि — 261 ईपू
- पड़ोसी जनजातियों — अटवी, चोल, पाण्ड्य का उल्लेख
- ब्राह्मी लिपि का सबसे विस्तृत प्राचीन प्रयोग
- प्राकृत भाषा का राजकीय प्रयोग
- James Prinsep की खोज से भारतीय पुरालेखशास्त्र का जन्म
- बहुभाषीय राज्य-नीति का प्रमाण
🎯 BPSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण
आलोचनात्मक दृष्टिकोण एवं सीमाएँ
अशोक के अभिलेख भले ही ऐतिहासिक दृष्टि से अमूल्य हों, परन्तु एक समालोचनात्मक इतिहासकार की दृष्टि से इनकी सीमाओं को समझना आवश्यक है।
- एकतरफा विवरण: ये अभिलेख स्वयं अशोक द्वारा जारी किए गए थे — इसलिए ये राज्य की आधिकारिक दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। विरोधी दृष्टिकोण अनुपस्थित है।
- अतिशयोक्ति: कलिंग युद्ध में मरने वालों की संख्या (1,00,000+) और बंदियों (1,50,000) का आँकड़ा अतिरंजित हो सकता है।
- व्यावहारिक पालन की अनिश्चितता: अभिलेखों में दिए आदेश वास्तव में कितने पालन हुए — इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं।
- भाषाई अनुवाद की समस्या: प्राकृत से आधुनिक अनुवाद में कुछ शब्दों के अर्थ विवादित हैं — जैसे “धम्म” शब्द की व्याख्या।
- व्यापकता की कमी: ये अभिलेख मुख्यतः धार्मिक नीति पर केन्द्रित हैं। आर्थिक नीति, युद्ध-नीति का विस्तृत विवरण अनुपस्थित है।
इतिहासकारों के मत
सारांश एवं परीक्षा उपयोगी त्वरित तथ्य
त्वरित संशोधन तालिका (Quick Revision)
पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQ) एवं Practice MCQ
BPSC Prelims एवं Mains में अशोक के अभिलेखों से प्रश्न बार-बार पूछे गए हैं। नीचे PYQ आधारित प्रश्न और Interactive MCQ दिए गए हैं।


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