बिहार का उत्तर-गुप्त काल
परिचय एवं कालखंड की समय-सीमा — गुप्त साम्राज्य के पतन से पाल वंश के उदय तक का संक्रमण-युग
उत्तर-गुप्त काल का आरम्भ
उत्तर-गुप्त काल का अंत
अनुमानित अवधि
भौगोलिक केन्द्र
परिचय एवं महत्व — उत्तर-गुप्त काल क्या है?
बिहार का उत्तर-गुप्त काल (Post-Gupta Period) BPSC परीक्षा की दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाला कालखंड है, जो गुप्त साम्राज्य के विघटन के पश्चात् लगभग 6वीं शताब्दी ई. के मध्य से प्रारम्भ होकर 8वीं शताब्दी ई. के मध्य तक चलता है।
संक्रमण-काल
अनुमानित समय
BPSC में महत्व
भारतीय इतिहास में गुप्त साम्राज्य (Gupta Empire) को “स्वर्ण युग” (Golden Age) कहा जाता है। इसके पतन के पश्चात् जो राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हुई, उसे भरने के लिए बिहार (मगध) क्षेत्र में अनेक स्थानीय एवं क्षेत्रीय राजवंशों ने सत्ता स्थापित की। इस काल में मौखरि वंश, परवर्ती गुप्त वंश (Later Guptas), गौड़ वंश तथा हर्षवर्धन के साम्राज्य का प्रभाव बिहार पर पड़ा। इसके बाद पाल वंश के उदय (लगभग 750 ई.) के साथ इस काल का समापन माना जाता है।
“उत्तर-गुप्त काल” का अर्थ है — गुप्त काल के बाद का समय। इसे “Post-Gupta Period” या “Later Gupta Period” भी कहते हैं। किन्तु “Later Guptas” (परवर्ती गुप्त वंश) एक विशेष वंश का नाम है, जबकि “Post-Gupta Period” एक व्यापक कालखंड है। BPSC प्रश्नों में इस अंतर को समझना आवश्यक है।
उत्तर-गुप्त काल की पहचान क्यों आवश्यक है?
यह काल बिहार के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी काल में नालंदा विश्वविद्यालय का विकास हुआ, बौद्ध धर्म का प्रसार जारी रहा, और बिहार पुनः भारत की राजनीति का केन्द्र बनने की दिशा में अग्रसर हुआ। हर्षवर्धन (606–647 ई.) के काल में कन्नौज साम्राज्य का विस्तार बिहार तक हुआ। इस प्रकार यह काल गुप्त स्वर्ण युग से पाल साम्राज्य के बौद्ध युग तक का सेतु है।
BPSC Prelims में “उत्तर-गुप्त काल” की समय-सीमा से सम्बंधित प्रश्न प्रायः 550 ई. से 750 ई. के रूप में पूछे जाते हैं। कभी-कभी “गुप्त साम्राज्य का पतन कब हुआ?” या “पाल वंश की स्थापना कब हुई?” जैसे अप्रत्यक्ष प्रश्नों के माध्यम से इसी सीमा को पूछा जाता है।
गुप्त साम्राज्य का पतन — उत्तर-गुप्त काल के उद्भव की पृष्ठभूमि
गुप्त साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया 5वीं शताब्दी के अंत से प्रारम्भ हो गई थी और 6वीं शताब्दी के मध्य तक (लगभग 550 ई.) यह साम्राज्य पूर्णतः विघटित हो गया। इसी विघटन ने बिहार में उत्तर-गुप्त काल को जन्म दिया।
गुप्त साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण
मध्य एशिया के हूणों (Hunas) ने स्कंदगुप्त (455–467 ई.) के काल में भारत पर आक्रमण किये। हालाँकि स्कंदगुप्त ने उन्हें पराजित किया, किन्तु साम्राज्य की आर्थिक एवं सैनिक शक्ति क्षीण हो गई।
स्कंदगुप्त के पश्चात् गुप्त वंश में उत्तराधिकार की लड़ाई छिड़ गई। पुरुगुप्त, बुधगुप्त, नरसिंहगुप्त, कुमारगुप्त द्वितीय जैसे अनेक शासक हुए जो दुर्बल सिद्ध हुए।
केन्द्रीय सत्ता कमजोर होते ही सामंत राजाओं ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। मौखरि वंश (Maukharis) और परवर्ती गुप्त वंश (Later Guptas) ने बिहार-उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र राज्य स्थापित किये।
लगातार युद्धों एवं हूण आक्रमणों के कारण साम्राज्य की आर्थिक नींव कमजोर हुई। व्यापार मार्गों पर नियंत्रण समाप्त हुआ और राजकोष रिक्त हो गया।
अनेक छात्र “Later Guptas” (परवर्ती गुप्त वंश) को मूल गुप्त वंश का ही हिस्सा मान लेते हैं। परवर्ती गुप्त एक अलग वंश था जो मूल गुप्त वंश से भिन्न था — यह मगध में स्वतंत्र रूप से शासन करता था और अपने को गुप्त वंश का वंशज बताता था, परन्तु ऐतिहासिक साक्ष्य इसकी पुष्टि नहीं करते।
| गुप्त शासक | काल (लगभग) | महत्वपूर्ण घटना | BPSC प्रासंगिकता |
|---|---|---|---|
| 1 स्कंदगुप्त | 455–467 ई. | हूण आक्रमण का प्रतिरोध | पतन की शुरुआत — Prelims |
| 2 बुधगुप्त | 477–495 ई. | साम्राज्य का संकुचन | कमजोर केंद्र — Mains |
| 3 नरसिंहगुप्त | 495–530 ई. | हूण (मिहिरकुल) से पराजय | हूण सम्पर्क — Prelims |
| 4 विष्णुगुप्त | 540–550 ई. | अंतिम गुप्त शासक | उत्तर-गुप्त काल का आरम्भ |
उत्तर-गुप्त काल की समय-सीमा का विस्तृत निर्धारण
उत्तर-गुप्त काल की समय-सीमा के निर्धारण में इतिहासकारों में मतभेद है। BPSC परीक्षा की दृष्टि से लगभग 550 ई. से 750 ई. की सीमा सबसे अधिक स्वीकृत एवं परीक्षोपयोगी है।
आरम्भिक सीमा — लगभग 550 ई.
उत्तर-गुप्त काल का आरम्भ गुप्त साम्राज्य के अंतिम पतन से जोड़ा जाता है। गुप्त वंश के अंतिम ज्ञात शासक विष्णुगुप्त का काल लगभग 540–550 ई. माना जाता है। उनके पश्चात् मगध (बिहार) में केन्द्रीय गुप्त सत्ता का अस्तित्व समाप्त हो गया और स्थानीय वंशों ने राज्य स्थापित कर लिये। इसीलिए 550 ई. को उत्तर-गुप्त काल की प्रारम्भिक सीमा माना जाता है।
R.C. Majumdar एवं अन्य इतिहासकार गुप्त साम्राज्य के पतन को 6वीं शताब्दी के मध्य (लगभग 550 ई.) में मानते हैं। कुछ विद्वान इसे 467 ई. (स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद) से ही प्रारम्भ मानते हैं क्योंकि उसके बाद साम्राज्य प्रभावी रूप से कभी पुनर्स्थापित नहीं हो सका। BPSC की दृष्टि से 550 ई. ही मानक तिथि है।
एक अन्य मत के अनुसार 480 ई. के आसपास जब हूण आक्रमणकारी पश्चिमी भारत में स्थायी हो गए, तभी से व्यावहारिक रूप से उत्तर-गुप्त काल का आरम्भ हुआ। किन्तु मगध (बिहार) में गुप्त सत्ता का प्रभाव 6वीं शताब्दी के मध्य तक बना रहा।
अंतिम सीमा — लगभग 750 ई.
उत्तर-गुप्त काल की अंतिम सीमा पाल वंश की स्थापना (लगभग 750 ई.) से निर्धारित होती है। गोपाल (Gopala) ने लगभग 750 ई. में पाल वंश की स्थापना की और बिहार-बंगाल पर अपना अधिकार स्थापित किया। पाल वंश के उदय के साथ बिहार में एक नया सुस्थिर साम्राज्य आया जिसने उत्तर-गुप्त काल की अस्थिरता का अंत किया।
पाल वंश की स्थापना गोपाल ने लगभग 750 ई. में की। उनके पुत्र धर्मपाल (770–810 ई.) ने साम्राज्य को अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित किया। पाल वंश के उदय के साथ ही बिहार का उत्तर-गुप्त काल समाप्त माना जाता है। कुछ इतिहासकार हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) को भी एक सीमांक मानते हैं क्योंकि उसके बाद बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल और बढ़ गई।
पाँच – सात – पाँच – सात
आधुनिक इतिहासकार इस काल को “Dark Age” (अंधकार युग) नहीं मानते। R.S. Sharma जैसे विद्वानों का मत है कि यह काल आर्थिक विकेंद्रीकरण एवं स्थानीय संस्कृतियों के विकास का काल था। नालंदा विश्वविद्यालय की उन्नति इसी काल में हुई — अतः यह सांस्कृतिक रूप से समृद्ध काल भी था।
उत्तर-गुप्त काल के प्रमुख राजवंश एवं शासक
उत्तर-गुप्त काल (550–750 ई.) में बिहार-मगध क्षेत्र पर अनेक वंशों ने शासन किया। इनमें परवर्ती गुप्त वंश, मौखरि वंश, हर्षवर्धन का साम्राज्य एवं गौड़ शासक शशांक प्रमुख हैं।
परवर्ती गुप्त वंश (Later Guptas)
लगभग 550 – 650 ई.
मगध केंद्र
अभिलेख साक्ष्य
मौखरि वंश (Maukharis)
लगभग 550 – 606 ई.
कन्नौज राजधानी
हर्ष से पूर्व
हर्षवर्धन (Harshavardhan)
606 – 647 ई.
नालंदा संरक्षण
ह्वेन-सांग यात्रा
शशांक (Shashanka) — गौड़ राज
लगभग 600 – 625 ई.
गौड़ राज्य
बौद्ध विरोधी
बाणभट्ट की “हर्षचरित” एवं ह्वेन-सांग का यात्रा-विवरण “Si-Yu-Ki” इस काल के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत हैं। नालंदा एवं बोधगया के अभिलेख भी इस काल को समझने में सहायक हैं।
| वंश / शासक | काल | राजधानी | बिहार से सम्बन्ध |
|---|---|---|---|
| परवर्ती गुप्त वंश | 550–650 ई. | मगध (पाटलिपुत्र) | प्रत्यक्ष — मगध पर शासन |
| मौखरि वंश | 550–606 ई. | कन्नौज | अप्रत्यक्ष — उत्तर बिहार |
| शशांक (गौड़) | 600–625 ई. | कर्णसुवर्ण | मगध पर अधिकार — बोधगया |
| हर्षवर्धन | 606–647 ई. | कन्नौज | नालंदा संरक्षण, बिहार पर नियंत्रण |
| पाल वंश (गोपाल) | लगभग 750 ई. | मुंगेर / मगध | उत्तर-गुप्त काल का अंत |
उत्तर-गुप्त काल — राजनीतिक अस्थिरता एवं सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
उत्तर-गुप्त काल को केवल राजनीतिक अस्थिरता का काल मानना उचित नहीं है। इस काल में एक ओर जहाँ सत्ता-संघर्ष चला, वहीं दूसरी ओर नालंदा विश्वविद्यालय का अभूतपूर्व विकास, बौद्ध एवं हिन्दू धर्म का समानान्तर पुष्पन, तथा साहित्य व कला का उत्कर्ष भी हुआ।
🏛️ राजनीतिक विशेषताएँ
- विकेन्द्रीकरण: केन्द्रीय सत्ता समाप्त हुई और क्षेत्रीय राज्य उभरे — सामंतवाद का उदय।
- निरन्तर युद्ध: मौखरि, परवर्ती गुप्त, शशांक और हर्ष के बीच निरन्तर संघर्ष।
- विदेशी प्रभाव: हूणों के आक्रमण से उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीति प्रभावित हुई।
- कन्नौज का महत्व: इस काल में कन्नौज उत्तर भारत की राजनीति का केंद्र बना।
🎨 सांस्कृतिक उपलब्धियाँ
- नालंदा: इस काल में नालंदा विश्वविद्यालय विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र बना। ह्वेन-सांग ने यहाँ अध्ययन किया।
- बौद्ध धर्म: हर्षवर्धन के संरक्षण में बौद्ध धर्म पुनः पुष्पित हुआ।
- साहित्य: बाणभट्ट की “हर्षचरित” और “कादम्बरी” इसी काल की रचनाएँ हैं।
- वास्तुकला: नालंदा के विहारों एवं मन्दिरों का निर्माण जारी रहा।
नालंदा विश्वविद्यालय — उत्तर-गुप्त काल की सबसे बड़ी उपलब्धि
नालंदा विश्वविद्यालय (वर्तमान बिहार के नालंदा जिले में) इस काल में शिक्षा के सर्वोच्च केंद्र के रूप में स्थापित हुआ। इसे मूलतः गुप्त काल में कुमारगुप्त प्रथम ने स्थापित किया था, किन्तु उत्तर-गुप्त काल में इसका अभूतपूर्व विकास हुआ। हर्षवर्धन ने यहाँ बड़ा दान दिया। ह्वेन-सांग (629–645 ई.) और बाद में इत्सिंग (671–695 ई.) यहाँ आये। यहाँ 10,000 से अधिक छात्र और 1,500 से अधिक शिक्षक थे। यह संस्था उत्तर-गुप्त काल की अस्थिरता के बावजूद फलती-फूलती रही।
Mains में “उत्तर-गुप्त काल की विशेषताएँ” या “गुप्त पतन के बाद बिहार की स्थिति” जैसे प्रश्नों में राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ नालंदा के विकास को अवश्य शामिल करें। यह संतुलित दृष्टिकोण अंक दिलाता है।
- राजनीतिक अनिश्चितता: कोई एक सार्वभौम सत्ता न होने से प्रशासन अस्त-व्यस्त था।
- धार्मिक संघर्ष: शशांक के बौद्ध-विरोधी कृत्यों ने सामाजिक तनाव उत्पन्न किया।
- व्यापार में गिरावट: असुरक्षित मार्गों के कारण व्यापार प्रभावित हुआ।
- विदेशी आक्रमण का भय: हूणों के प्रभाव से मुक्त होने के बाद भी उत्तर-पश्चिम सीमा असुरक्षित रही।
उत्तर-गुप्त काल के प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत एवं अभिलेख
उत्तर-गुप्त काल के इतिहास-निर्माण में साहित्यिक, पुरातात्विक एवं विदेशी यात्रियों के विवरण — तीनों प्रकार के स्रोत उपयोगी हैं। BPSC Prelims में इन स्रोतों से सम्बंधित प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं।
साहित्यिक स्रोत
- हर्षचरित — बाणभट्ट द्वारा, हर्षवर्धन की जीवनी, बिहार का विवरण
- कादम्बरी — बाणभट्ट का उपन्यास, तत्कालीन समाज का चित्रण
- आर्यभटीय — आर्यभट्ट की गणित-खगोल कृति (पूर्व-काल, किन्तु प्रभाव जारी)
विदेशी यात्री
- ह्वेन-सांग (629–645 ई.) — चीनी बौद्ध भिक्षु, नालंदा में अध्ययन, “Si-Yu-Ki”
- इत्सिंग (671–695 ई.) — चीनी यात्री, नालंदा का विस्तृत विवरण
- सुंग-युन — 6वीं शताब्दी के आरम्भ का चीनी यात्री
अभिलेख एवं मुद्राएँ
- अफसड़ अभिलेख — आदित्यसेन (परवर्ती गुप्त) का, गया जिला, बिहार
- देव बरनार्क अभिलेख — परवर्ती गुप्त शासकों का उल्लेख
- नालंदा तांबे की पट्टिकाएँ — इस काल की भूमि-व्यवस्था का प्रमाण
पुरातात्विक साक्ष्य
- नालंदा के उत्खनन — इस काल की इमारतें, मूर्तियाँ एवं मठ
- बोधगया — शशांक द्वारा कटवाए बोधिवृक्ष का पुनः उगना — मठों के प्रमाण
- पाटलिपुत्र (पटना)** के उत्खनन — इस काल की परतें
— ह्वेन-सांग, Si-Yu-Ki (7वीं शताब्दी)
“हर्षवर्धन के काल में भारत आने वाले चीनी यात्री का नाम क्या था?” — ह्वेन-सांग। “अफसड़ अभिलेख किस वंश से सम्बंधित है?” — परवर्ती गुप्त वंश (आदित्यसेन)। ये प्रश्न BPSC में पूछे जा चुके हैं।
📊 सारांश एवं BPSC परीक्षा दृष्टि
🎯 BPSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण
लगभग 550 ई. — गुप्त साम्राज्य के अंतिम पतन के साथ
लगभग 750 ई. — पाल वंश (गोपाल) की स्थापना के साथ
विष्णुगुप्त (लगभग 540–550 ई.)
कर्णसुवर्ण (वर्तमान मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल)
629–645 ई. — हर्षवर्धन के काल में भारत आये
आदित्यसेन (परवर्ती गुप्त वंश) — गया, बिहार में प्राप्त
प्रश्न: “उत्तर-गुप्त काल में बिहार की राजनीतिक स्थिति का वर्णन कीजिए।” — उत्तर की रूपरेखा: (1) समय-सीमा का परिचय, (2) गुप्त पतन के कारण, (3) क्षेत्रीय शक्तियों का उदय (परवर्ती गुप्त, मौखरि, शशांक, हर्ष), (4) नालंदा का सांस्कृतिक महत्व, (5) पाल वंश के उदय से समाप्ति। प्रत्येक बिन्दु पर तिथि, शासक एवं स्रोत का उल्लेख अवश्य करें।
अभ्यास MCQ एवं विगत वर्षों के प्रश्न (PYQ)
नीचे दिये गए Interactive MCQ पर क्लिक करके अपना स्व-परीक्षण करें। विकल्प पर क्लिक करते ही उत्तर प्रकट हो जाएगा।
BPSC विगत वर्षों के प्रश्न एवं सम्भावित प्रश्न
प्र. 1: गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद मगध (बिहार) में किस वंश ने सत्ता स्थापित की?
प्र. 2: शशांक किस राज्य का शासक था? उसने बिहार में क्या उल्लेखनीय कार्य किया?
प्र. 3: उत्तर-गुप्त काल की समय-सीमा बताइए एवं इस काल के दो प्रमुख वंशों का नाम लिखिए।
प्र. 4: हर्षवर्धन का बिहार के इतिहास में क्या योगदान था?
प्र. 5: “उत्तर-गुप्त काल केवल राजनीतिक अंधकार का काल नहीं था।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
प्र. 6: पाल वंश का संस्थापक कौन था जिसके उदय से उत्तर-गुप्त काल का अंत हुआ?
BPSC Prelims में उत्तर-गुप्त काल से तिथियाँ, शासक, राजधानियाँ, स्रोत — इन चार बिन्दुओं पर अवश्य ध्यान दें। Mains में विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण रखें — केवल तथ्य नहीं, उनकी समीक्षा भी आवश्यक है। 550 ई. और 750 ई. ये दो तिथियाँ अवश्य याद रखें।

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