पुष्यमित्र शुंग — सत्ता ग्रहण, साम्राज्य विस्तार एवं यवन आक्रमणों का सामना
BPSC Prelims + Mains के लिए संपूर्ण विश्लेषण — पाटलिपुत्र (बिहार) से शासन करने वाले महान सेनापति की गाथा
परिचय — पुष्यमित्र शुंग कौन था?
पुष्यमित्र शुंग भारतीय इतिहास का वह अद्वितीय व्यक्तित्व है जो एक सेनापति से सम्राट बना। BPSC परीक्षा में बिहार के प्रमुख शासकों के अंतर्गत उसका विशेष स्थान है, क्योंकि उसने पाटलिपुत्र (आज का पटना) को अपनी राजधानी बनाकर 36 वर्षों तक शासन किया और यवन आक्रमणों से बिहार की धरती की रक्षा की।
पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण जाति से था और भारद्वाज गोत्र से संबंधित था। वह मौर्य साम्राज्य के अंतिम सम्राट बृहद्रथ मौर्य का सेनापति (Senapati / Commander-in-Chief) था। उसने 185 ईसा पूर्व में एक सैनिक तख्तापलट के माध्यम से सत्ता प्राप्त की और शुंग वंश की नींव रखी।
पुष्यमित्र के बारे में जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं — पतंजलि की महाभाष्य, बाणभट्ट की हर्षचरित, दिव्यावदान (बौद्ध ग्रंथ), कालिदास की मालविकाग्निमित्रम् और विभिन्न पुराण। ये स्रोत परस्पर विरोधाभासी भी हैं, जो इस ऐतिहासिक व्यक्तित्व को और अधिक रोचक बनाते हैं।
प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत एवं उनका महत्त्व
| स्रोत | रचयिता / काल | क्या बताता है | दृष्टिकोण |
|---|---|---|---|
| महाभाष्य | पतंजलि (185 ईपू) | यवन आक्रमण, अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख | समकालीन — सर्वाधिक विश्वसनीय |
| हर्षचरित | बाणभट्ट (7वीं शताब्दी ई.) | तख्तापलट की घटना का विवरण | परवर्ती — विश्वसनीय |
| दिव्यावदान | बौद्ध ग्रंथ | बौद्ध उत्पीड़न का विवरण | पक्षपाती — सावधानी से पढ़ें |
| मालविकाग्निमित्रम् | कालिदास | अग्निमित्र का शासन, विदर्भ युद्ध, यवन | साहित्यिक — ऐतिहासिक संकेत |
| पुराण | विभिन्न | शासकों की सूची, वंशावली | परंपरागत — उपयोगी |
सत्ता ग्रहण — तख्तापलट की पृष्ठभूमि एवं परिस्थितियाँ
पुष्यमित्र शुंग का सत्ता ग्रहण अचानक नहीं हुआ — यह उन परिस्थितियों का परिणाम था जो अशोक की मृत्यु (232 ईपू) के बाद से निर्मित हो रही थीं। बिहार की धरती पर केंद्रित मौर्य साम्राज्य अंदर से खोखला हो रहा था और बाहर से यवन आक्रमणों का खतरा बढ़ रहा था।
मौर्योत्तर संकट — वे 6 कारण जिन्होंने तख्तापलट को अवश्यंभावी बनाया
अशोक के बाद दशरथ → संप्रति → शालिशुक → देवर्मन → शतधन्वन → बृहद्रथ — ये सभी शासक क्रमशः कमज़ोर होते गए। बृहद्रथ इनमें सबसे दुर्बल था — वह न सेना पर नियंत्रण रख सका, न प्रांतों पर।
डेमेट्रियस और मेनेन्डर जैसे यवन शासक उत्तर-पश्चिम भारत में बढ़ रहे थे। बृहद्रथ में इनसे लड़ने की न इच्छाशक्ति थी, न क्षमता। सेनापति पुष्यमित्र के लिए यह असह्य था।
अशोक के समय से बौद्ध धर्म को राजाश्रय मिलने से ब्राह्मण वर्ग उपेक्षित था। पशुबलि पर प्रतिबंध, यज्ञों की उपेक्षा — इससे ब्राह्मण समाज क्षुब्ध था। पुष्यमित्र उनकी आशाओं का प्रतीक बना।
विशाल नौकरशाही का बोझ, व्यापार में गिरावट और अशोक के धार्मिक दान ने राजकोष को खाली कर दिया था। सेना का वेतन तक नियमित नहीं था, जिससे सैनिक असंतोष बढ़ा।
प्रांतीय गवर्नर स्वतंत्र होने लगे थे। विदर्भ क्षेत्र (आधुनिक महाराष्ट्र) ने विद्रोह किया। कलिंग और दक्षिण भारत व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र थे।
पुष्यमित्र के हाथ में वास्तविक सत्ता थी। सेना उसके प्रति निष्ठावान थी। बृहद्रथ नाममात्र का राजा था। सत्ता का वास्तविक केंद्र पाटलिपुत्र में पुष्यमित्र के पास था।
बृहद्रथ मौर्य — अंतिम मौर्य सम्राट का चरित्र-चित्रण
बृहद्रथ मौर्य वंश का अंतिम और सबसे दुर्बल शासक था। पुराणों में उसे निर्बल, कायर और अयोग्य बताया गया है। वह न तो यवन आक्रमण रोक सकता था और न ही विद्रोही प्रांतों को नियंत्रित कर सकता था। उसके शासन में पाटलिपुत्र की प्रतिष्ठा तेज़ी से गिर रही थी। वास्तविक सत्ता उसके सेनापति पुष्यमित्र के हाथ में थी।
सत्ता ग्रहण — घटना, विधि एवं वैधता का प्रश्न
185 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) में सेना की परेड के दौरान सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर दी। यह घटना भारतीय इतिहास का पहला प्रमुख सैनिक तख्तापलट मानी जाती है।
तख्तापलट की घटना — चरण दर चरण विश्लेषण
पुष्यमित्र शुंग ने सेना की परेड (Sena Pradarshan) का आयोजन किया। यह परेड सम्राट बृहद्रथ की उपस्थिति में होनी थी। इस अवसर का उपयोग पुष्यमित्र ने सुनियोजित ढंग से किया।
- परेड का आयोजन पाटलिपुत्र में किया गया
- सम्राट बृहद्रथ को परेड का निरीक्षण करना था
- पुष्यमित्र ने पहले से सेना को अपने पक्ष में कर लिया था
- यह घटना सार्वजनिक थी — सैनिकों की उपस्थिति में
परेड के दौरान पुष्यमित्र शुंग ने सम्राट बृहद्रथ की खुलेआम हत्या कर दी। सेना ने इस घटना का विरोध नहीं किया — बल्कि पुष्यमित्र का समर्थन किया। इस प्रकार सत्ता हस्तांतरण बिना किसी गृहयुद्ध के हो गया।
- हत्या सार्वजनिक स्थान पर — इसने पुष्यमित्र की शक्ति का संदेश दिया
- सेना की तत्काल स्वीकृति — इससे सत्ता संक्रमण सुगम हुआ
- कोई वैकल्पिक मौर्य दावेदार नहीं उठा — मौर्य शक्ति पूरी तरह क्षीण थी
- पुष्यमित्र ने स्वयं को शासक (Samrat) घोषित किया
सत्ता प्राप्त करने के बाद पुष्यमित्र को अपनी राजनीतिक वैधता (Legitimacy) स्थापित करनी थी। क्योंकि वह मौर्य वंश का नहीं था और न राजपुत्र था, इसलिए उसने अनेक उपाय अपनाए।
- अश्वमेध यज्ञ — चक्रवर्ती सम्राट होने की घोषणा का पारंपरिक तरीका
- ब्राह्मण समर्थन — पतंजलि जैसे विद्वान पुरोहित को यज्ञ पुरोहित बनाया
- वैदिक धर्म की पुनःस्थापना — पशुबलि, यज्ञ परंपरा पुनः शुरू
- यवन आक्रमण से रक्षा — राष्ट्ररक्षक का दर्जा प्राप्त किया
- पाटलिपुत्र को राजधानी बनाए रखा — निरंतरता का संदेश
क्या पुष्यमित्र का तख्तापलट न्यायसंगत था? — BPSC Mains विश्लेषण
- यवन आक्रमण से राष्ट्र रक्षा आवश्यक थी
- बृहद्रथ शासन में सर्वथा अक्षम था
- सेना की स्वैच्छिक स्वीकृति मिली
- वैदिक परंपरा का पुनरुत्थान आवश्यक था
- मगध (बिहार) की रक्षा हुई
- अपने स्वामी की हत्या — विश्वासघात
- संवैधानिक अधिकार के बिना सत्ता ग्रहण
- बौद्ध ग्रंथों के अनुसार धार्मिक अत्याचार
- मौर्य एकता का विखंडन
साम्राज्य विस्तार — भौगोलिक, राजनीतिक एवं सैन्य
पुष्यमित्र शुंग ने सत्ता ग्रहण के बाद केवल मगध (बिहार) तक सीमित नहीं रहा — उसने सक्रिय सैन्य अभियानों द्वारा साम्राज्य का विस्तार किया। उसका नियंत्रण पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में पंजाब तक और उत्तर में हिमालय की तलहटी से दक्षिण में विदर्भ तक था।
विदर्भ विजय — साम्राज्य विस्तार का महत्त्वपूर्ण अभियान
पुष्यमित्र के शासनकाल में विदर्भ (आधुनिक महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र) ने विद्रोह किया। वहाँ का शासक यक्षसेन था जो शुंग आधिपत्य स्वीकार नहीं करता था। पुष्यमित्र ने अपने पुत्र अग्निमित्र (जो विदिशा का गवर्नर था) को इस अभियान में भेजा।
कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्रम् में इस युद्ध का काव्यात्मक विवरण मिलता है। इस नाटक का नायक अग्निमित्र है जो विदिशा का शासक है। नाटक के अनुसार विदर्भ-युद्ध में माधवसेन नामक राजकुमार को बंदी बनाया गया था, जो यक्षसेन का भतीजा था।
- नाटक में विदर्भ की सीमा पर वर्धा नदी का उल्लेख है
- अग्निमित्र ने वीरसेन नामक सेनापति को भेजा
- यक्षसेन की पराजय हुई और विदर्भ का विभाजन हुआ
- उत्तरी विदर्भ — शुंग अधिकार; दक्षिणी विदर्भ — यक्षसेन को
- यह कालिदास का ऐतिहासिक साहित्य है — इसे पूर्ण इतिहास न मानें
| क्षेत्र | स्थिति (शुंग काल में) | महत्त्व |
|---|---|---|
| मगध (बिहार) | केंद्रीय सत्ता — पाटलिपुत्र राजधानी | साम्राज्य का हृदय |
| अवंति-विदिशा (MP) | अग्निमित्र का शासन — उप-राजधानी | पश्चिमी द्वार की रक्षा |
| कोसल-साकेत (UP) | शुंग नियंत्रण | यवन से रक्षा का मोर्चा |
| विदर्भ (Maharashtra) | अग्निमित्र द्वारा जीता — आंशिक नियंत्रण | दक्षिणी विस्तार |
| सिंधु क्षेत्र (Punjab) | यवनों से संघर्ष — वसुमित्र की विजय | उत्तर-पश्चिम सीमा |
| दक्षिण भारत | सातवाहनों का उभार — शुंग नियंत्रण नहीं | साम्राज्य की सीमा |
यवन (Indo-Greek) आक्रमण — पृष्ठभूमि एवं खतरे का स्वरूप
यवन शब्द का प्रयोग प्राचीन भारतीय साहित्य में Indo-Greeks के लिए होता है — वे यूनानी शासक जो सिकंदर के उत्तराधिकारियों से निकले और बैक्ट्रिया (आधुनिक अफगानिस्तान) में बसे। पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में इन यवन शासकों ने भारत पर आक्रमण किया — यह शुंग साम्राज्य और बिहार के लिए सबसे बड़ा बाह्य खतरा था।
यवन आक्रमण का भौगोलिक मार्ग एवं चरण
यवन आक्रमण की विशेषताएँ — बिहार के लिए खतरा
यवन आक्रमण का सामना — पुष्यमित्र की रणनीति एवं प्रतिरोध
पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यवन आक्रमण का सफल प्रतिरोध था। एक सेनापति की पृष्ठभूमि से आने के कारण वह सैनिक रणनीति में पारंगत था। उसने यवनों को पाटलिपुत्र (बिहार) तक पहुँचने से रोका — यह उसका सबसे बड़ा राष्ट्रीय योगदान था।
पतंजलि की महाभाष्य — जो पुष्यमित्र के समकालीन थे और उनके अश्वमेध यज्ञ के पुरोहित भी — में दो संदर्भ हैं जो यवन आक्रमण की पुष्टि करते हैं:
- इन वाक्यों में क्रिया वर्तमान काल (Present Tense) में है
- यह सिद्ध करता है कि पतंजलि यह घटनाएँ अपने समय में देख रहे थे
- माध्यमिका — राजस्थान में चित्तौड़गढ़ के निकट
- साकेत — अयोध्या (उत्तर प्रदेश)
- दोनों स्थान पाटलिपुत्र (बिहार) के पश्चिम में थे
पुष्यमित्र शुंग एक अनुभवी सैन्य नेता था। उसने यवन प्रतिरोध के लिए निम्नलिखित रणनीतियाँ अपनाईं:
- अग्रिम मोर्चे की रक्षा: यवनों को सीमा पर ही रोकने की नीति — पाटलिपुत्र तक नहीं आने दिया
- पुत्र को प्रतिनिधि: अग्निमित्र को विदिशा (पश्चिमी मोर्चे के निकट) का गवर्नर बनाया
- अश्वमेध यज्ञ: घोड़े की यात्रा से साम्राज्य की सीमाओं की जाँच और शक्ति का प्रदर्शन
- पोते वसुमित्र को सेनापति: सिंधु अभियान में वसुमित्र को भेजा जिसने निर्णायक विजय दिलाई
- केंद्रीय सेना की मजबूती: मौर्य सेना को पुनर्गठित किया और उसे अपने प्रति निष्ठावान बनाया
पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ किए — ये केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि सैनिक एवं राजनीतिक उपकरण भी थे।
- अश्वमेध घोड़ा — एक वर्ष तक स्वतंत्र विचरण करता था। जो राजा उसे रोकता, उससे युद्ध होता
- घोड़े की यात्रा से साम्राज्य की वास्तविक सीमाएँ निर्धारित होती थीं
- यह यवनों को संदेश था — शुंग साम्राज्य शक्तिशाली है
- पतंजलि की महाभाष्य में अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख समकालीन प्रमाण है
- प्रथम यज्ञ — संभवतः यवन विजय के पश्चात् विजय उत्सव के रूप में
- द्वितीय यज्ञ — साम्राज्य की स्थिरता की घोषणा
यवन प्रतिरोध में बिहार (मगध) की भूमिका
पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) इस पूरे संघर्ष का केंद्र था। यह वह स्थान था जिसकी रक्षा के लिए पुष्यमित्र ने सब कुछ किया। यदि यवन पाटलिपुत्र तक पहुँच जाते, तो भारतीय इतिहास की दिशा बदल जाती।
- पाटलिपुत्र (पटना) — शुंग साम्राज्य की राजधानी, यवन आक्रमण का मुख्य लक्ष्य
- पुष्यमित्र ने मगध की धरती से यवन प्रतिरोध का नेतृत्व किया
- गंगा नदी — पूर्व की ओर प्राकृतिक सुरक्षा रेखा
- बिहार के शासक ने भारत को यूनानी शासन से बचाया
- यह घटना बिहार के गौरवशाली इतिहास का अभिन्न अंग है
वसुमित्र की सिंधु-विजय — यवन संकट का निर्णायक अंत
वसुमित्र पुष्यमित्र शुंग का पोता था जिसने यवनों के विरुद्ध सिंधु नदी के तट पर निर्णायक युद्ध जीता। यह घटना शुंग वंश की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि मानी जाती है और पतंजलि की महाभाष्य में इसका स्पष्ट उल्लेख है।
वसुमित्र पुष्यमित्र का पोता और अग्निमित्र का पुत्र था। उसने यवनों को सिंधु नदी के तट पर पराजित किया — यह शुंग इतिहास की सबसे प्रसिद्ध सैनिक घटना है। इस विजय के बाद यवनों की भारत पर बड़े आक्रमण की क्षमता क्षीण हो गई।
सिंधु-युद्ध का विवरण एवं महत्त्व
पतंजलि की महाभाष्य में स्पष्ट उल्लेख है कि पुष्यमित्र के समय में यवनों को पराजित किया गया। कालिदास के मालविकाग्निमित्रम् में वसुमित्र की सिंधु-विजय का काव्यात्मक वर्णन है — यह नाटक का एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है।
- नाटक में वर्णन है कि वसुमित्र अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की रक्षा करते हुए सिंधु पहुँचा
- वहाँ यवन सेना ने घोड़े को रोकने का प्रयास किया
- वसुमित्र ने यवन सेना को पराजित किया और घोड़े को मुक्त कराया
- विजयी वसुमित्र पाटलिपुत्र लौटा — उत्सव मनाया गया
- यह प्रसंग राजनीतिक एवं सैनिक दोनों दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है
- यवन खतरे का व्यावहारिक अंत: इसके बाद यवन भारत के आंतरिक भागों तक नहीं पहुँचे
- शुंग प्रतिष्ठा में वृद्धि: यवनों को पराजित करने वाले वंश के रूप में मान्यता
- भारतीय संस्कृति की रक्षा: यदि यवन जीतते तो हेलेनिस्टिक संस्कृति का प्रसार होता
- बिहार की सुरक्षा: पाटलिपुत्र यवन आक्रमण से बचा रहा
- अश्वमेध यज्ञ की सफलता: घोड़े की वापसी से यज्ञ पूर्ण हुआ — राजनीतिक वैधता मजबूत
| तुलना बिंदु | यवन (Indo-Greeks) | शुंग (पुष्यमित्र/वसुमित्र) |
|---|---|---|
| सैन्य शक्ति | भारी घुड़सवार, Phalanx | हाथी सेना, पैदल, रथ |
| लक्ष्य | पाटलिपुत्र तक विजय | अपनी सीमाओं की रक्षा |
| धर्म | यूनानी देवता + कुछ बौद्ध | वैदिक ब्राह्मण धर्म |
| परिणाम | सिंधु पर पराजय — वापसी | भारत की आंतरिक सुरक्षा |
| दीर्घकालिक प्रभाव | पंजाब-गांधार तक सीमित | मगध (बिहार) सुरक्षित |
पुष्यमित्र शुंग का समग्र मूल्यांकन — बिहार एवं भारत की दृष्टि से
पुष्यमित्र शुंग का मूल्यांकन भारतीय इतिहासलेखन में सदा विवादास्पद रहा है। एक ओर उसे राष्ट्ररक्षक कहा जाता है जिसने यवन आक्रमण से भारत को बचाया, वहीं दूसरी ओर उसे बौद्ध उत्पीड़क और विश्वासघाती सेनापति भी कहा जाता है।
यवन (Indo-Greek) आक्रमण से भारत की रक्षा — यह सर्वसम्मत उपलब्धि है। पाटलिपुत्र (बिहार) को बचाया। भारतीय संस्कृति एवं धर्म की सुरक्षा।
वैदिक यज्ञ परंपरा की पुनःस्थापना। अश्वमेध यज्ञ। पतंजलि जैसे विद्वान को संरक्षण — महाभाष्य का निर्माण।
साँची स्तूप का विस्तार (तोरण द्वार, रेलिंग) एवं भरहुत स्तूप का निर्माण — भारतीय वास्तुकला की उत्कृष्ट कृतियाँ।
36 वर्ष का दीर्घ शासन। मगध (बिहार) की केंद्रीय सत्ता बनाए रखी। विदर्भ विद्रोह का दमन।
दिव्यावदान के अनुसार बौद्ध भिक्षुओं की हत्या, विहार ध्वंस। किंतु साँची-भरहुत निर्माण इसका खंडन करते हैं। अतः यह आरोप पूर्णतः सत्य नहीं।
मौर्य साम्राज्य जितना विशाल नहीं था। दक्षिण भारत पर नियंत्रण नहीं। सातवाहन शक्ति बढ़ रही थी।
प्रमुख इतिहासकारों के मत
Romila Thapar के अनुसार पुष्यमित्र को ब्राह्मण प्रतिक्रिया (Brahmanical Reaction) का नेता माना जा सकता है। उन्होंने बौद्ध उत्पीड़न के दावों को अतिरंजित बताया। उनके अनुसार पुष्यमित्र ने राज्य की नीति बदली — बौद्धों का पूर्ण दमन नहीं किया। साँची-भरहुत जैसे बौद्ध स्मारकों का निर्माण इसका प्रमाण है।
H.C. Raychaudhuri पुष्यमित्र को राष्ट्रीय नायक मानते हैं जिसने यवन आक्रमण से भारत को बचाया। उनके अनुसार यदि पुष्यमित्र न होता, तो यवन शासन स्थापित हो जाता और भारतीय संस्कृति का स्वरूप बदल जाता।
D.N. Jha पुष्यमित्र को वर्णव्यवस्था के पुनर्स्थापक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार पुष्यमित्र ने ब्राह्मण वर्चस्व को राजनीतिक शक्ति दी और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों के माध्यम से जाति-व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया।
भूमिका: मौर्योत्तर संकट → सत्ता ग्रहण: परेड-घटना, बृहद्रथ हत्या, वैधता-स्थापना → विस्तार: विदर्भ, साम्राज्य सीमाएँ → यवन खतरा: डेमेट्रियस, माध्यमिका, साकेत → प्रतिरोध: पुष्यमित्र की रणनीति, वसुमित्र की सिंधु-विजय → मूल्यांकन: उपलब्धियाँ एवं आलोचना → निष्कर्ष: बिहार की रक्षा, भारतीय संस्कृति की निरंतरता।
सारांश एवं Quick Revision
🎯 BPSC परीक्षा — PYQ, MCQ एवं Mains अभ्यास
🏆 BPSC परीक्षा के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्य
🎯 स्वयं परीक्षण — Interactive MCQ
- 185 ईपू — सत्ता ग्रहण वर्ष (सैनिक परेड में बृहद्रथ की हत्या)
- पतंजलि की महाभाष्य — यवन आक्रमण का समकालीन, सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य
- वसुमित्र (पोता) — सिंधु पर यवन-विजय
- अग्निमित्र (पुत्र) — विदर्भ-विजय + मालविकाग्निमित्रम् का नायक
- पाटलिपुत्र = पटना (बिहार) — शुंग राजधानी, यवन से सुरक्षित
- अश्वमेध यज्ञ — 2 बार, पुरोहित पतंजलि
निष्कर्ष
पुष्यमित्र शुंग बिहार के इतिहास में एक ऐसे शासक के रूप में अमर है जिसने एक सैनिक सेनापति के रूप में सत्ता संभाली और यवन आक्रमणों से मगध (पाटलिपुत्र) की रक्षा की। उसका शासनकाल — 185 से 149 ईसा पूर्व — भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण संक्रमणकाल था जिसमें मौर्य साम्राज्य का स्थान शुंग वंश ने लिया। पतंजलि की महाभाष्य, कालिदास की मालविकाग्निमित्रम् और अनेक पुराण इस काल के ऐतिहासिक महत्त्व के साक्षी हैं। BPSC परीक्षार्थियों के लिए पुष्यमित्र शुंग की सत्ता-प्राप्ति एवं यवन-प्रतिरोध — ये दो पक्ष अनिवार्य रूप से तैयार करने चाहिए।


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