बिहार में बौद्ध धर्म का संरक्षण
मौर्य वंश एवं सम्राट अशोक की भूमिका — इतिहास, नीति और विरासत
परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बिहार में बौद्ध धर्म का संरक्षण BPSC परीक्षा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय है — यहाँ मौर्य वंश, विशेषतः सम्राट अशोक की भूमिका को गहराई से समझना आवश्यक है। बिहार की भूमि बौद्ध धर्म का उद्गम स्थल है — गया में बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, सारनाथ में पहला उपदेश दिया और राजगृह (Rajgir) व वैशाली में प्रमुख संगीतियाँ आयोजित हुईं।
बौद्ध धर्म के उद्भव के समय उत्तर भारत में 16 महाजनपद थे। बिहार क्षेत्र में मगध, वज्जि, अंग जैसे शक्तिशाली महाजनपद स्थित थे। मगध का उत्थान बिंबिसार (Bimbisara) के काल से आरंभ हुआ जिन्होंने बुद्ध को राजाश्रय दिया। बाद में मौर्य वंश ने बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान कर उसे वैश्विक स्तर पर प्रसारित किया।
| स्थान | बौद्ध महत्त्व | आधुनिक जिला (बिहार) |
|---|---|---|
| बोधगया | बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति | गया |
| राजगृह (Rajgir) | प्रथम बौद्ध संगीति, बुद्ध उपदेश | नालंदा |
| पाटलिपुत्र | तृतीय बौद्ध संगीति (अशोक काल) | पटना |
| नालंदा | विश्वप्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय | नालंदा |
| वैशाली | द्वितीय बौद्ध संगीति | वैशाली |
| केसरिया | विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप | पूर्वी चंपारण |
मौर्य वंश और बौद्ध धर्म का उदय
मौर्य वंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने 322 ईपू में की। यह भारत का प्रथम विशाल साम्राज्य था जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) थी। मौर्य काल में बौद्ध धर्म को उत्तरोत्तर राजाश्रय मिला।
मौर्य पूर्व शासकों का बौद्ध धर्म से संबंध
बिंबिसार (Haryanka वंश) ने बुद्ध को वेलुवन विहार दान दिया था — यह बौद्ध संघ को दिया गया प्रथम आवास था। अजातशत्रु ने प्रथम बौद्ध संगीति (483 ईपू) राजगृह में आयोजित कराई। नंद वंश के दौरान बौद्ध धर्म फैलता रहा। मौर्यों के सत्ता में आने के बाद, विशेषकर अशोक के काल में, बौद्ध धर्म को अभूतपूर्व राजकीय संरक्षण मिला।
अशोक का जीवन एवं धम्म में परिवर्तन
कलिंग युद्ध और धम्म-दीक्षा
261 ईपू में अशोक ने कलिंग (आधुनिक ओडिशा) पर आक्रमण किया। यह युद्ध अत्यंत विनाशकारी था — 1,00,000 से अधिक व्यक्ति मारे गए, 1,50,000 बंदी बनाए गए और लाखों विस्थापित हुए। इस नरसंहार ने अशोक को भीतर से झकझोर दिया। 13वें शिलालेख (Rock Edict XIII) में उन्होंने स्वयं इस पछतावे का वर्णन किया है।
कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक ने बौद्ध भिक्षु उपगुप्त से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। उन्होंने “भेरीघोष” (युद्ध की आवाज़) का त्याग कर “धम्मघोष” (धर्म की आवाज़) को अपनाया। यह परिवर्तन न केवल व्यक्तिगत था बल्कि इसने पूरी राजनीतिक नीति को बदल दिया।
अशोक के अभिलेख (Edicts) — बौद्ध धर्म के साक्ष्य
| अभिलेख प्रकार | संख्या | विषय | बिहार में स्थान |
|---|---|---|---|
| शिलालेख (Rock Edicts) | 14 मुख्य | धम्म नीति, अहिंसा, सहिष्णुता | — |
| स्तंभ लेख (Pillar Edicts) | 7 मुख्य | जीव दया, अधिकारी नियुक्ति | लौरिया-नंदनगढ़ (W. Champaran), लौरिया अरेराज |
| लघु शिलालेख | अनेक | बौद्ध संघ में प्रवेश | — |
| गुहा अभिलेख | 3 | आजीवक भिक्षुओं को गुफाएँ | बराबर पहाड़ी, गया |
| रुम्मिनदेई स्तंभ | 1 | बुद्ध जन्मस्थान — कर माफी | लुंबिनी (अशोक की यात्रा) |
अशोक की बौद्ध संरक्षण नीतियाँ
अशोक ने बौद्ध धर्म को केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं रखा — उन्होंने इसे राजकीय नीति (State Policy) बनाया। उनकी संरक्षण नीतियाँ तीन स्तरों पर थीं: प्रशासनिक, निर्माण संबंधी और प्रचार संबंधी।
धम्म महामात्र — अशोक ने विशेष अधिकारी नियुक्त किए जो बौद्ध सिद्धांतों का प्रचार करते थे, भिक्षुओं की देखभाल करते थे और दान वितरित करते थे। यह भारत में पहली बार धार्मिक अधिकारी की स्थापना थी।
परंपरा के अनुसार अशोक ने 84,000 स्तूप बनवाए। बुद्ध के धातु-अवशेषों को 8 स्थानों से एकत्र कर पुनः वितरित किया। बिहार में केसरिया स्तूप (पूर्वी चंपारण) अशोक काल से जुड़ा है।
अशोक ने पशु-बलि पर प्रतिबंध लगाया। राजकीय रसोई में मारे जाने वाले जानवरों की संख्या कम की। जीव-दया को राज्य नीति बनाया — यह बौद्ध अहिंसा सिद्धांत का व्यावहारिक अनुप्रयोग था।
अशोक ने धम्म दूत भेजे: श्रीलंका (महेंद्र + संघमित्रा), मिस्र, सीरिया, मेसेडोनिया, एपिरस। महेंद्र ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म स्थापित किया — यही आज का थेरवाद बौद्ध धर्म है।
बौद्ध करुणा सिद्धांत के अनुरूप: सड़कें, कुएँ, अस्पताल (मनुष्य और पशु दोनों के लिए), छायादार वृक्ष लगवाना। इन्हें शिलालेखों में “धम्म कार्य” कहा गया है।
अशोक ने बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्राएँ कीं — बोधगया, सारनाथ, लुंबिनी, कुशीनगर। लुंबिनी में स्तंभ स्थापित कर कर-मुक्ति की घोषणा की।
अशोक का धम्म — क्या यह केवल बौद्ध धर्म था?
इतिहासकारों में मतभेद है। रोमिला थापर के अनुसार अशोक का “धम्म” एक सार्वभौमिक नैतिक संहिता थी जो सभी धर्मों के तत्त्वों से बनी थी — यह किसी एक धर्म का प्रचार नहीं था। इसमें सत्य, अहिंसा, दान, शुचिता, गुरु-सेवा जैसे सिद्धांत थे जो बौद्ध, जैन और ब्राह्मण सभी मानते हैं।
| शिलालेख | मुख्य विषय |
|---|---|
| 1st Rock Edict | पशु-बलि पर प्रतिबंध |
| 2nd Rock Edict | चिकित्सालय, सड़क, कुएँ |
| 6th Rock Edict | प्रत्येक स्थान और समय पर राजा से मिलने का अधिकार |
| 7th & 8th Rock Edict | धम्म यात्रा का उल्लेख |
| 12th Rock Edict | धार्मिक सहिष्णुता |
| 13th Rock Edict | कलिंग युद्ध का पश्चाताप — सबसे महत्त्वपूर्ण |
| Pillar Edict VII | जीव दया, धम्म अधिकारियों की भूमिका |
बौद्ध स्थापत्य एवं बिहार की विरासत
मौर्य काल, विशेषकर अशोक के समय में बिहार में अनेक महत्त्वपूर्ण बौद्ध स्थापत्य संरचनाओं का निर्माण हुआ। ये संरचनाएँ न केवल धार्मिक महत्त्व की हैं बल्कि BPSC Prelims में बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्नों का स्रोत भी हैं।
अशोक स्तंभ — वास्तुकला की विशेषताएँ
अशोक के स्तंभ मौर्य कला का सर्वोत्तम नमूना हैं। ये एकल पत्थर (monolithic) से बने हैं, चुनार (UP) के बलुआ पत्थर से, जिसे अद्भुत चमक दी गई है। स्तंभ के ऊपर शीर्ष (Capital) होता है — जिसमें पशु आकृतियाँ (सिंह, बैल, घोड़ा, हाथी) और धम्म चक्र होता है। सारनाथ का अशोक स्तंभ शीर्ष (चार सिंह) भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है और अशोक चक्र (24 तीलियाँ) राष्ट्रीय ध्वज में है।
तृतीय बौद्ध संगीति एवं धम्म प्रचार अभियान
बौद्ध इतिहास में तीन प्रमुख संगीतियाँ (Buddhist Councils) हुईं। तीसरी संगीति अशोक के काल में पाटलिपुत्र में आयोजित हुई जो बौद्ध धर्म के इतिहास में एक निर्णायक क्षण था।
| संगीति | वर्ष | स्थान | अध्यक्ष | संरक्षक | उपलब्धि |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 प्रथम | 483 ईपू | राजगृह (बिहार) | महाकस्सप | अजातशत्रु | विनय पिटक और सुत्त पिटक का संकलन |
| 2 द्वितीय | 383 ईपू | वैशाली (बिहार) | सब्बकामी | कालाशोक | विनय नियमों पर विवाद — थेरवाद / महासांघिक विभाजन |
| 3 तृतीय | 250 ईपू | पाटलिपुत्र (बिहार) | मोग्गलिपुत्त तिस्स | अशोक | अभिधम्म पिटक का संकलन; विधर्मियों का निष्कासन; धम्म दूत भेजे |
| 4 चतुर्थ | 72 ईस्वी | कुंडलवन (कश्मीर) | वसुमित्र | कनिष्क | महायान बौद्ध धर्म का उदय |
धम्म दूत — अशोक का वैश्विक प्रचार अभियान
तृतीय बौद्ध संगीति के बाद अशोक ने 9 धम्म मिशन विभिन्न देशों में भेजे। यह विश्व में पहली बार किसी राजा ने किसी धर्म के अंतरराष्ट्रीय प्रचार का आयोजन किया।
| दूत | भेजा गया क्षेत्र | परिणाम |
|---|---|---|
| महेंद्र (अशोक का पुत्र) | श्रीलंका (Ceylon) | थेरवाद बौद्ध धर्म की स्थापना — आज तक जीवित |
| संघमित्रा (अशोक की पुत्री) | श्रीलंका | बोधि वृक्ष की शाखा ले गईं — अनुराधापुर में |
| मज्झंतिक | कश्मीर और गंधार | बौद्ध धर्म का प्रसार |
| महादेव | महिष्मति (दक्षिण भारत) | दक्षिण में प्रसार |
| रक्खित | वनवास (कर्नाटक) | — |
| धम्मरक्खित | अपरांत (महाराष्ट्र) | — |
| महारक्खित | यवन देश (ग्रीस/पश्चिम एशिया) | हेलेनिस्टिक क्षेत्रों में प्रचार |
| सोण और उत्तर | सुवर्णभूमि (Myanmar/Thailand) | दक्षिण-पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म |
| महिंद | हिमालय क्षेत्र | — |
बौद्ध संरक्षण के कारण एवं महत्त्व
अशोक ने बौद्ध धर्म को संरक्षण क्यों दिया? यह प्रश्न BPSC Mains में बार-बार पूछा जाता है। इसके पीछे व्यक्तिगत, राजनीतिक और सामाजिक — तीनों प्रकार के कारण थे।
कलिंग युद्ध का मानसिक आघात — 1 लाख मृत, 1.5 लाख बंदी। अशोक के हृदय में गहरी पश्चाताप की भावना उत्पन्न हुई। बौद्ध धर्म की अहिंसा ने उन्हें आत्मशांति प्रदान की। भिक्षु उपगुप्त का प्रभाव। बौद्ध संघ की मजबूत संगठन क्षमता ने प्रशासन में सहायता का अवसर दिखा।
साम्राज्य को एकजुट रखने का उपकरण — विशाल मौर्य साम्राज्य में विभिन्न जातियाँ और धर्म थे। बौद्ध धर्म की जाति-निरपेक्षता सभी को एकत्रित कर सकती थी। ब्राह्मण पुरोहित वर्ग पर निर्भरता कम करना। बौद्ध संघ के माध्यम से प्रशासनिक नेटवर्क का विस्तार। धम्म महामात्रों की नियुक्ति से केंद्रीय नियंत्रण।
बौद्ध धर्म के संरक्षण ने सामाजिक समानता को बल दिया। बौद्ध विहार शिक्षा केंद्र बने। नालंदा विश्वविद्यालय (बाद में) की नींव इसी परंपरा पर पड़ी। पाली भाषा का साहित्यिक विकास हुआ। बौद्ध धर्म के माध्यम से भारत का सांस्कृतिक निर्यात हुआ — आज भी दक्षिण-पूर्व एशिया और श्रीलंका में भारतीय प्रभाव दिखता है।
अशोक के संरक्षण का दीर्घकालिक प्रभाव
आलोचनाएँ एवं मौर्योत्तर काल में बौद्ध धर्म
अशोक के संरक्षण के बावजूद मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद बौद्ध धर्म को कठिनाइयाँ आईं। यह समझना BPSC Mains के लिए आवश्यक है — केवल उत्थान नहीं, पतन के कारण भी पूछे जाते हैं।
- सैन्य कमजोरी: कुछ इतिहासकार (H.C. Raychaudhuri) मानते हैं कि अहिंसा नीति से सेना कमजोर हुई जो मौर्य पतन का एक कारण बनी।
- ब्राह्मण प्रतिक्रिया: पशु-बलि पर रोक और बौद्ध धर्म के पक्षपात से ब्राह्मण वर्ग में असंतोष — जो शुंग वंश के उभरने में सहायक बना।
- राजकोष पर बोझ: 84,000 स्तूप, विहार, दान से राज्य की आर्थिक शक्ति कमजोर होने की संभावना।
- एकपक्षीय धर्म-नीति: हालाँकि अशोक ने सर्वधर्म समभाव का दावा किया, व्यवहार में बौद्ध धर्म को अधिक संरक्षण मिला।
मौर्योत्तर काल: शुंग वंश और बौद्ध धर्म
185 ईपू में पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या कर शुंग वंश स्थापित किया। पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण धर्म का कट्टर समर्थक था। बौद्ध परंपराओं के अनुसार उसने अनेक बौद्ध विहारों को नष्ट किया और भिक्षुओं को प्रताड़ित किया। हालाँकि आधुनिक इतिहासकार इसे अतिरंजित मानते हैं — शुंग काल में साँची स्तूप का विस्तार भी हुआ।
- बौद्ध काल (5वीं–3री सदी ईपू): उद्गम और प्रारंभिक प्रसार — बिंबिसार, अजातशत्रु
- मौर्य काल (322–185 ईपू): अशोक का स्वर्णकाल — सर्वाधिक संरक्षण
- शुंग/कण्व काल (185–28 ईपू): अवरोध, परंतु बौद्ध कला जारी
- कुषाण काल (1–3री सदी ईस्वी): महायान का उदय, गंधार कला
- गुप्त काल (4–6वीं सदी): नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना
- पाल काल (8–12वीं सदी): बिहार में अंतिम बौद्ध राजवंश — विक्रमशिला
- 1193 ईस्वी: बख्तियार खिलजी — नालंदा विध्वंस — बिहार में बौद्ध धर्म का पतन


Leave a Reply