दिल्ली सल्तनत की शुरुआत ममलूक वंश का परिचय — 1206 ई.
भारत में तुर्क शासन की नींव · मध्यकालीन भारत का प्रथम अध्याय · बिहार परीक्षा केंद्रित
परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
दिल्ली सल्तनत (1206–1526 ई.) मध्यकालीन भारत का वह राजनीतिक ढाँचा था जिसने 320 वर्षों तक उपमहाद्वीप को प्रभावित किया। BPSC Prelims और Mains दोनों के लिए इसकी शुरुआत — 1206 ई. — एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तिथि है। इसी वर्ष कुतुबुद्दीन ऐबक ने ममलूक वंश की स्थापना कर भारत में इस्लामी शासन की नींव रखी।
12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत की राजनीतिक स्थिति जटिल थी। राजपूत राज्य आपस में लड़ रहे थे और केंद्रीय शक्ति का अभाव था। इसी कमज़ोरी का लाभ उठाकर मुहम्मद गोरी (Muiz ud-Din Muhammad) ने उत्तर भारत पर एक के बाद एक आक्रमण किए। 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद तुर्क शक्ति अपराजेय बन गई। गोरी ने विजित प्रदेशों का भार अपने विश्वस्त दास-सेनापतियों को सौंपा — इन्हीं में सर्वश्रेष्ठ था कुतुबुद्दीन ऐबक।
1206 ई. — दिल्ली सल्तनत कैसे अस्तित्व में आई?
दिल्ली सल्तनत की स्थापना किसी एक निर्णय या घोषणा का परिणाम नहीं थी — यह एक क्रमिक प्रक्रिया थी जो 1192 ई. से 1229 ई. तक चली। 1206 ई. को इसलिए आधार वर्ष माना जाता है क्योंकि इसी वर्ष ऐबक ने स्वतंत्र रूप से शासन संभाला।
सल्तनत स्थापना की चरणबद्ध प्रक्रिया
ऐबक बनाम इल्तुतमिश — संस्थापक विवाद
| आधार | कुतुबुद्दीन ऐबक (1206–1210) | इल्तुतमिश (1211–1236) |
|---|---|---|
| उपाधि | मलिक, सिपहसालार | सुल्तान (औपचारिक) |
| खुतबा | गोरी के नाम पर पढ़ा | अपने नाम पर पढ़वाया |
| सिक्के | कोई स्वतंत्र सिक्का नहीं | टंका (चाँदी) + जीतल (ताँबा) |
| खलीफा मान्यता | नहीं | हाँ — 1229 ई., मनशूर प्राप्त |
| राजधानी | लाहौर | दिल्ली (स्थानांतरित की) |
| इतिहासकार मत | नाममात्र संस्थापक | वास्तविक संस्थापक |
ममलूक शब्द का अर्थ, उत्पत्ति एवं वंश का स्वरूप
‘ममलूक’ अरबी शब्द है जिसका अर्थ है — “जो किसी के स्वामित्व में हो” अर्थात् क्रय किया गया दास। इस वंश के प्रमुख शासक पहले गुलाम थे, इसीलिए इसे गुलाम वंश (Slave Dynasty) भी कहते हैं। यह दिल्ली सल्तनत का पहला और आधारभूत राजवंश था।
तीन नामों वाला एक ही वंश
दिल्ली सल्तनत — पाँच वंशों की तालिका
| क्र. | वंश | काल | संस्थापक | अंतिम शासक | BPSC महत्त्व |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | ममलूक (गुलाम) | 1206–1290 | कुतुबुद्दीन ऐबक | शम्सुद्दीन क्यूमर्स | अत्यधिक |
| 2 | खिलजी | 1290–1320 | जलालुद्दीन खिलजी | नासिरुद्दीन खुसरव | अधिक |
| 3 | तुगलक | 1320–1414 | गयासुद्दीन तुगलक | नासिरुद्दीन महमूद | अधिक |
| 4 | सैयद | 1414–1451 | खिज्र खाँ | अलाउद्दीन आलम | सामान्य |
| 5 | लोदी | 1451–1526 | बहलूल लोदी | इब्राहिम लोदी | अधिक |
ऐबक का जन्म तुर्किस्तान में हुआ। बाल्यकाल में निशापुर (ईरान) के बाज़ार में दास के रूप में बेचा गया। काजी फखरुद्दीन अब्दुल अजीज कूफी ने उसे खरीदा और अच्छी शिक्षा दी — कुरान कंठस्थ करवाई, तीरंदाजी और अश्वारोहण सिखाया।
काजी की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों ने ऐबक को पुनः बेच दिया। इस बार वह मुहम्मद गोरी के दरबार तक पहुँचा। गोरी ने उसकी असाधारण प्रतिभा पहचानी और अमीर-ए-आखुर (घुड़साल प्रमुख) बनाया। अपनी योग्यता से वह शीघ्र ही मुख्य सेनापति बन गया और भारत अभियान का सूत्रधार बना।
- लाखबख्श — लाखों दान देने की उदारता के कारण यह उपाधि
- कुरान खाँ — कुरान कंठस्थ होने के कारण यह उपाधि
- मृत्यु: 1210 ई., लाहौर, चौगान (पोलो) खेलते हुए घोड़े से गिरकर
- समाधि: लाहौर (पाकिस्तान) में स्थित है
दिल्ली सल्तनत की संरचना, प्रशासन एवं विशेषताएँ
दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक और राजनीतिक संरचना पूर्णतः नई थी — यह इस्लामी राज्य सिद्धांत पर आधारित थी जो भारत के लिए अपरिचित था। सुल्तान सर्वोच्च था, वह अल्लाह का प्रतिनिधि माना जाता था और खलीफा की मान्यता उसे वैधता देती थी।
सल्तनत की मुख्य विशेषताएँ
सुल्तान राज्य का सर्वोच्च प्रमुख — सैन्य, न्यायिक और धार्मिक अधिकारों का केंद्र। खलीफा का अनुमोदन आवश्यक था जो वैधता प्रदान करता था।
शरिया (इस्लामी कानून) राज्य का आधार था। काजी (न्यायाधीश) न्याय करता था। गैर-मुस्लिमों पर जज़िया कर लागू था।
विजित भूमि को इक्ता (जागीर) के रूप में अमीरों को दिया जाता था जो उससे सेना और राजस्व प्रदान करते थे। इल्तुतमिश ने इसे व्यवस्थित किया।
दीवान-ए-विज़ारत (राजस्व), दीवान-ए-अर्ज़ (सेना), दीवान-ए-इंशा (पत्राचार), दीवान-ए-रसालत (धार्मिक मामले) — ये चार प्रमुख विभाग थे।
साम्राज्य को इक्ता (प्रांतों) में विभाजित किया गया। प्रत्येक इक्ता का प्रमुख मुक्ति या वली कहलाता था। वह राजस्व इकट्ठा करता और सेना रखता था।
भूमि कर (खराज) — उपज का 1/3 से 1/2 भाग। व्यापार कर (ज़कात)। गैर-मुस्लिम कर (जज़िया)। युद्ध लूट (गनीमत) का 1/5 राज्य को।
सल्तनत काल के प्रमुख पद एवं उनके कार्य
इक्ता प्रणाली ममलूक काल की सबसे महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक देन थी। इल्तुतमिश ने इसे व्यवस्थित रूप दिया। बिहार और बंगाल में बख्तियार खिलजी की विजयों के बाद इन क्षेत्रों को इक्ता के रूप में वितरित किया गया।
बख्तियार खिलजी की मृत्यु (1206 ई.) के बाद बिहार-बंगाल में खिलजी अमीरों के बीच इक्ता को लेकर संघर्ष हुआ। इस क्षेत्र का पहला व्यवस्थित इक्ता प्रशासन इल्तुतमिश के काल में स्थापित हुआ जब उसने खिलजी अमीरों को अनुशासित किया।
- इक्ता = जागीर (भूमि अनुदान) — सैनिक सेवा के बदले
- मुक्ति = इक्ता का शासक — सेना और कर का प्रबंध
- इक्ता वंशानुगत नहीं था — सुल्तान की इच्छा पर निर्भर
- बिहार का इक्ता: लखनौती (बंगाल) और बिहार अलग-अलग इक्ता
बिहार पर दिल्ली सल्तनत का प्रभाव — 1206 ई. और उसके बाद
बिहार के इतिहास में 1206 ई. एक निर्णायक मोड़ था। इससे पहले ही बख्तियार खिलजी (ऐबक का अधीनस्थ सेनापति) ने बिहार की सांस्कृतिक, शैक्षिक और धार्मिक विरासत को गहरी चोट पहुँचाई थी। 1206 ई. के बाद बिहार औपचारिक रूप से दिल्ली सल्तनत का अंग बन गया।
बख्तियार खिलजी और बिहार — संक्षिप्त परिचय
इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी खिलजी जनजाति (अफगानिस्तान) का था। वह पहले कुतुबुद्दीन ऐबक का अधीनस्थ अधिकारी था। ऐबक ने उसे मिर्ज़ापुर-बदायूँ क्षेत्र में छोटी जागीर दी। वहाँ से उसने अपने साधनों से बिहार और बंगाल पर आक्रमण किया।
बिहार के महाविहारों का विनाश — BPSC का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु
| महाविहार | वर्तमान स्थान | अनुमानित विनाश | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|
| नालंदा | नालंदा जिला (राजगीर के निकट) | ~1199 ई. | विश्व का प्राचीनतम अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, 9 मंजिला पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ |
| विक्रमशिला | भागलपुर (अंतीचक गाँव) | ~1203 ई. | तांत्रिक बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र, पाल राजा धर्मपाल ने बनवाया |
| उदंतपुरी | बिहारशरीफ, नालंदा | ~1197 ई. | पाल राजा देवपाल द्वारा स्थापित — बिहार नाम की उत्पत्ति यहीं से |
| जगद्दला | बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) | ~1203 ई. | पाल राजा रामपाल द्वारा स्थापित, बंगाल विजय के समय नष्ट |
1206 ई. के बाद बिहार की राजनीतिक स्थिति
दिल्ली सल्तनत की स्थापना का महत्त्व एवं आलोचनात्मक विश्लेषण
दिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206 ई.) भारतीय इतिहास का एक युगांतकारी परिवर्तन था। इसने न केवल राजनीति बल्कि समाज, संस्कृति, धर्म और अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। BPSC Mains में इसके बहुआयामी प्रभावों का विश्लेषण अपेक्षित होता है।
सकारात्मक प्रभाव
- नई प्रशासनिक व्यवस्था: इक्ता, केंद्रीय विभाग और फारसी भाषा आधारित प्रशासन ने भारत में एक नई शासन पद्धति का सूत्रपात किया।
- वास्तुकला की नई शैली: कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, कुतुब मीनार — भारतीय-इस्लामी स्थापत्य (Indo-Islamic Architecture) का जन्म।
- व्यापार एवं मुद्रा: इल्तुतमिश के टंका और जीतल सिक्कों ने एकीकृत मौद्रिक व्यवस्था दी।
- सांस्कृतिक संश्लेषण: फारसी-अरबी और भारतीय परंपराओं के मेल से एक नई हिंदुस्तानी संस्कृति का उदय हुआ जिसने हिंदी, उर्दू और संगीत को समृद्ध किया।
- मंगोल रक्षा: बलबन के काल में मंगोल आक्रमणों से भारत की रक्षा — बिहार और पूर्वी भारत इससे बचे रहे।
नकारात्मक प्रभाव
- बौद्ध विरासत का नाश: नालंदा, विक्रमशिला का विध्वंस — हजारों वर्षों की बौद्धिक सम्पदा नष्ट।
- हिन्दू मंदिरों का विनाश: सोमनाथ, काशी, अजमेर — धार्मिक और सांस्कृतिक चोट।
- जज़िया कर: गैर-मुस्लिमों पर अतिरिक्त कर — आर्थिक भेदभाव।
- दास व्यापार: युद्धबंदियों को दास बनाकर बेचा गया — मानवाधिकारों का हनन।
- उत्तराधिकार का संकट: कोई स्पष्ट उत्तराधिकार नियम न होने से बार-बार गृहयुद्ध।
इतिहासकारों के दृष्टिकोण
इरफान हबीब के अनुसार दिल्ली सल्तनत ने भारत में एक नई आर्थिक व्यवस्था की नींव रखी जिसमें शहरीकरण और बाज़ार व्यवस्था का विकास हुआ।
सतीश चंद्र का मत है कि सल्तनत काल में भारतीयकरण (Indianization) की प्रक्रिया हुई — तुर्क शासक धीरे-धीरे भारतीय रीति-रिवाज अपनाने लगे।
R.P. Tripathi ने बलबन की नीतियों को सल्तनत की वास्तविक मज़बूती का आधार बताया।
मिन्हाज-ए-सिराज (तबकात-ए-नासिरी के लेखक) और जियाउद्दीन बरनी (तारीख-ए-फिरोजशाही) — दो प्रमुख समकालीन स्रोत जिनसे सल्तनत का इतिहास जाना जाता है।
- तबकात-ए-नासिरी — मिन्हाज-ए-सिराज — ममलूक काल का सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत
- ताज-उल-मासिर — हसन निज़ामी — ऐबक काल का विवरण
- तारीख-ए-फिरोज़शाही — जियाउद्दीन बरनी — बलबन से फिरोज़ तुगलक तक


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