जैन संप्रदाय — दिगम्बर एवं श्वेताम्बर
जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों — दिगम्बर एवं श्वेताम्बर — का उद्भव, विकास, मतभेद और बिहार से उनका संबंध BPSC Prelims एवं Mains दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
परिचय — संप्रदाय-भेद की पृष्ठभूमि
जैन धर्म में दिगम्बर और श्वेताम्बर संप्रदायों का विभाजन भारतीय धार्मिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है जो बिहार की भूमि से सीधे जुड़ी है। BPSC परीक्षा में यह विषय बार-बार पूछा जाता है।
भगवान महावीर के निर्वाण (527 ईपू) के बाद जैन धर्म एकीकृत रूप में लगभग दो शताब्दियों तक चलता रहा। परंतु ~298 ईपू में मगध (बिहार) में पड़े भीषण अकाल ने जैन संघ को दो भागों में बाँट दिया। जो मुनि बिहार से दक्षिण भारत चले गए वे दिगम्बर कहलाए, और जो बिहार में ही रहे वे धीरे-धीरे श्वेताम्बर परंपरा के रूप में विकसित हुए। इस विभाजन के पीछे केवल भौगोलिक दूरी नहीं, बल्कि धार्मिक आचरण, दर्शन और आगम-ग्रंथों की व्याख्या में उत्पन्न गहरे मतभेद थे।
दोनों नामों का अर्थ
अर्थात् जो दिशाओं (आकाश) को ही अपना वस्त्र मानते हैं — निर्वस्त्र साधु। यह नाम महावीर की स्वयं की साधना-पद्धति से जुड़ा है। महावीर ने गृहत्याग के समय वस्त्र त्याग दिए थे।
जो साधु-साध्वियाँ श्वेत (सफ़ेद) वस्त्र धारण करते हैं। इस परंपरा में वस्त्र-धारण को मोक्ष-मार्ग में बाधक नहीं माना जाता।
विभाजन का इतिहास — अकाल और पलायन
जैन संप्रदायों के विभाजन की कहानी बिहार के मगध राज्य में पड़े भीषण अकाल से शुरू होती है। यह घटनाक्रम चंद्रगुप्त मौर्य के काल से जुड़ा है और इतिहास के पन्नों में स्पष्ट रूप से दर्ज है।
विभाजन के मूल कारण
~298 ईपू में 12 वर्षीय भीषण अकाल। साधुओं के लिए भिक्षाटन असंभव। जीवित रहने के लिए कुछ मुनियों ने वस्त्र धारण किए — दिगम्बर मुनियों ने इसे अस्वीकार किया और दक्षिण चले गए।
दिगम्बर मानते हैं कि महावीर के मूल उपदेश (14 पूर्व) अकाल के बाद विस्मृत हो गए। श्वेताम्बर 45 आगम ग्रंथों को प्रामाणिक मानते हैं। यह मूलभूत वैचारिक भेद था।
मोक्ष के लिए वस्त्र-त्याग आवश्यक है या नहीं — यह केंद्रीय प्रश्न। दिगम्बर: वस्त्र परिग्रह (attachment) है अतः मोक्षार्थी को निर्वस्त्र रहना होगा। श्वेताम्बर: वस्त्र-धारण मोक्ष में बाधक नहीं।
दिगम्बर: स्त्री को निर्वस्त्र नहीं रहा जा सकता, अतः इसी जन्म में मोक्ष असंभव — अगले जन्म में पुरुष रूप में ही मोक्ष। श्वेताम्बर: स्त्री को भी इसी जन्म में मोक्ष संभव (19वीं तीर्थंकर मल्लिनाथ स्त्री थीं)।
दिगम्बर संप्रदाय — विस्तृत परिचय
दिगम्बर शब्द का अर्थ है — दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाले। यह संप्रदाय महावीर की मूल साधना-पद्धति का कड़ाई से पालन करने का दावा करता है और मुख्यतः दक्षिण भारत एवं मध्य भारत में प्रचलित है।
दिगम्बर संप्रदाय की मुख्य मान्यताएँ
- नग्नता अनिवार्य: मुनि (साधु) पूर्णतः निर्वस्त्र रहते हैं। वस्त्र परिग्रह है जो मोक्ष-मार्ग में बाधक। महावीर ने स्वयं वस्त्र त्यागे थे।
- स्त्री-मोक्ष असंभव: स्त्री इस जन्म में मोक्ष नहीं पा सकती। उसे पहले पुरुष-देह प्राप्त करनी होगी। स्त्री-साध्वियाँ (आर्यिका) वस्त्र पहनती हैं और श्रावक-वर्ग में गिनी जाती हैं।
- आगम-अप्रामाणिकता: मूल 14 पूर्व और 12 अंग विस्मृत हो चुके। श्वेताम्बर द्वारा संकलित 45 आगम प्रामाणिक नहीं।
- हाथ में भोजन: मुनि अपनी हथेलियों को पात्र के रूप में उपयोग करते हैं — कोई बर्तन नहीं।
- महावीर का विवाह नहीं: महावीर आजीवन ब्रह्मचारी थे, उनका कोई विवाह नहीं हुआ।
- केवलज्ञान के बाद भोजन नहीं: केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद तीर्थंकर को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती।
प्रमुख दिगम्बर आचार्य एवं ग्रंथकार
- भद्रबाहु (4थी शताब्दी ईपू): अंतिम श्रुतकेवली; कल्पसूत्र के रचनाकार; चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु।
- कुंदकुंदाचार्य (1-2 शताब्दी ई.): समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय — दिगम्बर दर्शन के मूल ग्रंथ।
- उमास्वाति / उमास्वामी (2 शताब्दी ई.): तत्त्वार्थसूत्र — दोनों संप्रदायों में मान्य एकमात्र ग्रंथ।
- पूज्यपाद (5-6 शताब्दी ई.): सर्वार्थसिद्धि।
- अकलंक (8 शताब्दी ई.): राजवार्तिक, तत्त्वार्थवार्तिक।
दिगम्बर की उपशाखाएँ
| उपसंप्रदाय | विशेषता | प्रमुख केंद्र |
|---|---|---|
| मूलसंघ | सबसे पुराना और बड़ा दिगम्बर संघ; कुंदकुंद परंपरा | कर्नाटक, मध्यप्रदेश |
| काष्ठासंघ | मूलसंघ से अलग; कुछ भिन्न आचरण | उत्तर भारत |
| बिसपंथ | देवी-पूजा, भट्टारक (पुजारी-संस्था) को स्वीकार करते हैं | राजस्थान, मध्यप्रदेश |
| तेरापंथ (दिगम्बर) | भट्टारक-व्यवस्था का विरोध; मूर्तिपूजा में सीमित विश्वास; बनारसीदास द्वारा 17वीं शताब्दी में स्थापित | आगरा, जयपुर |
| तारणपंथ | मूर्तिपूजा का पूर्ण विरोध; केवल शास्त्र-पूजा; तारण स्वामी (15-16 शताब्दी) द्वारा स्थापित | मध्यप्रदेश (बुंदेलखंड) |
दिगम्बर संप्रदाय के प्रमुख ग्रंथ
- षट्खंडागम: दिगम्बर का सर्वाधिक प्राचीन और प्रामाणिक आगम। पुष्पदंत और भूतबलि द्वारा रचित (1-2 शताब्दी ई.)।
- कषायपाहुड (कषायप्राभृत): गुणधर आचार्य रचित; षट्खंडागम के साथ दिगम्बर का मूल आगम-जोड़ा।
- समयसार: कुंदकुंदाचार्य रचित; आत्मा और मोक्ष की अनुपम व्याख्या।
- तत्त्वार्थसूत्र: उमास्वाति रचित; दोनों संप्रदायों में मान्य — जैन दर्शन का सर्वाधिक सुव्यवस्थित ग्रंथ।
- आदिपुराण: जिनसेन आचार्य रचित; ऋषभदेव की कथा।
श्वेताम्बर संप्रदाय — विस्तृत परिचय
श्वेताम्बर संप्रदाय मुख्यतः गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में प्रचलित है। यह संप्रदाय 45 आगम ग्रंथों को प्रामाणिक मानता है और स्त्री-मोक्ष को स्वीकार करता है।
श्वेताम्बर संप्रदाय की मुख्य मान्यताएँ
- श्वेत वस्त्र: साधु-साध्वियाँ श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। मुँह पर मुखवस्त्रिका (रजोहरण) बाँधते हैं ताकि श्वास लेने में सूक्ष्म जीवों की हिंसा न हो।
- स्त्री-मोक्ष संभव: स्त्री को भी इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त हो सकता है। 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ स्त्री थीं (दिगम्बर इसे अस्वीकार करते हैं)।
- 45 आगम प्रामाणिक: स्थूलभद्र के काल से संकलित और वल्लभी संगीति (512 ईपू) में लिखित रूप में संरक्षित 45 आगम ग्रंथ प्रामाणिक हैं।
- पात्र में भोजन: मुनि पात्र (बर्तन) में भिक्षा ग्रहण करते हैं।
- महावीर का विवाह हुआ था: महावीर ने यशोदा से विवाह किया था और उनकी पुत्री प्रियदर्शना (अणोज्जा) थी।
- केवलज्ञान के बाद भोजन: केवलज्ञानी को भी सांसारिक आवश्यकताएँ रहती हैं।
- तीर्थंकर की मूर्तियाँ: आभूषणों और वस्त्रों से सजाई जाती हैं (दिगम्बर में सादी)।
प्रमुख श्वेताम्बर आचार्य
- स्थूलभद्र (4 शताब्दी ईपू): प्रथम जैन संगीति के अध्यक्ष; श्वेताम्बर परंपरा के पितामह।
- देवर्द्धि क्षमाश्रमण (5-6 शताब्दी ई.): वल्लभी संगीति के अध्यक्ष; आगम ग्रंथों को लिखित रूप दिया।
- हेमचंद्राचार्य (1088–1172 ई.): योगशास्त्र, त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित; गुजरात के राजा कुमारपाल के गुरु; “जैनों के सर्वज्ञ”।
- हरिभद्र सूरि (8 शताब्दी ई.): षड्दर्शनसमुच्चय — सभी दर्शनों का तुलनात्मक विवेचन।
श्वेताम्बर की उपशाखाएँ
| उपसंप्रदाय | विशेषता | स्थापना |
|---|---|---|
| मूर्तिपूजक (देरावासी) | मंदिरों में मूर्ति-पूजा; तीर्थंकरों को आभूषण पहनाते हैं; मुनि को पात्र और वस्त्र दोनों | प्राचीनतम उपशाखा |
| स्थानकवासी | मूर्तिपूजा का विरोध; मंदिर की बजाय स्थानक (कमरे) में पूजा; मुँह पर सदा रजोहरण | लोंकाशाह (15 शताब्दी ई.) |
| तेरापंथ (श्वेताम्बर) | मूर्तिपूजा का विरोध; सामाजिक सेवा पर बल; भिक्षाटन केवल मुनियों के लिए; अणुव्रत आंदोलन | भिक्षु स्वामी (1760 ई., राजस्थान) |
श्वेताम्बर के 45 आगम ग्रंथ — संरचना
| वर्ग | संख्या | प्रमुख ग्रंथ |
|---|---|---|
| 12 अंग | 12 | आचारांग सूत्र (सर्वप्राचीन), सूत्रकृतांग, स्थानांग, भगवतीसूत्र |
| 12 उपांग | 12 | औपपातिक, राजप्रश्नीय, जीवाजीवाभिगम |
| 10 प्रकीर्णक | 10 | महापरिज्ञा, आउरपच्चक्खाण |
| 6 छेदसूत्र | 6 | दशाश्रुतस्कंध, बृहत्कल्प, व्यवहार |
| 4 मूलसूत्र | 4 | उत्तराध्ययन, आवश्यक, दशवैकालिक, पिंडनिर्युक्ति |
| 2 चूलिकासूत्र | 2 | नंदीसूत्र, अनुयोगद्वार |
| योग | 46 (45+1) | 12वाँ अंग (दृष्टिवाद) विस्मृत माना जाता है; 45 उपलब्ध |
दोनों संप्रदायों की तुलना — प्रमुख मतभेद
BPSC Prelims और Mains दोनों में दिगम्बर और श्वेताम्बर की तुलना सर्वाधिक पूछा जाने वाला विषय है। नीचे सम्पूर्ण और परीक्षोपयोगी तुलना दी गई है।
| विषय | दिगम्बर 🌑 | श्वेताम्बर ⬜ |
|---|---|---|
| नाम का अर्थ | दिशाएँ = वस्त्र (निर्वस्त्र) | श्वेत = वस्त्र (श्वेत वस्त्रधारी) |
| वस्त्र | मुनि पूर्णतः निर्वस्त्र | मुनि-साध्वी श्वेत वस्त्र |
| भोजन पात्र | हाथ की हथेलियाँ | पात्र (बर्तन) |
| स्त्री मोक्ष | इस जन्म में असंभव | इस जन्म में संभव |
| साध्वी की स्थिति | आर्यिका — श्रावक-वर्ग जैसी | साध्वी — पूर्ण मुनि-तुल्य |
| 19वें तीर्थंकर मल्लिनाथ | पुरुष थे | स्त्री थीं |
| महावीर का विवाह | नहीं हुआ — आजीवन ब्रह्मचारी | यशोदा से विवाह हुआ था |
| महावीर की पुत्री | नहीं मानते | प्रियदर्शना (अणोज्जा) |
| केवलज्ञान के बाद | भोजन आवश्यकता नहीं | भोजन आवश्यकता रहती है |
| आगम ग्रंथ | मूल आगम विस्मृत; वर्तमान ग्रंथ अप्रामाणिक | 45 आगम ग्रंथ प्रामाणिक |
| प्रथम संगीति | अस्वीकार करते हैं | स्वीकार करते हैं (स्थूलभद्र अध्यक्ष) |
| तीर्थंकर मूर्ति | सादी, बिना आभूषण | आभूषणयुक्त, वस्त्रसहित |
| मुख्य प्रसार क्षेत्र | कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान | गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र |
| प्रमुख तीर्थस्थल | श्रवणबेलगोला, सम्मेद शिखर | पालिताना, राणकपुर, माउंट आबू |
| चंद्रगुप्त मौर्य | दिगम्बर बने; भद्रबाहु के शिष्य | श्वेताम्बर नहीं मानते |
| विभाजन के पूर्वज | भद्रबाहु | स्थूलभद्र |
| भाषा (आगम) | शौरसेनी प्राकृत | अर्धमागधी प्राकृत |
| प्रमुख आचार्य | कुंदकुंद, उमास्वाति, अकलंक | हेमचंद्र, हरिभद्र, देवर्द्धि |
साझा मान्यताएँ (जो दोनों में समान हैं)
- 24 तीर्थंकर: दोनों 24 तीर्थंकरों की परंपरा को मानते हैं (मल्लिनाथ के लिंग को छोड़कर)।
- पंच महाव्रत: दोनों संप्रदायों के मुनि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह के पाँच व्रत मानते हैं।
- त्रिरत्न: सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र — दोनों में समान।
- अनेकांतवाद और स्यादवाद: दोनों संप्रदाय इसे स्वीकार करते हैं।
- कर्म सिद्धांत: आत्मा पर कर्म-परमाणु चिपकते हैं — यह भौतिक मान्यता दोनों की साझा है।
- अहिंसा: जीवन का सर्वोच्च नैतिक मूल्य — दोनों की एकमत मान्यता।
- सम्मेद शिखर: दोनों इसे पवित्र तीर्थ मानते हैं (20 तीर्थंकरों का निर्वाण)।
जैन आगम ग्रंथ और संगीतियाँ
जैन धर्म की दोनों संगीतियाँ और आगम ग्रंथों का विवाद संप्रदाय-भेद के केंद्र में हैं। BPSC Prelims में संगीतियों के स्थान और अध्यक्ष बार-बार पूछे जाते हैं।
काल: ~300 ईपू
अध्यक्ष: स्थूलभद्र
कार्य: 12 अंगों का संकलन; आगम ग्रंथों को व्यवस्थित किया।
विवाद: दिगम्बर इसे अस्वीकार करते हैं। उनके अनुसार भद्रबाहु (जो दक्षिण गए थे) की अनुपस्थिति में यह संगीति अधूरी थी।
काल: ~512 ईपू (कुछ विद्वान 5वीं-6वीं शताब्दी ई. मानते हैं)
अध्यक्ष: देवर्द्धि क्षमाश्रमण
कार्य: आगम ग्रंथों को लिखित रूप दिया — पहले ये केवल मौखिक परंपरा में थे।
महत्त्व: श्वेताम्बर के 45 आगम इसी संगीति में लिपिबद्ध हुए।
14 पूर्व — विलुप्त ज्ञान
जैन परंपरा में 14 पूर्व (पूर्वज्ञान) माने जाते हैं जो महावीर द्वारा उनके गणधरों को प्रदान किए गए थे। दिगम्बर मान्यता के अनुसार अकाल और समय के साथ ये 14 पूर्व पूर्णतः विस्मृत हो गए। अंतिम जिन्हें 14 पूर्वों का पूर्ण ज्ञान था, वे भद्रबाहु थे — इसीलिए उन्हें श्रुतकेवली (श्रुतज्ञान के अंतिम धारक) कहा जाता है।
| क्र. | अंग का नाम | विषय-वस्तु |
|---|---|---|
| 1 | आचारांग सूत्र | मुनियों का आचरण, महावीर की तपस्या का वर्णन; सर्वप्राचीन जैन ग्रंथ |
| 2 | सूत्रकृतांग | विभिन्न दर्शनों का खंडन; अहिंसा और आत्मा |
| 3 | स्थानांग | एक से दस तक के विषयों का वर्गीकरण |
| 4 | समवायांग | संख्यात्मक वर्गीकरण |
| 5 | भगवतीसूत्र (व्याख्याप्रज्ञप्ति) | सर्वाधिक विस्तृत; महावीर के उपदेश प्रश्नोत्तर रूप में |
| 6 | ज्ञातृधर्मकथांग | धार्मिक कथाएँ |
| 7 | उपासकदशांग | 10 श्रावकों की कथाएँ |
| 8 | अंतगडदशांग | 10 मुनियों की मोक्ष-कथाएँ |
| 9 | अनुत्तरोवाइयदशांग | अनुत्तर स्वर्ग के देवों की कथाएँ |
| 10 | प्रश्नव्याकरण | पाँच महाव्रत और उनके भेद |
| 11 | विपाकश्रुत | कर्म के फल की कथाएँ |
| 12 | दृष्टिवाद (विलुप्त) | 14 पूर्वों का संग्रह — अब उपलब्ध नहीं |
बिहार से संबंध — चंद्रगुप्त, पाटलिपुत्र और पावापुरी
जैन संप्रदायों के विभाजन की जड़ें बिहार की मिट्टी में हैं। पाटलिपुत्र से दिगम्बर साधुओं का दक्षिण-पलायन, वैशाली में महावीर का जन्म, और पावापुरी में निर्वाण — ये सभी BPSC की दृष्टि से परीक्षोपयोगी तथ्य हैं।
चंद्रगुप्त मौर्य और जैन धर्म
~321–298 ईपूचंद्रगुप्त मौर्य ने मगध में महान मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। उनके दरबार में जैन आचार्य भद्रबाहु का विशेष प्रभाव था। जब ~298 ईपू में मगध में अकाल पड़ा, चंद्रगुप्त ने राज्य त्याग कर भद्रबाहु के साथ दक्षिण भारत (कर्नाटक) की यात्रा की। श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में उन्होंने सल्लेखना (संथारा) — जैन पद्धति से उपवास रखते हुए देह-त्याग — किया।
दिगम्बर जैन भद्रबाहु के शिष्य श्रवणबेलगोला में निधनबिहार के प्रमुख जैन स्थल
तीर्थस्थल एवं ऐतिहासिक महत्त्वबिहार में जैन धर्म के अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल हैं जो दोनों संप्रदायों द्वारा पूजित हैं।
पावापुरी — महावीर निर्वाण वैशाली — महावीर जन्म पाटलिपुत्र — प्रथम संगीति राजगीर — प्रथम उपदेश| स्थान | जिला | महत्त्व | संप्रदाय |
|---|---|---|---|
| पावापुरी | नालंदा | महावीर का निर्वाण स्थल (527 ईपू); जलमंदिर सरोवर के बीच; सर्वाधिक पवित्र तीर्थ | दोनों |
| कुंडग्राम (वैशाली) | वैशाली / मुजफ्फरपुर | महावीर का जन्मस्थान (599 ईपू); जन्मस्थली मंदिर स्थित | दोनों |
| राजगीर (राजगृह) | नालंदा | महावीर का प्रथम उपदेश (विपुलाचल पर्वत); मगध की प्रारंभिक राजधानी | दोनों |
| पाटलिपुत्र | पटना | प्रथम जैन संगीति (~300 ईपू); अध्यक्ष स्थूलभद्र; चंद्रगुप्त मौर्य की राजधानी | श्वेताम्बर |
| चम्पापुरी | भागलपुर | 12वें तीर्थंकर वासुपूज्य का जन्मस्थान; प्राचीन अंग महाजनपद की राजधानी | दोनों |
| सम्मेद शिखर | गिरिडीह (झारखंड) | 20 तीर्थंकरों का निर्वाण; पार्श्वनाथ पर्वत; दोनों संप्रदायों का सर्वप्रमुख तीर्थ | दोनों |
दोनों संप्रदायों के प्रमुख तीर्थस्थल
दिगम्बर और श्वेताम्बर संप्रदायों के तीर्थस्थल न केवल धार्मिक बल्कि स्थापत्य-कला के भी अनुपम केंद्र हैं। BPSC में इनसे संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।
दिगम्बर संप्रदाय के प्रमुख तीर्थ
श्वेताम्बर संप्रदाय के प्रमुख तीर्थ
Mains विश्लेषण — महत्त्व, आलोचना एवं समकालीन प्रासंगिकता
BPSC Mains में जैन संप्रदायों के विभाजन को केवल इतिहास की घटना के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता, स्त्री-अधिकार, पर्यावरण और आधुनिक समाज के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
जैन संप्रदाय — ऐतिहासिक महत्त्व
एक ही मूल धर्म से दो संप्रदायों का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व भारतीय सहिष्णुता की परंपरा का उदाहरण है। दोनों संप्रदायों में कभी हिंसक संघर्ष नहीं हुआ।
श्वेताम्बर संप्रदाय ने 45 आगम ग्रंथों को लिखित रूप में संरक्षित किया। दिगम्बर ने षट्खंडागम और समयसार जैसे ग्रंथ रचे। दोनों ने प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य का विकास किया।
श्वेताम्बर की स्त्री-मोक्ष की अवधारणा प्राचीन भारत में नारी-समानता की एक प्रगतिशील सोच थी। दिगम्बर की आर्यिका व्यवस्था में भी स्त्रियों को धार्मिक जीवन का अवसर मिला।
दोनों संप्रदायों ने भारतीय स्थापत्य को अमूल्य योगदान दिया — दिगम्बर ने गोमतेश्वर प्रतिमा और श्वेताम्बर ने दिलवाड़ा मंदिर जैसी कृतियाँ। ये भारत की सांस्कृतिक विरासत हैं।
आलोचनाएँ एवं विवाद
- दिगम्बर में स्त्री-भेद: स्त्री को इस जन्म में मोक्ष न मिलने की मान्यता आधुनिक मानवाधिकार की दृष्टि से विवादास्पद है। आर्यिकाओं को पूर्ण मुनि-तुल्य दर्जा नहीं।
- सल्लेखना (संथारा) विवाद: 2015 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने इसे आत्महत्या घोषित किया था — बाद में उच्चतम न्यायालय ने स्थगन दिया। यह जैन समुदाय के लिए संवेदनशील विषय है।
- संप्रदाय-भेद का सामाजिक प्रभाव: दोनों संप्रदायों के बीच मंदिर, तीर्थस्थल और आगम को लेकर ऐतिहासिक विवाद रहे हैं।
- सम्मेद शिखर विवाद (2022-23): झारखंड सरकार के पर्यटन स्थल घोषित करने के निर्णय पर दोनों संप्रदायों ने एकजुट होकर विरोध किया — यह उनकी साझा धार्मिक पहचान का प्रमाण।
समकालीन प्रासंगिकता
- अहिंसा और पर्यावरण: जैन धर्म का अहिंसा-सिद्धांत आधुनिक पर्यावरण आंदोलन का अग्रदूत है। जीव-जगत की रक्षा का विचार आज जैव-विविधता संरक्षण से मेल खाता है।
- अणुव्रत आंदोलन: तेरापंथी आचार्य तुलसी द्वारा प्रारंभ, आधुनिक समाज में नैतिक जीवन-शैली का आह्वान।
- जैन व्यापारी-वर्ग: गुजरात और राजस्थान के जैन व्यापारी समुदाय ने भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- अंतर्राष्ट्रीय मान्यता: संयुक्त राष्ट्र ने जैन धर्म के अहिंसा-सिद्धांत को SDGs (Sustainable Development Goals) से जोड़कर देखा है।
उत्तर-रूपरेखा: (1) भूमिका — महावीर के बाद जैन धर्म (2) विभाजन के कारण — अकाल, भद्रबाहु-स्थूलभद्र, आगम-विवाद (3) मुख्य मतभेद — तालिका सहित (4) साझा मान्यताएँ (5) योगदान — आगम-संरक्षण, कला, भाषा, स्त्री-विमर्श (6) आलोचना (7) समकालीन प्रासंगिकता। शब्द-सीमा: 250-300 शब्द।


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