बिहार की मानसून प्रणाली
मानसून का आगमन, वापसी, वर्षा वितरण एवं प्रभाव — Bihar Govt. Competitive Exams एवं बिहार राज्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय — मानसून क्या है और बिहार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
बिहार की जलवायु एवं कृषि का आधार दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) है। बिहार की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 80–85% भाग केवल मानसून काल (जून–सितंबर) में प्राप्त होता है। Bihar Govt. Competitive Exams एवं अन्य बिहार प्रतियोगी परीक्षाओं में मानसून से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
मानसून (Monsoon) शब्द अरबी भाषा के “मौसिम” से बना है, जिसका अर्थ है — ऋतु या मौसम। मानसून एक मौसमी पवन तंत्र (Seasonal Wind System) है जिसमें हवाओं की दिशा ग्रीष्म और शीत ऋतु में परस्पर विपरीत हो जाती है। भारत और बिहार में मानसून हिंद महासागर से आर्द्र हवाएँ लेकर आता है।
मानसून के प्रकार — भारत में दो शाखाएँ
| शाखा | उत्पत्ति | बिहार पर प्रभाव | वर्षा की मात्रा |
|---|---|---|---|
| बंगाल की खाड़ी शाखा (Bay of Bengal Branch) | बंगाल की खाड़ी; उत्तर-पश्चिम दिशा में गति | प्रमुख शाखा — बिहार पर सर्वाधिक प्रभाव; पूर्व से प्रवेश | अधिक — 70–80% वर्षा इसी से |
| अरब सागर शाखा (Arabian Sea Branch) | अरब सागर; उत्तर-पूर्व दिशा में गति | पश्चिमी बिहार पर सीमित प्रभाव; मुख्यतः पश्चिम भारत को प्रभावित करती है | कम — 20–30% वर्षा |
मानसून का आगमन — बिहार में कब और कैसे?
दक्षिण-पश्चिम मानसून प्रतिवर्ष केरल (1 जून) से भारत में प्रवेश करता है और क्रमशः उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ते हुए जून के प्रथम सप्ताह में बिहार पहुँचता है। बिहार में मानसून का यह आगमन खरीफ बुआई का संकेत होता है।
मानसून के आगमन से पूर्व बिहार में पूर्व-मानसून वर्षा (Pre-Monsoon Rain) होती है, जिसे स्थानीय रूप से “नॉर्वेस्टर (Norwesters)” या “काल बैशाखी” कहते हैं। ये तेज़ आँधी-तूफान मई-जून में आते हैं और कुछ राहत देते हैं। इसके बाद वास्तविक मानसून की वर्षा शुरू होती है।
मानसून का भारत में क्रमिक आगमन
मानसून आगमन के कारण — वैज्ञानिक व्याख्या
ग्रीष्म ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप अत्यधिक गर्म हो जाता है, जिससे निम्न वायुदाब (Low Pressure) का क्षेत्र बनता है। हिंद महासागर अपेक्षाकृत ठंडा होने के कारण उच्च वायुदाब (High Pressure) का क्षेत्र होता है। हवाएँ उच्च से निम्न वायुदाब की ओर (समुद्र से भूमि की ओर) चलती हैं — यही मानसून है।
सामान्यतः पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet) हिमालय के दक्षिण में प्रवाहित होती है। जून में यह उत्तर की ओर खिसककर हिमालय के पार चली जाती है। इससे दक्षिण-पश्चिम मानसून का मार्ग खुल जाता है और वह तेज़ी से भारत में प्रवेश करता है।
Inter-Tropical Convergence Zone (ITCZ) — जिसे मानसून का इंजन कहा जाता है — ग्रीष्म ऋतु में उत्तर की ओर गंगा के मैदान तक खिसक आता है। इससे उष्णकटिबंधीय हवाओं का अभिसरण बिहार तक होता है और वर्षा होती है।
हिमालय पर्वत श्रृंखला मानसूनी हवाओं को उत्तर में आगे जाने से रोकती है। इससे नम हवाएँ हिमालय की तलहटी में टकराती हैं और भारी वर्षा करती हैं। उत्तरी बिहार इसी तलहटी क्षेत्र में है — इसीलिए वहाँ अधिक वर्षा होती है।
मानसून आगमन से पहले (अप्रैल-जून) बिहार में तड़ित-झंझावात (Thunderstorm) आते हैं, जिन्हें पूर्वोत्तर भारत और बंगाल में काल बैशाखी (Kal Baisakhi) और बिहार में Norwesters कहते हैं।
- समय: अप्रैल-मई; अपराह्न/संध्या में अचानक।
- कारण: ज़मीन की गर्मी से उठने वाली नम हवाओं का संघनन।
- विशेषता: तेज़ हवा, बिजली, ओले, छोटी अवधि की भारी वर्षा।
- लाभ: ग्रीष्म की तपन से राहत; आम के पकने में सहायक।
- हानि: कभी-कभी ओलावृष्टि से फसल एवं सम्पत्ति का नुकसान।
बिहार में वर्षा वितरण एवं क्षेत्रीय भिन्नता
बिहार में वर्षा का वितरण एकसमान नहीं है। उत्तर-पूर्वी बिहार सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करता है, जबकि दक्षिण-पश्चिमी बिहार अपेक्षाकृत कम वर्षा पाता है। यह असमान वितरण ही बिहार में एक तरफ बाढ़ और दूसरी तरफ सूखे की समस्या का कारण है।
बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा
| क्र. | क्षेत्र / जिले | औसत वार्षिक वर्षा | कारण |
|---|---|---|---|
| 1 | उत्तर-पूर्वी बिहार (किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार) | 1500–2000 mm (सर्वाधिक) | हिमालय तलहटी + बंगाल की खाड़ी शाखा का सीधा प्रभाव |
| 2 | उत्तर-मध्य बिहार (दरभंगा, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, मधुबनी) | 1200–1500 mm | हिमालय का अवरोध + नदियों की निकटता |
| 3 | मध्य बिहार (पटना, नालंदा, गया, नवादा) | 1000–1200 mm | औसत — मानसून का मध्यवर्ती प्रभाव |
| 4 | दक्षिण-पश्चिम बिहार (रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद) | 800–1000 mm (न्यूनतम) | हिमालय से दूर + छोटानागपुर पठार का आश्रय प्रभाव |
| 5 | पूर्वी बिहार (भागलपुर, बाँका, जमुई) | 1100–1300 mm | बंगाल की खाड़ी शाखा का प्रारंभिक प्रभाव |
मासिक वर्षा वितरण — पटना (प्रतिनिधि आँकड़े)
किशनगंज बिहार का सर्वाधिक वर्षा वाला जिला है (1600–2000 mm से अधिक)। इसके कारण हैं:
- हिमालय की तलहटी: मानसूनी हवाएँ हिमालय से टकराकर भारी वर्षा करती हैं।
- बंगाल की खाड़ी शाखा: यह शाखा सीधे उत्तर-पूर्व बिहार से गुज़रती है।
- तराई क्षेत्र: घने वन और आर्द्र भूमि वाष्पीकरण बढ़ाते हैं — स्थानीय वर्षा भी होती है।
- भौगोलिक स्थिति: सिक्किम और पश्चिम बंगाल की पहाड़ियों से आने वाली नम हवाएँ इस क्षेत्र में संघनित होती हैं।
रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद बिहार के अपेक्षाकृत कम वर्षा वाले जिले हैं (800–1000 mm)। इसके कारण:
- छोटानागपुर पठार का आश्रय (Rain Shadow): झारखंड की पहाड़ियाँ दक्षिण से आने वाली नम हवाओं को रोक लेती हैं।
- हिमालय से दूरी: उत्तरी बिहार की तुलना में मानसून कमज़ोर पड़ जाता है।
- वायु का शुष्क होना: लंबी दूरी तय करने से मानसूनी हवाओं की नमी कम हो जाती है।
मानसून की वापसी — Retreating Monsoon
सितंबर के अंत से दक्षिण-पश्चिम मानसून धीरे-धीरे भारत से वापस जाने लगता है। इस प्रक्रिया को मानसून की वापसी (Retreating Monsoon) कहते हैं। बिहार से मानसून की पूर्ण वापसी अक्टूबर तक हो जाती है।
मानसून की वापसी के दौरान हवाओं की दिशा बदल जाती है — वे भूमि से समुद्र की ओर (स्थल-समीर) चलने लगती हैं। इस काल में आकाश स्वच्छ होने लगता है, वर्षा घटती है और तापमान में क्रमिक गिरावट शुरू होती है। यही शरद ऋतु (Autumn) का संकेत है।
मानसून वापसी — क्रमिक प्रक्रिया
मानसून वापसी के कारण
सितंबर से सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने लगती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप ठंडा होने लगता है, निम्न वायुदाब केंद्र कमज़ोर पड़ जाता है — समुद्र से हवाएँ खींचने की क्षमता घटती है।
जो पश्चिमी जेट स्ट्रीम जून में उत्तर की ओर खिसकी थी, वह सितंबर-अक्टूबर में वापस दक्षिण (हिमालय के दक्षिण) की ओर आ जाती है। इससे मानसून का मार्ग अवरुद्ध होता है।
सूर्य के दक्षिणायन (Southern Solstice) के साथ ITCZ भी दक्षिण की ओर खिसकने लगता है। इससे मानसूनी हवाओं का अभिसरण बिहार से दूर हो जाता है और वर्षा बंद होती है।
सितंबर के बाद भारत का तापमान गिरता है, वायुदाब बढ़ता है। अब भूमि पर उच्च वायुदाब और समुद्र पर निम्न वायुदाब की स्थिति बनती है — हवाएँ भूमि से समुद्र की ओर लौटती हैं।
मानसून के प्रभाव — कृषि, नदियाँ एवं जनजीवन
मानसून बिहार के कृषि, जल-संसाधन, अर्थव्यवस्था और जनजीवन का केंद्र है। एक सामान्य मानसून वर्ष बिहार की कृषि उत्पादकता और GDP को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
- खरीफ फसलें: धान, मक्का, अरहर, मूँगफली की पूर्ण निर्भरता।
- भूजल पुनर्भरण: कुआँ, तालाब, नलकूप रिचार्ज होते हैं।
- नदियों में प्रवाह: गंगा, कोसी, गंडक में जलस्तर बढ़ता है।
- पशुपालन: चारागाह हरे-भरे होते हैं।
- सिंचाई: नहर प्रणाली में पानी की आपूर्ति।
- पर्यावरण: वन और वनस्पति का पुनरुद्धार।
- बाढ़: कोसी, गंडक, बागमती उफनती हैं — उत्तरी बिहार सर्वाधिक प्रभावित।
- फसल नुकसान: धान की खड़ी फसल डूब सकती है।
- जनजीवन बाधित: मकान, सड़क, पुल क्षतिग्रस्त।
- बीमारियाँ: मलेरिया, डायरिया, कालाज़ार का प्रकोप।
- भूमि कटाव: नदियाँ कृषि भूमि को बहाती हैं।
मानसून काल में बिहार की प्रमुख खरीफ फसलें
| फसल | बुआई | कटाई | प्रमुख जिले |
|---|---|---|---|
| धान (Paddy) | जून–जुलाई | अक्टूबर–नवंबर | रोहतास, भोजपुर, पटना, बेगूसराय |
| मक्का (Maize) | जून–जुलाई | सितंबर–अक्टूबर | सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया |
| अरहर (Pigeon Pea) | जून | नवंबर–दिसंबर | औरंगाबाद, गया, नालंदा |
| मूँग / उड़द | जुलाई | सितंबर–अक्टूबर | दक्षिण बिहार |
| मूँगफली | जून–जुलाई | अक्टूबर | गया, जहानाबाद |
| सोयाबीन | जून–जुलाई | सितंबर–अक्टूबर | दक्षिण-पूर्वी बिहार |
मानसून की अनिश्चितता — बाढ़ एवं सूखे की समस्या
बिहार की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाएँ — बाढ़ (Flood) और सूखा (Drought) — दोनों का मूल कारण मानसून की अनिश्चितता है। अत्यधिक वर्षा बाढ़ लाती है, तो अल्प वर्षा सूखे को जन्म देती है।
बिहार को “बाढ़ का राज्य” कहा जाता है। भारत की कुल बाढ़-प्रभावित भूमि का लगभग 17% अकेले बिहार में है।
- कारण: नेपाल में भारी वर्षा → नदियों में अचानक उफान।
- सर्वाधिक प्रभावित: दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, सहरसा, मुजफ्फरपुर।
- कोसी नदी: “बिहार का शोक (Sorrow of Bihar)” — सर्वाधिक बाढ़।
- 2008 कोसी बाढ़: बिहार की सबसे भीषण बाढ़ — 35 लाख+ प्रभावित।
- गंडक बाढ़: पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर प्रभावित।
जब मानसून कमज़ोर पड़ता है या देर से आता है तो दक्षिण बिहार (गया, औरंगाबाद, रोहतास) में सूखे की स्थिति बनती है।
- कारण: El Niño + कमज़ोर मानसून + कम वर्षा वाला क्षेत्र।
- सर्वाधिक प्रभावित: गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा।
- प्रभाव: धान की रोपाई नहीं हो पाती, पेयजल संकट।
- मागध क्षेत्र: ऐतिहासिक रूप से सूखा-संवेदनशील।
बाढ़ बनाम सूखा — तुलना
| पहलू | 🌊 बाढ़ | 🏜️ सूखा |
|---|---|---|
| कारण | अत्यधिक वर्षा + नेपाली नदियाँ उफान | अल्प वर्षा + El Niño प्रभाव |
| प्रभावित क्षेत्र | उत्तर बिहार — तराई क्षेत्र | दक्षिण-पश्चिम बिहार — मगध क्षेत्र |
| प्रमुख नदी | कोसी (बिहार का शोक) | कोई नदी नहीं या सूख जाती हैं |
| फसल नुकसान | खड़ी धान डूबती है | धान रोप नहीं पाते |
| सरकारी उपाय | तटबंध, बाढ़ चेतावनी, NDRF | सिंचाई, MGNREGA, किसान मुआवज़ा |
- कोसी नदी — “बिहार का शोक”: बार-बार अपना मार्ग बदलती है; तटबंध टूटने से भारी तबाही।
- एक साथ बाढ़ और सूखा: एक ही वर्ष उत्तर में बाढ़ और दक्षिण में सूखा — प्रशासनिक चुनौती।
- मानसून की देरी: खरीफ बुआई पर असर; धान की रोपाई प्रभावित।
- जलवायु परिवर्तन: मानसून की अनिश्चितता बढ़ रही है — अनियमित वर्षा पैटर्न।
अभ्यास MCQ, परीक्षा प्रश्न एवं सारांश
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