बिहार की मानसून अनियमितता
मानसून की अनिश्चितता, अनियमितता के कारण, बाढ़-सूखे की दोहरी मार, El Niño–La Niña प्रभाव एवं जलवायु परिवर्तन — Bihar Govt. Competitive Exams एवं बिहार राज्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सम्पूर्ण विश्लेषण
परिचय — मानसून की अनियमितता क्या है?
बिहार की जलवायु का सबसे बड़ा संकट मानसून की अनियमितता (Monsoon Irregularity) है। मानसून न केवल देर से आता है या जल्दी लौट जाता है, बल्कि वर्षा की मात्रा, वितरण और तीव्रता में भी भारी उतार-चढ़ाव रहता है — जिससे एक ही वर्ष में बिहार के एक भाग में भीषण बाढ़ और दूसरे भाग में घोर सूखा की स्थिति बन जाती है।
मानसून की अनियमितता का अर्थ है — वर्षा का सामान्य से अधिक या कम होना, समय से पहले या बाद में आना-जाना, और वर्षा का स्थानिक वितरण असमान होना। बिहार में औसत वार्षिक वर्षा 1000–1200 mm है, किन्तु किसी वर्ष यह 700 mm तो किसी वर्ष 1800 mm तक पहुँच जाती है। यही अनिश्चितता बिहार की कृषि-अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है।
मानसून अनियमितता के प्रकार
(Temporal)
(Quantitative)
(Spatial)
(Intensity)
(Monsoon Break)
मानसून अनियमितता के प्रमुख कारण
बिहार में मानसून की अनियमितता कोई एकल कारण से नहीं, बल्कि वैश्विक, क्षेत्रीय और स्थानीय — तीनों स्तरों के कारकों के जटिल संयोजन से उत्पन्न होती है।
प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के असामान्य गर्म होने (El Niño) से भारतीय मानसून कमज़ोर पड़ता है। बिहार में सूखे का यह सबसे बड़ा वैश्विक कारण है। इसके विपरीत La Niña में मानसून तीव्र होता है और बाढ़ आती है।
Sub-Tropical Westerly Jet Stream का उत्तर-दक्षिण खिसकना मानसून की तीव्रता और समय को नियंत्रित करता है। इसकी अनियमित स्थिति मानसूनी विराम (Break) या असामान्य सक्रियता का कारण बनती है।
Inter-Tropical Convergence Zone (ITCZ) जब अपेक्षा से कम उत्तर की ओर खिसकता है तो मानसून कमज़ोर रहता है। अत्यधिक उत्तर की ओर जाने पर उत्तरी बिहार में अत्यधिक वर्षा होती है।
Indian Ocean Dipole (IOD) — हिंद महासागर के पूर्वी और पश्चिमी भागों के तापमान में अंतर — मानसून की शक्ति को प्रभावित करता है। सकारात्मक IOD मानसून को मज़बूत और नकारात्मक IOD कमज़ोर करता है।
नेपाल में असाधारण वर्षा का सीधा असर कोसी, गंडक, बागमती जैसी नदियों पर पड़ता है। नेपाल में भारी वर्षा → नदियों में अचानक उफान → बिहार में बाढ़। बिहार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं।
बिहार और आसपास के क्षेत्रों में वनों की कटाई से स्थानीय वाष्पीकरण-वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) घटा है। इससे स्थानीय वर्षा चक्र बाधित हुआ है और मानसून की अनिश्चितता बढ़ी है।
पटना जैसे बड़े शहरों में Urban Heat Island Effect से स्थानीय तापमान बढ़ता है, जिससे वर्षा के पैटर्न अनियमित होते हैं। कंक्रीट सतहें वर्षाजल का त्वरित बहाव करती हैं — शहरी बाढ़ बढ़ी है।
वैश्विक तापमान वृद्धि से मानसून की तीव्रता और अनिश्चितता दोनों बढ़ रही हैं। “Wet gets wetter, Dry gets drier” — अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में और अधिक तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में और कम वर्षा हो रही है।
मानसूनी विराम (Monsoon Break) — विशेष
मानसूनी विराम (Monsoon Break) वह स्थिति है जब सक्रिय मानसून काल (जून–सितंबर) के बीच में कुछ दिनों से लेकर कुछ सप्ताह तक वर्षा अचानक रुक जाती है। इस दौरान ITCZ हिमालय की तलहटी की ओर खिसक जाता है और मध्य भारत वर्षाहीन हो जाता है।
- अवधि: आमतौर पर 7–15 दिन; कभी-कभी 3–4 सप्ताह।
- बिहार पर प्रभाव: धान की खड़ी फसल पानी के बिना सूखने लगती है; रोपाई रुक जाती है।
- उत्तर बिहार में: इस विराम काल में भी हिमालयी नदियों से बाढ़ का खतरा बना रहता है।
- अर्थव्यवस्था पर: किसान की लागत बढ़ती है; सिंचाई पर अतिरिक्त खर्च।
- कारण: Jet Stream का दक्षिण की ओर खिसकना और ITCZ का अस्थायी उत्तरायण।
El Niño एवं La Niña — बिहार पर प्रभाव
El Niño और La Niña — प्रशांत महासागर की ये दो विपरीत जलवायु घटनाएँ भारत और बिहार के मानसून को सर्वाधिक प्रभावित करती हैं। Bihar Govt. Competitive Exams में इन दोनों पर प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
🔥 El Niño
ENSO Warm PhaseEl Niño स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है “छोटा लड़का” या “शिशु ईसा”। यह दक्षिणी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है।
- घटना काल: हर 3–7 साल में एक बार
- भारत पर: मानसून कमज़ोर → कम वर्षा
- बिहार पर: सूखे की संभावना ↑; दक्षिण बिहार सर्वाधिक
- फसल प्रभाव: धान उत्पादन घटता है
- उदाहरण: 2002, 2009, 2014–15 में भारत में El Niño जनित सूखा
❄️ La Niña
ENSO Cool PhaseLa Niña स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है “छोटी लड़की”। यह El Niño के विपरीत — प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से ठंडे होने की घटना है।
- घटना काल: El Niño के बाद प्रायः आती है
- भारत पर: मानसून तीव्र → अधिक वर्षा
- बिहार पर: बाढ़ की संभावना ↑; उत्तर बिहार सर्वाधिक
- फसल प्रभाव: अत्यधिक वर्षा से धान डूब सकता है
- उदाहरण: 2010–11, 2020–21 में La Niña जनित अतिवृष्टि
El Niño बनाम La Niña — तुलना तालिका
| पहलू | 🔥 El Niño | ❄️ La Niña |
|---|---|---|
| समुद्र तापमान | पूर्वी प्रशांत — असामान्य गर्म | पूर्वी प्रशांत — असामान्य ठंडा |
| भारतीय मानसून | कमज़ोर पड़ता है | तीव्र होता है |
| बिहार में वर्षा | सामान्य से कम | सामान्य से अधिक |
| बिहार पर मुख्य खतरा | सूखा (Drought) | बाढ़ (Flood) |
| सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र | दक्षिण बिहार (गया, औरंगाबाद) | उत्तर बिहार (दरभंगा, सुपौल) |
| खरीफ फसल | उत्पादन घटता है | अत्यधिक से फसल डूब सकती है |
| आवृत्ति | 3–7 साल में एक बार | El Niño के बाद अक्सर |
| अर्थ (स्पेनिश) | छोटा लड़का / शिशु ईसा | छोटी लड़की |
🌊 बाढ़ — उत्तरी बिहार की स्थायी त्रासदी
बिहार को “बाढ़-प्रवण राज्य” कहा जाता है। भारत की कुल बाढ़-प्रभावित भूमि का लगभग 17% हिस्सा अकेले बिहार में है। राज्य की 76% भूमि बाढ़ के लिए संवेदनशील है — यह अनुपात देश में सर्वाधिक है।
बिहार में बाढ़ के प्रमुख कारण
कोसी, गंडक, बागमती, कमला-बलान, बूढ़ी गंडक नदियाँ नेपाल-हिमालय से निकलती हैं। नेपाल में भारी वर्षा होने पर ये नदियाँ तेज़ी से उफन जाती हैं और बिहार में बाढ़ लाती हैं।
कोसी नदी अपना मार्ग बार-बार बदलती है — पिछले 200 वर्षों में यह 120 km पश्चिम की ओर खिसक चुकी है। इस अनिश्चित मार्ग से निचले इलाके अचानक डूब जाते हैं।
बाढ़ नियंत्रण के लिए बनाए गए तटबंध (Embankments) कभी-कभी टूट जाते हैं। टूटा हुआ तटबंध सामान्य बाढ़ को विनाशकारी बाढ़ में बदल देता है। 2008 की कोसी बाढ़ इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है।
La Niña वर्षों में मानसून असाधारण रूप से सक्रिय होता है। कुछ दिनों में ही महीने भर की वर्षा हो जाती है — नदियों और जल-निकासी व्यवस्था की क्षमता से अधिक।
उत्तरी बिहार का तराई-मैदान अत्यंत समतल है — ढाल (Gradient) बहुत कम। पानी का प्राकृतिक बहाव धीमा होता है, जिससे जलभराव (Waterlogging) दीर्घकालिक बना रहता है।
हिमालयी और तराई क्षेत्रों में वनों की कटाई से मृदा कटाव बढ़ा है। नदियों में गाद (Silt) जमा होने से नदी तल ऊँचा उठता जा रहा है — बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं।
बिहार की प्रमुख बाढ़-प्रभावित नदियाँ
| नदी | उद्गम | सर्वाधिक प्रभावित जिले | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|
| कोसी | नेपाल (हिमालय) | सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया | “बिहार का शोक” — 120 km मार्ग परिवर्तन |
| गंडक | नेपाल | पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर | नेपाल वर्षा से सीधा प्रभाव |
| बागमती | नेपाल (काठमांडू के पास) | सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा | मिथिलांचल की जीवनरेखा; बाढ़ में विनाशक |
| कमला-बलान | नेपाल | मधुबनी, दरभंगा | मधुबनी पेंटिंग क्षेत्र; बाढ़ से कला-संस्कृति प्रभावित |
| बूढ़ी गंडक | समस्तीपुर के पास | मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय | वर्षाजल से उफान |
| घाघरा (सरयू) | तिब्बत-नेपाल | सीवान, सारण, भोजपुर | पश्चिमी बिहार में बाढ़ |
- तारीख: अगस्त 2008 — नेपाल में कुसहा बाँध का तटबंध टूटा।
- प्रभाव: सुपौल, अररिया, मधेपुरा, सहरसा — 35 लाख+ लोग विस्थापित।
- क्षेत्र: 3,100 वर्ग किलोमीटर से अधिक जलमग्न।
- कारण: नेपाल में असाधारण वर्षा + तटबंध की विफलता।
- विशेष: कोसी नदी ने अपना मार्ग 130 km पूर्व में बदल लिया था — 100 साल में पहली बार।
🏜️ सूखा — दक्षिण बिहार की जलवायु चुनौती
जब मानसून कमज़ोर पड़ता है, देर से आता है या बीच में विराम लेता है, तो बिहार के दक्षिण-पश्चिमी भाग (गया, औरंगाबाद, रोहतास, कैमूर, जहानाबाद, नवादा) में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
सूखे की परिभाषा के अनुसार — जब किसी क्षेत्र में वार्षिक वर्षा सामान्य से 25% से अधिक कम हो, तो उसे सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित किया जाता है। बिहार के दक्षिण-पश्चिम में पहले से ही वर्षा कम होती है (800–1000 mm) — इसलिए थोड़ी भी कमी से सूखे के हालात बन जाते हैं।
सूखे के प्रकार — बिहार के संदर्भ में
| सूखे का प्रकार | परिभाषा | बिहार में उदाहरण |
|---|---|---|
| मौसमी सूखा (Meteorological Drought) | वर्षा सामान्य से 25% या अधिक कम होना | गया, औरंगाबाद में El Niño वर्षों में |
| जल-विज्ञान सूखा (Hydrological Drought) | नदियों, जलाशयों और भूजल स्तर में गिरावट | दक्षिण बिहार की नदियाँ (फल्गु, पुनपुन) सूख जाती हैं |
| कृषि सूखा (Agricultural Drought) | मृदा में नमी इतनी कम कि फसल नहीं उगती | धान रोपाई न हो पाना; फसल झुलसना |
| सामाजिक-आर्थिक सूखा | खाद्य उत्पादन में कमी से मानवीय संकट | किसान का प्रवासन (Migration); आर्थिक नुकसान |
सूखे के प्रमुख कारण — बिहार में
El Niño वर्षों में भारतीय मानसून कमज़ोर रहता है। बिहार में सामान्य से 20–30% कम वर्षा होती है। दक्षिण बिहार पहले से कम वर्षा का क्षेत्र होने से विशेष रूप से प्रभावित होता है।
छोटानागपुर पठार (झारखंड) दक्षिण से आने वाली नम हवाओं को रोक लेता है। रोहतास, कैमूर पठारी जिलों में इस आश्रय प्रभाव (Rain Shadow Effect) से वर्षा कम होती है।
जुलाई-अगस्त में 2–3 सप्ताह का मानसूनी विराम (Monsoon Break) आने पर धान की खड़ी रोपाई सूखने लगती है। यह “कृषि सूखा” का रूप ले लेता है, भले ही कुल वार्षिक वर्षा सामान्य हो।
मानसून का आगमन यदि 2–3 सप्ताह देर से हो तो खरीफ बुआई का मौसम चूक जाता है। देर से बोई गई फसल पाला पड़ने से पहले पक नहीं पाती — दोहरा नुकसान।
गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, अरवल — ये जिले बिहार के सबसे सूखा-संवेदनशील क्षेत्र हैं। इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से “मगध” कहते हैं। यहाँ पानी की कमी इतनी गहरी है कि फल्गु नदी (बोधगया के पास) गर्मियों में लगभग पूरी तरह सूख जाती है।
- औसत वर्षा: 800–950 mm — बिहार में सबसे कम।
- El Niño प्रभाव: 20–30% कमी = 550–700 mm → गंभीर सूखा।
- भूजल: अत्यधिक दोहन से स्तर गिरता जा रहा है।
- प्रवासन: सूखे वर्षों में गया-औरंगाबाद से बड़ी संख्या में मज़दूर प्रवास करते हैं।
जलवायु परिवर्तन एवं मानसून का भविष्य
वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) बिहार के मानसून को अधिक अनिश्चित और अनियमित बना रहा है। भविष्य में बाढ़ और सूखे दोनों की तीव्रता बढ़ने की आशंका है।
- वैश्विक तापमान प्रत्येक दशक में ~0.2°C बढ़ रहा है।
- बिहार में गर्मी के दिन लंबे और अधिक तीव्र हो रहे हैं।
- हिमालयी हिमनद (Glaciers) पिघल रहे हैं — लंबे समय में नदियाँ प्रभावित।
- ताप द्वीप प्रभाव (Urban Heat Island) — पटना में बढ़ रहा है।
- “Wet gets wetter, Dry gets drier” — अमीर और गरीब का बढ़ता अंतर।
- भारी वर्षा के दिन बढ़े; हल्की वर्षा के दिन घटे।
- Flash Flood (अचानक बाढ़) की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
- मानसून की शुरुआत और वापसी अनिश्चित हो रही है।
जलवायु परिवर्तन — बिहार पर संभावित भविष्य प्रभाव
सरकारी उपाय एवं प्रबंधन नीतियाँ
बिहार सरकार और केंद्र सरकार मानसून अनियमितता से उत्पन्न बाढ़ और सूखे से निपटने के लिए अनेक योजनाएँ एवं उपाय लागू कर रही हैं।
- तटबंध निर्माण एवं सुदृढ़ीकरण: कोसी, गंडक, बागमती पर तटबंध। परंतु तटबंध टूटने का खतरा भी।
- बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली (Flood Early Warning): CWC (Central Water Commission) द्वारा। IMD के साथ समन्वय।
- NDRF / SDRF: राष्ट्रीय/राज्य आपदा मोचन बल — बाढ़ के दौरान राहत एवं बचाव।
- नेपाल के साथ समन्वय: हिमालयी नदियों के जल प्रबंधन के लिए द्विपक्षीय वार्ता।
- जल निकासी परियोजनाएँ: तराई क्षेत्र में नहर और ड्रेनेज नेटवर्क।
- जल जीवन हरियाली अभियान: बिहार सरकार की पहल — तालाब, पोखर, कुएँ का जीर्णोद्धार; वृक्षारोपण।
- PMKSY (प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना): “हर खेत को पानी” — ड्रिप/स्प्रिंकलर सिंचाई।
- सूखा-प्रतिरोधी बीज: ICAR द्वारा विकसित कम पानी में उगने वाली धान की किस्में।
- MGNREGA: सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जल-संरक्षण कार्य + रोज़गार।
- फसल बीमा (PMFBY): प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना — नुकसान की भरपाई।
बिहार की प्रमुख बाढ़-सूखा प्रबंधन योजनाएँ
| योजना | उद्देश्य | केंद्र / राज्य |
|---|---|---|
| जल जीवन हरियाली | तालाब, कुएँ, वृक्षारोपण; जल संरक्षण | बिहार सरकार |
| PMKSY | सिंचाई सुविधा — “हर खेत को पानी” | केंद्र सरकार |
| PMFBY (फसल बीमा) | बाढ़/सूखे से नष्ट फसल का मुआवज़ा | केंद्र + राज्य |
| MGNREGA | जल-संरक्षण कार्य + रोज़गार गारंटी | केंद्र सरकार |
| बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम (FMP) | तटबंध, ड्रेनेज, बाढ़ चेतावनी | केंद्र + राज्य |
| आपदा राहत कोष (SDRF) | बाढ़/सूखे में तत्काल राहत | राज्य सरकार |
अभ्यास MCQ, परीक्षा प्रश्न एवं सारांश
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