बिहार की मानसून प्रणाली — दक्षिण-पश्चिम मानसून
Bihar Govt. Competitive Exams एवं बिहार राज्य सेवा परीक्षाओं हेतु सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं प्रमुख तथ्य
बिहार की मानसून प्रणाली और दक्षिण-पश्चिम मानसून का अध्ययन Bihar Govt. Competitive Exams सहित सभी बिहार राज्य प्रतियोगी परीक्षाओं के भूगोल खण्ड में केन्द्रीय महत्व रखता है। यह मानसून राज्य की कृषि, जल-संसाधन, बाढ़-सूखा चक्र और जन-जीवन को नियंत्रित करता है।
मानसून (Monsoon) शब्द अरबी भाषा के “मौसिम” से आया है जिसका अर्थ है ऋतु। दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण जलवायवी घटना है। बिहार को इस मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा से वर्षा मिलती है। राज्य में मानसून-काल जून से सितम्बर तक रहता है, जिसमें वार्षिक वर्षा का लगभग 85–90% प्राप्त होता है।
बिहार की जलवायु का वर्गीकरण
बिहार की जलवायु उपोष्णकटिबंधीय मानसूनी (Sub-tropical Monsoon) प्रकार की है। कोपेन (Köppen) के वर्गीकरण के अनुसार यह Cwa (Humid Subtropical) श्रेणी में आती है। यहाँ वर्षा, तापमान और आर्द्रता — तीनों का मानसून से गहरा संबंध है। ग्रीष्म काल उष्ण एवं आर्द्र, शीत काल शुष्क एवं शीतल, तथा मानसून काल उष्ण-आर्द्र होता है।
| ऋतु | काल | विशेषता | वर्षा |
|---|---|---|---|
| शीत ऋतु | नवम्बर – फ़रवरी | शुष्क, शीतल; पश्चिमी विक्षोभ से कभी-कभी वर्षा | 50–100 mm (7%) |
| ग्रीष्म ऋतु | मार्च – मई | उष्ण; Nor’westers / आँधी-पानी; लू (hot wind) | 50–80 mm (5%) |
| मानसून ऋतु | जून – सितम्बर | दक्षिण-पश्चिम मानसून; अधिकतम आर्द्रता | 1,000–1,800 mm (88%) |
| उत्तर-पूर्वी मानसून | अक्टूबर – नवम्बर | मानसून की वापसी; बिहार में नगण्य वर्षा | नगण्य |
मानसून की उत्पत्ति एवं तंत्र
दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्पत्ति एक जटिल वायुमंडलीय घटना है। इसे समझने के लिए थर्मल अवधारणा, जेट स्ट्रीम सिद्धांत और ITCZ की गति — तीनों को एक साथ देखना आवश्यक है। Bihar Govt. Competitive Exams मुख्य परीक्षा में इस पर विस्तृत प्रश्न आते हैं।
मानसून की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत
ग्रीष्म काल में एशियाई महाद्वीप (विशेषतः थार मरुस्थल और उत्तर-पश्चिम भारत) अत्यधिक गर्म हो जाता है। इससे वहाँ निम्न वायुदाब (Low Pressure) का क्षेत्र बनता है। हिन्द महासागर तुलनात्मक रूप से ठंडा रहता है, जिससे वहाँ उच्च वायुदाब (High Pressure) बना रहता है। हवाएँ उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती हैं — अर्थात् समुद्र से स्थल की ओर। यही नमी-युक्त हवाएँ मानसून बनती हैं।
उपोष्णकटिबंधीय जेट स्ट्रीम (Sub-tropical Jet Stream) शीतकाल में हिमालय के दक्षिण में बहती है। ग्रीष्म काल में यह हिमालय के उत्तर में चली जाती है। इसके साथ ही सोमाली जेट स्ट्रीम (Somali Jet / Low-Level Jet) सक्रिय होती है जो पूर्वी अफ्रीका से अरब सागर होते हुए भारत की ओर नमी-युक्त हवाएँ लाती है। जेट स्ट्रीम का उत्तर की ओर खिसकना ही मानसून के आगमन का संकेत है।
ITCZ (Inter-Tropical Convergence Zone) वह क्षेत्र है जहाँ उत्तरी और दक्षिणी गोलार्धों की व्यापारिक हवाएँ (Trade Winds) मिलती हैं। ग्रीष्म काल में ITCZ उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान के ऊपर आ जाता है। इससे दक्षिणी गोलार्ध की दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें भूमध्य रेखा पार करके दक्षिण-पश्चिमी पवनों में बदल जाती हैं — यही दक्षिण-पश्चिम मानसून है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएँ
बिहार में मानसून का आगमन एवं प्रगति
दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में सबसे पहले केरल (1 जून) पहुँचता है और धीरे-धीरे उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ता है। बिहार तक पहुँचने में इसे लगभग 10–15 दिन लगते हैं। मानसून की यह प्रगति परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मानसून की क्रमिक प्रगति — अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य
बिहार में मानसून की प्रगति — ज़िला स्तर
बिहार में मानसून पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता है। सबसे पहले पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज (पूर्वी बिहार) में वर्षा प्रारम्भ होती है क्योंकि ये बंगाल की खाड़ी के निकट हैं। इसके बाद भागलपुर, मुंगेर, पटना (मध्य बिहार) और अंत में सारण, गोपालगंज, पश्चिमी चम्पारण (पश्चिमी बिहार) में मानसून पहुँचता है।
| क्षेत्र | प्रमुख जिले | मानसून आगमन | विशेषता |
|---|---|---|---|
| पूर्वी बिहार | पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया | 10–12 जून | सर्वप्रथम, सर्वाधिक वर्षा |
| उत्तर-मध्य बिहार | दरभंगा, मुज़फ़्फ़रपुर, सीतामढ़ी | 12–14 जून | कोसी-बागमती क्षेत्र, उच्च वर्षा |
| मध्य बिहार | पटना, नालंदा, भागलपुर | 13–15 जून | मध्यम वर्षा, गंगा मैदान |
| दक्षिण बिहार | गया, औरंगाबाद, रोहतास | 14–16 जून | कम वर्षा, कभी-कभी सूखा |
| पश्चिमी बिहार | गोपालगंज, सारण, पश्चिमी चम्पारण | 15–18 जून | सबसे अंत में, अपेक्षाकृत कम वर्षा |
बिहार में वर्षा का वितरण
बिहार में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण — दोनों दिशाओं में वर्षा की मात्रा घटती है। यह असमानता कृषि उत्पादन, बाढ़-सूखा की स्थिति और जल-संसाधन प्रबंधन को सीधे प्रभावित करती है।
वर्षा के क्षेत्रीय पैटर्न
उत्तर-पूर्वी बिहार (किशनगंज, पूर्णिया, अररिया) में सर्वाधिक वर्षा होती है — 1,500–2,000+ mm तक। यहाँ बंगाल की खाड़ी से उठी नमी-युक्त हवाएँ सीधे पहुँचती हैं और मेघालय पठार से उतरकर भी नमी मिलती है।
उत्तर-मध्य बिहार (दरभंगा, मुज़फ़्फ़रपुर, सीतामढ़ी) में 1,200–1,500 mm वर्षा होती है। यह क्षेत्र बाढ़-बहुल है क्योंकि नेपाल की पहाड़ियों से भी पानी आता है।
दक्षिण-पश्चिमी बिहार (औरंगाबाद, रोहतास, कैमूर, भोजपुर) सूखा-प्रवण क्षेत्र है — 800–1,000 mm वर्षा। यहाँ के किसान अनिश्चित वर्षा से परेशान रहते हैं।
वर्षा की क्षेत्रीय असमानता — कारण
बंगाल की खाड़ी से जितना दूर उतनी कम आर्द्रता। पूर्वी बिहार निकट, पश्चिमी बिहार दूर — इसलिए पूर्व में अधिक वर्षा।
उत्तर में हिमालय की तराई क्षेत्र — नमी-रोधक। दक्षिण में छोटानागपुर पठार — पहाड़ी अवरोध कम। इससे वर्षा का असमान वितरण।
बंगाल की खाड़ी शाखा पूर्व से पश्चिम बढ़ती है। पश्चिम पहुँचते-पहुँचते नमी कम हो जाती है। अतः पश्चिम बिहार में कम वर्षा।
मानसून को प्रभावित करने वाले कारक
बिहार में मानसून की तीव्रता, समयबद्धता और वर्षा की मात्रा — ये सभी अनेक स्थानीय एवं वैश्विक कारकों पर निर्भर करती हैं। इन कारकों को समझना Bihar Govt. Competitive Exams मुख्य परीक्षा में अत्यंत उपयोगी है।
वैश्विक एवं महासागरीय कारक
स्थानीय / क्षेत्रीय कारक
वन क्षेत्र वर्षा को आकर्षित करते हैं। बिहार में वन आवरण मात्र 7.7% है (राष्ट्रीय औसत 21.7%)। वनोन्मूलन से स्थानीय वर्षा चक्र प्रभावित होता है, मिट्टी का ताप बढ़ता है और वाष्पीकरण कम होता है। इससे वर्षा की अनिश्चितता बढ़ती है।
बंगाल की खाड़ी में बनने वाले अवदाब (Low Pressure Systems) मानसून को तीव्र बनाते हैं। ये अवदाब पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ते हुए बिहार से गुजरते हैं और 2–3 दिनों में 100–200 mm वर्षा दे सकते हैं। यही बिहार में अचानक बाढ़ का एक कारण है।
शीतकाल में भूमध्यसागर से उठकर आने वाले पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) पश्चिमोत्तर भारत और हिमालय में हिमपात व वर्षा करते हैं। बिहार तक पहुँचते-पहुँचते इनका प्रभाव कमज़ोर हो जाता है, किन्तु शीतकाल में 50–100 mm वर्षा इनसे मिलती है जो रबी फसलों के लिए उपयोगी है।
ग्रीष्म काल (मार्च–मई) में उत्तर-पश्चिम से आने वाली तूफ़ानी हवाओं के साथ होने वाली वर्षा को Nor’westers या काल बैसाखी (Kalbaisakhi) कहते हैं। बिहार में इन्हें आँधी-पानी कहते हैं। ये वर्षा अल्पकालिक किन्तु तीव्र होती है। आम और लीची की फसल के लिए लाभदायक।
मानसून की वापसी एवं पश्च-मानसून काल
दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी (Withdrawal) उतनी ही महत्वपूर्ण घटना है जितना उसका आगमन। वापसी उत्तर-पश्चिम से प्रारम्भ होती है और दक्षिण की ओर होती है — अर्थात् आगमन के विपरीत दिशा में।
मानसून वापसी का क्रम
पश्च-मानसून काल में बिहार की वर्षा
मानसून वापसी के बाद बिहार में अक्टूबर–नवम्बर में छिटपुट वर्षा होती है। बंगाल की खाड़ी में बनने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones) कभी-कभी बिहार तक पहुँचते हैं और भारी वर्षा करते हैं। दिसम्बर से फ़रवरी में पश्चिमी विक्षोभ से थोड़ी वर्षा होती है जो रबी फसल के लिए लाभकारी है।
- वापसी की दिशा: उत्तर-पश्चिम → दक्षिण-पूर्व (आगमन के विपरीत)
- राजस्थान: 1 सितम्बर से वापसी प्रारम्भ
- बिहार: अक्टूबर के प्रथम–द्वितीय सप्ताह में विदा
- केरल: नवम्बर–दिसम्बर में अंतिम विदाई
- कुल मानसून काल (बिहार): लगभग 110–120 दिन
कृषि, अर्थव्यवस्था एवं मानसून
बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था पूर्णतः मानसून-निर्भर है। मानसून की समयबद्धता और पर्याप्तता राज्य के कृषि उत्पादन, जीडीपी और किसानों की आय को सीधे प्रभावित करती है। इस विषय पर Bihar Govt. Competitive Exams मुख्य परीक्षा में विश्लेषणात्मक प्रश्न आते हैं।
मानसून और खरीफ फसलें
बिहार की प्रमुख खरीफ फसलें — धान, मक्का, जूट, तिलहन — पूर्णतः मानसून-आश्रित हैं। जून में मानसून आगमन के साथ ही खेतों की जुताई और बुआई शुरू होती है। जुलाई–अगस्त में फसल के विकास के लिए नियमित वर्षा आवश्यक है। सितम्बर में कम वर्षा फसल परिपक्वता के लिए उपयुक्त होती है।
| फसल | मानसून आवश्यकता | प्रभावित जिले | मानसून विफलता का प्रभाव |
|---|---|---|---|
| धान (Paddy) | 1,000–1,500 mm | उत्तर बिहार, पूर्वी बिहार | उत्पादन में 30–50% गिरावट |
| मक्का (Maize) | 700–1,000 mm | कोसी क्षेत्र, पूर्णिया | उपज में कमी, किसान ऋणग्रस्त |
| जूट (Jute) | 1,200–1,500 mm | पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज | रेशा उत्पादन घटता है |
| लीची | पूर्व-मानसून वर्षा | मुज़फ़्फ़रपुर | फल की गुणवत्ता प्रभावित |
| गन्ना | 1,500 mm+ | पश्चिम चम्पारण, गोपालगंज | चीनी मिलों पर प्रभाव |
मानसून विफलता — सूखे का प्रभाव
मानसून देर से या कम आने पर खरीफ फसलें नष्ट हो जाती हैं। दक्षिण बिहार (गया, औरंगाबाद, रोहतास) में सूखे की घटनाएँ बार-बार होती हैं।
कृषि GDP घटती है। किसानों की आय कम होती है। ग्रामीण पलायन बढ़ता है। सरकार पर राहत का बोझ बढ़ता है।
कम वर्षा से भूजल स्तर गिरता है। नदियाँ, तालाब, कुएँ सूखते हैं। पेयजल की समस्या उत्पन्न होती है।
मानसून अधिक सक्रिय होने पर बाढ़। उत्तर बिहार में कोसी, गंडक में उफान। फसल, मकान, सड़क सब नष्ट। दोहरी मार — कहीं सूखा, कहीं बाढ़।
जलवायु परिवर्तन एवं बिहार का मानसून
21वीं सदी में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) बिहार के मानसून पैटर्न को गहराई से प्रभावित कर रहा है। वर्षा की अनिश्चितता बढ़ रही है, अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ तीव्र हो रही हैं और सूखे की आवृत्ति भी बढ़ रही है।
सारांश, स्मृति-सूत्र एवं परीक्षा प्रश्न
स्मृति-सूत्र (Mnemonic)
🎯 BPSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण
(A) हिंदी (B) फ़ारसी (C) अरबी (D) संस्कृत
(A) 1 जून (B) 5–8 जून (C) 10–15 जून (D) 20–25 जून
(A) La Niña (B) IOD धनात्मक (C) El Niño (D) उच्च हिमाच्छादन
(A) वेस्टर्लीज़ (B) आँधी-पानी / Nor’westers (C) उत्तर-पूर्वी मानसून (D) चक्रवात
(A) Indian Tropical Cyclone Zone (B) Inter-Tropical Convergence Zone (C) Indian Temperature Climate Zone (D) इनमें से कोई नहीं
(A) उत्तर-पश्चिम (B) दक्षिण-पश्चिम (C) उत्तर-पूर्व / पूर्व (D) दक्षिण
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