बिहार का दक्षिणी पठारी क्षेत्र
भौतिक विभाजन के आधार पर बिहार के दक्षिण का पठारी क्षेत्र — भूगोल, खनिज, जनजाति एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य
परिचय एवं भौगोलिक स्थिति
बिहार के भौतिक (Physical) विभाजन के आधार पर दक्षिण का पठारी क्षेत्र राज्य का एक महत्वपूर्ण भूआकृतिक खंड है, जो BPSC परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पठारी क्षेत्र मुख्यतः छोटानागपुर पठार का विस्तार है जो झारखंड राज्य बनने से पहले बिहार का अभिन्न अंग था।
बिहार को भौतिक आधार पर तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है — (1) उत्तर का हिमालयी तराई क्षेत्र, (2) मध्य का मैदानी क्षेत्र (गंगा का मैदान), और (3) दक्षिण का पठारी क्षेत्र। तीसरा भाग — दक्षिणी पठारी क्षेत्र — भारत के प्राचीनतम भूखंड प्रायद्वीपीय पठार का उत्तरी विस्तार है जो बिहार के दक्षिणी हिस्से में फैला हुआ है।
पठारी क्षेत्र का विस्तार एवं प्रमुख भाग
बिहार का दक्षिणी पठारी क्षेत्र मुख्यतः गंगा के दक्षिण में स्थित जिलों में फैला है। यह क्षेत्र उत्तर में गंगा के मैदान से धीरे-धीरे ऊँचा होता जाता है और दक्षिण में झारखंड के छोटानागपुर पठार से मिलता है।
इस पठारी क्षेत्र को भू-आकृति के आधार पर तीन उपखंडों में समझा जा सकता है — (अ) पश्चिमी पठारी खंड (रोहतास-कैमूर), (ब) मध्यवर्ती पठारी खंड (गया-नवादा-जमुई), और (स) पूर्वी पठारी खंड (मुंगेर-बांका)। प्रत्येक खंड की भूआकृतिक विशेषताएँ अलग-अलग हैं।
पठारी क्षेत्र के प्रमुख जिले एवं विस्तार
| # | उपखंड | प्रमुख जिले | विशेषता | प्रमुख ऊँचाई |
|---|---|---|---|---|
| 1 | पश्चिमी पठार | रोहतास, कैमूर | कैमूर पठार, सोन नदी घाटी | ~300-450 मी. |
| 2 | मध्यवर्ती पठार | गया, नवादा, औरंगाबाद, जमुई | राजगीर पहाड़ियाँ, फल्गु नदी | ~150-300 मी. |
| 3 | पूर्वी पठार | मुंगेर, बांका, जमुई | राजमहल पहाड़ियाँ, किऊल-गंगा | ~200-380 मी. |
कैमूर पठार — विशेष परिचय
कैमूर पठार बिहार के पश्चिमी दक्षिणी भाग में स्थित है और विंध्य पर्वत श्रेणी का पूर्वी विस्तार है। यह रोहतास और कैमूर जिलों में फैला है। इसकी ऊँचाई 300 से 450 मीटर तक है। यह पठार बालुआ पत्थर (Sandstone) एवं चूना पत्थर से निर्मित है — जो इसे दक्षिण के आर्कियन पठार से अलग बनाता है।
- स्थान: उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा पर स्थित; मध्य प्रदेश के बाँधवगढ़ तक विस्तृत
- शैल संरचना: विंध्यन काल का बालुआ पत्थर (Vindhyan Sandstone)
- नदियाँ: सोन नदी इस पठार को काटते हुए गंगा में मिलती है
- जलप्रपात: तुतला भवानी जलप्रपात, करकट जलप्रपात — प्रसिद्ध पर्यटन स्थल
- वन: घने शाल (Sal) एवं सागौन के वन; वन्यजीव अभयारण्य
- ऐतिहासिक: रोहतासगढ़ किला इसी पठार पर स्थित है
राजगीर (नालंदा जिला) की पहाड़ियाँ बिहार के मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र का हिस्सा हैं। ये पहाड़ियाँ पाँच शैलाओं — वैभव, विपुलगिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि, सोनगिरि — से मिलकर बनी हैं। इनका भूवैज्ञानिक आधार आर्कियन ग्रेनाइट है।
- ऐतिहासिक महत्व: मगध साम्राज्य की प्राचीन राजधानी; बुद्ध और महावीर दोनों का वास
- तापीय स्रोत: ब्रह्मकुंड — गर्म जल के प्राकृतिक स्रोत
- वर्तमान: पर्यटन, रोपवे, नालंदा से निकटता
प्रमुख पर्वत श्रेणियाँ एवं पहाड़ियाँ
बिहार के दक्षिणी पठारी क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पर्वत श्रेणियाँ एवं पहाड़ी क्षेत्र हैं जो BPSC परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं। ये पर्वत श्रेणियाँ उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई हैं।
सोमेश्वर श्रेणी
पश्चिमी चंपारण — उत्तरी सीमाराजमहल पहाड़ियाँ
संथाल परगना — पूर्वी बिहारखड़गपुर पहाड़ियाँ
मुंगेर, जमुई — मध्य-पूर्वगिरियक पहाड़ियाँ
नालंदा — मध्यवर्ती भागपर्वत श्रेणियों की तुलनात्मक सारणी
| पर्वत/पहाड़ी | जिला | शैल प्रकार | अधिकतम ऊँचाई | विशेष महत्व |
|---|---|---|---|---|
| सोमेश्वर श्रेणी | पश्चिमी चंपारण | शिवालिक तलछटी | 874 मी. | बिहार की सर्वोच्च चोटी |
| कैमूर पठार | रोहतास, कैमूर | विंध्यन बालुआ पत्थर | ~450 मी. | सोन नदी का उद्गम क्षेत्र |
| राजमहल पहाड़ियाँ | जमुई, बांका | बेसाल्ट (ज्वालामुखीय) | ~480 मी. | Rajmahal Traps — जीवाश्म |
| खड़गपुर पहाड़ियाँ | मुंगेर, जमुई | ग्रेनाइट (आर्कियन) | ~160 मी. | अभ्रक निक्षेप |
| राजगीर पहाड़ियाँ | नालंदा | ग्रेनाइट | ~300 मी. | बौद्ध-जैन धर्म स्थल |
| गया पहाड़ियाँ | गया | ग्रेनाइट/नीस | ~250 मी. | बोधगया निकट |
नदियाँ एवं जल प्रवाह तंत्र
दक्षिणी पठारी क्षेत्र से कई महत्वपूर्ण नदियाँ निकलती हैं जो गंगा में आकर मिलती हैं। ये नदियाँ पठारी भूमि के कारण वर्षाकाल में तीव्र प्रवाहयुक्त एवं उथली घाटियों वाली होती हैं।
दक्षिणी पठारी क्षेत्र की नदियाँ गंगा की दक्षिणी सहायक नदियाँ हैं। ये नदियाँ मुख्यतः वर्षा पर निर्भर (Rain-fed) हैं, जिससे गर्मियों में इनका प्रवाह अत्यंत कम हो जाता है। पठारी भूमि पर इनकी घाटियाँ गहरी (V-shaped) होती हैं।
नदियों की विशेषताएँ — पठारी बनाम मैदानी
| विशेषता | दक्षिणी पठारी नदियाँ | उत्तरी मैदानी नदियाँ |
|---|---|---|
| स्रोत | वर्षा (Rain-fed) | हिमनद + वर्षा (Perennial) |
| प्रवाह | मौसमी, अनियमित | बारहमासी, नियमित |
| घाटी प्रकार | V-आकार, संकरी, गहरी | U-आकार, चौड़ी |
| जलप्रपात | अनेक जलप्रपात | नहीं |
| सिंचाई | सीमित | व्यापक |
| बाढ़ | अचानक (Flash Flood) | लंबे समय तक |
- ककोलत जलप्रपात — नवादा जिला (लगभग 47 मीटर); बिहार का प्रसिद्ध जलप्रपात
- तुतला भवानी जलप्रपात — रोहतास जिला; सोन की सहायक नदी पर
- दुर्गावती जलप्रपात — कैमूर जिला
- तेलहर कुंड जलप्रपात — कैमूर जिला
खनिज संसाधन एवं भूवैज्ञानिक महत्व
दक्षिणी पठारी क्षेत्र बिहार का एकमात्र ऐसा हिस्सा है जहाँ महत्वपूर्ण खनिज संसाधन पाए जाते हैं। आर्कियन काल की आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानें इसे खनिजों की दृष्टि से समृद्ध बनाती हैं।
झारखंड बनने से पहले बिहार खनिज संपदा में बेहद धनी था। वर्तमान बिहार में दक्षिणी पठारी क्षेत्र में मुख्यतः अभ्रक (Mica), बॉक्साइट, चूना पत्थर, और कोयला (सीमांत क्षेत्रों में) पाए जाते हैं।
नवादा, जमुई, मुंगेर जिलों में। गया-नवादा अभ्रक पेटी विश्व प्रसिद्ध है। Sheet Mica का उत्पादन। इलेक्ट्रॉनिक्स में उपयोग।
रोहतास, कैमूर जिलों में। डालमियानगर (रोहतास) में बड़े सीमेंट कारखाने हैं जो इसी चूना पत्थर पर आधारित हैं।
जमुई, बांका (झारखंड सीमा पर) में कुछ लौह अयस्क के निक्षेप। मुख्यतः झारखंड से आयात।
मुंगेर, कैमूर क्षेत्रों में सीमित बॉक्साइट निक्षेप। एल्युमिनियम उत्पादन का कच्चा माल।
गया, नवादा, जमुई क्षेत्रों में ग्रेनाइट खनन। निर्माण कार्य में व्यापक उपयोग।
गया जिले में कुछ ग्रेफाइट निक्षेप। औद्योगिक उपयोग — स्नेहक, इलेक्ट्रोड।
गया-नवादा अभ्रक पेटी — विशेष परिचय
बिहार का गया-नवादा-जमुई अभ्रक क्षेत्र भारत की तीन प्रमुख अभ्रक पेटियों में से एक है (अन्य दो — झारखंड-आंध्र प्रदेश पेटी और राजस्थान पेटी)। यहाँ Ruby Mica (मस्कोवाइट) पाया जाता है जो उच्च विद्युत रोधकता (High Dielectric Strength) के कारण इलेक्ट्रॉनिक उद्योग में अत्यंत उपयोगी है।
जनजाति, वन संसाधन एवं पारिस्थितिकी
दक्षिणी पठारी क्षेत्र न केवल भूवैज्ञानिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से भी बिहार का अनूठा भाग है। यहाँ अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं और घने वन पाए जाते हैं।
| जनजाति | प्रमुख जिला | भाषा/विशेषता |
|---|---|---|
| संथाल | जमुई, बांका, मुंगेर | संथाली भाषा; कृषि आधारित |
| मुंडा | जमुई, नवादा | मुंडारी भाषा; शिकारी-कृषक |
| ओरांव (कुरुख) | गया, औरंगाबाद | कुरुख भाषा |
| बिरहोर | जमुई, गया | खानाबदोश; शिकारी समुदाय |
| मालपहाड़िया | जमुई, बांका | पहाड़िया क्षेत्र में निवास |
बिहार के दक्षिणी पठारी क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Dry Deciduous Forest) पाए जाते हैं। यहाँ के प्रमुख वृक्ष हैं — साल (Shorea robusta), सागौन (Teak), पलाश, महुआ, आँवला।
- वाल्मीकि टाइगर रिजर्व: पश्चिमी चंपारण — बिहार का एकमात्र टाइगर रिजर्व; पठारी तराई में
- गौतम बुद्ध वन्यजीव अभयारण्य: गया जिला — पठारी दक्षिण बिहार में महत्वपूर्ण
- राजगीर वन्यजीव अभयारण्य: नालंदा — पहाड़ी क्षेत्र में
- भीमबाँध वन्यजीव अभयारण्य: मुंगेर — खड़गपुर पहाड़ियों में
- विक्रमशिला गंगेटिक डॉल्फिन अभयारण्य: भागलपुर — नदी अभयारण्य
मृदा प्रकार — दक्षिणी पठारी क्षेत्र
Mains विश्लेषण — महत्व, चुनौतियाँ एवं विकास
BPSC Mains परीक्षा में बिहार के दक्षिणी पठारी क्षेत्र से संबंधित विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। इस खंड में हम क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक महत्व, विकास की चुनौतियाँ और सरकारी नीतियों का विश्लेषण करेंगे।
दक्षिणी पठारी क्षेत्र का महत्व
विकास की चुनौतियाँ
- नक्सलवाद/वामपंथी उग्रवाद: जमुई, गया, औरंगाबाद, नवादा जिले प्रभावित — विकास में बाधा
- वन कटान: अवैध खनन और वन क्षरण — मृदा अपरदन और नदियों में गाद की समस्या
- सिंचाई की कमी: वर्षाआधारित कृषि — किसानों की आर्थिक अनिश्चितता
- आदिवासी विस्थापन: खनन और विकास परियोजनाओं के कारण जनजातीय समुदायों का विस्थापन
- अवसंरचना की कमी: पठारी भूमि पर सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सेवाएँ अपर्याप्त
- बाढ़ और सूखा: मानसून पर अत्यधिक निर्भरता — अनियमित वर्षा से कृषि प्रभावित
सरकारी पहल एवं योजनाएँ
- MNREGS (मनरेगा): पठारी क्षेत्र में रोजगार — जल संरक्षण, तालाब निर्माण
- वन अधिकार अधिनियम 2006: जनजातियों को वन भूमि पर अधिकार
- PESA अधिनियम: आदिवासी स्वशासन को मान्यता
- सोन सिंचाई परियोजना: रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद में सिंचाई
- बिहार पर्यटन नीति: बोधगया, राजगीर को केंद्र मानकर पर्यटन विकास
- इंटीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट: जमुई, बांका में विशेष विकास योजनाएँ


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