उत्तर का तराई क्षेत्र — बिहार
हिमालय की तलहटी में बसा दलदली-वन क्षेत्र | BPSC Prelims + Mains के लिए सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं भौगोलिक पहचान
बिहार के भौतिक विभाजन में उत्तर का तराई क्षेत्र एक अत्यंत महत्वपूर्ण भू-आकृतिक इकाई है, जो हिमालय की शिवालिक श्रृंखला की तलहटी में स्थित है। BPSC परीक्षा की दृष्टि से यह क्षेत्र भूगोल के प्रश्नों में बार-बार आता है।
तराई शब्द की उत्पत्ति हिंदी/नेपाली भाषा से हुई है जिसका अर्थ है — “नीची एवं आर्द्र भूमि।” यह क्षेत्र हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) से निर्मित है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ जल-भराव की स्थिति लगभग सदैव बनी रहती है।
बिहार के भौतिक विभाजन — संक्षिप्त अवलोकन
बिहार को मुख्यतः तीन भौतिक भागों में बाँटा जाता है:
- उत्तर का विशाल मैदान — गंगा के उत्तर में स्थित विशाल जलोढ़ मैदान, जिसके अंतर्गत तराई क्षेत्र, भाबर क्षेत्र और उत्तरी गंगा का मैदान आता है।
- दक्षिण का पठारी भाग — छोटानागपुर पठार का उत्तरी विस्तार, जिसमें रोहतास, कैमूर एवं जमुई आदि जिले शामिल हैं।
- गंगा का जलोढ़ मैदान — गंगा के दोनों किनारों पर फैला उपजाऊ मध्य भाग, जो बिहार का सर्वाधिक आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
भौगोलिक विस्तार एवं सीमाएँ
बिहार का तराई क्षेत्र राज्य के उत्तरी सिरे पर स्थित है और यह पूर्व से पश्चिम तक एक संकरी किंतु लंबी पट्टी के रूप में फैला हुआ है। इसकी उत्तरी सीमा नेपाल से लगती है।
सीमाएँ (Boundaries)
- उत्तर में: नेपाल (हिमालय की तराई) — अंतर्राष्ट्रीय सीमा
- दक्षिण में: उत्तरी गंगा का मैदान (Gangetic Plain)
- पूर्व में: पश्चिम बंगाल के किशनगंज एवं दार्जिलिंग तराई से मिलती सीमा
- पश्चिम में: उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र से संलग्न
प्रमुख जिले जहाँ तराई विद्यमान है
- पश्चिमी चंपारण (West Champaran) — सर्वाधिक तराई क्षेत्र वाला जिला
- पूर्वी चंपारण (East Champaran) — मध्यम तराई
- सीतामढ़ी (Sitamarhi) — पूर्वी तराई का विस्तार
- मधुबनी (Madhubani) — आंशिक तराई
- सुपौल (Supaul) — नेपाल सीमावर्ती तराई
- अररिया (Araria) — उत्तरपूर्वी तराई
- किशनगंज (Kishanganj) — पूर्वी सिरे पर तराई
तराई क्षेत्र एवं भाबर में अंतर
| आधार | भाबर क्षेत्र | तराई क्षेत्र |
|---|---|---|
| स्थिति | शिवालिक की तलहटी से सटा हुआ (उत्तर) | भाबर के दक्षिण में |
| मिट्टी | मोटे कंकड़-पत्थर, बालू — अपारगम्य | बारीक जलोढ़ — चिकनी, आर्द्र |
| जल-प्रवाह | नदियाँ भूमिगत हो जाती हैं (Lost Streams) | नदियाँ पुनः धरातल पर आ जाती हैं |
| आर्द्रता | अपेक्षाकृत शुष्क | अत्यधिक आर्द्र, दलदली |
| वनस्पति | विरल वन | घने साल वन, घास के मैदान |
| बिहार में स्थिति | नगण्य / बहुत कम | पश्चिमी व पूर्वी चंपारण, सुपौल आदि |
उत्पत्ति एवं निर्माण-प्रक्रिया
तराई क्षेत्र की उत्पत्ति हिमालय पर्वत-निर्माण और हिमनद (Glacial) क्रियाओं से जुड़ी है। यह क्षेत्र लाखों वर्षों की भूगर्भीय प्रक्रियाओं का परिणाम है।
निर्माण में सहायक कारक
शिवालिक की दक्षिणमुखी ढाल के कारण हिमालय से आने वाली नदियाँ मैदान में प्रवेश करते ही अपना वेग खो देती हैं और मलबा जमा कर देती हैं।
भाबर में भूमिगत हो गई नदियाँ तराई क्षेत्र में पुनः धरातल पर आकर बहती हैं, जिससे जल-भराव और आर्द्रता बढ़ती है।
हिमालय के साथ लगने के कारण यहाँ वर्षा 150–200 सेमी तक होती है, जो जलाक्रांतता (waterlogging) को बढ़ाती है।
घने साल एवं सागौन के वन जल-निकासी को रोकते हैं और मिट्टी में आर्द्रता बनाए रखते हैं, जो दलदली स्वभाव को स्थायी करती है।
भू-आकृतिक विशेषताएँ
तराई क्षेत्र की भौतिक संरचना अत्यंत विशिष्ट है। यह क्षेत्र समतल परंतु दलदली, नदी-जालों से युक्त एवं जैव-विविधता से संपन्न भू-भाग है।
तराई का धरातल पूर्णतः समतल दिखता है किंतु वास्तव में यह उत्तर से दक्षिण की ओर धीरे-धीरे ढलता है। इसकी औसत ऊँचाई 75–100 मीटर (MSL) है। बिहार के पश्चिमी चंपारण में यह ऊँचाई अधिक होती है, जबकि पूर्व की ओर यह घटती जाती है। यह ढाल ही नदियों की प्रवाह-दिशा निर्धारित करता है।
तराई की सबसे प्रमुख विशेषता है — स्थायी जल-जमाव। यहाँ की महीन चिकनी मिट्टी पानी को आसानी से नीचे नहीं जाने देती। भाबर से उभरने वाली नदियाँ, उच्च वर्षा एवं सघन वनस्पति मिलकर यहाँ सदैव जलाक्रांत स्थिति बनाए रखती हैं। मानसून में तो यह क्षेत्र विस्तृत दलदल में बदल जाता है।
तराई क्षेत्र में हिमालय से निकलने वाली अनेक नदियाँ प्रवाहित होती हैं। ये नदियाँ प्रायः बारहमासी (Perennial) हैं क्योंकि ये हिमनदों से पोषित होती हैं। बिहार के तराई क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ हैं:
- गंडक (Gandak) — पश्चिमी चंपारण से प्रवेश, नेपाल में त्रिशूलगंगा के नाम से जानी जाती है
- बूढ़ी गंडक — गंडक की समानांतर धारा
- बागमती (Bagmati) — सीतामढ़ी के निकट प्रवेश
- कमला (Kamla) — मधुबनी क्षेत्र
- कोसी (Kosi) — “बिहार का शोक”, सुपौल से प्रवेश
- महानंदा (Mahananda) — किशनगंज क्षेत्र
तराई में चाउर (Chaur) — उथली कटोरेनुमा झीलें — पाई जाती हैं। ये नदियों के पुराने मार्ग (Ox-bow Lakes) के रूप में बनती हैं। मानसून में ये जल से भर जाती हैं और शीतकाल में प्रवासी पक्षियों का आश्रय बन जाती हैं। पश्चिमी चंपारण के सोमेश्वर पहाड़ी के आस-पास ऐसे चाउर प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
तराई बनाम अन्य उत्तरी क्षेत्र — तुलनात्मक दृष्टि
| विशेषता | तराई | उत्तरी गंगा का मैदान | दियारा क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| स्थिति | नेपाल सीमा के साथ | तराई के दक्षिण में | गंगा के किनारे |
| मिट्टी | बारीक जलोढ़, चिकनी | पुरानी जलोढ़ (Bhangar) | नई जलोढ़ (Khadar) |
| जल-भराव | अधिकतम | मध्यम | मानसून में अधिक |
| वनस्पति | साल, सागौन वन | कृषि भूमि | घास, झाड़ी |
| आर्थिक उपयोग | वन + कृषि (सीमित) | गहन कृषि | मौसमी कृषि |
जलवायु, मिट्टी एवं वनस्पति
तराई की जलवायु, मृदा एवं वन-आवरण परस्पर इतने घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं कि इन्हें अलग करके नहीं समझा जा सकता। यह समझ BPSC Mains के लिए अत्यंत आवश्यक है।
जलवायु (Climate)
मिट्टी (Soil)
तराई की मिट्टी मुख्यतः नई जलोढ़ (New Alluvial / Khadar) है, जिसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:
- बनावट: बारीक, चिकनी, सिल्टी — जल को देर तक रोककर रखती है।
- उर्वरता: उच्च नाइट्रोजन, पोटाश और जीवांश (Humus) की प्रचुरता।
- रंग: काला-भूरा रंग, जैव-पदार्थ की अधिकता के कारण।
- pH: हल्की अम्लीय (5.5–6.5), जो साल वनों के लिए आदर्श है।
- विशेष: जल-जमाव के कारण यहाँ Gleysol (ग्लेईसोल) प्रकार की मिट्टी भी पाई जाती है — जो नीले-हरे रंग की होती है।
वनस्पति (Vegetation)
तराई क्षेत्र उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन (Tropical Moist Deciduous Forest) का क्षेत्र है। बिहार में वाल्मीकि टाइगर रिजर्व इसी तराई क्षेत्र में स्थित है।
- साल (Shorea robusta) — सर्वप्रमुख वृक्ष
- सागौन (Teak) — आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण
- खैर (Acacia catechu)
- सेमल (Bombax ceiba)
- बाँस (Bamboo)
- बाघ (Tiger) — वाल्मीकि रिजर्व में
- हाथी (Elephant)
- गैंडा (Rhinoceros) — पूर्व में अब दुर्लभ
- हिरण, सांभर, नीलगाय
- मगर (Gharial) — नदियों में
- स्थान: पश्चिमी चंपारण — तराई का सबसे बड़ा वन क्षेत्र
- क्षेत्रफल: ~898 वर्ग किमी (Core + Buffer Zone)
- स्थापना: 1990 में Tiger Reserve घोषित
- नेपाल से संलग्न: बारदिया राष्ट्रीय उद्यान (नेपाल) से सटा हुआ — ट्रांसबाउंड्री संरक्षण
- नदी: गंडक एवं मसान नदी इस रिजर्व से गुजरती हैं
आर्थिक एवं कृषि महत्व
तराई क्षेत्र की उपजाऊ मिट्टी एवं पर्याप्त जल-उपलब्धता इसे कृषि एवं वन-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बनाती है, हालांकि जल-जमाव एक बड़ी चुनौती है।
कृषि (Agriculture)
| फसल | मौसम | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| धान (Paddy) | खरीफ (Kharif) | जल-जमाव वाले क्षेत्र के लिए सर्वाधिक उपयुक्त; तराई का प्रमुख खाद्यान्न |
| गेहूँ (Wheat) | रबी (Rabi) | जल-जमाव कम होने पर उगाया जाता है |
| गन्ना (Sugarcane) | वार्षिक | पश्चिमी चंपारण में बड़े पैमाने पर; चीनी मिलें स्थापित |
| दलहन (Pulses) | रबी | मसूर, चना — शुष्क भागों में |
| जूट (Jute) | खरीफ | पूर्वी तराई (किशनगंज, अररिया) में प्रचुर वर्षा के कारण |
वन-आधारित उद्योग (Forest-based Economy)
- साल की लकड़ी (Sal Timber) — इमारती लकड़ी के रूप में अत्यंत मूल्यवान। रेलवे, निर्माण कार्य में उपयोग।
- लाख (Lac) — वन क्षेत्र में लाख उत्पादन; खैर वृक्ष से प्राप्त।
- जड़ी-बूटियाँ (Medicinal Plants) — तराई के वनों में सैकड़ों औषधीय पौधे पाए जाते हैं।
- बाँस उत्पाद — टोकरी, फर्नीचर, निर्माण सामग्री।
- इको-टूरिज्म — वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में पर्यटन से राजस्व।
मत्स्य पालन (Fisheries)
तराई की नदियाँ एवं चाउर (झीलें) मछली उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं। गंडक, बागमती एवं कोसी में रोहू, कतला, मांगुर जैसी मछलियाँ प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। मत्स्य पालन यहाँ के जनजातीय समुदायों की आजीविका का प्रमुख साधन है।
पर्यावरणीय एवं आपदा-संबंधी मुद्दे
तराई क्षेत्र प्राकृतिक दृष्टि से संवेदनशील है और यहाँ बाढ़, वनों की कटाई एवं जैव-विविधता संकट जैसी गंभीर चुनौतियाँ हैं। BPSC Mains में इन मुद्दों पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
- बाढ़ (Flood): नेपाल से आने वाली नदियाँ — विशेषतः कोसी — प्रतिवर्ष विनाशकारी बाढ़ लाती हैं। 2008 में कोसी बाढ़ ने सुपौल, सहरसा, मधेपुरा में भारी तबाही मचाई।
- वनों की कटाई (Deforestation): जनसंख्या वृद्धि के कारण वन क्षेत्र में कमी। वाल्मीकि रिजर्व के बफर जोन में अतिक्रमण।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष: हाथियों का खेतों में आना, बाघ का हमला — दोनों पक्षों के लिए खतरा।
- जल-जमाव से फसल नुकसान: अत्यधिक जल-भराव रबी फसलों को नष्ट कर देता है।
- मलेरिया एवं अन्य रोग: स्थायी जल-भराव मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल — मलेरिया, जापानी इन्सेफेलाइटिस (JE) का खतरा।
कोसी — बिहार का शोक
कोसी नदी को “बिहार का शोक” (Sorrow of Bihar) कहते हैं। यह तराई क्षेत्र से होकर गुजरती है और अपना मार्ग बदलती रहती है। पिछले 250 वर्षों में कोसी ने अपना मार्ग 120 किमी पश्चिम की ओर स्थानांतरित किया है। इसके कारण:
- हजारों गाँव विस्थापित हुए।
- भूमि-कटाव एवं रेत जमाव से कृषि भूमि नष्ट।
- 2008 की बाढ़ — कुशहा बाँध टूटा, 5 जिले प्रभावित, लाखों विस्थापित।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों में अचानक बाढ़ (Glacial Lake Outburst Flood — GLOF) का खतरा बढ़ा है। साथ ही मानसून की अनिश्चितता से तराई की कृषि प्रभावित हो रही है।
सरकारी योजनाएँ एवं संरक्षण प्रयास
बिहार सरकार एवं केंद्र सरकार ने तराई क्षेत्र की समस्याओं से निपटने एवं इसके प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए अनेक योजनाएँ एवं नीतियाँ लागू की हैं।
- कोसी परियोजना — भारत-नेपाल संयुक्त बाँध परियोजना
- गंडक परियोजना — सिंचाई + बाढ़ नियंत्रण
- तटबंध (Embankment) निर्माण
- बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली
- Project Tiger — वाल्मीकि रिजर्व में
- Project Elephant — हाथी गलियारा संरक्षण
- Eco-sensitive Zone (ESZ) अधिसूचना
- वन सुरक्षा समितियाँ (VSS)
- जल-जमाव रोधी धान किस्मों का विकास (IRRI)
- PMFBY (प्रधानमंत्री फसल बीमा) योजना
- तराई में ड्रेनेज परियोजनाएँ
- मत्स्य पालन विकास योजना
- National Vector Borne Disease Control Programme
- मलेरिया एवं JE रोधी अभियान
- मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयाँ
- सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र


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