बिहार की वर्षा
औसत वार्षिक वर्षा, वितरण, मानसून एवं Bihar Govt. Competitive Exams के लिए सम्पूर्ण अध्ययन
परिचय — बिहार में वर्षा का महत्त्व
बिहार की वर्षा Bihar Govt. Competitive Exams में बार-बार पूछे जाने वाले भूगोल के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विषयों में से एक है। राज्य की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 1200 मिमी है, जो मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होती है।
बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है जहाँ लगभग 76% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। यहाँ की खरीफ फसलें (धान, मक्का, ज्वार, बाजरा) पूरी तरह मानसूनी वर्षा पर आधारित हैं। वर्षा की अनियमितता ही राज्य में बाढ़ और सूखे दोनों समस्याओं को जन्म देती है।
भौगोलिक दृष्टि से बिहार 26.4°N – 27.5°N अक्षांश एवं 83.2°E – 88.2°E देशांतर के मध्य स्थित है। उत्तर में हिमालय, दक्षिण में छोटानागपुर का पठार तथा मध्य में गंगा का मैदान — ये तीनों भूआकृतियाँ वर्षा के वितरण को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।
बिहार में वर्षा के प्रमुख कारण
बिहार में वर्षा के दो प्रमुख स्रोत हैं — (1) दक्षिण-पश्चिम मानसून तथा (2) पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances)। इसके अतिरिक्त भूगोल की भिन्नता (पहाड़, मैदान, पठार) वर्षा के असमान वितरण का मुख्य कारण है।
बिहार की कुल वर्षा का 85–90% भाग जून से सितम्बर के मध्य दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होता है। यह बंगाल की खाड़ी से उठकर उत्तर-पूर्वी दिशा में आता है।
शीत ऋतु (दिसम्बर–फरवरी) में पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर से आकर बिहार में हल्की वर्षा करते हैं — इसे रबी की वर्षा कहते हैं। यह गेहूँ के लिए लाभकारी है।
उत्तर में हिमालय की तलहटी (तराई क्षेत्र) में पर्वतीय वर्षा होती है। दक्षिण में छोटानागपुर पठार की ऊँचाई कम होने से वर्षा कम होती है।
मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा पूर्वी बिहार (किशनगंज, पूर्णिया) में पहले पहुँचती है — इसीलिए पूर्वी बिहार में वर्षा अधिक होती है।
वर्षा को प्रभावित करने वाले अन्य कारक
- अक्षांशीय स्थिति: बिहार उष्णकटिबंधीय मानसून क्षेत्र में है जो नमी प्राप्त करने के लिए अनुकूल है।
- नदियाँ एवं आर्द्रता: गंगा, कोसी, गंडक, घाघरा नदियाँ स्थानीय वाष्पीकरण द्वारा आर्द्रता बढ़ाती हैं।
- वन आच्छादन: वनों की कमी के कारण स्थानीय वर्षा चक्र कमजोर होता जा रहा है।
- चक्रवाती तूफान: बंगाल की खाड़ी के चक्रवात कभी-कभी बिहार में असाधारण वर्षा लाते हैं।
मानसून एवं ऋतुओं के अनुसार वर्षा
बिहार में वर्षा का वार्षिक चक्र चार ऋतुओं में विभाजित किया जा सकता है — ग्रीष्म, वर्षा, शरद एवं शीत। इनमें वर्षा ऋतु (जून–सितम्बर) सबसे महत्त्वपूर्ण है।
मानसून के आगमन एवं विदाई की तिथियाँ
| क्र. | स्थान/क्षेत्र | मानसून आगमन | मानसून विदाई | वर्षाकाल (दिन) |
|---|---|---|---|---|
| 1 | पूर्णिया / किशनगंज | 10–12 जून | अक्टूबर मध्य | ~125 दिन |
| 2 | भागलपुर / मुंगेर | 12–15 जून | अक्टूबर | ~120 दिन |
| 3 | पटना / मगध क्षेत्र | 15–18 जून | सितम्बर अंत | ~110 दिन |
| 4 | पश्चिम बिहार (बक्सर, रोहतास) | 18–20 जून | सितम्बर | ~100 दिन |
जिलेवार एवं क्षेत्रवार वर्षा वितरण
बिहार के 38 जिलों में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। सर्वाधिक वर्षा किशनगंज (लगभग 1800 मिमी) में तथा न्यूनतम वर्षा रोहतास-कैमूर क्षेत्र (लगभग 700–800 मिमी) में होती है।
| क्षेत्र | प्रमुख जिले | औसत वार्षिक वर्षा | विशेषता |
|---|---|---|---|
| उत्तर-पूर्वी बिहार | किशनगंज, अररिया, पूर्णिया | 1600–1800 मिमी | सर्वाधिक वर्षा — तराई + बंगाल की खाड़ी से निकटता |
| उत्तर-मध्य बिहार | मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सीतामढ़ी, मधुबनी | 1300–1500 मिमी | हिमालयी नदियाँ + मानसून — बाढ़प्रभावित क्षेत्र |
| मध्य बिहार (गंगा मैदान) | पटना, नालंदा, गया, जहानाबाद | 1000–1200 मिमी | राज्य का औसत क्षेत्र — कृषि के लिए उपयुक्त |
| पूर्वी बिहार | भागलपुर, बाँका, मुंगेर, खगड़िया | 1100–1300 मिमी | मानसून की सीधी मार — धान की खेती प्रमुख |
| पश्चिम-दक्षिण बिहार | रोहतास, कैमूर, बक्सर, भोजपुर | 700–900 मिमी | न्यूनतम वर्षा — सूखा-प्रवण, सिंचाई पर निर्भर |
वर्षा के आधार पर बिहार का वर्गीकरण
वर्षा की क्षेत्रीय असमानता — कारण एवं प्रभाव
बिहार में पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा क्रमशः घटती जाती है। यह असमानता राज्य के कृषि, जल संसाधन एवं जनजीवन को गहरे रूप से प्रभावित करती है।
1. मानसून की दिशा: मानसून पूर्व दिशा (बंगाल की खाड़ी) से आता है — पूर्वी बिहार सर्वप्रथम नमी ग्रहण करता है। पश्चिम तक पहुँचते-पहुँचते नमी कम हो जाती है।
2. भूआकृति का प्रभाव: उत्तर-पूर्व में हिमालय की तलहटी (तराई) पर्वतीय वर्षा को बढ़ाती है। दक्षिण-पश्चिम में कोई ऊँची पर्वत-श्रृंखला नहीं है, अतः वर्षा रोकने का कोई अवरोध नहीं।
3. नदियों का प्रभाव: पूर्वी बिहार में कोसी, महानंदा, कमला बलान जैसी नदियाँ हिमालय से आती हैं जो अतिरिक्त आर्द्रता लाती हैं। पश्चिमी बिहार में ऐसी कोई बड़ी हिमालयी नदी नहीं है।
4. वनाच्छादन: पूर्वी एवं उत्तरी बिहार में वन क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक हैं जो स्थानीय वाष्पीकरण एवं वर्षण में सहायक हैं।
- उत्तर बिहार में बाढ़: अत्यधिक वर्षा + हिमालयी नदियों के कारण दरभंगा, मुजफ्फरपुर, सुपौल प्रतिवर्ष बाढ़ग्रस्त होते हैं।
- दक्षिण-पश्चिम में सूखा: रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, गया में अनावृष्टि एवं सूखे की स्थिति बनती है।
- फसल विविधता: उच्च वर्षा क्षेत्र में धान, कम वर्षा क्षेत्र में गेहूँ-दलहन की खेती होती है।
- सिंचाई की आवश्यकता: पश्चिमी बिहार में सोन नहर परियोजना, गंडक नहर जैसी सिंचाई व्यवस्थाएँ विशेष रूप से बनाई गई हैं।
- पलायन: कम वर्षा एवं बाढ़ दोनों ही पलायन के कारण बनते हैं।
वर्षा से संबंधित आपदाएँ — बाढ़ एवं सूखा
बिहार वर्षा की अनिश्चितता एवं असमानता के कारण एक ओर भीषण बाढ़ और दूसरी ओर सूखे का शिकार होता है। दोनों आपदाएँ कृषि, अर्थव्यवस्था एवं जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।
- बिहार का शोक: कोसी नदी — उत्तरी बिहार की सबसे बड़ी बाढ़ लाने वाली नदी।
- बिहार का 73% क्षेत्र बाढ़-प्रभावित है।
- उत्तरी बिहार के मिथिलांचल एवं कोसी क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित।
- कोसी, गंडक, घाघरा, बूढ़ी गंडक, बागमती प्रमुख बाढ़-कारण नदियाँ।
- 2008 का कोसी प्रलय — अब तक की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक।
- बिहार के दक्षिण-पश्चिमी जिले (रोहतास, कैमूर, गया, औरंगाबाद) सूखाग्रस्त।
- वर्षा 750 मिमी से कम होने पर सूखे की घोषणा की जाती है।
- मानसून की देरी या विफलता से फसल नष्ट हो जाती है।
- सोन नहर, पूर्वी कोसी नहर से सिंचाई की व्यवस्था की गई है।
- MGNREGA जैसी योजनाएँ सूखे के असर को कम करती हैं।
बिहार की प्रमुख नदियाँ एवं उनसे जुड़ी वर्षा समस्याएँ
| नदी | उद्गम | बाढ़ प्रभावित जिले | उपनाम |
|---|---|---|---|
| कोसी | नेपाल हिमालय | सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, खगड़िया | बिहार का शोक |
| गंडक | नेपाल | पूर्वी चम्पारण, मुजफ्फरपुर | नारायणी |
| घाघरा | हिमालय (तिब्बत) | सीवान, गोपालगंज, सारण | — |
| बागमती | नेपाल | सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा | — |
| महानंदा | दार्जिलिंग | किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार | — |
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