दक्षिण बिहार की क्षेत्रीय जलवायु विविधता
कम वर्षा, सूखा एवं पठारी प्रभाव | Bihar Govt. Competitive Exams के लिए सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं भौगोलिक संदर्भ
दक्षिण बिहार की क्षेत्रीय जलवायु विविधता Bihar Govt. Competitive Exams एवं बिहार सरकार की अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाने वाला विषय है। गंगा नदी के दक्षिण में फैला यह क्षेत्र जहाँ एक ओर छोटा नागपुर के पठार से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर इसकी जलवायु उत्तर बिहार से मौलिक रूप से भिन्न है — कम वर्षा, अधिक गर्मी और बार-बार आने वाला सूखा इस क्षेत्र की पहचान है।
दक्षिण बिहार — भौगोलिक परिचय
दक्षिण बिहार में गंगा के दक्षिण से लेकर झारखंड की सीमा तक का समस्त क्षेत्र आता है। इसमें मुख्यतः तीन प्रकार के भू-भाग मिलते हैं — गंगा का दक्षिणी मैदान, छोटा नागपुर के पठार की उत्तरी सीमा, तथा विंध्यन शैलों से निर्मित पहाड़ियाँ (कैमूर श्रेणी, राजगीर पहाड़ियाँ, गिरियक पहाड़ियाँ)। यह भू-वैविध्य यहाँ की जलवायु को और अधिक जटिल बनाता है।
दक्षिण बिहार की जलवायु विशेषताएँ
दक्षिण बिहार की जलवायु उष्णकटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क मानसूनी (Tropical Wet and Dry Monsoon) प्रकार की है। यहाँ वर्षभर तापमान अधिक रहता है, आर्द्रता अपेक्षाकृत कम है और मानसून की वर्षा अनिश्चित एवं अपर्याप्त रहती है।
ऋतुओं के अनुसार जलवायु
| ऋतु | अवधि | तापमान | विशेषता |
|---|---|---|---|
| 1 शीत ऋतु | नवंबर–फरवरी | 8°C – 22°C | उत्तर बिहार से अपेक्षाकृत हल्की ठंड; पश्चिमी विक्षोभ से हल्की वर्षा; कोहरा कम |
| 2 ग्रीष्म ऋतु | मार्च–जून | 38°C – 45°C | बिहार की सबसे भीषण गर्मी; तेज लू (Loo); गया सर्वाधिक गर्म; आर्द्रता बहुत कम |
| 3 मानसून ऋतु | जून–सितंबर | 28°C – 36°C | 70–80% वार्षिक वर्षा; अनिश्चित एवं असमान; कभी सूखा, कभी अचानक वर्षा |
| 4 मानसून-पश्चात | अक्टूबर | 25°C – 33°C | मानसून शीघ्र वापसी; वर्षा बंद; शुष्कता आरंभ; नदियाँ पतली पड़ने लगती हैं |
तापमान — दक्षिण बिहार की विशिष्टताएँ
जिलेवार वार्षिक वर्षा — दक्षिण बिहार
वर्षा का स्वरूप — कम वर्षा के कारण
दक्षिण बिहार में वर्षा की मात्रा उत्तर बिहार की तुलना में 400–800 मिमी कम है। इस कमी के पीछे भौगोलिक, स्थलाकृतिक एवं वायुमंडलीय कारण जिम्मेदार हैं।
कम वर्षा के प्रमुख कारण
छोटा नागपुर पठार एवं विंध्यन पर्वत शृंखला मानसूनी हवाओं को रोकती है। बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसून पश्चिम बंगाल एवं झारखंड में वर्षा करके कमज़ोर हो जाती है और दक्षिण बिहार में कम वर्षा लाती है।
बंगाल की खाड़ी की मानसून शाखा उत्तर-पूर्व बिहार (किशनगंज) में पहले आती है। दक्षिण बिहार तक पहुँचते-पहुँचते मानसून की नमी पहले ही खर्च हो चुकी होती है, इसलिए यहाँ वर्षा कम होती है।
उत्तर बिहार में हिमालय मानसूनी हवाओं को रोककर भारी वर्षा कराता है। दक्षिण बिहार में ऐसी कोई ऊँची पर्वत श्रृंखला नहीं है जो मानसून को रोके और ऑरोग्राफिक वर्षा करा सके।
बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न-दाब तंत्र (Low Pressure Systems) और चक्रवात मुख्यतः उत्तर-पूर्वी बिहार एवं उड़ीसा/झारखंड की ओर बढ़ते हैं। दक्षिण बिहार इनसे प्रायः वंचित रहता है।
दक्षिण बिहार के पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की भारी कटाई हुई है। इससे स्थानीय आर्द्रता कम हुई है, वाष्पीकरण-वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) घटा है और स्थानीय वर्षा-चक्र बाधित हुआ है।
दक्षिण बिहार में मानसून उत्तर बिहार से 5–7 दिन बाद पहुँचता है (20–25 जून)। देर से आकर और जल्दी लौटने के कारण वर्षा की अवधि कम होती है, परिणामस्वरूप वार्षिक वर्षा कम होती है।
मानसून आगमन एवं वापसी — दक्षिण बिहार
- मानसूनी वर्षा (Monsoonal Rain): जून–सितंबर; कुल वर्षा का 75–80%; अत्यंत अनिश्चित एवं असमान वितरण
- पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance): शीतकाल (दिसंबर–फरवरी) में; भूमध्यसागर से; हल्की वर्षा (50–80 मिमी); गेहूँ के लिए उपयोगी
- संवहनीय वर्षा (Convectional Rain): ग्रीष्मकाल की दोपहर में; अचानक आँधी के साथ; बहुत कम मात्रा में
- वर्षा-छाया (Rain Shadow): झारखंड की पहाड़ियों के पीछे होने से गया-औरंगाबाद में सबसे कम वर्षा
- कोई ऑरोग्राफिक वर्षा नहीं: हिमालय जैसी ऊँची पर्वत शृंखला न होने से ऑरोग्राफिक वर्षा नगण्य है
सूखा — कारण, प्रकार एवं प्रभावित क्षेत्र
दक्षिण बिहार बाढ़ की बजाय सूखे (Drought) का सामना करता है। जहाँ उत्तर बिहार “बाढ़ का बिहार” है, वहाँ दक्षिण बिहार को “सूखे का बिहार” कहा जा सकता है। मानसून की अनिश्चितता, कम वर्षा और पानी के अभाव से यहाँ कृषि, जनजीवन एवं अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होती है।
- प्रभावित जिले: गया, औरंगाबाद, नवादा, जहानाबाद, अरवल, रोहतास, कैमूर, जमुई, बाँका — 14 से अधिक जिले
- कृषि पर प्रभाव: धान की खेती नष्ट; सिंचाई का अभाव; भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन
- बार-बार सूखा: बिहार में प्रत्येक 3–5 वर्ष में गंभीर सूखा; 2009, 2010, 2016, 2019 के सूखे उल्लेखनीय
- प्रवासन: सूखे के कारण दक्षिण बिहार से मजदूरों का पलायन — पटना, दिल्ली, मुंबई की ओर
सूखे के प्रकार — दक्षिण बिहार में
सूखे के कारण — विस्तृत विश्लेषण
मानसून की अनियमितता के कारण कभी 600 मिमी तो कभी 1100 मिमी वर्षा होती है। इस अनिश्चितता से किसान योजना नहीं बना सकते। “मानसून की जुआरी अर्थव्यवस्था” का यह क्षेत्र शिकार है।
दक्षिण बिहार में सिंचाई का प्रतिशत बहुत कम है। नहर-तंत्र विकसित नहीं; तालाब सूखे हुए; कुएँ का जलस्तर नीचे। किसान वर्षा पर पूरी तरह निर्भर हैं।
पठारी क्षेत्रों में वनों की कटाई से मिट्टी की जलधारण-क्षमता कम हुई। वर्षा-जल सतह पर बह जाता है और भूमिगत जल रिचार्ज नहीं होता। सूखे की तीव्रता बढ़ती है।
दक्षिण बिहार की लाल-पीली मिट्टी एवं पुरानी जलोढ़ मिट्टी में जलधारण-क्षमता कम होती है। थोड़ी वर्षा में भी जल जल्दी बह जाता है या वाष्पित हो जाता है।
सिंचाई के लिए भूमिगत जल का अत्यधिक उपयोग। वर्षा कम होने से रिचार्ज नहीं होता। भूजल स्तर प्रतिवर्ष नीचे जा रहा है — विशेष रूप से गया, नवादा, औरंगाबाद में।
उच्च तापमान (40–45°C) के कारण जल का वाष्पीकरण अत्यधिक होता है। जो थोड़ी-बहुत वर्षा होती है, वह भी वाष्पित हो जाती है और मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं बचती।
प्रमुख नदियाँ — दक्षिण बिहार
दक्षिण बिहार की नदियाँ मुख्यतः प्रायद्वीपीय (Peninsular) मूल की हैं — अर्थात् ये हिमालय से नहीं बल्कि छोटा नागपुर पठार एवं विंध्यन पर्वत से निकलती हैं। इनमें वर्षभर जल नहीं रहता — गर्मियों में ये सूख जाती हैं। यही इन्हें उत्तर बिहार की हिमालयी नदियों से मूलतः अलग करता है।
सोन नदी (Son River)
दक्षिण बिहार की प्रमुख नदीसोन बिहार की दक्षिणी ओर से आने वाली सबसे बड़ी नदी है। गर्मी में जलस्तर बहुत कम हो जाता है। इस पर इंद्रपुरी बैराज (रोहतास) एवं डेहरी बैराज बने हैं।
फल्गु नदी (Falgu River)
गया की पावन नदीधार्मिक महत्व: हिंदू धर्म में पितृ-तर्पण एवं पिंडदान के लिए प्रसिद्ध। गर्मियों में लगभग सूख जाती है — केवल रेत दिखती है। इसे “मृत नदी” भी कहा जाता है।
पुनपुन नदी (Punpun River)
पटना की दक्षिणी नदीमानसून काल में उफान; शेष समय छिछली। पटना के दक्षिणी भाग में बाढ़ का कारण। कृषि-सिंचाई में उपयोग।
किऊल नदी (Kiul River)
लखीसराय की नदीछोटी किंतु महत्वपूर्ण नदी। किऊल रेलवे जंक्शन इसी के किनारे। ग्रीष्मकाल में जलप्रवाह नगण्य।
उत्तरी कोयल / औरंगा
औरंगाबाद की नदियाँये छोटी नदियाँ बरसाती (seasonal) हैं। गर्मियों में पूरी तरह सूख जाती हैं। सूखे-प्रवण औरंगाबाद के लिए पानी का एकमात्र स्थानीय स्रोत।
चानन / पंचाने नदी
नालंदा-नवादा की नदियाँराजगीर (नालंदा) के पास गर्म-जल के स्रोत (Hot Springs) इन्हीं पहाड़ियों से संबंधित हैं। नवादा में इन नदियों का पानी सिंचाई में उपयोग।
उत्तर बिहार से जलवायु तुलना
बिहार के दोनों भाग — उत्तर बिहार (गंगा के उत्तर) और दक्षिण बिहार (गंगा के दक्षिण) — जलवायु, वर्षा, नदी-तंत्र और प्राकृतिक समस्याओं की दृष्टि से एक-दूसरे के लगभग विपरीत हैं।
| पहलू | उत्तर बिहार | दक्षिण बिहार |
|---|---|---|
| वार्षिक वर्षा | 1200–1800 मिमी | 800–1100 मिमी |
| जलवायु प्रकार | उष्ण आर्द्र मानसूनी | उष्ण अर्ध-शुष्क मानसूनी |
| मुख्य समस्या | बाढ़ (Flood) | सूखा (Drought) |
| नदियाँ | हिमालयी — बारहमासी | प्रायद्वीपीय — वर्षाश्रित |
| ग्रीष्म तापमान | 38–44°C | 40–45°C (गया) |
| शीत तापमान | 3–15°C (कम) | 8–22°C (अधिक) |
| आर्द्रता | 70–90% (उच्च) | 40–70% (कम) |
| मिट्टी | नवीन जलोढ़ (खादर) — उर्वर | पुरानी जलोढ़ + लाल-पीली मिट्टी |
| वनस्पति | घना तराई वन, जूट, धान | विरल वन, कंटीली झाड़ियाँ |
| मुख्य फसल | धान, मक्का, जूट | गेहूँ, दलहन, तिलहन |
| मानसून आगमन | 10–15 जून (पहले) | 20–25 जून (देर से) |
| सर्वाधिक वर्षा जिला | किशनगंज (~1800 मिमी) | भागलपुर/मुंगेर (~1050 मिमी) |
| न्यूनतम वर्षा जिला | पश्चिमी चंपारण (~1100 मिमी) | औरंगाबाद/गया (~800 मिमी) |
| गर्म हवाएँ | लू + काल-बैशाखी | केवल लू (Loo) — अधिक तीव्र |
- उत्तर बिहार = अधिक वर्षा + बाढ़ + हिमालयी नदियाँ + आर्द्र जलवायु + ठंडा शीतकाल
- दक्षिण बिहार = कम वर्षा + सूखा + प्रायद्वीपीय नदियाँ + अर्ध-शुष्क जलवायु + गर्म ग्रीष्मकाल
- गंगा नदी दोनों क्षेत्रों के बीच की प्राकृतिक सीमा एवं जलवायु-विभाजक है
- किशनगंज = बिहार में सर्वाधिक वर्षा | औरंगाबाद/गया = न्यूनतम वर्षा
सूखा प्रबंधन एवं सरकारी उपाय
दक्षिण बिहार में सूखे की समस्या से निपटने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार ने कई योजनाएँ चलाई हैं। इनमें सिंचाई विस्तार, जल-संरक्षण, फसल बीमा और रोजगार योजनाएँ प्रमुख हैं।
सिंचाई एवं जल-प्रबंधन परियोजनाएँ
पारंपरिक जल-प्रबंधन — आहर-पईन व्यवस्था
दक्षिण बिहार में सदियों पुरानी आहर-पईन (Ahar-Pyne) व्यवस्था थी जो सूखे से निपटने का देशज तरीका था। आहर (Ahar) एक प्रकार का जलाशय होता था जिसमें वर्षा-जल संरक्षित किया जाता था, और पईन (Pyne) उसमें जोड़ी गई नहरें होती थीं जो खेतों तक पानी पहुँचाती थीं। अंग्रेजी शासनकाल में इस व्यवस्था की उपेक्षा हुई और आज इसे पुनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं।
- सोन नहर प्रणाली: इंद्रपुरी एवं डेहरी बैराज से निकली नहरें गया, औरंगाबाद, पटना जिलों को सींचती हैं
- चेक-डैम निर्माण: छोटी नदियों एवं नालों पर चेक-डैम बनाकर वर्षा-जल का संरक्षण
- तालाब पुनरुद्धार: सरकारी कार्यक्रम से हजारों तालाबों की खुदाई एवं सफाई
- भूजल पुनर्भरण (Recharge): कृत्रिम तरीकों से भूमिगत जल का रिचार्ज; “Recharge Pits” का निर्माण
- लिफ्ट सिंचाई: सोन, पुनपुन जैसी नदियों से पंप द्वारा पानी उठाकर खेतों तक पहुँचाना
- फसल बीमा — PMFBY: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना; सूखे में फसल नुकसान की भरपाई
- मनरेगा (MGNREGS): सूखा-प्रभावित जिलों में रोजगार; तालाब खुदाई, वृक्षारोपण कार्य
- IMD Early Warning: मौसम विभाग का सूखा-पूर्व चेतावनी तंत्र; किसानों को SMS अलर्ट
- सूखा-प्रतिरोधी फसलें: कम पानी में उगने वाली फसलें (अरहर, मक्का, बाजरा) को बढ़ावा
- जल-जीवन-हरियाली: बिहार सरकार की प्रमुख योजना; वृक्षारोपण, जल-संरक्षण, सौरऊर्जा पंप
वर्षाजल संग्रह
Rooftop Rain Harvesting; चेक-डैम; आहर-पईन पुनरुद्धार
वनीकरण
पठारी भूमि पर वृक्षारोपण; जलधारण क्षमता वृद्धि
सौर सिंचाई पंप
PM-KUSUM योजना; सौरऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंप
जलवायु-स्मार्ट कृषि
Drought-resistant seeds; Precision Farming; कम पानी में अधिक उपज


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