बिहार का ऋतु विभाजन
वर्षा ऋतु
Bihar Govt. Competitive Exams — Bihar Govt. Competitive Exams | हिंदी माध्यम | सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
परिचय एवं सामान्य जानकारी
बिहार की वर्षा ऋतु (Monsoon Season) वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण ऋतु है। यह जून के मध्य से अक्टूबर तक रहती है। बिहार की अर्थव्यवस्था, कृषि और जन-जीवन इस ऋतु पर केंद्रित है। Bihar Govt. Competitive Exams में वर्षा ऋतु से प्रतिवर्ष प्रश्न आते हैं।
बिहार में ऋतु-क्रम और वर्षा ऋतु की स्थिति
| ऋतु | अवधि | वर्षा (मासिक औसत) | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|---|
| ग्रीष्म ऋतु | मार्च – जून (मध्य) | 10–40 मिमी | लू, काल बैसाखी |
| वर्षा ऋतु | जून (मध्य) – अक्टूबर | 150–350 मिमी | दक्षिण-पश्चिम मानसून, बाढ़ |
| शीत ऋतु | नवम्बर – फरवरी | 5–15 मिमी | शुष्क, कोहरा, पश्चिमी विक्षोभ |
मानसून का आगमन एवं अवधि
दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में केरल (1 जून) से प्रवेश करता है और धीरे-धीरे उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ता है। बिहार में मानसून का आगमन जून के दूसरे-तीसरे सप्ताह में होता है और इसकी वापसी अक्टूबर में होती है।
मानसून का बिहार में प्रवेश — चरण-दर-चरण
दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएँ और बिहार
वर्षा का वितरण — क्षेत्रवार एवं जिलेवार
बिहार में वर्षा का वितरण पूर्व से पश्चिम की ओर घटता है। किशनगंज (पूर्वी बिहार) में सर्वाधिक वर्षा और कैमूर-रोहतास (पश्चिमी बिहार) में सबसे कम वर्षा होती है। यह असमान वितरण बिहार की जलवायु की प्रमुख विशेषता है।
जिलेवार वार्षिक वर्षा (अनुमानित)
क्षेत्रवार वर्षा का तुलनात्मक विश्लेषण
| क्षेत्र | प्रमुख जिले | वार्षिक वर्षा | प्रमुख कारण |
|---|---|---|---|
| उत्तर-पूर्वी बिहार | किशनगंज, पूर्णिया, अररिया, कटिहार | 1600–2200 मिमी | बंगाल की खाड़ी शाखा का सीधा प्रभाव; हिमालय की ढाल |
| उत्तर-मध्य बिहार | दरभंगा, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी | 1200–1500 मिमी | नेपाल से आने वाली नदियाँ; मानसूनी वर्षा |
| मध्य बिहार | पटना, नालंदा, वैशाली, समस्तीपुर | 1000–1200 मिमी | मानसून का क्रमिक कमजोर पड़ना |
| दक्षिण बिहार | गया, जहानाबाद, नवादा, अरवल | 900–1100 मिमी | छोटानागपुर पठार का वृष्टि-छाया (Rain Shadow) प्रभाव |
| पश्चिमी बिहार | रोहतास, कैमूर, भोजपुर, बक्सर | 750–950 मिमी | अरब सागर शाखा कमजोर; वृष्टि-छाया क्षेत्र |
1. पूर्व से पश्चिम घटती वर्षा: बंगाल की खाड़ी शाखा पूर्व से प्रवेश करती है। जैसे-जैसे यह पश्चिम की ओर बढ़ती है, इसमें जलवाष्प कम होता जाता है। इसलिए पूर्वी बिहार में सर्वाधिक और पश्चिमी बिहार में न्यूनतम वर्षा होती है।
2. वृष्टि-छाया प्रभाव (Rain Shadow Effect): दक्षिण बिहार में छोटानागपुर पठार एक अवरोध की तरह काम करता है। जब मानसूनी हवाएँ पठार से ऊपर उठती हैं तो पठार के ऊपर वर्षा होती है, परंतु पठार के पीछे (उत्तर) वाले क्षेत्र (दक्षिण बिहार) में कम वर्षा होती है।
3. हिमालय का प्रभाव: उत्तर-पूर्वी बिहार में हिमालय की ढलानें मानसूनी हवाओं को रोककर ऊपर उठाती हैं जिससे किशनगंज जैसे क्षेत्रों में असाधारण वर्षा होती है।
4. नदी घाटियों का प्रभाव: कोसी, गंडक, बागमती आदि नदी घाटियाँ मानसूनी हवाओं को अंदर खींचती हैं जिससे उत्तर बिहार में अधिक वर्षा होती है।
वर्षा के कारण एवं जलवायु तंत्र
बिहार में वर्षा ऋतु के दौरान वर्षा कई तंत्रों और कारणों से होती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून मुख्य स्रोत है, परंतु चक्रवात, Depression, ITCZ और ऑरोग्राफिक वर्षा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
बिहार की 80–85% वर्षा का मुख्य कारण। हिंद महासागर से उठने वाली जलवाष्प से भरपूर हवाएँ उत्तर-पूर्व की ओर बहती हैं। ITCZ का उत्तर की ओर खिंचाव इस प्रक्रिया को संचालित करता है।
जुलाई–सितंबर में बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दाब क्षेत्र (Depression) और चक्रवात बिहार में भारी वर्षा लाते हैं। ये बिहार में बाढ़ का प्रमुख कारण भी बनते हैं।
उत्तर-पूर्वी बिहार में हिमालय की ढलानों से टकराकर मानसूनी हवाएँ ऊपर उठती हैं। इससे किशनगंज, अररिया, सुपौल में भारी ऑरोग्राफिक वर्षा होती है।
जमीन के अत्यधिक गर्म होने से वायु ऊपर उठती है और ठंडी होकर वर्षा करती है। यह मुख्यतः दोपहर बाद होती है और वज्रपात के साथ आती है। दक्षिण बिहार में यह अधिक होती है।
मानसूनी वर्षा का माह-वार वितरण
| माह | औसत वर्षा | वार्षिक वर्षा का % | विशेषता |
|---|---|---|---|
| जून (मध्य से) | 100–150 मिमी | ~10–12% | मानसून आगमन, प्रारंभिक वर्षा |
| जुलाई | 250–350 मिमी | ~28–32% | सर्वाधिक वर्षा का माह; बाढ़ |
| अगस्त | 200–280 मिमी | ~22–26% | निरंतर भारी वर्षा; नदियाँ उफान पर |
| सितंबर | 120–180 मिमी | ~14–18% | वर्षा घटने लगती है; Retreating Monsoon |
| अक्टूबर | 30–60 मिमी | ~4–6% | मानसून विदाई; शुष्कता बढ़ती है |
ITCZ (Inter-Tropical Convergence Zone) वह क्षेत्र है जहाँ उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवनें (Trade Winds) मिलती हैं। ग्रीष्म ऋतु में ITCZ उत्तर की ओर खिंचकर बिहार तक पहुँचता है।
जब ITCZ उत्तर भारत के ऊपर होता है, तब बंगाल की खाड़ी और अरब सागर दोनों से आर्द्र हवाएँ उत्तर की ओर खिंचती हैं। यही दक्षिण-पश्चिम मानसून का सैद्धांतिक आधार है।
सितंबर में ITCZ दक्षिण की ओर वापस जाने लगता है, जिससे मानसून की वापसी होती है। अक्टूबर तक ITCZ दक्षिण भारत के नीचे चला जाता है और बिहार में वर्षा ऋतु समाप्त हो जाती है।
बाढ़ — कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं प्रबंधन
बिहार की वर्षा ऋतु की सबसे गंभीर आपदा बाढ़ (Flood) है। बिहार को भारत का सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित राज्य माना जाता है। उत्तर बिहार के जिले प्रतिवर्ष बाढ़ की विभीषिका झेलते हैं।
उत्तर बिहार की नदियाँ (कोसी, गंडक, बागमती) नेपाल और हिमालय से आती हैं। नेपाल में भारी वर्षा होने पर इन नदियों में अचानक बाढ़ आती है। कोसी नदी को “बिहार का शोक” कहते हैं।
बिहार की नदियों का तल समतल मैदानों में बहुत उथला हो जाता है। भारी वर्षा में नदियाँ किनारे तोड़कर बाहर बह जाती हैं। गाद (Silt) जमा होने से नदियों की जल-धारण क्षमता घट गई है।
बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दाब क्षेत्र बिहार की ओर आते हैं तो अत्यधिक वर्षा होती है। कुछ ही घंटों में 100–200 मिमी वर्षा संभव होती है जिससे अचानक बाढ़ (Flash Flood) आती है।
हिमालय और उत्तर बिहार में वनों की कटाई से जल-धारण क्षमता घटी है। मृदा अपरदन बढ़ा है। नदियों में गाद अधिक आ रही है। इससे बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं।
बाढ़-प्रभावित प्रमुख क्षेत्र और नदियाँ
| नदी | उपनाम / विशेषता | प्रभावित जिले | समस्या |
|---|---|---|---|
| कोसी (Koshi) | “बिहार का शोक” | सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया | अत्यधिक धारा परिवर्तन; 2008 में बड़ी तबाही |
| गंडक (Gandak) | “नारायणी नदी” | पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सारण | प्रतिवर्ष बाढ़; तटबंध टूटना |
| बागमती (Bagmati) | “मिथिला की सरस्वती” | सीतामढ़ी, शिवहर, मुजफ्फरपुर | मानसून में उफान; नेपाल निर्भरता |
| महानंदा (Mahananda) | — | किशनगंज, पूर्णिया | पूर्वी बिहार में बाढ़ |
| बूढ़ी गंडक (Budhi Gandak) | — | मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा | मध्य बिहार में वार्षिक बाढ़ |
| कमला (Kamla) | — | मधुबनी, दरभंगा | मिथिला क्षेत्र में बाढ़ |
कोसी नदी तिब्बत और नेपाल से निकलती है। इसे “बिहार का शोक (Sorrow of Bihar)” इसलिए कहते हैं क्योंकि यह सर्वाधिक तबाही मचाती है। यह नदी पिछले 250 वर्षों में 120 किमी पश्चिम की ओर खिसक चुकी है।
2008 की कोसी बाढ़ बिहार की सबसे भयंकर बाढ़ थी। नेपाल के कुसहा (Kusaha) में तटबंध टूटने से 30 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए। सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, अररिया, पूर्णिया जिले बुरी तरह प्रभावित हुए।
कोसी को नेपाल में “सप्तकोसी” भी कहते हैं क्योंकि यह सात धाराओं — सुनकोसी, तामूर, इंद्रावती, दूधकोसी, लिखू, अरुण और तमोर — से मिलकर बनती है।
बाढ़ प्रबंधन और सरकारी उपाय
कृषि एवं जन-जीवन पर वर्षा ऋतु का प्रभाव
वर्षा ऋतु बिहार की कृषि का आधार है। खरीफ फसलें पूर्णतः मानसून पर निर्भर हैं। जहाँ एक ओर पर्याप्त वर्षा फसल को समृद्ध करती है, वहीं अत्यधिक वर्षा बाढ़ से फसल नष्ट कर देती है।
धान (Paddy/Rice) बिहार की प्रमुख खरीफ फसल है। इसकी बुआई जून-जुलाई में होती है और कटाई अक्टूबर-नवंबर में। धान के लिए 1000–2000 मिमी वर्षा आवश्यक है। उत्तर और पूर्वी बिहार धान उत्पादन में अग्रणी हैं।
मक्का (Maize) बिहार की दूसरी प्रमुख खरीफ फसल है। यह कम वर्षा में भी उगती है। खगड़िया, सहरसा, मधेपुरा मक्का उत्पादन में प्रमुख हैं। बिहार मक्का उत्पादन में देश में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
दलहन (Pulses) जैसे अरहर, मूँग, उड़द भी खरीफ में बोए जाते हैं। तिलहन (Oilseeds) जैसे मूँगफली और सोयाबीन भी वर्षा ऋतु में उगाए जाते हैं। जूट (Jute) पूर्वी बिहार में उगाई जाती है जिसके लिए अधिक वर्षा और नमी चाहिए।
प्रमुख खरीफ फसलें और उनके उत्पादक क्षेत्र
| फसल | आवश्यक वर्षा | प्रमुख उत्पादक जिले | बिहार में महत्व |
|---|---|---|---|
| धान (Rice) | 1000–2000 मिमी | दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, कटिहार | मुख्य खाद्य फसल |
| मक्का (Maize) | 500–800 मिमी | खगड़िया, सहरसा, मधेपुरा, बेगूसराय | नकदी फसल; पशु आहार |
| जूट (Jute) | 1500–2000 मिमी | पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज | नकदी फसल; रेशेदार |
| अरहर (Pigeon Pea) | 600–1000 मिमी | गया, नालंदा, पटना, भोजपुर | प्रमुख दलहन फसल |
| सब्जियाँ | 300–800 मिमी | पटना, वैशाली, नालंदा | सब्जी उत्पादन हब |
जन-जीवन पर प्रभाव
- बाढ़: उत्तर बिहार के 28+ जिले प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित। लाखों लोग विस्थापित होते हैं।
- वज्रपात: बिहार वज्रपात मृत्यु में देशभर में अग्रणी है; वर्षा ऋतु में सर्वाधिक घटनाएँ।
- जलजनित रोग: बाढ़ के बाद मलेरिया, डेंगू, जापानी इंसेफलाइटिस (JE), लेप्टोस्पायरोसिस।
- फसल क्षति: अत्यधिक वर्षा और बाढ़ से धान, मक्का, सब्जियाँ नष्ट हो जाती हैं।
- अनिश्चितता: El Niño वर्षों में कम वर्षा; La Niña वर्षों में अत्यधिक वर्षा — किसानों के लिए जोखिम।
जलवायु विज्ञान एवं Bihar Govt. Competitive Exams विशेष तथ्य
Bihar Govt. Competitive Exams और अन्य बिहार प्रतियोगी परीक्षाओं में वर्षा ऋतु से संबंधित वैज्ञानिक तथ्य, आँकड़े और नाम प्रश्नों में पूछे जाते हैं। El Niño, La Niña, ENSO और जलवायु परिवर्तन का बिहार की वर्षा पर प्रभाव भी महत्वपूर्ण है।
El Niño और La Niña का बिहार की वर्षा पर प्रभाव
वर्षा ऋतु — महत्वपूर्ण संख्यात्मक तथ्य
| तथ्य | मान / विवरण | परीक्षा महत्व |
|---|---|---|
| बिहार की औसत वार्षिक वर्षा | ~1000–1200 मिमी | ⭐⭐⭐ |
| सर्वाधिक वर्षा वाला जिला | किशनगंज (2000–2200 मिमी) | ⭐⭐⭐ |
| न्यूनतम वर्षा वाला जिला | रोहतास / कैमूर (~750–900 मिमी) | ⭐⭐ |
| सर्वाधिक वर्षा वाला माह | जुलाई (~30%) | ⭐⭐⭐ |
| मानसून प्रवेश (बिहार) | जून का दूसरा/तीसरा सप्ताह | ⭐⭐⭐ |
| मानसून की विदाई | अक्टूबर मध्य | ⭐⭐ |
| कोसी का उपनाम | “बिहार का शोक” | ⭐⭐⭐ |
| बिहार में तटबंध की लंबाई | ~3700+ किमी | ⭐⭐ |
| वर्षा का प्रमुख स्रोत | दक्षिण-पश्चिम मानसून (80–85%) | ⭐⭐⭐ |


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