मामलुक वंश का पतन
और खिलजी वंश की स्थापना
बलबन के बाद की अराजकता से लेकर जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी द्वारा 1290 ई. में नए राजवंश की स्थापना तक — BPSC Prelims एवं Mains के लिए सम्पूर्ण विश्लेषण
परिचय एवं पृष्ठभूमि
मामलुक वंश का पतन और 1290 ई. में खिलजी वंश की स्थापना — BPSC Prelims एवं Mains परीक्षा के दृष्टिकोण से दिल्ली सल्तनत के इतिहास का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संक्रमण काल है। यह परिवर्तन केवल एक राजवंश के स्थान पर दूसरे राजवंश के आने का प्रश्न नहीं था, बल्कि यह भारत में तुर्की शासन-व्यवस्था के सामाजिक, सैनिक और राजनीतिक ढाँचे में आमूल परिवर्तन की शुरुआत थी।
दिल्ली सल्तनत की स्थापना 1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने की थी। यह वंश इतिहास में मामलुक वंश (Mamluk Dynasty), गुलाम वंश (Slave Dynasty) या इल्बारी वंश के नाम से जाना जाता है। लगभग 84 वर्षों तक इस वंश ने दिल्ली पर शासन किया। परंतु बलबन (1266–1287 ई.) की मृत्यु के पश्चात यह वंश तीव्र गति से पतन की ओर अग्रसर हुआ, और अंततः जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी ने इस वंश को समाप्त कर खिलजी वंश की नींव रखी।
मामलुक वंश: एक दृष्टि (1206–1290 ई.)
मामलुक शब्द का अर्थ है “वह जो किसी का स्वामित्व हो” — अर्थात् दास। इस वंश के संस्थापक और उसके अधिकांश उत्तराधिकारी पहले गुलाम रहे थे। इस वंश को पूर्णतः गुलाम वंश कहना भी सटीक नहीं है क्योंकि इल्तुतमिश के बाद के अनेक शासक गुलाम नहीं थे। इतिहासकार इसे इल्बारी वंश (Ilbari Turks) भी कहते हैं।
कुतुबुद्दीन ऐबक
1206–1210 ई.इल्तुतमिश
1210–1236 ई.रज़िया सुल्तान
1236–1240 ई.बलबन (गयासुद्दीन)
1266–1287 ई.प्रमुख शासकों की तालिका
| क्र. | शासक | शासनकाल | प्रमुख योगदान / घटना |
|---|---|---|---|
| 1 | कुतुबुद्दीन ऐबक | 1206–1210 | सल्तनत की स्थापना; कुवैत-उल-इस्लाम मस्जिद |
| 2 | आरामशाह | 1210–1211 | अयोग्य; इल्तुतमिश द्वारा हटाया गया |
| 3 | इल्तुतमिश | 1211–1236 | इक्ता, सिक्का, राजधानी दिल्ली स्थानांतरण |
| 4 | रज़िया सुल्तान | 1236–1240 | पहली महिला सुल्तान; अमीरों से संघर्ष |
| 5 | बहरामशाह / मसूद | 1240–1246 | कमजोर शासन; अमीरों का वर्चस्व |
| 6 | नासिरुद्दीन महमूद | 1246–1266 | नाममात्र का सुल्तान; बलबन की प्रधानमंत्री शक्ति |
| 7 | बलबन (गयासुद्दीन) | 1266–1287 | चेहलगानी नष्ट; राजत्व सिद्धान्त; केंद्रीकरण |
| 8 | मुइज्जुद्दीन कैकुबाद | 1287–1290 | अंतिम प्रभावी शासक; जलालुद्दीन ने अपदस्थ किया |
| 9 | शम्सुद्दीन क्यूमर्स | 1290 (कुछ माह) | बाल-शासक; नाम मात्र; वंश का अंत |
बलबन के बाद का संकट (1287–1290 ई.)
बलबन की मृत्यु (1287 ई.) मामलुक वंश के इतिहास का वास्तविक अंत था। उनके पश्चात जो तीन वर्षों की राजनीतिक उथल-पुथल हुई, उसने सल्तनत की नींव को जर्जर कर दिया और खिलजी वंश के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया।
बलबन के उत्तराधिकार की समस्या
बलबन के दो पुत्र थे — मुहम्मद (बड़ा पुत्र) और बुगरा खाँ (छोटा पुत्र)। मुहम्मद की 1285 ई. में मंगोलों के विरुद्ध युद्ध में मृत्यु हो चुकी थी, जिससे बलबन को अत्यंत गहरा आघात लगा था। बुगरा खाँ को बंगाल का प्रभारी बनाया गया था, परंतु वह दिल्ली की गद्दी के प्रति उदासीन था। अतः बलबन की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का कोई स्पष्ट उम्मीदवार नहीं था।
कैकुबाद का विनाशकारी शासन
मुइज्जुद्दीन कैकुबाद, बुगरा खाँ का पुत्र और बलबन का पौत्र था। वह बचपन से अत्यंत कठोर अनुशासन में पला-बढ़ा था, जिसकी प्रतिक्रिया में सुल्तान बनते ही वह विलासिता में डूब गया। उसने दरबारियों पर ध्यान नहीं दिया और शासन की बागडोर मलिक निज़ामुद्दीन (वज़ीर) के हाथों में छोड़ दी। निज़ामुद्दीन ने अपने हितों के अनुसार राज्य चलाना शुरू किया। इस अव्यवस्था का सीधा लाभ जलालुद्दीन खिलजी ने उठाया जो उस समय समाना और बरन का सूबेदार था।
मामलुक वंश के पतन के कारण: विस्तृत विश्लेषण
मामलुक वंश का पतन एक दिन में नहीं हुआ। यह दीर्घकालीन संरचनात्मक कमज़ोरियों, व्यक्तिगत विफलताओं और बाह्य दबावों का सम्मिलित परिणाम था। Mains परीक्षा में इन कारणों का विश्लेषणात्मक उत्तर माँगा जाता है।
बलबन ने चेहलगानी (Chalisa) — चालीस तुर्क दासों का शक्तिशाली दल — को नष्ट करके सारी सत्ता अपने हाथ में केंद्रित की। इससे एक ओर अनुभवी प्रशासकों का अभाव हुआ, दूसरी ओर कोई योग्य उत्तराधिकारी तैयार नहीं हो सका।
बड़े पुत्र शहज़ादा मुहम्मद की 1285 ई. में मंगोलों से युद्ध में मृत्यु हो गई। छोटे पुत्र बुगरा खाँ को बंगाल भेज दिया गया। बलबन का पौत्र कैकुबाद अयोग्य और विलासी निकला।
मामलुक वंश में समय-समय पर अमीरों का हस्तक्षेप होता रहा। बलबन के बाद मलिक निज़ामुद्दीन जैसे प्रभावशाली अमीरों ने सुल्तान को कठपुतली बना दिया। अमीरों की गुटबंदी ने सल्तनत को कमजोर किया।
1285 ई. में मंगोलों ने पंजाब पर भारी आक्रमण किया। शहज़ादा मुहम्मद की मृत्यु के बाद उत्तर-पश्चिमी सीमाएँ असुरक्षित हो गईं। इससे केंद्र सरकार की शक्ति और प्रतिष्ठा दोनों प्रभावित हुईं।
बलबन के भव्य दरबारी खर्च और सैन्य अभियानों ने राजकोष को खाली कर दिया था। कैकुबाद के काल में विलासी जीवनशैली से स्थिति और बिगड़ी। इक्ता व्यवस्था पर नियंत्रण शिथिल पड़ गया।
खिलजी जनजाति मूलतः अफगानिस्तान के हेलमंद क्षेत्र की थी। वे अफगान संस्कृति से प्रभावित तुर्क थे। इल्तुतमिश के काल से ये दिल्ली सल्तनत में सैनिक भूमिका निभा रहे थे। बलबन ने इन्हें अछूत (low-born) मानकर दरकिनार किया, जिससे इनमें असंतोष था।
इल्तुतमिश के बाद के कई शासक या तो गुलाम नहीं थे या उनकी वंशावली स्पष्ट नहीं थी। बलबन ने खलीफा से मान्यता प्राप्त की थी, परंतु उसके उत्तराधिकारियों में यह वैधता नहीं थी। इससे अमीर उन्हें सहजता से हटा सकते थे।
बलबन ने जो सुसंगठित सेना बनाई थी, कैकुबाद के काल में वह भी बिखर गई। सैनिकों का मनोबल गिरा और सेनापतियों की वफादारी संदिग्ध हो गई। जलालुद्दीन खिलजी, जो स्वयं एक अनुभवी सेनानायक था, ने इस शून्य का फायदा उठाया।
जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी: परिचय एवं उत्थान
जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी खिलजी वंश के संस्थापक और दिल्ली सल्तनत के पहले ऐसे सुल्तान थे जो तुर्की-अफगान मिश्रित पृष्ठभूमि से आए। वे न केवल एक कुशल सैनिक थे बल्कि एक नरम स्वभाव वाले शासक भी थे, जो उस युग में असाधारण था।
मूल और प्रारम्भिक जीवन: जलालुद्दीन खिलजी जनजाति के थे जो अफगानिस्तान के हेलमंद प्रदेश में बसी थी। यह जनजाति तुर्की मूल की थी परंतु अफगानी रीति-रिवाजों से इतनी प्रभावित थी कि कट्टर तुर्क अमीर इन्हें “अफगान” समझते और हेय दृष्टि से देखते थे। यही कारण था कि बलबन जैसे शासकों ने इन्हें उच्च पदों से वंचित रखा।
सैन्य जीवन: जलालुद्दीन ने बलबन के शासनकाल में मंगोलों के विरुद्ध अनेक सफल अभियान किए। बलबन ने उन्हें समाना, बरन और कड़ा का सूबेदार बनाया। मंगोलों को खदेड़ने में उनकी बहादुरी अत्यंत प्रसिद्ध थी।
सत्ता की ओर कदम: कैकुबाद के शासनकाल में जब दिल्ली में अस्थिरता थी, जलालुद्दीन ने सेना के साथ दिल्ली कूच किया। उसके प्रभाव और सैनिक शक्ति के सामने कैकुबाद झुक गया। जलालुद्दीन को “नाइब-उस-सल्तनत” (उपसुल्तान) बनाया गया। शीघ्र ही उन्होंने कैकुबाद को हटाकर खुद गद्दी सम्भाली।
खिलजी वंश की स्थापना: 1290 ई. की घटनाएँ
1290 ई. दिल्ली सल्तनत के इतिहास में एक निर्णायक वर्ष था। इस वर्ष घटी घटनाओं की श्रृंखला ने न केवल एक नए राजवंश को जन्म दिया, बल्कि भारतीय इतिहास में “खिलजी क्रांति” के नाम से विख्यात एक नए युग की शुरुआत की।
सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया
कैकुबाद ने सुल्तान बनते ही अपने को विलासिता में डुबो दिया। प्रशासन पूर्णतः मलिक निज़ामुद्दीन के हाथों में था। 1289–90 ई. में कैकुबाद को पक्षाघात (paralysis) हो गया। इस स्थिति में दरबारियों ने उसके तीन वर्षीय पुत्र शम्सुद्दीन क्यूमर्स को सुल्तान घोषित कर दिया।
- निज़ामुद्दीन की भूमिका: राज्य के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय वज़ीर निज़ामुद्दीन लेता था।
- क्यूमर्स का राज्याभिषेक: यह केवल कागज़ी था — वास्तविक शक्ति अमीरों के पास थी।
- दिल्ली में अराजकता: विभिन्न गुट अपने-अपने प्रभाव के लिए लड़ रहे थे।
जलालुद्दीन खिलजी उस समय कड़ा-मानिकपुर के क्षेत्र में था। उसने सेना के साथ दिल्ली की ओर कूच किया। पहले उसे किलोखरी (दिल्ली के निकट) में रोका गया। कैकुबाद के दरबार ने पहले जलालुद्दीन से समझौता करने की कोशिश की और उसे “शायस्ता खाँ” की उपाधि दी।
जब कैकुबाद पक्षाघात से पीड़ित हो गया, तो जलालुद्दीन की स्थिति और मज़बूत हो गई। दरबार में उसके समर्थकों ने उसे “नाइब-उस-सल्तनत” (Deputy Sultan) का पद दिलवाया।
जलालुद्दीन के समर्थकों ने (जलालुद्दीन की प्रत्यक्ष सहमति के बिना या सहमति से — इतिहासकारों में मतभेद है) पक्षाघातग्रस्त कैकुबाद को उसकी चारपाई सहित यमुना नदी में फेंक दिया। इसके पश्चात बाल-सुल्तान क्यूमर्स की भी हत्या कर दी गई।
1290 ई. में जलालुद्दीन फ़िरोज़ खिलजी को औपचारिक रूप से दिल्ली का सुल्तान घोषित किया गया। इसके साथ ही मामलुक वंश का अंत और खिलजी वंश का आरम्भ हुआ।
जलालुद्दीन के शासन की प्रमुख विशेषताएँ (1290–1296 ई.)
| नीति / घटना | विवरण | महत्त्व |
|---|---|---|
| उदार शासन नीति | पुराने अमीरों से समझौता; मामलुक-काल के अधिकारियों को पदों पर बनाए रखा | राजनीतिक स्थिरता लाने का प्रयास |
| मंगोल नीति | मंगोल घुसपैठियों (उलुग खाँ के नेतृत्व में) को मुस्लिम बनाकर बसाया | “नव-मुसलमान” — नई समस्या बनी |
| ठगी विरोधी अभियान | ठगों के एक बड़े गिरोह को पकड़कर सज़ा दी | आंतरिक सुरक्षा सुधार |
| मलिक छज्जू का विद्रोह दमन | बलबन के भतीजे मलिक छज्जू के विद्रोह को कुचला (1290) | सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया; परंतु उदारता दिखाई — छज्जू को माफ किया |
| देवगिरि अभियान (1294) | अलाउद्दीन ने बिना आज्ञा देवगिरि से विपुल धन लाया | अलाउद्दीन की स्वतंत्र महत्वाकांक्षा उजागर हुई |
| जलालुद्दीन की हत्या 1296 | अलाउद्दीन खिलजी ने कड़ा में धोखे से हत्या कर दी | अलाउद्दीन का सत्तारोहण; खिलजी वंश जारी रहा |
खिलजी क्रांति: स्वरूप एवं महत्त्व
“खिलजी क्रांति” — यह पद इतिहासकार के.ए. निज़ामी और अन्य इतिहासकारों ने खिलजियों के सत्तारोहण के लिए प्रयुक्त किया है। यह “क्रांति” इसलिए क्रांतिकारी थी क्योंकि इसने दिल्ली सल्तनत में तुर्की अभिजात वर्ग के एकाधिकार को समाप्त किया और शासन को अधिक समावेशी बनाया।
क्या यह वास्तव में “क्रांति” थी?
- तुर्की रक्त-शुद्धता के सिद्धान्त का अंत
- गैर-तुर्की (खिलजी) तत्त्वों को सत्ता में भागीदारी
- हिंदुओं को भी प्रशासन में अधिक अवसर (आगे चलकर अलाउद्दीन के काल में)
- अमीरों की पुरानी परम्परागत शक्ति पर प्रहार
- नयी आर्थिक और सैन्य नीतियों की नींव
- जलालुद्दीन स्वयं तुर्की-अफगान थे — पूर्णतः नई जाति नहीं
- सत्ता परिवर्तन की विधि हिंसक और कूटनीतिक थी
- जलालुद्दीन के काल में कोई आमूल परिवर्तन नहीं
- “क्रांति” का वास्तविक रूप अलाउद्दीन के काल में दिखा
- कुछ इतिहासकार इसे केवल “राजवंश परिवर्तन” मानते हैं
खिलजी वंश का दिल्ली सल्तनत पर प्रभाव
खिलजी वंश ने दिल्ली सल्तनत को उसके इतिहास की सर्वाधिक शक्तिशाली अवस्था में ला खड़ा किया। जलालुद्दीन ने नींव रखी और उनके उत्तराधिकारी अलाउद्दीन खिलजी (1296–1316 ई.) ने उसे शिखर पर पहुँचाया। अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत तक विजय अभियान चलाए, मंगोलों को पराजित किया, बाज़ार नियंत्रण लागू किया और एक कुशल नौकरशाही तंत्र विकसित किया।
स्मरण सूत्र (Mnemonic)
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