दिल्ली सल्तनत का पतन और बिहार पर प्रभाव
बिहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — 14वीं-15वीं शताब्दी में सल्तनत के विघटन से बिहार में उभरी राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन की गहरी पड़ताल
परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
दिल्ली सल्तनत का पतन Bihar Govt. Competitive Examपरीक्षा की दृष्टि से बिहार के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है, क्योंकि इस विघटन ने बिहार में नए राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक युग का सूत्रपात किया।
1206 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा स्थापित दिल्ली सल्तनत ने लगभग 320 वर्षों तक भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया। इस अवधि में बिहार — जो कभी मौर्य और गुप्त साम्राज्यों का हृदयस्थल था — एक दोयम दर्जे के प्रांत के रूप में सल्तनत के अधीन रहा। 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से सल्तनत की केंद्रीय शक्ति कमजोर पड़ने लगी और 1526 ई. में पानीपत की पहली लड़ाई में लोदी वंश की पराजय के साथ सल्तनत का औपचारिक अंत हुआ।
सल्तनत काल में बिहार की स्थिति
दिल्ली सल्तनत के अधीन बिहार एक उपेक्षित परंतु रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रांत था जहाँ केंद्र का नियंत्रण प्रायः शिथिल रहता था।
बख्तियार खिलजी और बिहार की विजय (1197 ई.)
मुहम्मद बख्तियार खिलजी ने 1197 ई. में बिहार पर आक्रमण कर बौद्ध विहारों और मठों को नष्ट किया। नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय का विनाश इसी समय हुआ, जो भारतीय बौद्ध संस्कृति के लिए एक अपूर्णीय क्षति थी। बख्तियार ने ओदंतपुरी (वर्तमान बिहार शरीफ) को अपना मुख्यालय बनाया।
सल्तनत कालीन प्रशासनिक व्यवस्था और बिहार
| क्र | प्रशासनिक इकाई | स्थानीय नाम | बिहार में कार्य |
|---|---|---|---|
| 1 | इक्ता | प्रांत/जागीर | बिहार प्रांत को इक्ता में विभाजित कर सरदारों को दिया गया |
| 2 | इक्तादार/मुक्ती | प्रांतपाल | बिहार शरीफ से सम्पूर्ण प्रांत का प्रशासन देखता था |
| 3 | शिक | जिला | राजस्व संग्रह और न्याय व्यवस्था |
| 4 | परगना | तहसील | स्थानीय कर-निर्धारण; हिंदू चौधरी की भूमिका जारी रही |
| 5 | ग्राम | Village | मुकद्दम (ग्राम-प्रधान) द्वारा कर संग्रह, पुरानी व्यवस्था जारी |
दिल्ली सल्तनत के पतन के कारण एवं प्रक्रिया
दिल्ली सल्तनत का पतन किसी एकल घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह दीर्घकालिक आंतरिक कमजोरियों, विदेशी आक्रमणों और क्षेत्रीय शक्तियों के उदय का सामूहिक परिणाम था।
तैमूर लंग के आक्रमण ने दिल्ली सल्तनत की रीढ़ तोड़ दी। दिल्ली में भारी लूट और नरसंहार हुआ। इसके बाद सल्तनत कभी वास्तविक सुदृढ़ता नहीं पा सकी। बिहार सहित समस्त प्रांत व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र हो गए।
फिरोज शाह तुगलक (1351–1388 ई.) के बाद दिल्ली की गद्दी पर अयोग्य शासकों की श्रृंखला आई। सैय्यद वंश के शासकों की शक्ति दिल्ली और उसके निकट तक सिमट गई। बिहार जैसे दूरस्थ प्रांत केंद्र से कट गए।
बंगाल, जौनपुर, मालवा, गुजरात और बहमनी जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्र सल्तनतों की स्थापना हुई। बिहार के अफगान सरदारों ने भी अर्ध-स्वायत्त स्थिति प्राप्त की और दिल्ली को केवल नाममात्र की अधीनता दी।
अलाउद्दीन खिलजी की मूल्य-नियंत्रण नीति के बाद अर्थव्यवस्था चरमराई। मुहम्मद तुगलक के असफल प्रयोगों ने खजाना खाली किया। बिहार से कर-संग्रह अनियमित हो गया जिससे केंद्रीय सेना कमजोर पड़ी।
लोदी वंश के समय अफगान सरदार अत्यंत शक्तिशाली हो गए। बिहार में इन सरदारों ने — जिनमें सासाराम के सूर कबीले के लोग भी थे — केंद्रीय आदेश मानने से प्रायः इनकार किया।
पानीपत की प्रथम लड़ाई में इब्राहिम लोदी की बाबर से पराजय और मृत्यु ने सल्तनत का औपचारिक अंत कर दिया। अब बिहार के अफगान सरदारों को मुगलों से संघर्ष करना था।
बिहार पर राजनीतिक प्रभाव
सल्तनत के पतन ने बिहार की राजनीतिक संरचना को आमूल बदल दिया। अफगान अमीरों की स्वायत्तता, स्थानीय राजपूत जमींदारों का पुनरुत्थान और शेरशाह सूरी के महान साम्राज्य का उदय — ये सभी इसी राजनीतिक उथल-पुथल की देन थे।
जौनपुर सल्तनत का प्रभाव
तैमूर के आक्रमण के बाद 1394 ई. में जौनपुर सल्तनत की स्थापना हुई जिसने बिहार पर गहरा प्रभाव डाला। जौनपुर के शासक शर्की वंश ने बिहार के पूर्वी भाग पर नियंत्रण का प्रयास किया। जौनपुर और दिल्ली के बीच बिहार एक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बन गया। 1479 ई. में लोदियों ने जौनपुर को पराजित किया और बिहार पुनः दिल्ली के नाममात्र नियंत्रण में आया।
सल्तनत के कमजोर होने के साथ बिहार में अफगान मूल के सरदारों का प्रभाव तेजी से बढ़ा। ये सरदार मूलतः दिल्ली के सुल्तानों द्वारा नियुक्त इक्तादार थे, परंतु केंद्रीय शक्ति के शिथिल होते ही इन्होंने स्वायत्त जागीरें बना लीं।
- सूर कबीला (सासाराम): शेरशाह के पूर्वज इब्राहिम सूर को सिकंदर लोदी ने सासाराम की जागीर दी थी। इसी परिवार से शेर खान (बाद में शेरशाह) का उदय हुआ।
- लोहानी अफगान: बिहार के मध्यवर्ती भाग में इनका प्रभाव था। मुगल आक्रमण के बाद ये शेरशाह के मुख्य समर्थक बने।
- नूहानी अफगान: बिहार के पूर्वी क्षेत्र में बहुत शक्तिशाली थे। मुहम्मद शाह नूहानी ने बाबर के आक्रमण के बाद बिहार में मुगल नियंत्रण का विरोध किया।
- फर्मुली अफगान: ये बिहार के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में स्थापित थे और कभी-कभी स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार करते थे।
बिहार का स्वतंत्र प्रांत के रूप में उभार
1498 ई. के आसपास सिकंदर लोदी ने बिहार को एक अर्ध-स्वतंत्र सूबे का दर्जा दिया और अपने पुत्र जलाल खान को यहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। इब्राहिम लोदी के काल में यह प्रांत और अधिक स्वायत्त हो गया। वस्तुतः सल्तनत के पतन से पहले ही बिहार एक अर्ध-स्वायत्त प्रशासनिक इकाई के रूप में काम कर रहा था।
शेर खान (शेरशाह सूरी)
1540–1545 ई. (दिल्ली का सुल्तान)मुहम्मद शाह नूहानी
1526–1529 ई. (बिहार का स्वतंत्र शासक)बिहार पर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव
सल्तनत के पतन के साथ बिहार में सूफी संतों का प्रभाव, हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक मेलजोल और स्थानीय भाषाओं का विकास एक नए चरण में प्रवेश कर गया।
सूफी आंदोलन और बिहार
सल्तनत काल में और विशेषतः उसके पतन के दौर में सूफी संतों ने बिहार में धार्मिक सहिष्णुता का वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केंद्रीय शक्ति के कमजोर होने से धार्मिक विविधता के लिए अधिक स्थान बना।
बौद्ध धर्म का पतन एवं हिंदू धर्म का पुनर्उत्थान
बख्तियार खिलजी के आक्रमण से प्रारंभ हुए बौद्ध विहारों के विनाश का क्रम सल्तनत काल में जारी रहा। नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी और सोमपुर जैसे महान विद्या-केंद्रों के नष्ट होने के बाद बिहार में बौद्ध धर्म अत्यंत क्षीण हो गया। इसके स्थान पर वैष्णव आंदोलन और शैव परंपराएँ पुनः सक्रिय हुईं। सल्तनत के पतन के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई।
भाषा एवं साहित्य का विकास
सल्तनत के पतन के दौर में बिहार में मैथिली, मगही और भोजपुरी भाषाओं का साहित्यिक विकास तेज हुआ। विद्यापति ठाकुर (1352–1448 ई.) — मिथिला के महान कवि — इसी काल में हुए। उनकी पदावलियाँ बिहार की सांस्कृतिक पहचान बनीं। फारसी का प्रभाव भी बढ़ा और स्थानीय शासकों के दरबारों में हिंदी-फारसी मिश्रित भाषा का उपयोग होने लगा।
विद्यापति ठाकुर (1352–1448 ई.) मिथिला के महाकवि और राजकवि थे जो मिथिला के ओइनवार (तिरहुत) राजाओं के संरक्षण में फले-फूले। उन्होंने मैथिली और संस्कृत दोनों भाषाओं में रचना की।
- पदावली: राधा-कृष्ण भक्ति में लिखे गए मैथिली पद — बिहार की साहित्यिक विरासत के शिखर।
- कीर्तिलता: मैथिली में लिखी रचना जिसमें तुगलक काल के बिहार का वर्णन है। सल्तनत शासन का ऐतिहासिक दस्तावेज़।
- कीर्तिपताका: संस्कृत में लिखी रचना जो ओइनवार राजा शिवसिंह के शासन का वर्णन करती है।
- महत्व: सल्तनत के कमजोर होने से मिथिला के स्थानीय शासक अधिक स्वायत्त हुए और उन्होंने ऐसे विद्वानों को संरक्षण दिया।
बिहार पर आर्थिक एवं कृषि प्रभाव
सल्तनत के पतन ने बिहार की अर्थव्यवस्था को दोनों तरफ से प्रभावित किया — एक ओर कर-शोषण से राहत मिली, तो दूसरी ओर राजनीतिक अस्थिरता ने व्यापार और कृषि को नुकसान पहुँचाया।
भूमि राजस्व व्यवस्था में परिवर्तन
| पहलू | सल्तनत काल में | पतन के बाद |
|---|---|---|
| भूमि कर दर | उपज का 1/3 से 1/2 तक (अलाउद्दीन काल) | स्थानीय जमींदारों द्वारा नियंत्रित, कम नियमित |
| राजस्व संग्रह | केंद्रीय खजाने के लिए, इक्तादार मध्यस्थ | स्थानीय सरदारों की अपनी जागीरों में |
| व्यापार मार्ग | गंगा मार्ग पर केंद्रीय नियंत्रण | स्थानीय नियंत्रण, चुंगी की विविधता |
| किसान की स्थिति | भारी कर का बोझ, खेती प्रायः जीविका मात्र | अस्थिर परंतु स्थानीय जमींदार से सीधा संबंध |
| शिल्प एवं व्यापार | सल्तनत के अधीन नियंत्रित बाजार | स्थानीय मेलों और हाटों का महत्व बढ़ा |
गंगा व्यापार मार्ग और बिहार
बिहार की समृद्धि का मुख्य आधार गंगा नदी मार्ग था जो बंगाल को उत्तर भारत से जोड़ता था। सल्तनत के कमजोर होने पर इस मार्ग पर स्थानीय सरदारों ने अपने-अपने चुंगी चौकियाँ बना लीं जिससे व्यापार बाधित हुआ। पटना (पाटलिपुत्र) का पुनरुत्थान इस काल में शुरू हुआ जब स्थानीय अफगान सरदारों ने इसे अपने वाणिज्यिक केंद्र के रूप में विकसित करना शुरू किया।
शेरशाह के आर्थिक सुधारों की पृष्ठभूमि
सल्तनत के पतन से उत्पन्न आर्थिक अराजकता ने ही शेरशाह सूरी के भूमि सुधारों की आवश्यकता पैदा की। शेरशाह ने बिहार में रैयतवाड़ी व्यवस्था (सीधे किसान से कर) लागू की और जमाबंदी (भूमि रिकॉर्ड) तैयार कराई। यह व्यवस्था बाद में मुगल भूमि सुधारों का आधार बनी।
स्थानीय शक्तियों का उदय एवं बिहार का पुनर्गठन
सल्तनत के पतन ने बिहार में तीन प्रकार की शक्तियों को उभरने का मौका दिया — अफगान अमीर, मिथिला के हिंदू राजा और स्थानीय राजपूत जमींदार — जो मिलकर बिहार की नई राजनीतिक संरचना बनाते थे।
मिथिला का ओइनवार राजवंश
ओइनवार राजवंश (1325–1526 ई.) ने सल्तनत के पतन के साथ अपनी शक्ति तेजी से बढ़ाई। इस राजवंश के शासकों — विशेषतः शिवसिंह, पद्मसिंह और नरसिंहदेव — ने संस्कृत और मैथिली साहित्य को भरपूर संरक्षण दिया। विद्यापति इसी राजवंश के राजकवि थे। ओइनवार राजाओं ने सल्तनत की नाममात्र अधीनता स्वीकार की परंतु व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र रहे।
| शक्ति/राजवंश | क्षेत्र | काल | विशेषता |
|---|---|---|---|
| ओइनवार (तिरहुत) | मिथिला, उत्तरी बिहार | 1325–1526 ई. | हिंदू राजवंश; विद्यापति का संरक्षण |
| नूहानी अफगान | पूर्वी बिहार, तिरहुत | 1450–1529 ई. | बाबर से युद्ध; अर्ध-स्वतंत्र |
| लोहानी अफगान | मध्य बिहार | 1450–1540 ई. | शेरशाह के प्रबल समर्थक |
| सूर कबीला (सासाराम) | पश्चिमी बिहार (रोहतास) | 1480–1545 ई. | शेरशाह का मूल आधार |
| चेरो राजा | पलामू, शाहाबाद | 14वीं–17वीं शती | वन-क्षेत्र पर नियंत्रण, कर-संग्रह में बाधक |
शेरशाह सूरी — सल्तनत के पतन का सर्वोत्तम परिणाम
दिल्ली सल्तनत के पतन से बिहार को जो सबसे महत्वपूर्ण देन मिली वह थी शेरशाह सूरी (1486–1545 ई.) का उदय। शेर खान के पिता हसन खान सूर को सिकंदर लोदी ने सासाराम की जागीर दी थी। सल्तनत की कमजोरी ने शेर खान को बिहार में सत्ता का विस्तार करने का अवसर दिया।
- रैयतवाड़ी व्यवस्था: बिहार में सीधे किसान से कर लेने की व्यवस्था — आधुनिक भूमि सुधारों का पूर्वज।
- ग्रैंड ट्रंक रोड: सासाराम से बांग्लादेश तक — बिहार के व्यापार को क्रांतिकारी बदलाव।
- मुद्रा सुधार: चाँदी का रुपया और ताँबे का दाम — भारतीय मुद्रा इतिहास में मील का पत्थर।
- डाक प्रणाली: चौकी व्यवस्था — राज्य की सूचना-प्रणाली।
- सासाराम का मकबरा: इंडो-अफगान स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण — बिहार की विरासत।
सारांश एवं Bihar Govt. Competitive Exam दृष्टि
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