बिहार की स्थलाकृति — ऊँचाई एवं ढाल
Relief, Altitude & Slope of Bihar — पठार से मैदान तक की ऊँचाई, ढाल की दिशा, नदी प्रवाह और BPSC परीक्षा विश्लेषण
परिचय — ऊँचाई एवं ढाल का भौगोलिक महत्त्व
बिहार की स्थलाकृति में ऊँचाई (Altitude/Relief) एवं ढाल (Slope) BPSC परीक्षा के भूगोल खण्ड का अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है — यही दो तत्त्व बिहार की नदियों की दिशा, बाढ़ के क्षेत्र, कृषि प्रकार, जलवायु और बस्तियों के वितरण को निर्धारित करते हैं।
बिहार की भूमि समुद्र तल से 30 मीटर (पूर्वी सीमा) से लेकर 870 मीटर (सोमेश्वर पर्वत, पश्चिमी चम्पारण) तक ऊँची है। इस ऊँचाई में भिन्नता ही बिहार को तीन भिन्न भू-आकृतिक प्रदेशों — उत्तरी मैदान, मध्यवर्ती गंगा मैदान और दक्षिणी पठार — में विभाजित करती है।
ऊँचाई एवं ढाल का अध्ययन क्यों ज़रूरी है?
बिहार में ऊँचाई के क्षेत्र — ऊँचाई-वार वर्गीकरण
बिहार को ऊँचाई के आधार पर चार प्रमुख क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता है — उच्च पर्वतीय क्षेत्र, मध्यम पठारी क्षेत्र, निम्न मैदानी क्षेत्र और अत्यंत निम्न बाढ़ मैदान। प्रत्येक क्षेत्र का अपना भौगोलिक, आर्थिक और पारिस्थितिक महत्त्व है।
| ऊँचाई-वर्ग | ऊँचाई (मीटर) | क्षेत्र / जिले | भू-आकृति | विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| 1 उच्च पर्वतीय | 500–870 मी. | पश्चिमी चम्पारण (सोमेश्वर) | तराई से लगी पहाड़ियाँ | सघन वन, वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व |
| 2 मध्यम पठारी | 200–500 मी. | गया, नवादा, जमुई, बाँका, रोहतास, कैमूर | छोटानागपुर पठार + कैमूर-विन्ध्य श्रेणी | लाल मिट्टी, खनिज, आर्कियन चट्टानें |
| 3 निम्न मैदानी | 60–200 मी. | पटना, मुज़फ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर | जलोढ़ गंगा मैदान | अत्यंत उपजाऊ, सघन बसावट |
| 4 अत्यंत निम्न | 30–60 मी. | कटिहार, पूर्णिया, सुपौल, सहरसा, किशनगंज | नदी बाढ़ मैदान (Flood Plain) | वार्षिक बाढ़, जलकुंभी, चौर झीलें |
प्रमुख ऊँचाई बिन्दु — विस्तृत विवरण
सोमेश्वर पर्वत श्रेणी
~870 मीटर — बिहार का सर्वोच्च बिन्दुकैमूर पठार
300–400 मीटर — विन्ध्य का पूर्वी छोरराजगीर की पहाड़ियाँ
~300–400 मीटर — नालन्दा जिलाखड़गपुर पहाड़ी
~300 मीटर — मुंगेर जिलागया जिले की पहाड़ियाँ — विशेष महत्त्व
गया जिले में छोटानागपुर पठार की कई पहाड़ियाँ स्थित हैं, जो धार्मिक एवं भौगोलिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण हैं। इनकी ऊँचाई 200–350 मीटर के बीच है।
- ब्रह्मयोनि पहाड़ी: गया नगर के निकट। लगभग 250 मीटर ऊँची। हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ।
- प्रेतशिला पहाड़ी: पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म का केन्द्र। फल्गु नदी के किनारे।
- रामशिला पहाड़ी: भगवान राम से जुड़ी पौराणिक पहाड़ी। गया से 8 किमी दूर।
- गृद्धकूट पर्वत (राजगीर): बौद्ध धर्म का पवित्र स्थल — बुद्ध ने यहाँ उपदेश दिए।
उत्तरी मैदान — ढाल एवं ऊँचाई का विश्लेषण
उत्तर बिहार का मैदानी क्षेत्र एक अत्यंत मंद ढाल वाला (Gentle Slope) विशाल जलोढ़ मैदान है। इसका ढाल पश्चिम से पूर्व और उत्तर से दक्षिण — दोनों दिशाओं में है, जो इसे गंगा की ओर प्रवाहित करता है।
उत्तरी मैदान के ढाल की विशेषताएँ
उत्तर-पश्चिम (नेपाल तराई) से दक्षिण-पूर्व (गंगा) की ओर। ऊँचाई पश्चिमी चम्पारण (~90 मी.) से पूर्व के कटिहार (~30 मी.) तक घटती है।
प्रति किलोमीटर केवल 5–10 सेंटीमीटर की गिरावट। यह अत्यंत मंद ढाल नदियों को मेण्डरिंग (घुमावदार) बनाता है और बाढ़ फैलाता है।
मंद ढाल के कारण नदियाँ अपना मार्ग बदलती हैं (कोसी, बागमती)। जल-निकासी (Drainage) धीमी होती है, जिससे दीर्घकालिक जलभराव होता है।
मंद ढाल के कारण नदियाँ पुरानी धारा छोड़ देती हैं — वह घोड़े की नाल (Oxbow) आकार की झील बन जाती है। दरभंगा, सुपौल में अनेक चौर हैं।
उत्तरी मैदान की ऊँचाई — पश्चिम से पूर्व
उत्तरी मैदान की उप-भौगोलिक संरचना — ऊँचाई के आधार पर
| उप-क्षेत्र | ऊँचाई | ढाल | प्रमुख लक्षण |
|---|---|---|---|
| तराई क्षेत्र | 60–90 मी. | तीव्र (उत्तर से दक्षिण) | नम, दलदली, वन-आच्छादित; नदियाँ यहाँ धरातल पर आती हैं |
| बांगर (पुरानी जलोढ़) | 60–80 मी. | मंद | बाढ़ से ऊपर, कंकड़युक्त मिट्टी, घनी बसावट |
| खादर (नई जलोढ़) | 30–60 मी. | अत्यंत मंद | प्रतिवर्ष बाढ़, नई उपजाऊ मिट्टी, धान-गन्ने की खेती |
| चौर / दियारा | 30–40 मी. | लगभग समतल | नदी बेसिन में जलभराव; मछली पालन, जलकुंभी |
दियारा (Diara) — नदी द्वारा निर्मित वह निम्न भूमि जो बाढ़ के समय डूब जाती है और बाढ़ उतरने के बाद कृषि के लिए उपलब्ध होती है। गंगा, गण्डक और कोसी के किनारे बड़े दियारा क्षेत्र हैं। यहाँ की ऊँचाई 30–40 मीटर के बीच होती है और ढाल लगभग शून्य (Flat) होता है। दियारा में रेतीली एवं दोमट मिट्टी पाई जाती है जो तरबूज, खरबूज और सब्जियों के लिए आदर्श है।
- गोपालगंज दियारा: गण्डक नदी के किनारे।
- वैशाली दियारा: गंगा के उत्तरी किनारे।
- भोजपुर दियारा: सोन-गंगा संगम क्षेत्र।
- कोसी दियारा: कटिहार-खगड़िया — सर्वाधिक विस्तृत।
दक्षिणी पठार — ढाल एवं ऊँचाई का विश्लेषण
बिहार का दक्षिणी पठार क्षेत्र उत्तरी मैदान की तुलना में तीव्र ढाल वाला है। यहाँ की नदियाँ तेज़ गति से उत्तर की ओर (गंगा की तरफ) बहती हैं, जलप्रपात बनाती हैं और कम खनन-योग्य घाटियाँ निर्मित करती हैं।
दक्षिणी पठार की ऊँचाई — दक्षिण से उत्तर
दक्षिणी ढाल की प्रमुख भौगोलिक विशेषताएँ
कैमूर-रोहतास पठार — विस्तृत विश्लेषण
कैमूर पठार विन्ध्य पर्वत श्रेणी का पूर्वी छोर है और बिहार में रोहतास एवं कैमूर जिलों में फैला है। इसकी ऊँचाई 300–400 मीटर के बीच है। यह पठार का ढाल उत्तर की ओर तीव्र (सोन नदी की ओर) और दक्षिण की ओर अपेक्षाकृत मंद (मध्य प्रदेश सीमा की ओर) है।
- तुतला भवानी जलप्रपात: रोहतास जिला — कैमूर पठार से। लगभग 100 मीटर ऊँचा।
- ककोलत जलप्रपात: नवादा जिला — 160 मीटर ऊँचा; बिहार का सबसे ऊँचा जलप्रपात।
- दुर्गावती जलप्रपात: कैमूर — दुर्गावती नदी पर।
- धुआँकुण्ड जलप्रपात: रोहतास। शेरशाह के किले के निकट।
ढाल का नदी प्रवाह पर प्रभाव
बिहार की समस्त नदी-व्यवस्था ढाल के नियम पर आधारित है — “जल सदा उच्च से निम्न की ओर बहता है।” उत्तर बिहार की मंद ढाल पर नदियाँ घुमावदार (Meandering) हो जाती हैं, जबकि दक्षिण में तीव्र ढाल पर नदियाँ सीधी और तेज़ बहती हैं।
गंगा नदी का ढाल — बिहार में
गंगा बिहार में पश्चिम (बक्सर, ~67 मी.) से पूर्व (राजमहल, ~32 मी.) की ओर बहती है। लगभग 445 किमी की यात्रा में उसकी ऊँचाई केवल 35 मीटर घटती है — यानी औसत ढाल मात्र 7.9 सेमी प्रति किलोमीटर। यह अत्यंत मंद ढाल है।
| नदी | उद्गम क्षेत्र की ऊँचाई | बिहार में ऊँचाई | ढाल प्रकार | नदी का स्वभाव |
|---|---|---|---|---|
| गण्डक | नेपाल (~8000 मी.) | 90 मी. → 53 मी. | मंद | Meandering, बाढ़ प्रवण |
| कोसी | नेपाल (~7000 मी.) | 70 मी. → 30 मी. | अत्यंत मंद | Braided, धारा-परिवर्तनशील |
| बागमती | नेपाल (महाभारत ~3000 मी.) | 80 मी. → 45 मी. | मंद | Meandering, जलभराव |
| सोन | अमरकण्टक (~1065 मी.) | 250 मी. → 53 मी. | तीव्र → मंद | पठार पर तेज़, मैदान में मंद |
| फल्गु | गया पहाड़ियाँ (~300 मी.) | 250 मी. → 53 मी. | तीव्र | बरसाती, गर्मी में सूख जाती है |
| महानन्दा | दार्जिलिंग (~2000 मी.) | 60 मी. → 30 मी. | मंद | Meandering, पूर्वतम नदी |
ढाल के आधार पर नदियों का वर्गीकरण
- घुमावदार (Meandering) प्रवाह
- बाढ़ मैदान (Flood Plain) निर्माण
- धारा परिवर्तन — Oxbow Lake
- जलोढ़ मिट्टी का जमाव
- उदाहरण: कोसी, गण्डक, बागमती
- सीधा प्रवाह (Straight Channel)
- V-आकार की घाटी
- जलप्रपात निर्माण
- अपरदन (Erosion) अधिक
- उदाहरण: सोन, फल्गु, कर्मनाशा
कोसी नदी — धारा परिवर्तन का भौगोलिक कारण
कोसी का धारा परिवर्तन बिहार की सबसे बड़ी भौगोलिक समस्या है। इसका मूल कारण है — अत्यंत मंद ढाल। कोसी जब हिमालय से भारी मात्रा में तलछट (Silt) लेकर आती है और मैदान में प्रवेश करती है, तो ढाल की मंदता के कारण:
- नदी अपना तलछट बीच-बीच में जमा करती जाती है (Aggradation)।
- नदी का तल ऊँचा होता जाता है — नदी Braided Pattern में बहती है।
- बाढ़ के समय नदी नया रास्ता ढूँढती है — धारा परिवर्तन (Avulsion) होता है।
- पिछले 250 वर्षों में कोसी लगभग 120 किमी पश्चिम खिसक चुकी है।
ऊँचाई एवं ढाल का जलवायु, कृषि और बस्ती पर प्रभाव
बिहार में ऊँचाई और ढाल केवल भौगोलिक तथ्य नहीं हैं — ये मानव जीवन, कृषि चक्र, सिंचाई प्रणाली और शहरों के स्थान को सीधे नियंत्रित करते हैं। यही कारण है कि BPSC Mains में “ढाल के प्रभाव” से सम्बन्धित विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
ऊँचाई एवं जलवायु — सम्बन्ध
| क्षेत्र | ऊँचाई | वार्षिक वर्षा | तापमान (जून) | जलवायु प्रकृति |
|---|---|---|---|---|
| किशनगंज (NE) | ~35 मी. | 2000+ mm | ~28°C | आर्द्र उष्णकटिबंधीय |
| मुज़फ्फरपुर (N) | ~60 मी. | ~1200 mm | ~32°C | आर्द्र उपोष्ण |
| पटना (Central) | ~53 मी. | ~1000 mm | ~36°C | उपोष्ण |
| गया (S) | ~115 मी. | ~1000 mm | ~38°C | उपोष्ण, अर्ध-शुष्क प्रवृत्ति |
| रोहतास / कैमूर (SW) | ~200–400 मी. | ~800 mm | ~35°C | अर्ध-शुष्क |
| सोमेश्वर (NW पर्वत) | ~870 मी. | ~1500 mm | ~22°C | पर्वतीय — ठण्डा, आर्द्र |
ढाल एवं सिंचाई — नहर प्रणाली
ऊँचाई एवं बस्ती-वितरण
बिहार के लगभग सभी प्रमुख नगर — पटना, गया, मुज़फ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर — नदी किनारे, थोड़ा ऊँचे (बांगर) स्थान पर बसे हैं, जहाँ बाढ़ का खतरा कम होता है।
उत्तर बिहार के गाँव भी ऊँचे टीलों (Tola) पर बसे होते हैं। चौर/दियारा क्षेत्रों में स्थायी बसावट नहीं होती — केवल अस्थायी कृषक बसते हैं।
NH-30 (पटना-रांची), NH-19 (पटना-कोलकाता) आदि प्रमुख राजमार्ग ऊँचे भूमि पर बनाए गए हैं। नदियों के पार पुल ही एकमात्र सम्बन्ध होते थे — जैसे महात्मा गांधी सेतु (गंगा, पटना-हाजीपुर)।
दक्षिणी पठार की ऊँचाई एवं खनिज के कारण सीमेण्ट उद्योग (कैमूर), चूना उद्योग (रोहतास) और खनन उद्योग यहाँ केन्द्रित हैं। उत्तर बिहार में चीनी मिलें निचले मैदान में हैं।
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