बिहार में चट्टानों के प्रकार एवं उनका वितरण
BPSC Prelims + Mains के लिए सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री — शैल-विज्ञान से लेकर बिहार की भूवैज्ञानिक संरचना तक, सभी महत्वपूर्ण तथ्य एक स्थान पर।
परिचय एवं भूवैज्ञानिक पृष्ठभूमि
बिहार की चट्टानें एवं उनका वितरण BPSC परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है — इस राज्य की भूवैज्ञानिक संरचना में आर्कियन, विंध्यन, गोंडवाना एवं जलोढ़ (Alluvial) शैल समूहों का विस्तृत वर्णन मिलता है जो बिहार के भूगोल, खनिज सम्पदा एवं कृषि आधार को निर्धारित करते हैं।
पृथ्वी की ऊपरी परत (Crust) चट्टानों से बनी है। भूगोल में चट्टान (Rock) उस प्राकृतिक पदार्थ को कहते हैं जो एक या एक से अधिक खनिजों से मिलकर बना होता है। उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन मुख्य वर्गों में बाँटा जाता है — आग्नेय, अवसादी एवं रूपांतरित। बिहार में इन तीनों प्रकार की चट्टानों का वितरण असमान है।
आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks) — बिहार में वितरण
आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks) मैग्मा या लावा के ठंडे होकर जम जाने से बनती हैं। ये बिहार की प्राथमिक (Primary) चट्टानें हैं और गया, नवादा, जमुई, बाँका तथा कैमूर पठार के आसपास के क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण
उत्पत्ति स्थान के आधार पर आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं — अंतर्भेदी (Intrusive) जो भूगर्भ में ही जम जाती हैं, और बाह्य भेदी (Extrusive) जो धरातल पर आकर जमती हैं।
| # | चट्टान का नाम | प्रकार | बिहार में स्थान | प्रमुख उपयोग |
|---|---|---|---|---|
| 1 | ग्रेनाइट (Granite) | अंतर्भेदी (Intrusive) | गया, नवादा, जमुई, औरंगाबाद | भवन निर्माण, मूर्तिकला, सड़क |
| 2 | बेसाल्ट (Basalt) | बाह्यभेदी (Extrusive) | राजगीर, नालंदा के आसपास | सड़क निर्माण, कुचल पत्थर |
| 3 | डोलेराइट (Dolerite) | डाइक रूप में | गया पठार, जहानाबाद | भवन निर्माण सामग्री |
| 4 | क्वार्टज़ाइट (Quartzite) | रूपांतरित आग्नेय | रोहतास, सासाराम, कैमूर पठार | काँच निर्माण, चीनी मिट्टी |
ग्रेनाइट — बिहार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आग्नेय शैल
ग्रेनाइट (Granite) बिहार की सर्वाधिक व्यापक आग्नेय चट्टान है। यह क्वार्ट्ज़, फेल्सपार तथा अभ्रक (Mica) से मिलकर बना होता है। बिहार में गया जिले में विशेष रूप से काले रंग का ग्रेनाइट पाया जाता है जो निर्यात की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। नवादा और जमुई जिलों में भी ग्रेनाइट की प्रचुरता है। इस चट्टान की कठोरता (Mohs Scale पर 6-7) के कारण यह भवन निर्माण, सड़क, मूर्तिकला एवं स्मारकों के लिए उपयुक्त है।
- रवेदार संरचना (Crystalline Structure) — तेज़ी से ठंडे होने पर महीन दाने, धीरे ठंडे होने पर मोटे रवे बनते हैं।
- जीवाश्म-रहित (Fossil-free) — उच्च तापमान के कारण इनमें कोई जीवाश्म नहीं होता।
- कठोर एवं टिकाऊ — क्षरण के प्रति प्रतिरोधी, इसलिए पहाड़ी भूस्वरूप बनाती हैं।
- रंध्रहीन (Non-porous) — जल अवशोषण क्षमता कम होने से जलधारण नहीं करतीं।
- धात्विक खनिज स्रोत — सोना, ताँबा, लोहा, माइका जैसे खनिज आग्नेय चट्टानों से प्राप्त होते हैं।
- प्राथमिक चट्टानें — ये पृथ्वी पर सर्वप्रथम बनी चट्टानें हैं। आर्कियन महाकल्प में निर्मित।
अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks) — बिहार में वितरण
अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks) बिहार की सर्वाधिक विस्तृत चट्टान प्रकार हैं। गंगा के मैदान का लगभग संपूर्ण उत्तरी बिहार जलोढ़ (Alluvial) निक्षेप से ढका हुआ है, जबकि दक्षिण-पश्चिम में विंध्यन और कुडप्पा समूह की चट्टानें पाई जाती हैं।
अवसादी चट्टानों के प्रकार
जलोढ़ मिट्टी — बिहार का आर्थिक आधार
बिहार का लगभग 90% भूभाग गंगा के जलोढ़ मैदान से ढका है। इस क्षेत्र में दो प्रकार की जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है — खादर (नई जलोढ़ — नदियों के निकट, बाढ़ प्रभावित, उपजाऊ) और बाँगर (पुरानी जलोढ़ — ऊँचाई पर, कम उपजाऊ, कैल्शियम पिण्ड — कंकर — मिलते हैं)।
| चट्टान/मिट्टी | जिले / क्षेत्र | आयु / निर्माण | खनिज / विशेषता |
|---|---|---|---|
| नई जलोढ़ (खादर) | उत्तर बिहार के सभी नदी तटीय जिले | होलोसीन | उपजाऊ, धान-गेहूँ की खेती |
| पुरानी जलोढ़ (बाँगर) | गंगा से दूर के क्षेत्र | प्लीस्टोसीन | कंकर मिश्रित, कम उर्वर |
| विंध्यन बलुआ पत्थर | रोहतास, कैमूर, सासाराम | 1,200–1,700 Ma | चूना पत्थर, सीमेंट उद्योग |
| विंध्यन चूना पत्थर | रोहतास (Dalmianagar), कैमूर | 1,200–1,700 Ma | Cement Factory — डालमियानगर |
| गोंडवाना शेल+कोयला | औरंगाबाद, सीमावर्ती झारखंड | 250–350 Ma | कोयला, लिग्नाइट |
विंध्यन शैल समूह का विशेष महत्व
बिहार के दक्षिण-पश्चिम में कैमूर पठार और सोन नदी घाटी में विंध्यन शैल समूह की प्रमुखता है। रोहतास जिले में चूना पत्थर की प्रचुरता के कारण Dalmia Bharat Cement का कारखाना डालमियानगर में स्थापित हुआ। यह बिहार का एकमात्र बड़ा सीमेंट उद्योग क्षेत्र है। कैमूर पठार पर बलुआ पत्थर की मोटी परतें हैं जिनका उपयोग निर्माण कार्य में होता है।
- परतदार संरचना (Stratified) — ये परतों में जमा होती हैं, इसलिए इन्हें स्तरित चट्टानें भी कहते हैं।
- जीवाश्म (Fossils) युक्त — प्राचीन जीवों के अवशेष अवसादी चट्टानों में ही मिलते हैं।
- रंध्रयुक्त (Porous) — जलधारण क्षमता अधिक होने के कारण जलभृत (Aquifer) का निर्माण करती हैं।
- ईंधन खनिज स्रोत — कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस अवसादी चट्टानों में पाए जाते हैं।
- उर्वर मिट्टी — जलोढ़ अवसाद से निर्मित मैदान कृषि के लिए सर्वोत्तम होते हैं।
रूपांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks) — बिहार में वितरण
रूपांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks) वे चट्टानें हैं जो पहले से विद्यमान आग्नेय या अवसादी चट्टानों पर अत्यधिक ताप (Heat) एवं दाब (Pressure) के प्रभाव से परिवर्तित होकर बनती हैं। बिहार में ये मुख्यतः गया, नवादा, जमुई, बाँका एवं मुंगेर जिलों में पाई जाती हैं।
बिहार में प्रमुख रूपांतरित चट्टानें
नाइस (Gneiss)
आर्कियन युगशिस्ट (Schist)
आर्कियन-प्रोटेरोज़ोइकसंगमरमर (Marble)
विंध्यन युग रूपांतरितक्वार्टज़ाइट (Quartzite)
विंध्यन-कुडप्पा युगअभ्रक (Mica) — रूपांतरित चट्टानों का महत्वपूर्ण उत्पाद
बिहार में जमुई जिला अभ्रक (Mica) के लिए जाना जाता था। पहले यह बिहार-झारखंड का सम्मिलित क्षेत्र था जो विश्व का सर्वाधिक अभ्रक उत्पादक क्षेत्र था। Mica Belt मुख्यतः हज़ारीबाग-कोडरमा-गिरिडीह (अब झारखंड) से जमुई तक फैली है। अभ्रक माइका शिस्ट (रूपांतरित चट्टान) में पाया जाता है। इसका उपयोग विद्युत उपकरण, अंतरिक्ष उद्योग, सौंदर्य प्रसाधन में होता है।
| मूल चट्टान | रूपांतरित चट्टान | बिहार में स्थान |
|---|---|---|
| ग्रेनाइट | नाइस (Gneiss) | गया, नवादा, जमुई |
| शेल / मडस्टोन | स्लेट → फाइलाइट → शिस्ट | जमुई, बाँका, मुंगेर |
| चूना पत्थर | संगमरमर (Marble) | रोहतास (सीमित) |
| बलुआ पत्थर | क्वार्टज़ाइट | कैमूर, रोहतास, सासाराम |
| बेसाल्ट | एम्फिबोलाइट / Hornfels | राजगीर के निकट |
- अत्यधिक कठोर — ताप-दाब के कारण खनिजों का पुनः क्रिस्टलीकरण होता है।
- पर्णन (Foliation) — खनिज परतों में व्यवस्थित हो जाते हैं जिससे शिस्ट, नाइस जैसी बंधित संरचना बनती है।
- जीवाश्म नष्ट — उच्च ताप के कारण जीवाश्म नष्ट हो जाते हैं।
- नए खनिज निर्माण — रूबी, नीलम, गार्नेट, ग्रेफाइट, हीरा जैसे बहुमूल्य रत्न रूपांतरित चट्टानों में मिलते हैं।
- संरचनात्मक उपयोग — इमारतों, फर्श, सीढ़ियों में संगमरमर और स्लेट का उपयोग।
बिहार की भूवैज्ञानिक संरचना एवं क्षेत्रीय वितरण
बिहार की भूवैज्ञानिक संरचना (Geological Structure) को समझने के लिए राज्य को तीन भौगोलिक खंडों में बाँटकर देखना उपयोगी है — उत्तरी मैदान, दक्षिणी छोटानागपुर सीमांत क्षेत्र तथा दक्षिण-पश्चिम का विंध्य-कैमूर पठार।
तीन भूवैज्ञानिक क्षेत्र
बिहार की भूवैज्ञानिक संरचना — विस्तृत तालिका
| भूवैज्ञानिक युग / समूह | आयु | चट्टान प्रकार | बिहार में क्षेत्र | मुख्य खनिज |
|---|---|---|---|---|
| आर्कियन (Archaean) | 2,500 Ma से अधिक | ग्रेनाइट, नाइस, शिस्ट | गया, नवादा, जमुई, बाँका | अभ्रक, ग्रेनाइट |
| कुडप्पा (Cuddapah) | 1,600–1,700 Ma | क्वार्टज़ाइट, स्लेट, शेल | रोहतास (सीमित) | क्वार्टज़ |
| विंध्यन (Vindhyan) | 600–1,700 Ma | बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, शेल | रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद | चूना पत्थर, बलुआ पत्थर |
| गोंडवाना (Gondwana) | 250–350 Ma | शेल, कोयला, बलुआ पत्थर | औरंगाबाद, गया सीमांत | कोयला (Coal) |
| जलोढ़ (Alluvial) | प्लीस्टोसीन–होलोसीन | मिट्टी, रेत, कंकर, बजरी | संपूर्ण उत्तर बिहार + गंगा मैदान | उपजाऊ मिट्टी |
राजगीर की पहाड़ियाँ — भूवैज्ञानिक महत्व
राजगीर (नालंदा) की पाँच पहाड़ियाँ (वैभव, विपुल, रत्न, सोन, उदय) भूवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये पहाड़ियाँ मुख्यतः प्री-कैम्ब्रियन (Pre-Cambrian) काल की कठोर चट्टानों से बनी हैं। यहाँ गर्म जल के स्रोत (Hot Springs) पाए जाते हैं जो भूगर्भिक ऊर्जा एवं आग्नेय गतिविधि के प्रमाण हैं।
सोन नदी घाटी की भूवैज्ञानिक संरचना
सोन नदी (Son River) घाटी बिहार की सबसे महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक संरचना में से एक है। यह नदी विंध्यन शैल समूह को काटकर बहती है। सोन नदी के किनारों पर बलुआ पत्थर, चूना पत्थर की मोटी परतें दिखाई देती हैं। रोहतास जिले में सोन नदी के किनारे डेहरी-ऑन-सोन (Dehri-on-Sone) में सीमेंट उद्योग विकसित हुआ।
चट्टानों से जुड़ी खनिज सम्पदा एवं आर्थिक महत्व
बिहार में चट्टानों के वितरण के साथ-साथ खनिज सम्पदा का वितरण भी जुड़ा हुआ है। झारखंड के अलग होने के बावजूद बिहार में चूना पत्थर, ग्रेनाइट, बलुआ पत्थर, पाइराइट एवं अभ्रक जैसे महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं।
रोहतास, कैमूर जिलों में विंध्यन शैल में। डालमियानगर में सीमेंट कारखाने का आधार। बिहार के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण।
जमुई, बाँका जिलों में माइका शिस्ट में। विद्युत उपकरण, अंतरिक्ष उद्योग में उपयोग। भारत विश्व में सर्वाधिक अभ्रक उत्पादक देशों में।
गया, नवादा, औरंगाबाद में काले रंग का ग्रेनाइट। निर्यात योग्य। फर्श, स्मारक, भवन निर्माण में उपयोग।
रोहतास जिले के अमझोर में पाइराइट की खान। सल्फ्यूरिक एसिड एवं उर्वरक उद्योग के लिए उपयोगी।
कैमूर पठार, रोहतास में। भवन निर्माण, सड़क, पुल आदि में उपयोग। राज्य में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध।
गया, जमुई, रोहतास में। कांच उद्योग, सिलिका ईंट निर्माण में उपयोग। उच्च शुद्धता वाला क्वार्ट्ज़ महंगा।
झारखंड विभाजन का प्रभाव — एक विश्लेषण
2000 में झारखंड के अलग होने से बिहार की खनिज सम्पदा में भारी कमी आई। छोटानागपुर पठार में लोहा, कोयला, बॉक्साइट, ताँबा, यूरेनियम जैसे खनिज थे जो अब झारखंड में हैं। बिहार के पास केवल जलोढ़ मैदान की कृषि सम्पदा और दक्षिणी जिलों के सीमित खनिज बचे हैं।


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