बिहार का जल प्रदूषण
औद्योगिक एवं घरेलू अपशिष्ट — कारण, प्रभाव एवं समाधान
परिचय एवं संदर्भ
बिहार का जल प्रदूषण BPSC परीक्षा के पर्यावरण खंड का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है — यह राज्य गंगा, कोसी, गंडक, सोन, पुनपुन तथा बागमती जैसी नदियों का घर है, फिर भी यहाँ के 10 करोड़ से अधिक लोग प्रदूषित जल से जुड़ी बीमारियों का सामना करते हैं।
बिहार में जल प्रदूषण की समस्या दो मुख्य स्रोतों से उत्पन्न होती है: औद्योगिक अपशिष्ट (Industrial Effluents) तथा घरेलू अपशिष्ट (Domestic Sewage)। इसके अतिरिक्त, कृषि रसायनों, खनन गतिविधियों एवं धार्मिक-सांस्कृतिक प्रथाओं से भी जल स्रोत प्रभावित होते हैं। Central Pollution Control Board (CPCB) के अनुसार, बिहार की कई नदियाँ Class D एवं E श्रेणी में आती हैं, जो पीने योग्य तो दूर, नहाने योग्य भी नहीं हैं।
जल प्रदूषण की परिभाषा एवं वैधानिक ढाँचा
Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974 के अनुसार, जल प्रदूषण वह अवस्था है जब किसी जल स्रोत में ऐसे पदार्थ मिल जाएँ जो उसके प्राकृतिक स्वरूप, गुण या उपयोगिता को दुष्प्रभावित करें। बिहार में Bihar State Pollution Control Board (BSPCB) इस अधिनियम के अंतर्गत कार्य करता है। इसके अतिरिक्त, Environment Protection Act, 1986 तथा National Green Tribunal (NGT) भी जल प्रदूषण नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रमुख प्रदूषित नदियाँ एवं क्षेत्र
बिहार की नदियाँ सदियों से जीवनदायिनी रही हैं, परंतु आज गंगा, पुनपुन, बूढ़ी गंडक, बागमती सहित कई नदियाँ गंभीर प्रदूषण की चपेट में हैं। CPCB की Grossly Polluted River Stretches सूची में बिहार के कई स्थान शामिल हैं।
| नदी | प्रदूषित क्षेत्र | प्रमुख प्रदूषण स्रोत | BOD स्तर |
|---|---|---|---|
| गंगा | पटना, मुंगेर, भागलपुर, कहलगाँव | सीवेज, औद्योगिक, धार्मिक अपशिष्ट | 20–45 mg/L |
| पुनपुन | पटना जिला | घरेलू सीवेज, कचरा डंपिंग | 35–80 mg/L |
| बूढ़ी गंडक | मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर | चीनी मिल, डिस्टिलरी अपशिष्ट | 25–60 mg/L |
| बागमती | सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर | शहरी सीवेज, कृषि रसायन | 20–40 mg/L |
| सोन | पटना (संगम क्षेत्र) | खनन, सीमेंट उद्योग | 8–15 mg/L |
| कमला-बलान | दरभंगा, मधुबनी | घरेलू अपशिष्ट | 15–25 mg/L |
गंगा नदी — बिहार में प्रदूषण की स्थिति
गंगा बिहार के उत्तर प्रदेश सीमा से बंगाल सीमा तक लगभग 445 किलोमीटर बहती है और पटना, मुंगेर, भागलपुर जैसे प्रमुख शहरों से होकर गुजरती है। National Mission for Clean Ganga (NMCG) के अंतर्गत बिहार में कई Sewage Treatment Plants (STP) स्थापित किए जा रहे हैं, परंतु पटना में प्रतिदिन 390 MLD सीवेज उत्पन्न होता है जबकि उपचार क्षमता मात्र 65 MLD है।
औद्योगिक अपशिष्ट — स्रोत एवं प्रकार
बिहार में औद्योगिक जल प्रदूषण मुख्यतः चीनी मिलें, डिस्टिलरी, टेनरी (चर्मशोधन), उर्वरक कारखाने, थर्मल पावर प्लांट तथा चावल/आटा मिलों से उत्पन्न होता है। ये उद्योग बिना उचित उपचार के अपशिष्ट नदियों में बहा देते हैं।
बिहार में 28 से अधिक चीनी मिलें हैं। इनसे Bagasse, Press mud, Molasses युक्त उच्च BOD अपशिष्ट जल निकलता है। बूढ़ी गंडक एवं गंडक नदी इनसे सर्वाधिक प्रभावित हैं। मुजफ्फरपुर, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण जिलों की मिलें प्रमुख दोषी हैं।
Spent wash (vinasse) का BOD 45,000–65,000 mg/L तक हो सकता है — यह सामान्य घरेलू सीवेज से 100 गुना अधिक है। एक छोटी डिस्टिलरी का अपशिष्ट एक बड़े शहर के सीवेज के बराबर जल को प्रदूषित कर सकता है।
पटना एवं गया जिलों में टेनरी उद्योग से Chromium (Cr⁶⁺), Lead, Cadmium, Arsenic युक्त अपशिष्ट जल निकलता है। Cr⁶⁺ (Hexavalent Chromium) IARC के अनुसार Group 1 Carcinogen है। यह भूजल में मिलकर दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा करता है।
Kahalgaon STPP (2340 MW) एवं Barauni Thermal Power Station से Fly ash, Bottom ash तथा गर्म जल (Thermal Pollution) गंगा में मिलता है। Fly ash में Mercury, Arsenic, Lead, Selenium जैसे भारी धातु होते हैं।
पटना एवं हाजीपुर BIDA (Bihar Industrial Development Authority) क्षेत्र में pharmaceutical units से Active Pharmaceutical Ingredients (APIs), antibiotics एवं organic solvents जल में मिलते हैं, जो Antimicrobial Resistance (AMR) को बढ़ावा देते हैं।
रोहतास, कैमूर, गया जिलों में सीमेंट एवं खनन उद्योगों से उत्पन्न अम्लीय खदान जल (Acid Mine Drainage) एवं खनिज धूल नदियों की Turbidity बढ़ाती है, जलीय जीवों को नुकसान पहुँचाती है।
हेवी मेटल प्रदूषण — बिहार में Arsenic संकट
बिहार में जल प्रदूषण का एक विशेष आयाम Arsenic (आर्सेनिक) प्रदूषण है। भोजपुर, बक्सर, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय जिलों के भूजल में Arsenic की मात्रा WHO की अधिकतम अनुमेय सीमा 0.01 mg/L से कई गुना अधिक पाई गई है। यह मुख्यतः Geological (प्राकृतिक) कारण से है — गंगा की जलोढ़ मिट्टी में FeAsS (Iron Arsenide Sulphide) के ऑक्सीकरण से Arsenic घुलता है, परंतु औद्योगिक गतिविधियाँ इसे और गंभीर बनाती हैं।
घरेलू अपशिष्ट एवं सीवेज समस्या
बिहार में जल प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत — लगभग 70-75% — घरेलू सीवेज है। पटना जैसे महानगर से लेकर छोटे कस्बों तक, अनुपचारित सीवेज सीधे नदियों में प्रवाहित होता है। पर्याप्त Sewage Treatment Plant (STP) की अनुपस्थिति इस संकट की जड़ है।
पटना की सीवेज समस्या
पटना नगर निगम क्षेत्र में प्रतिदिन लगभग 390 MLD (Million Litres per Day) सीवेज उत्पन्न होता है। NMCG परियोजनाओं के बावजूद उपचार क्षमता मात्र 65 MLD के आसपास है। अर्थात् 83% से अधिक सीवेज बिना उपचार के गंगा एवं अन्य जल स्रोतों में मिल जाता है।
पटना में 47 नाले (Drains) गंगा में गिरते हैं, जिनमें से अधिकांश पर कोई उपचार प्रणाली नहीं है। Beur STP (43 MLD) एवं Saidpur STP (22 MLD) शहर के मुख्य उपचार संयंत्र हैं, पर ये जरूरत से बहुत कम हैं।
Open Defecation की समस्या
Census 2011 के अनुसार बिहार में मात्र 18.6% ग्रामीण परिवारों के पास शौचालय की सुविधा थी। हालाँकि Swachh Bharat Mission (Gramin) के बाद 2019 तक बिहार ODF (Open Defecation Free) घोषित हो गया, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच अभी भी भूजल एवं जल स्रोतों को दूषित करता है।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की विफलता
बिहार के शहरों में प्रतिदिन उत्पन्न हजारों टन ठोस अपशिष्ट (Municipal Solid Waste) का उचित निष्पादन नहीं हो पाता। नदी किनारे अवैध डंपिंग से Leachate (कचरे से रिसने वाला विषैला द्रव) जल स्रोतों में मिलता है। Solid Waste Management Rules, 2016 लागू होने के बावजूद बिहार के अधिकांश नगर निकाय इनका पालन नहीं कर पाते।
कृषि रसायन एवं भूजल प्रदूषण
बिहार एक कृषि-प्रधान राज्य है जहाँ 76% से अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। कृषि में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं शाकनाशियों के प्रयोग से भूजल एवं सतही जल दोनों प्रदूषित हो रहे हैं।
Fluoride प्रदूषण — दक्षिण बिहार का संकट
दक्षिण बिहार के गया, नालंदा, औरंगाबाद, नवादा, जहानाबाद जिलों के भूजल में Fluoride की मात्रा BIS मानक 1.5 mg/L से अधिक पाई जाती है। उच्च Fluoride से Dental Fluorosis (दाँतों पर धब्बे) एवं Skeletal Fluorosis (हड्डियों का मुड़ना) होता है। यह समस्या मुख्यतः Crystalline Basement Rocks में Fluoride खनिज की प्राकृतिक उपस्थिति के कारण है, परंतु कृषि रसायनों से यह और बढ़ती है।
बिहार में Arsenic प्रदूषण एक विकराल समस्या है। UNICEF एवं WHO की रिपोर्टों के अनुसार बिहार के 15 से अधिक जिलों के भूजल में Arsenic की मात्रा WHO की अनुमेय सीमा 0.01 mg/L से अधिक है।
- सर्वाधिक प्रभावित जिले: भोजपुर, बक्सर, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, भागलपुर
- कारण: गंगा की जलोढ़ मिट्टी में FeAsS का अपचयी विलायीकरण (Reductive Dissolution)
- स्वास्थ्य प्रभाव: Arsenicosis, Skin keratosis, Bladder cancer, Lung cancer
- समाधान: Piped Water Supply, Iron-sand Filter, Arsenic removal units
- सरकारी प्रयास: Jal Jeevan Mission के तहत surface water आधारित पाइप जल आपूर्ति
स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय प्रभाव
जल प्रदूषण के कारण बिहार में प्रतिवर्ष लाखों लोग जल-जनित रोगों की चपेट में आते हैं। NFHS-5 (2019-21) के अनुसार बिहार में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में Diarrhea Prevalence राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
- Cholera (हैजा): Vibrio cholerae — दूषित जल से फैलता है; बिहार में बाढ़ के बाद प्रकोप
- Typhoid (मियादी बुखार): Salmonella typhi — बिहार में Endemic स्तर पर
- Hepatitis A & E: Fecal-oral route — Patna, Gaya में आवर्ती प्रकोप
- Diarrhea/Dysentery: 5 वर्ष से कम बच्चों में प्रमुख मृत्यु कारण
- Encephalitis (AES/JE): Muzzaffarpur में Litchi + दूषित जल का संयोजन
- Fluorosis: दक्षिण बिहार में Dental एवं Skeletal Fluorosis व्यापक
- Arsenicosis: उत्तर बिहार में Skin lesions, Keratosis
- Biodiversity Loss: Gangetic Dolphin, Gharial, Freshwater turtles की संख्या में गिरावट
- Fishery Collapse: बिहार की नदियों में मछली उत्पादन में 40% तक गिरावट
- Eutrophication: झीलों एवं तालाबों में Algal Bloom, DO की कमी
- Soil Contamination: दूषित सिंचाई जल से कृषि भूमि में भारी धातु जमाव
- Food Chain Contamination: Bio-magnification द्वारा Persistent Pollutants मानव तक
- Groundwater Depletion: प्रदूषण के कारण usable groundwater में कमी
Acute Encephalitis Syndrome (AES) — मुजफ्फरपुर का संकट
मुजफ्फरपुर में प्रतिवर्ष मई-जून में बच्चों में AES/Chamki Bukhar का प्रकोप होता है। 2019 में इस बीमारी से 100 से अधिक बच्चों की मौत हो गई थी। शोधकर्ताओं के अनुसार कुपोषण, दूषित जल, लीची का अधिक सेवन एवं रात में खाली पेट सोना — इनके संयोजन से Hypoglycemia होती है। बूढ़ी गंडक नदी का प्रदूषित जल पीने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, जिससे AES का खतरा बढ़ता है।
- नदी-घाटों पर शव दाह एवं अस्थि विसर्जन: गंगा में Coliform bacteria एवं BOD में वृद्धि
- धार्मिक अनुष्ठान: Chhath Puja के दौरान दूध, फल, फूल आदि जल में मिलना
- बाढ़ का प्रभाव: बाढ़ में सीवेज, खेत के रसायन, शौचालय का मलबा — सब मिल जाता है
- अवैध खनन: नदी तट पर बालू खनन से नदी की Natural Purification क्षमता घटती है
- जागरूकता का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में जल परीक्षण एवं स्वच्छता की जानकारी नहीं
सरकारी नीतियाँ एवं योजनाएँ
बिहार में जल प्रदूषण नियंत्रण हेतु केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा अनेक योजनाएँ लागू की गई हैं। Namami Gange, Jal Jeevan Mission, Swachh Bharat Mission इनमें सबसे प्रमुख हैं।
Namami Gange Programme
2014 — वर्तमानJal Jeevan Mission (JJM)
2019 — 2024Swachh Bharat Mission (G)
2014 — 2019 (SBM-2: 2020)National Water Policy, 2012
2012 — वर्तमानBihar सरकार के विशेष प्रयास
बिहार सरकार ने Bihar Water Resources Department एवं BSPCB के माध्यम से कई उपाय किए हैं: Continuous Effluent Monitoring System (CEMS) प्रमुख उद्योगों में लगाई गई है, Common Effluent Treatment Plants (CETPs) Industrial Clusters में स्थापित की जा रही हैं, तथा नदी किनारे 200 मीटर की Green Buffer Zone घोषित की गई है।
- 2014: NGT ने Ganga में अनुपचारित सीवेज डालने पर प्रतिबंध लगाया; जुर्माने का प्रावधान
- 2017: बिहार के Sugar Mills को Effluent Treatment Plants अपग्रेड करने का आदेश
- 2019: Punpun River Restoration Plan तैयार करने का निर्देश
- 2021: Ganga के किनारे 100m के भीतर industrial activities पर रोक की पुष्टि
- 2022: पटना के 47 नालों पर STP लगाने की समयसीमा निर्धारित
Infrastructure
पर्याप्त STP निर्माण, Sewer Networks का विस्तार, Industrial CETPs
Regulation
BSPCB की क्षमता वृद्धि, नियमित निरीक्षण, जुर्माने का कड़ा क्रियान्वयन
Agriculture Reform
Organic Farming को प्रोत्साहन, Integrated Pest Management (IPM), Drip Irrigation
Technology
Real-time Water Quality Monitoring, GIS-based Pollution Mapping, Biotreatment
Community Participation
Gram Panchayats की भूमिका, जल संरक्षण समितियाँ, जन जागरूकता अभियान
Finance
Green Bonds, PPP Model, AMRUT Fund का उपयोग, 15th Finance Commission ग्रांट


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