दांडेकर समिती (1984)
दांडेकर समिती — परिचय व पृष्ठभूमी
दांडेकर समिती (1984) महाराष्ट्र के क्षेत्रीय असमतोल को पहली बार वैज्ञानिक पद्धति से अधोरेखित करने वाली एक ऐतिहासिक समिती थी। यह Rajasthan Govt Exam Preparation के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय संघीय संरचना में क्षेत्रीय विकास असमतोल की समझ प्रदान करती है।
डॉ. धनंजय रामचंद्र दांडेकर (Dr. Dhananjay Ramchandra Dandekar) एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे जिन्होंने महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक विकास में गहरी खाई को समझा। 1984 में उनकी समिती ने एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें विदर्भ और मराठवाडा के पिछड़ेपन के कारणों का विश्लेषण किया गया।
ऐतिहासिक संदर्भ
1960 के दशक में महाराष्ट्र का गठन हुआ था जब बॉम्बे राज्य को विभाजित किया गया। इसके बाद से ही क्षेत्रीय असमतोल एक प्रमुख समस्या बन गई। दांडेकर समिती इसी समस्या का पहला व्यवस्थित अध्ययन था।
समिती की स्थापना व उद्देश्य
दांडेकर समिती की स्थापना महाराष्ट्र सरकार द्वारा की गई थी ताकि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों के बीच आर्थिक विकास में असमतोल के कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा सके।
मुख्य उद्देश्य
- क्षेत्रीय विकास का आकलन — महाराष्ट्र के सभी क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन करना
- असमतोल के कारणों की पहचान — विदर्भ और मराठवाडा के पिछड़ेपन के मूल कारणों को समझना
- नीति सुझाव — पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए ठोस सिफारिशें देना
- संतुलित विकास — राज्य के सभी भागों में समान विकास सुनिश्चित करने के उपाय सुझाना
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| स्थापना वर्ष | 1984 |
| अध्यक्ष | डॉ. धनंजय रामचंद्र दांडेकर |
| प्रकार | आर्थिक विश्लेषण समिती |
| क्षेत्र | महाराष्ट्र (विदर्भ, मराठवाडा, पश्चिमी महाराष्ट्र) |
| रिपोर्ट प्रकार | व्यापक आर्थिक सर्वेक्षण |
मुख्य निष्कर्ष व अनुसंधान
दांडेकर समिती की रिपोर्ट में महाराष्ट्र के तीन प्रमुख क्षेत्रों — पश्चिमी महाराष्ट्र, विदर्भ और मराठवाडा — के बीच आर्थिक विकास में भारी अंतर को दर्ज किया गया।
मुख्य निष्कर्ष
- औद्योगिकीकरण में असमतोल — पश्चिमी महाराष्ट्र में 70% से अधिक औद्योगिक विकास केंद्रित था, जबकि विदर्भ और मराठवाडा में केवल 15-20% था
- कृषि संकट — विदर्भ और मराठवाडा में कृषि पर अत्यधिक निर्भरता और सूखे की समस्या थी
- बुनियादी ढांचे की कमी — पिछड़े क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव था
- पूंजी निवेश का असमान वितरण — निजी और सार्वजनिक निवेश मुख्यतः पश्चिमी महाराष्ट्र में केंद्रित था
पश्चिमी महाराष्ट्र में मुंबई, पुणे जैसे बड़े औद्योगिक केंद्र थे, जबकि विदर्भ और मराठवाडा में औद्योगिक विकास न्यूनतम था।
विदर्भ और मराठवाडा में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था थी, जो सूखे और मानसून पर निर्भर थी।
क्षेत्रीय असमतोल की पहचान
दांडेकर समिती ने महाराष्ट्र के क्षेत्रीय असमतोल को तीन प्रमुख आयामों में पहचाना — आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक।
आर्थिक असमतोल
समिती ने पाया कि पश्चिमी महाराष्ट्र की प्रति व्यक्ति आय विदर्भ और मराठवाडा की तुलना में 2-3 गुना अधिक थी। मुंबई और पुणे जैसे शहरों में राष्ट्रीय आय का एक बड़ा हिस्सा केंद्रित था।
औद्योगिक असमतोल
विदर्भ और मराठवाडा में कोयला, कपास जैसे कच्चे माल होने के बावजूद, औद्योगिक विकास न्यूनतम था। यह दर्शाता है कि पूंजी निवेश और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी थी।
सामाजिक असमतोल
शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण असमतोल था। पश्चिमी महाराष्ट्र में साक्षरता दर 60% से अधिक थी, जबकि विदर्भ और मराठवाडा में यह 35-40% थी।
सिफारिशें व नीति प्रभाव
दांडेकर समिती ने महाराष्ट्र के क्षेत्रीय असमतोल को दूर करने के लिए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें दीं, जिनका बाद की नीतियों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
मुख्य सिफारिशें
- विदर्भ में औद्योगिक पार्क — नागपुर, अमरावती जैसे शहरों में औद्योगिक क्षेत्र विकसित करना
- कच्चे माल का उपयोग — कपास, कोयला जैसे स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्योग स्थापित करना
- सरकारी निवेश — सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में विदर्भ और मराठवाडा में निवेश बढ़ाना
- सिंचाई परियोजनाएं — दुष्काळप्रवण मराठवाडा में बड़ी सिंचाई परियोजनाएं विकसित करना
- जल संरक्षण — वर्षा जल संचयन और भूजल प्रबंधन में सुधार
- कृषि अनुसंधान — सूखा-सहन करने वाली फसलों का विकास
- सड़क नेटवर्क — विदर्भ और मराठवाडा में राष्ट्रीय राजमार्ग और स्थानीय सड़कों का विस्तार
- बिजली आपूर्ति — विद्युत उत्पादन और वितरण में सुधार
- परिवहन — रेलवे और सड़क परिवहन को मजबूत करना
- शिक्षा संस्थान — विदर्भ और मराठवाडा में विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान स्थापित करना
- कौशल प्रशिक्षण — औद्योगिक कौशल विकास कार्यक्रम
- साक्षरता अभियान — प्राथमिक शिक्षा को सार्वभौमिक बनाना
नीति प्रभाव
दांडेकर समिती की सिफारिशों का प्रभाव बाद की महाराष्ट्र सरकार की नीतियों पर स्पष्ट दिखता है। इसके आधार पर ही संविधान के अनुच्छेद 371(2) में विदर्भ और मराठवाडा के लिए विशेष तरतूद दिए गए। साथ ही, 1994 में विदर्भ वैधानिक विकास मंडल (VSDB) और मराठवाडा वैधानिक विकास मंडल की स्थापना की गई।


Leave a Reply