18वीं सदी — मुगल पतन, मराठा विस्तार
परिचय — 18वीं सदी का संदर्भ
18वीं सदी भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था जब मुगल साम्राज्य का पतन तेजी से हुआ और मराठा शक्ति का विस्तार पूरे भारत में हुआ। यह काल Rajasthan Govt Exam Preparation के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी समय राजस्थान के राज्यों का राजनीतिक स्वरूप बदला और वे मराठा आधिपत्य के अधीन आए।
18वीं सदी की शुरुआत में औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर हो गया। दिल्ली में कमजोर बादशाह, केंद्रीय सत्ता का विघटन, और प्रांतीय गवर्नरों की स्वतंत्रता की महत्वाकांक्षा ने साम्राज्य को विखंडित कर दिया। इसी खाली स्थान को भरने के लिए मराठा साम्राज्य आगे बढ़ा और राजस्थान सहित पूरे उत्तर भारत में अपना प्रभाव स्थापित किया।
मुगल साम्राज्य का पतन
औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद मुगल साम्राज्य तेजी से कमजोर हुआ। उसके उत्तराधिकारी कमजोर थे और वे साम्राज्य को नियंत्रित नहीं कर सके। बहादुर शाह प्रथम (1707–1712) के समय भी केंद्रीय सत्ता कमजोर रही। उसके बाद के बादशाहों में राजनीतिक क्षमता नहीं थी।
मुगल पतन के मुख्य कारण थे:
- केंद्रीय सत्ता की कमजोरी — दिल्ली में बादशाहों की शक्ति घटी
- प्रांतीय गवर्नरों की स्वतंत्रता — बंगाल, हैदराबाद, अवध जैसे प्रांत स्वतंत्र हो गए
- आर्थिक संकट — राजस्व में कमी और सैन्य व्यय में वृद्धि
- धार्मिक नीति की विफलता — औरंगजेब की कट्टर नीति से विद्रोह
- विदेशी आक्रमण — नादिर शाह का आक्रमण (1739) और अहमद शाह अब्दाली के हमले
| बादशाह | शासनकाल | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| औरंगजेब | 1658–1707 | अंतिम शक्तिशाली बादशाह, दक्कन में लंबा युद्ध |
| बहादुर शाह प्रथम | 1707–1712 | कमजोर, सिख विद्रोह, राजपूत समस्या |
| जहांदार शाह | 1712–1713 | अत्यंत कमजोर, महिलाओं के प्रभाव में |
| फर्रुखसियर | 1713–1719 | सैयद भाइयों के नियंत्रण में, अस्थिर शासन |
| मुहम्मद शाह | 1719–1748 | नादिर शाह का आक्रमण, मराठा विस्तार |
मराठा शक्ति का उदय
शिवाजी (1627–1680) ने दक्कन में मराठा शक्ति की नींव रखी। उन्होंने मुगल और बीजापुर की सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया और एक स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र संभाजी (1680–1689) ने शासन किया, लेकिन औरंगजेब के विरुद्ध संघर्ष में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
18वीं सदी में बाजीराव प्रथम (1720–1740) मराठा साम्राज्य के सबसे महान सेनानायक थे। उन्होंने मराठा शक्ति को पूरे भारत में फैलाया। उनके नेतृत्व में मराठा सेनाएं:
- उत्तर भारत में विस्तार — मालवा, गुजरात, राजस्थान में प्रवेश
- दिल्ली के पास पहुंचना — मुगल सत्ता को चुनौती देना
- चौथ और सरदेशमुखी की वसूली — राजस्थान के राज्यों से कर वसूली
- निजाम और अन्य शक्तियों को पराजित करना — दक्कन में प्रभुत्व
राजस्थान में मराठा विस्तार
18वीं सदी के दूसरे दशक में मराठा सेनाएं राजस्थान में प्रवेश करने लगीं। बाजीराव प्रथम (1720–1740) के नेतृत्व में मराठा विस्तार तेजी से हुआ। राजस्थान के विभिन्न राज्यों को मराठा आधिपत्य स्वीकार करना पड़ा।
मराठा विस्तार के मुख्य चरण:
- मालवा और गुजरात पर कब्जा — बाजीराव प्रथम ने निजाम को पराजित किया
- राजस्थान की सीमाओं तक पहुंचना — मारवाड़ और जयपुर के पास पहुंचे
- चौथ की मांग शुरू करना — राजस्थान के राज्यों से कर वसूली की शुरुआत
- जयपुर, जोधपुर, उदयपुर पर दबाव — इन राज्यों को चौथ देने के लिए बाध्य किया
- बीकानेर और अन्य राज्यों का समर्पण — अधिकांश राजस्थानी राज्य मराठा आधिपत्य स्वीकार करने लगे
- सरदेशमुखी की वसूली — राजस्व का 10% हिस्सा मराठों को देना पड़ा
- बाजीराव प्रथम की मृत्यु (1740) — उनके बाद बालाजी बाजीराव ने नेतृत्व किया
- राजस्थान में मराठा नियंत्रण का विस्तार — लगभग पूरे राजस्थान पर मराठा प्रभाव
- पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) तक मराठा शक्ति का शिखर — इसके बाद मराठा शक्ति में कमी
मुगल साम्राज्य की कमजोरी के कारण राजस्थान के राज्य कमजोर पड़ गए और मराठा आक्रमण का सामना नहीं कर सके।
बाजीराव प्रथम की तेजी से चलने वाली घुड़सवार सेनाएं राजस्थान के राज्यों को हराने में सक्षम थीं।
मराठों को चौथ और सरदेशमुखी से बहुत आय होती थी, इसलिए वे राजस्थान में विस्तार करते रहे।
राजस्थान दिल्ली के रास्ते में था, इसलिए मराठा उत्तर भारत में विस्तार के लिए इसे नियंत्रित करना चाहते थे।
राजस्थान के राज्यों पर प्रभाव
18वीं सदी में मराठा विस्तार का राजस्थान के राज्यों पर गहरा प्रभाव पड़ा। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर जैसे प्रमुख राज्यों को मराठा आधिपत्य स्वीकार करना पड़ा। इससे राजस्थान की राजनीतिक स्थिति में बड़ा परिवर्तन हुआ।
मराठा प्रभाव के परिणाम:
- आर्थिक शोषण — चौथ और सरदेशमुखी से राजस्थान के राज्यों की आय में भारी कमी
- राजनीतिक अधीनता — राजस्थान के राजाओं को मराठा सत्ता के अधीन रहना पड़ा
- सैन्य कमजोरी — राजस्थान के राज्यों की सैन्य शक्ति में कमी
- सांस्कृतिक प्रभाव — मराठा संस्कृति का कुछ प्रभाव राजस्थान में आया
- भविष्य की तैयारी — अंग्रेजों के आने से पहले राजस्थान के राज्य कमजोर हो गए
| राज्य | मराठा आधिपत्य की स्थिति | प्रमुख प्रभाव |
|---|---|---|
| जयपुर | 1730 के बाद मराठा नियंत्रण में | चौथ-सरदेशमुखी का भुगतान, बणी-विराई का युद्ध (1735) |
| जोधपुर | 1730 के बाद मराठा दबाव में | आर्थिक संकट, सैन्य कमजोरी |
| उदयपुर | 1740 के बाद मराठा प्रभाव | राजस्व में कमी, राजनीतिक अस्थिरता |
| बीकानेर | 1750 के बाद मराठा नियंत्रण | सीमांत क्षेत्र होने के कारण कम प्रभाव |
- पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) — अहमद शाह अब्दाली ने मराठों को हराया, जिससे मराठा शक्ति में कमी आई
- राजस्थान में मराठा नियंत्रण की समाप्ति — 1760 के बाद मराठा शक्ति कमजोर हुई, लेकिन राजस्थान पर उनका प्रभाव बना रहा
परीक्षा प्रश्न और सारांश
🎓 इंटरैक्टिव प्रश्न
आर्थिक प्रभाव: चौथ और सरदेशमुखी से राजस्थान के राज्यों की आय में भारी कमी। राजकोष कमजोर हो गया।
राजनीतिक प्रभाव: राजस्थान के राजाओं को मराठा आधिपत्य स्वीकार करना पड़ा। उनकी स्वतंत्रता सीमित हुई।
सैन्य प्रभाव: राजस्थान की सैन्य शक्ति कमजोर हुई। अंग्रेजों के आने से पहले राज्य तैयार नहीं थे।
सांस्कृतिक प्रभाव: मराठा संस्कृति का कुछ प्रभाव राजस्थान में आया।
दीर्घकालीन प्रभाव: राजस्थान के राज्य अंग्रेजों के सामने कमजोर पड़ गए और उन्हें अंग्रेजों के साथ संधि करनी पड़ी।
संभाजी और राजाराम का काल (1680–1707): औरंगजेब के साथ संघर्ष में मराठा शक्ति कमजोर हुई। लेकिन दक्कन में मराठा राज्य बना रहा।
संक्रमण काल (1707–1720): औरंगजेब की मृत्यु के बाद मराठा शक्ति का पुनर्गठन हुआ।
बाजीराव प्रथम की भूमिका (1720–1740): बाजीराव प्रथम ने मराठा साम्राज्य को सर्वोच्च शक्ति तक पहुंचाया। उन्होंने:
1. तेजी से चलने वाली घुड़सवार सेनाएं बनाईं
2. निजाम को पराजित किया
3. मालवा और गुजरात पर कब्जा किया
4. राजस्थान में विस्तार किया
5. दिल्ली के पास पहुंचे
परिणाम: बाजीराव प्रथम के समय मराठा साम्राज्य पूरे भारत में एक प्रमुख शक्ति बन गया।

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