74वां संशोधन — संवैधानिक दर्जा
परिचय एवं पृष्ठभूमि
74वां संवैधानिक संशोधन (1992) भारतीय संविधान में नगरीय प्रशासन को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने वाला एक ऐतिहासिक कदम था। यह संशोधन नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका को संविधान के भाग IX-A में शामिल करके स्थानीय शासन को मजबूत करता है। राजस्थान सरकार परीक्षा की दृष्टि से यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संशोधन की आवश्यकता
स्वतंत्रता के बाद भारत में नगरीय निकायों को संविधान में स्पष्ट स्थान नहीं था। ये निकाय राज्य सूची के अंतर्गत आते थे और राज्य सरकारें उन्हें मनमाने ढंग से भंग कर सकती थीं। इसी कमजोरी को दूर करने के लिए 74वां संशोधन लाया गया। इसका उद्देश्य नगरीय स्थानीय निकायों को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना था।

74वां संशोधन की मुख्य विशेषताएँ
74वां संवैधानिक संशोधन ने नगरीय प्रशासन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए। इसने नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका को संविधान के अंतर्गत संरक्षण दिया और उन्हें स्वायत्त निकाय का दर्जा प्रदान किया।
- संवैधानिक दर्जा: नगरीय निकायों को भाग IX-A में शामिल किया गया
- निर्वाचित निकाय: सभी नगरीय निकायों का गठन सीधे चुनाव से होगा
- निश्चित कार्यकाल: प्रत्येक निकाय की अवधि 5 वर्ष निर्धारित की गई
- आरक्षण: महिलाओं के लिए कम से कम 1/3 सीटें आरक्षित
- अनुसूचित जाति/जनजाति: उनके लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान
नगरीय निकायों के प्रकार
| निकाय का प्रकार | जनसंख्या मानदंड | राजस्थान में उदाहरण |
|---|---|---|
| नगर निगम | 3 लाख से अधिक | जयपुर, जोधपुर, कोटा |
| नगर परिषद | 1 लाख से 3 लाख | अजमेर, बीकानेर, उदयपुर |
| नगर पालिका | 20,000 से 1 लाख | छोटे नगर |
नगरीय निकायों को संवैधानिक दर्जा
74वें संशोधन से पहले नगरीय निकाय राज्य के अधीन थे और उनका कोई संवैधानिक सुरक्षा नहीं था। संशोधन के बाद ये निकाय संविधान के भाग IX-A के तहत आते हैं और उन्हें स्वायत्त शक्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
संवैधानिक दर्जे के लाभ
राज्य सरकार मनमाने ढंग से निकायों को भंग नहीं कर सकती। निकायों को संवैधानिक सुरक्षा मिली।
नगरीय निकायों को अपने क्षेत्र में निर्णय लेने की स्वायत्त शक्तियाँ मिलीं।
सभी पदों का चुनाव सीधे जनता द्वारा होता है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत हुई।
निकायों को अपने राजस्व के स्रोत मिले और वित्तीय आयोग की सिफारिशें मानी जाती हैं।
संवैधानिक संरचना
74वें संशोधन के तहत नगरीय निकायों की संरचना में महापौर, उप-महापौर, पार्षद और कमिश्नर शामिल हैं। महापौर का चुनाव पार्षदों द्वारा किया जाता है, जबकि कमिश्नर राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।

राजस्थान में कार्यान्वयन
राजस्थान ने 74वें संशोधन को अपने नगरीय प्रशासन में प्रभावी ढंग से लागू किया है। राज्य में जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर और उदयपुर जैसे प्रमुख नगर निगम हैं जो इस संशोधन के तहत काम करते हैं।
राजस्थान के प्रमुख नगरीय निकाय
राजस्थान में महिला प्रतिनिधित्व
चुनौतियाँ एवं समीक्षा
74वें संशोधन के बावजूद, राजस्थान में नगरीय प्रशासन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वित्तीय संसाधनों की कमी, राज्य सरकार का अत्यधिक हस्तक्षेप और बुनियादी ढाँचे की कमजोरी मुख्य समस्याएँ हैं।
मुख्य चुनौतियाँ
- राजस्व की कमी: नगरीय निकायों के पास अपने राजस्व के सीमित स्रोत हैं
- केंद्रीय सहायता: केंद्र और राज्य सरकार की सहायता अपर्याप्त है
- कर संग्रह: संपत्ति कर और अन्य कर का संग्रह कम है
- राज्य का हस्तक्षेप: राज्य सरकार अभी भी नगरीय निकायों के कार्यों में हस्तक्षेप करती है
- कर्मचारी: कुशल कर्मचारियों की कमी और प्रशिक्षण की कमजोरी
- जवाबदेही: पारदर्शिता और जवाबदेही में कमी
सुधार के प्रयास
परीक्षा प्रश्न एवं सारांश
सारांश
स्मरणीय सूत्र
इंटरैक्टिव प्रश्न
पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQ)
- संवैधानिक दर्जा: नगरीय निकायों को संविधान के भाग IX-A में शामिल किया गया, जिससे उन्हें कानूनी सुरक्षा मिली।
- निर्वाचित निकाय: सभी पद सीधे चुनाव से भरे जाने लगे, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत हुई।
- महिला आरक्षण: कम से कम 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।
- राजस्थान में प्रभाव: जयपुर, जोधपुर, कोटा जैसे नगरों में नगर निगम की स्थापना हुई। महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हुई। हालांकि, वित्तीय संसाधनों की कमी और राज्य सरकार के अत्यधिक हस्तक्षेप से पूरी स्वायत्तता अभी भी प्राप्त नहीं हुई है।
- नगर निगम: 3 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों के लिए (जयपुर, जोधपुर, कोटा)
- नगर परिषद: 1 लाख से 3 लाख जनसंख्या वाले नगरों के लिए (अजमेर, बीकानेर, उदयपुर)
- नगर पालिका: 20,000 से 1 लाख जनसंख्या वाले छोटे नगरों के लिए


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