अरावली का जलवायु विभाजक — पश्चिम (शुष्क) और पूर्व (आर्द्र)
परिचय — अरावली जलवायु विभाजक
अरावली पर्वत श्रृंखला राजस्थान की सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषता है, जो न केवल एक पर्वत श्रृंखला है बल्कि भारत का सबसे महत्वपूर्ण जलवायु विभाजक भी है। यह पर्वत श्रृंखला राजस्थान को दो अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों में विभाजित करती है — पश्चिमी अरावली (शुष्क) और पूर्वी अरावली (आर्द्र)। यह विभाजन राजस्थान की कृषि, वनस्पति, जल संसाधन और मानव बस्तियों को गहराई से प्रभावित करता है।
अरावली का भौगोलिक विस्तार
अरावली पर्वत श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में विस्तृत है। राजस्थान में यह गुजरात की सीमा से दिल्ली तक फैली हुई है। इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उदयपुर, राजसमंद, पाली और सिरोही जिलों में स्थित है। अरावली की ऊंचाई दक्षिण में अधिक (1722 मीटर) और उत्तर में क्रमशः कम होती जाती है।

पश्चिमी अरावली — शुष्क जलवायु क्षेत्र
अरावली के पश्चिमी ढलान पर शुष्क जलवायु पाई जाती है। यह क्षेत्र राजस्थान का सबसे शुष्क भाग है, जहां वर्षा बहुत कम होती है और तापमान अत्यधिक होता है। इस क्षेत्र में थार मरुस्थल का विस्तार है।
वर्षा की विशेषताएं
पश्चिमी अरावली क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 25-50 सेंटीमीटर के बीच होती है। कुछ क्षेत्रों में तो वर्षा 25 सेंटीमीटर से भी कम होती है। यह वर्षा मुख्यतः जून से सितंबर के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होती है। बाकी महीनों में लगभग कोई वर्षा नहीं होती।
तापमान और अन्य जलवायु विशेषताएं
इस क्षेत्र में गर्मियों में तापमान 45-50°C तक पहुंच जाता है, जबकि सर्दियों में 5-10°C रहता है। वाष्पीकरण की दर बहुत अधिक है, जिससे मिट्टी में नमी की कमी रहती है। आर्द्रता बहुत कम है, और हवाएं तेज चलती हैं।
| जलवायु पैरामीटर | पश्चिमी अरावली (शुष्क) | विशेषता |
|---|---|---|
| वार्षिक वर्षा | 25-50 सेंटीमीटर | अत्यंत कम |
| गर्मी का तापमान | 45-50°C | अत्यधिक |
| सर्दी का तापमान | 5-10°C | ठंडा |
| वाष्पीकरण दर | 200-250 सेंटीमीटर | वर्षा से कई गुना अधिक |
| आर्द्रता | 20-30% | बहुत कम |
पूर्वी अरावली — आर्द्र जलवायु क्षेत्र
अरावली के पूर्वी ढलान पर आर्द्र जलवायु पाई जाती है। यह क्षेत्र राजस्थान का सबसे आर्द्र भाग है, जहां वर्षा अधिक होती है और वनस्पति घनी है। इस क्षेत्र में बनास, चंबल और माही नदियां बहती हैं।
वर्षा की विशेषताएं
पूर्वी अरावली क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 50-100 सेंटीमीटर के बीच होती है, कुछ क्षेत्रों में तो 100 सेंटीमीटर से अधिक भी होती है। यह वर्षा मुख्यतः जून से सितंबर के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होती है। माउंट आबू क्षेत्र में वर्षा सबसे अधिक (150-200 सेंटीमीटर) होती है।
तापमान और अन्य जलवायु विशेषताएं
इस क्षेत्र में गर्मियों में तापमान 35-40°C तक पहुंचता है, जबकि सर्दियों में 10-15°C रहता है। वाष्पीकरण की दर पश्चिमी क्षेत्र की तुलना में कम है। आर्द्रता अधिक है (50-70%), और हवाएं मंद चलती हैं। इस क्षेत्र में बादल अधिक रहते हैं और धुंध/कोहरा भी पड़ता है।
| जलवायु पैरामीटर | पूर्वी अरावली (आर्द्र) | विशेषता |
|---|---|---|
| वार्षिक वर्षा | 50-100 सेंटीमीटर | मध्यम से अधिक |
| गर्मी का तापमान | 35-40°C | मध्यम |
| सर्दी का तापमान | 10-15°C | ठंडा |
| वाष्पीकरण दर | 100-150 सेंटीमीटर | वर्षा के बराबर या कम |
| आर्द्रता | 50-70% | अधिक |
पूर्वी: 50-100 सेंटीमीटर
अंतर: 2-4 गुना
पूर्वी गर्मी: 35-40°C
अंतर: 5-10°C कम

जलवायु विभाजन के कारण
अरावली पर्वत श्रृंखला के कारण राजस्थान में इतना स्पष्ट जलवायु विभाजन क्यों होता है? इसके पीछे कई भौगोलिक और वायुमंडलीय कारण हैं।
मानसून की दिशा और अरावली का प्रभाव
दक्षिण-पश्चिम मानसून अरब सागर से आता है और उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ता है। जब यह नम हवाएं अरावली पर्वत श्रृंखला से टकराती हैं, तो पूर्वी ढलान पर वर्षा होती है (यह प्रक्रिया ऑरोग्राफिक वर्षा कहलाती है)। जब ये हवाएं अरावली को पार कर जाती हैं, तो वे शुष्क हो जाती हैं और पश्चिमी ढलान पर कम वर्षा होती है।
नम हवाएं अरावली की ऊंचाई पर ठंडी होती हैं और संघनन से वर्षा होती है। यह पूर्वी ढलान पर अधिक होती है।
अरावली को पार करने के बाद हवाएं शुष्क हो जाती हैं, जिससे पश्चिमी ढलान पर वर्षा छाया (Rain Shadow) का निर्माण होता है।
ऊंचाई के कारण पूर्वी ढलान पर तापमान कम होता है, जिससे वाष्पीकरण भी कम होता है।
पूर्वी ढलान अरब सागर के अधिक करीब है, जिससे नम हवाओं का प्रभाव अधिक रहता है।
मानसून की शक्ति
राजस्थान में दक्षिण-पश्चिम मानसून की शक्ति कमजोर है क्योंकि यह भारत के अंदरूनी भाग में है। इसलिए पश्चिमी क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है। यदि मानसून सामान्य से कमजोर हो, तो पूर्वी क्षेत्र में भी सूखा पड़ सकता है।
कृषि, वनस्पति और जीवन पर प्रभाव
अरावली के कारण होने वाला जलवायु विभाजन राजस्थान की कृषि, वनस्पति, जल संसाधन और मानव जीवन को गहराई से प्रभावित करता है।
कृषि पर प्रभाव
पश्चिमी अरावली (शुष्क क्षेत्र) में कृषि बहुत कठिन है। यहां बाजरा, मूंगफली, सरसों जैसी सूखा-सहन करने वाली फसलें उगाई जाती हैं। सिंचाई की सुविधा सीमित है। दूसरी ओर, पूर्वी अरावली (आर्द्र क्षेत्र) में गेहूं, मक्का, दलहन, तिलहन जैसी फसलें अच्छी होती हैं। यहां सिंचाई की सुविधा बेहतर है।
वनस्पति पर प्रभाव
पश्चिमी अरावली में कांटेदार झाड़ियां और घास पाई जाती हैं। यहां नीम, खेजड़ी, बबूल जैसे सूखा-सहन करने वाले पेड़ हैं। पूर्वी अरावली में उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं। यहां धोक, गुर्जन, सागौन, आम, नीम जैसे पेड़ हैं। वन का घनत्व पूर्वी क्षेत्र में अधिक है।
पश्चिमी अरावली में जल की कमी है। यहां भूजल का स्तर बहुत गहरा है (100-200 मीटर)। नदियां मौसमी हैं और गर्मियों में सूख जाती हैं। तालाब और कुएं जल संचय के मुख्य साधन हैं।
पूर्वी अरावली में जल की प्रचुरता है। यहां भूजल का स्तर उथला है (20-50 मीटर)। नदियां सदा बहने वाली हैं (बनास, चंबल, माही)। झरने भी पाए जाते हैं। इसलिए यह क्षेत्र कृषि और पेयजल के लिए अधिक समृद्ध है।
- पश्चिमी नदियां: लूनी, घग्घर (मौसमी)
- पूर्वी नदियां: बनास, चंबल, माही (सदा बहने वाली)
मानव बस्तियों पर प्रभाव
पश्चिमी अरावली में जनसंख्या का घनत्व कम है। यहां खानाबदोश पशुपालक अधिक हैं। पूर्वी अरावली में जनसंख्या का घनत्व अधिक है। यहां कृषि आधारित गांव अधिक हैं। उदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ा जैसे शहर पूर्वी क्षेत्र में हैं।
वन: कांटेदार झाड़ियां
जल: कम, गहरा भूजल
जनसंख्या: कम घनत्व
वन: घने वन
जल: अधिक, उथला भूजल
जनसंख्या: अधिक घनत्व
परीक्षा प्रश्न और सारांश
इंटरैक्टिव प्रश्न
पिछले वर्षों के परीक्षा प्रश्न (PYQ)
पश्चिमी क्षेत्र: कम वर्षा और अधिक तापमान के कारण केवल सूखा-सहन करने वाली फसलें (बाजरा, मूंगफली, सरसों) उगाई जाती हैं। सिंचाई की सुविधा सीमित है। कृषि उत्पादन कम है।
पूर्वी क्षेत्र: अधिक वर्षा और अच्छी आर्द्रता के कारण विविध फसलें (गेहूं, मक्का, दलहन, तिलहन) उगाई जाती हैं। सिंचाई की सुविधा बेहतर है। कृषि उत्पादन अधिक है।
इसलिए पूर्वी क्षेत्र राजस्थान का अधिक कृषि-समृद्ध क्षेत्र है।
अरावली में: दक्षिण-पश्चिम मानसून की नम हवाएं अरब सागर से आती हैं। जब ये अरावली की पूर्वी ढलान पर पहुंचती हैं, तो ऊंचाई के कारण ठंडी होकर संघनित हो जाती हैं और वर्षा करती हैं। जब ये हवाएं अरावली को पार कर जाती हैं, तो वे शुष्क हो चुकी होती हैं। इसलिए पश्चिमी ढलान पर वर्षा छाया का निर्माण होता है और कम वर्षा होती है।

