चित्तौड़ के तीन साके
परिचय — साके का अर्थ और महत्व
चित्तौड़ के तीन साके (Saka) मेवाड़ के इतिहास की सबसे नाटकीय और गौरवान्वित घटनाएँ हैं, जहाँ राजपूत राजाओं और रानियों ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध अपनी स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। ये तीनों साके 1303 ई., 1535 ई. और 1568 ई. में हुए और राजस्थान Govt Exam में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं।
साका का अर्थ और परिभाषा
संस्कृत में ‘साका’ शब्द का अर्थ है — सामूहिक आत्मबलिदान या सामूहिक आत्महत्या। राजपूत परंपरा में जब किसी दुर्ग पर विजय असंभव हो जाती थी, तो महिलाएँ (जौहर) और पुरुष (साका) दोनों ही शत्रु के हाथों में पड़ने से बेहतर मृत्यु को वरण करते थे। यह राजपूत सम्मान, वीरता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक माना जाता है।
साके और जौहर में अंतर
- जौहर: महिलाओं द्वारा किया गया सामूहिक आत्मबलिदान (आग में कूदना)
- साका: पुरुष योद्धाओं द्वारा किया गया सामूहिक आत्मबलिदान (युद्ध में मृत्यु)
- दोनों ही घटनाएँ एक साथ होती थीं — पहले जौहर, फिर साका
प्रथम साका — अलाउद्दीन खिलजी (1303 ई.)
चित्तौड़ का प्रथम साका 1303 ई. में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुआ। इस साके का सबसे प्रसिद्ध कारण रानी पद्मिनी की सुंदरता को लेकर अलाउद्दीन का आकर्षण था, जिसके परिणामस्वरूप भीषण युद्ध हुआ।
अलाउद्दीन खिलजी और चित्तौड़ पर आक्रमण
अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.) दिल्ली सल्तनत का सबसे शक्तिशाली और विस्तारवादी सुल्तान था। उसने भारत के विभिन्न हिस्सों को जीता। चित्तौड़ पर आक्रमण का तात्कालिक कारण रानी पद्मिनी की सुंदरता थी, जो राणा रतन सिंह की पत्नी थी। कहा जाता है कि अलाउद्दीन ने रानी पद्मिनी को दर्पण में देखने की इच्छा व्यक्त की, जिसे राणा ने स्वीकार कर दिया।
रानी पद्मिनी और उनका महत्व
- पद्मिनी: राणा रतन सिंह की पत्नी, अत्यंत सुंदर और गुणवान
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: सिंहल (श्रीलंका) की राजकुमारी
- साहित्यिक संदर्भ: मलिक मुहम्मद जायसी के प्रसिद्ध काव्य ‘पद्मावत’ में विस्तार से वर्णित
- ऐतिहासिकता: विद्वानों में इस पर विवाद है कि पद्मिनी वास्तविक थीं या काल्पनिक
साके की घटनाएँ
प्रमुख योद्धा और नायक
द्वितीय साका — गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह (1535 ई.)
चित्तौड़ का द्वितीय साका 1535 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय हुआ। इस साके में रानी कर्णावती (कर्मावती) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी, जिन्होंने अपनी राजनीतिक सूझबूझ और साहस का परिचय दिया।
बहादुरशाह और चित्तौड़ पर आक्रमण
बहादुरशाह (1526-1537 ई.) गुजरात सल्तनत का शक्तिशाली सुल्तान था। उसने पश्चिमी भारत में अपनी शक्ति को मजबूत किया। चित्तौड़ पर उसके आक्रमण का कारण राजनीतिक सत्ता, क्षेत्रीय विस्तार और आर्थिक लाभ था। इस समय मेवाड़ का शासक विक्रमादित्य सिंह (राणा सांगा का पुत्र) था, जो अभी नाबालिग था। वास्तविक शासन उसकी माता रानी कर्णावती के हाथों में था।
रानी कर्णावती — एक महान राजनीतिज्ञ
- परिचय: राणा सांगा की पत्नी, विक्रमादित्य सिंह की माता
- राजनीतिक सूझबूझ: नाबालिग पुत्र की ओर से दुर्ग की रक्षा का दायित्व संभाला
- राखी भेजना: मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता माँगी (राजपूत परंपरा के विरुद्ध)
- वीरता: दुर्ग की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई
राखी की घटना और हुमायूँ की भूमिका
रानी कर्णावती ने अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजी। यह कदम राजपूत परंपरा के विरुद्ध था, लेकिन इसका उद्देश्य बहादुरशाह के विरुद्ध सहायता प्राप्त करना था। हुमायूँ ने राखी का सम्मान किया और सहायता का वचन दिया, लेकिन वह समय पर सहायता नहीं पहुँच सका क्योंकि वह उसी समय गुजरात में अन्य कारणों से व्यस्त था।
साके की घटनाएँ
प्रमुख योद्धा

तृतीय साका — अकबर (1568 ई.)
चित्तौड़ का तृतीय और अंतिम साका 1568 ई. में मुगल बादशाह अकबर के आक्रमण के समय हुआ। इस साके में महाराणा उदय सिंह की भूमिका महत्वपूर्ण थी, जिन्होंने दुर्ग को छोड़कर अपने परिवार और सेना को सुरक्षित निकाल दिया और बाद में उदयपुर की स्थापना की।
अकबर और चित्तौड़ पर आक्रमण
अकबर (1556-1605 ई.) मुगल साम्राज्य का सबसे महान और विजयी बादशाह था। उसने भारत के विभिन्न भागों को अपने अधीन किया। चित्तौड़ पर अकबर का आक्रमण उसके साम्राज्य विस्तार की नीति का हिस्सा था। इस समय मेवाड़ का शासक महाराणा उदय सिंह था, जो राणा सांगा के पुत्र थे। अकबर के आक्रमण के समय महाराणा उदय सिंह दुर्ग को छोड़कर अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर ले गए।
महाराणा उदय सिंह की रणनीति
- दूरदर्शी निर्णय: दुर्ग की रक्षा असंभव जानकर परिवार को सुरक्षित निकाल दिया
- गोकुल नगर में शरण: परिवार को अरावली पर्वत की गोद में सुरक्षित स्थान पर रखा
- भविष्य की योजना: बाद में उदयपुर की स्थापना की (1559 ई.)
- प्रतिरोध की भावना: हालाँकि दुर्ग को छोड़ा, लेकिन मेवाड़ की स्वतंत्रता की भावना को जीवित रखा
साके की घटनाएँ
दुर्ग के रक्षक और सेनापति
अकबर के आक्रमण के परिणाम
तीनों साकों का तुलनात्मक विश्लेषण
चित्तौड़ के तीनों साके राजपूत इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। हालाँकि ये सभी दुर्ग के पतन से संबंधित हैं, लेकिन प्रत्येक साके की अपनी विशेषताएँ, कारण और परिणाम हैं।
तीनों साकों की तुलनात्मक तालिका
| विशेषता | प्रथम साका (1303) | द्वितीय साका (1535) | तृतीय साका (1568) |
|---|---|---|---|
| आक्रमणकारी | अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली) | बहादुरशाह (गुजरात) | अकबर (मुगल) |
| शासक | राणा रतन सिंह | विक्रमादित्य सिंह (नाबालिग) | महाराणा उदय सिंह |
| प्रमुख महिला | रानी पद्मिनी | रानी कर्णावती | दुर्ग की महिलाएँ |
| तात्कालिक कारण | रानी पद्मिनी की सुंदरता | राजनीतिक सत्ता और विस्तार | साम्राज्य विस्तार |
| मूल कारण | राजनीतिक शक्ति और धन | क्षेत्रीय वर्चस्व | मुगल साम्राज्य का विस्तार |
| राजनीतिक भूमिका | राणा की सैन्य रणनीति | रानी की राजनीतिक सूझबूझ (राखी) | महाराणा की दूरदर्शिता |
| परिणाम | दुर्ग अलाउद्दीन के अधीन | दुर्ग बहादुरशाह के अधीन | दुर्ग अकबर के अधीन, उदयपुर की स्थापना |
| ऐतिहासिक महत्व | राजपूत वीरता का प्रतीक | महिला नेतृत्व का उदाहरण | राजनीतिक दूरदर्शिता का प्रमाण |
साकों के कारणों का विश्लेषण
चित्तौड़ मेवाड़ की राजधानी था और भारत के सबसे मजबूत किलों में से एक। इसकी रणनीतिक स्थिति के कारण विभिन्न आक्रमणकारियों का लक्ष्य बना।
चित्तौड़ की अपार धन-संपत्ति और आर्थिक समृद्धि आक्रमणकारियों को आकर्षित करती थी। यह एक समृद्ध व्यापारिक केंद्र था।
मेवाड़ की राजनीतिक शक्ति और प्रभाव विभिन्न आक्रमणकारियों के लिए चुनौती थी। इसे नियंत्रित करना साम्राज्य विस्तार के लिए आवश्यक था।
साकों की समानताएँ और भिन्नताएँ
- जौहर की परंपरा: तीनों साकों में महिलाओं ने जौहर किया
- वीरता का प्रदर्शन: सभी में राजपूत सैनिकों ने वीरतापूर्वक लड़ाई लड़ी
- दुर्ग का पतन: सभी में चित्तौड़ दुर्ग आक्रमणकारियों के अधीन आ गया
- राजपूत सम्मान: सभी में राजपूत सम्मान और स्वतंत्रता की भावना प्रदर्शित हुई
- आक्रमणकारी की शक्ति: अलाउद्दीन < बहादुरशाह < अकबर (क्रमशः बढ़ती शक्ति)
- नेतृत्व की भूमिका: राणा की सैन्य रणनीति → रानी की राजनीतिक सूझबूझ → महाराणा की दूरदर्शिता
- परिणाम: पहले दो में दुर्ग का पतन; तीसरे में उदयपुर की स्थापना से मेवाड़ की परंपरा बची
- साहित्यिक संदर्भ: पहला साका पद्मावत में वर्णित; दूसरा और तीसरा ऐतिहासिक दस्तावेजों में


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