जलवायु परिवर्तन — मरुस्थलीकरण, सूखा, अनियमित वर्षा
राजस्थान की जलवायु परिवर्तन की समस्या
राजस्थान भारत का सबसे शुष्क राज्य है, जहाँ जलवायु परिवर्तन के कारण मरुस्थलीकरण, आवर्ती सूखा और अनियमित वर्षा की गंभीर समस्याएं उत्पन्न हुई हैं। Rajasthan Govt Exam Preparation के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि राजस्थान की पर्यावरणीय चुनौतियां राज्य की विकास नीति और कृषि नीति को सीधे प्रभावित करती हैं।
राजस्थान की जलवायु विशेषताएं
राजस्थान की जलवायु अत्यंत शुष्क से अर्ध-शुष्क है। वार्षिक वर्षा 100 मिमी से 900 मिमी तक भिन्न होती है। पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर) में वर्षा न्यूनतम है, जबकि दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र (झालावाड़, बांसवाड़ा) में अधिकतम है। तापमान गर्मी में 50°C तक पहुंचता है और सर्दी में 0°C से नीचे जा सकता है।
मरुस्थलीकरण — कारण, प्रभाव और विस्तार
मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें उपजाऊ भूमि क्रमशः रेगिस्तान में परिणत हो जाती है। राजस्थान में थार मरुस्थल का विस्तार प्रतिवर्ष बढ़ रहा है, जो कृषि, पशुपालन और जल संसाधनों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
मरुस्थलीकरण के कारण
- अत्यधिक चराई (Overgrazing): पशुओं द्वारा घास और वनस्पति का अत्यधिक दोहन से मिट्टी की सुरक्षा खो जाती है।
- वनों की कटाई: ईंधन और लकड़ी के लिए वनों का अनियंत्रित दोहन।
- जल स्तर में गिरावट: भूजल का अत्यधिक दोहन से वनस्पति सूख जाती है।
- खनन गतिविधियां: रेत खनन और खनिज दोहन से भूमि की संरचना नष्ट होती है।
- जलवायु परिवर्तन: बढ़ता तापमान और कम वर्षा मरुस्थलीकरण को तेज करते हैं।
मरुस्थलीकरण का भौगोलिक विस्तार
| जिला/क्षेत्र | प्रभावित क्षेत्र | मरुस्थलीकरण की गंभीरता |
|---|---|---|
| जैसलमेर | ~16,000 वर्ग किमी | अत्यधिक |
| बाड़मेर | ~12,000 वर्ग किमी | अत्यधिक |
| बीकानेर | ~8,000 वर्ग किमी | गंभीर |
| नागौर | ~6,000 वर्ग किमी | गंभीर |
| पाली | ~4,000 वर्ग किमी | मध्यम |
मरुस्थलीकरण के प्रभाव
उपजाऊ भूमि का नुकसान से खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ती है और किसानों की आय घटती है।
चारागाह का विनाश पशुपालकों को पलायन के लिए मजबूर करता है।
भूजल स्तर में गिरावट और सतही जल स्रोतों का सूखना।
मरुस्थलीकृत क्षेत्रों से तेज धूलभरी आंधियां आती हैं जो स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करती हैं।
सूखा — प्रकार, आवृत्ति और आर्थिक प्रभाव
सूखा एक दीर्घकालीन जलवायु घटना है जिसमें वर्षा में असामान्य कमी से जल की कमी हो जाती है। राजस्थान में सूखा एक आवर्ती समस्या है जो हर 2-3 साल में आता है और कृषि, पशुपालन और मानव जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
सूखे के प्रकार
जब वर्षा सामान्य से 25% से अधिक कम हो जाती है। यह अल्पकालिक होता है और आमतौर पर 1-2 मौसम तक रहता है।
- कारण: मानसून का विफल होना, पश्चिमी विक्षोभों की कमी
- अवधि: कुछ महीने से 1-2 साल
जब मिट्टी में नमी की कमी से फसलें सूख जाती हैं। यह कृषकों के लिए सबसे विनाशकारी होता है।
- कारण: वर्षा की कमी, उच्च तापमान, अत्यधिक वाष्पीकरण
- प्रभाव: फसल की विफलता, पशु चारे की कमी
जब भूजल स्तर में गिरावट आती है और कुएं, बोरवेल सूख जाते हैं। यह सबसे लंबे समय तक चलने वाला सूखा है।
- कारण: भूजल का अत्यधिक दोहन, वर्षा की कमी
- अवधि: कई साल तक
जब सूखे के कारण आजीविका के साधन नष्ट हो जाते हैं और लोग पलायन करने के लिए मजबूर होते हैं।
- प्रभाव: बेरोजगारी, गरीबी, पलायन, सामाजिक अस्थिरता
राजस्थान में सूखे की आवृत्ति
सूखे का आर्थिक प्रभाव
अनियमित वर्षा — पैटर्न और कृषि संकट
अनियमित वर्षा का अर्थ है वर्षा के समय, अवधि और मात्रा में अप्रत्याशित परिवर्तन। राजस्थान में वर्षा पहले से ही अनिश्चित है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण यह और भी अनियमित हो गई है, जिससे कृषि और जल प्रबंधन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
अनियमित वर्षा के पैटर्न
| वर्षा पैटर्न | विवरण | कृषि पर प्रभाव |
|---|---|---|
| देरी से आने वाली वर्षा | मानसून की शुरुआत में 2-4 सप्ताह की देरी | बीज बोने का समय गंवाना, फसल की विफलता |
| जल्दी समाप्त होने वाली वर्षा | सितंबर के मध्य में ही मानसून की समाप्ति | खरीफ फसलें अधूरी रह जाती हैं |
| अत्यधिक केंद्रित वर्षा | कुछ दिनों में ही वार्षिक वर्षा का 50% हिस्सा | बाढ़ का खतरा, मिट्टी का कटाव, फसलें डूब जाती हैं |
| अंतराल वाली वर्षा | बीच में लंबे सूखे के अंतराल के साथ वर्षा | फसलों में सूखे का तनाव, उपज में कमी |
| असामान्य स्थानिक वितरण | एक ही जिले में कहीं अधिक, कहीं कम वर्षा | कुछ क्षेत्रों में बाढ़, कुछ में सूखा |
अनियमित वर्षा के कारण
- El Niño प्रभाव: प्रशांत महासागर में तापमान वृद्धि से मानसून कमजोर हो जाता है।
- La Niña प्रभाव: अत्यधिक वर्षा का कारण बनता है।
- Indian Ocean Dipole (IOD): हिंद महासागर के तापमान में परिवर्तन।
- जलवायु परिवर्तन: वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर्न में बदलाव।
- शहरीकरण और वनों की कटाई: स्थानीय जलवायु को प्रभावित करते हैं।
अनियमित वर्षा का कृषि पर प्रभाव
राजस्थान में वर्षा की अनियमितता — डेटा
उत्तर: राजस्थान में वर्षा पहले से ही कम है, लेकिन अनियमितता इसे और गंभीर बनाती है। मानसून की देरी से बीज बोने का समय गंवाता है, बीच में सूखे के अंतराल से फसलें सूख जाती हैं, और अचानक भारी वर्षा से बाढ़ का खतरा होता है। इससे किसान सही समय पर सिंचाई की योजना नहीं बना पाते और उपज में 20-40% की कमी आती है। साथ ही, अनियमित वर्षा से भूजल पुनर्भरण भी अनिश्चित हो जाता है।
जलवायु परिवर्तन के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह राजस्थान के समाज और अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित कर रहा है। मरुस्थलीकरण, सूखा और अनियमित वर्षा के कारण लाखों लोगों की आजीविका खतरे में है।
कृषि और खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव
पिछले 20 वर्षों में राजस्थान में खाद्यान्न उत्पादन में 15-20% की गिरावट आई है। सूखे के वर्षों में यह गिरावट 40-50% तक हो जाती है।
फसल विफल होने से किसानों की आय में 30-60% की कमी आती है। कर्ज का बोझ बढ़ता है और आत्महत्याओं की घटनाएं बढ़ रही हैं।
किसान पारंपरिक फसलें छोड़कर कम पानी वाली फसलें उगाने लगे हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो रही है।
कम उत्पादन से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे गरीब लोगों को भोजन मिलना मुश्किल हो जाता है।
पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- पशु संपत्ति में नुकसान: सूखे के समय चारे की कमी से पशुओं की मृत्यु दर 20-40% तक बढ़ जाती है।
- दुग्ध उत्पादन में कमी: कमजोर पशुओं से दूध उत्पादन में 30-50% की गिरावट आती है।
- पशुपालकों का पलायन: चारे की कमी से पशुपालक शहरों की ओर पलायन करते हैं।
- आजीविका का संकट: राजस्थान में 40% ग्रामीण आबादी पशुपालन पर निर्भर है, जलवायु परिवर्तन से उनकी आजीविका खतरे में है।
जल संकट और स्वास्थ्य समस्याएं
- पेयजल संकट: भूजल स्तर में गिरावट से लाखों लोगों को पेयजल नहीं मिल रहा है।
- जलजनित रोग: दूषित जल से हैजा, टाइफाइड, डायरिया जैसी बीमारियां फैल रही हैं।
- कुपोषण: खाद्य सुरक्षा में कमी से बच्चों में कुपोषण बढ़ रहा है।
- मानसिक स्वास्थ्य: सूखे और आर्थिक संकट से तनाव, अवसाद और आत्महत्याएं बढ़ रही हैं।
पलायन और सामाजिक समस्याएं
| पलायन का प्रकार | कारण | परिणाम |
|---|---|---|
| ग्रामीण से शहरी पलायन | कृषि में आय न होने से | शहरों में झुग्गी-झोपड़ियां, बेरोजगारी |
| अंतर-राज्यीय पलायन | राजस्थान में काम न मिलने से | गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली में प्रवास |
| महिलाओं का पलायन | घरेलू कारणों से | बाल विवाह, महिला सशक्तिकरण में बाधा |
| शिक्षा में बाधा | आर्थिक संकट से | बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ता है |
शमन और अनुकूलन रणनीति
जलवायु परिवर्तन की समस्याओं से निपटने के लिए राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार ने विभिन्न शमन (Mitigation) और अनुकूलन (Adaptation) रणनीतियां अपनाई हैं। ये रणनीतियां मरुस्थलीकरण को रोकने, सूखे से बचाव करने और जल संसाधनों को संरक्षित करने पर केंद्रित हैं।
शमन रणनीतियां (Mitigation Strategies)
अनुकूलन रणनीतियां (Adaptation Strategies)
- वर्षा जल संचयन: छतों, सड़कों और खेतों में वर्षा जल को संरक्षित करना।
- तालाब और कुंड: पारंपरिक जल संरक्षण संरचनाएं जैसे तालाब, कुंड, बावड़ी का निर्माण।
- भूजल पुनर्भरण: कृत्रिम तरीकों से भूजल स्तर को बढ़ाना।
- ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई: पानी की बचत करने वाली सिंचाई तकनीकें।
- सूखा सहन करने वाली किस्में: बाजरा, ग्वार, मूंग जैसी सूखा सहन करने वाली फसलें।
- मल्च खेती: मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए पुआल बिछाना।
- फसल बीमा: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों को सुरक्षा।
- कृषि विस्तार सेवाएं: किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकें सिखाना।
- चारागाह विकास: सूखा सहन करने वाली घास और पेड़ों का रोपण।
- पशु नस्ल सुधार: सूखा सहन करने वाली नस्लें पालना।
- चारा भंडारण: अच्छे समय में चारा संरक्षित करना।
- पशु बीमा: पशुओं के लिए बीमा योजनाएं।
- सामाजिक सुरक्षा: MGNREGA, पेंशन योजनाएं, राहत कार्य।
- कौशल विकास: वैकल्पिक आजीविका के लिए प्रशिक्षण।
- महिला सशक्तिकरण: महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना।
- शिक्षा: जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता।
राजस्थान की प्रमुख योजनाएं
अंतर्राष्ट्रीय प्रयास
- पेरिस समझौता (Paris Agreement, 2015): भारत ने 2070 तक कार्बन तटस्थता का लक्ष्य रखा है।
- UNCCD (संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण सम्मेलन): राजस्थान इसका हिस्सा है।
- राष्ट्रीय कार्य योजना: भारत की जलवायु परिवर्तन कार्य योजना 2023।
- जयपुर जिला: वर्षा जल संचयन से भूजल स्तर में 2 मीटर की वृद्धि।
- बाड़मेर जिला: वृक्षारोपण से 5,000 हेक्टेयर भूमि को मरुस्थलीकरण से बचाया गया।
- जोधपुर जिला: जैविक खेती से किसानों की आय में 30% की वृद्धि।
सही उत्तर: (D) सभी उपरोक्त — मरुस्थलीकरण एक बहु-कारणीय समस्या है।
(2) कृषि सूखा — मिट्टी में नमी की कमी
(3) जलजनित सूखा — भूजल स्तर में गिरावट
(4) सामाजिक-आर्थिक सूखा — आजीविका के साधनों का नुकसान
सही उत्तर: (A) मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना — यह योजना वर्षा जल संचयन पर केंद्रित है।
(1) वनीकरण — राजस्थान वन नीति 2010 के तहत वनों का विस्तार
(2) नवीकरणीय ऊर्जा — सौर ऊर्जा परियोजनाएं
(3) टिकाऊ कृषि — जैविक खेती, फसल विविधीकरण
(4) औद्योगिक उत्सर्जन नियंत्रण
अनुकूलन रणनीतियां:
(1) जल संरक्षण — वर्षा जल संचयन, तालाब निर्माण
(2) कृषि अनुकूलन — सूखा सहन करने वाली किस्में, ड्रिप सिंचाई
(3) पशुपालन अनुकूलन — चारागाह विकास, पशु नस्ल सुधार
(4) सामाजिक अनुकूलन — MGNREGA, कौशल विकास, महिला सशक्तिकरण


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