जलवायु परिवर्तन — मरुस्थलीकरण, सूखा आवृत्ति, जल संकट
जलवायु परिवर्तन का परिचय
राजस्थान में जलवायु परिवर्तन एक गंभीर पर्यावरणीय संकट है जो मरुस्थलीकरण, सूखा आवृत्ति और जल संकट को तीव्र कर रहा है। Rajasthan Govt Exam Preparation में यह विषय भूगोल और पर्यावरण प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जलवायु परिवर्तन की परिभाषा
जलवायु परिवर्तन से तात्पर्य दीर्घकालीन जलवायु प्रणाली में स्थायी परिवर्तन से है। राजस्थान में यह परिवर्तन निम्नलिखित रूपों में दिखाई दे रहा है:
- तापमान में वृद्धि: वार्षिक औसत तापमान में 1.5°C की वृद्धि (1901-2018)
- वर्षा में अनिश्चितता: मानसून की अनिश्चितता और वर्षा का असमान वितरण
- चरम मौसम घटनाएँ: अधिक तीव्र लू, बाढ़ और सूखा चक्र
- भूजल स्तर में गिरावट: जलभृत में 0.5-1 मीटर वार्षिक गिरावट
राजस्थान के लिए विशेष चिंताएँ
राजस्थान की अर्ध-शुष्क और शुष्क जलवायु इसे जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाती है। राज्य की 61% भूमि पहले से ही शुष्क है, जिससे कृषि, पशुपालन और जल आपूर्ति पर तीव्र प्रभाव पड़ता है।

मरुस्थलीकरण — कारण और प्रभाव
मरुस्थलीकरण (Desertification) शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता में गिरावट की प्रक्रिया है। राजस्थान में यह प्रक्रिया तीव्र गति से बढ़ रही है।
| मरुस्थलीकरण के कारण | राजस्थान में प्रभाव | प्रभावित क्षेत्र |
|---|---|---|
| अत्यधिक चराई | वनस्पति आवरण में कमी, मिट्टी का क्षरण | बाड़मेर, जैसलमेर, पश्चिमी क्षेत्र |
| वनों की कटाई | वृक्ष आवरण 9.6% (2021), मिट्टी की नमी में कमी | दक्षिण-पूर्वी जिले |
| अनुचित कृषि | मिट्टी की उर्वरता में कमी, मरुस्थलीकरण | पश्चिमी और मध्य क्षेत्र |
| जलवायु परिवर्तन | वर्षा में कमी, तापमान वृद्धि | संपूर्ण राजस्थान |
| भूजल दोहन | जलस्रोतों का सूखना, कृषि संकट | पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्र |
मरुस्थलीकरण के प्रकार
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा में कमी और तापमान वृद्धि से होने वाला मरुस्थलीकरण। राजस्थान में 1901-2018 के दौरान वर्षा में 30-40% की कमी देखी गई है।
- दक्षिण-पश्चिम मानसून की अनिश्चितता
- शीतकालीन वर्षा (पश्चिमी विक्षोभ) में कमी
- चरम मौसम घटनाओं की बारंबारता में वृद्धि
मानवीय गतिविधियों के कारण होने वाला मरुस्थलीकरण। राजस्थान में यह प्रकार अधिक गंभीर है।
- अत्यधिक चराई: पशुओं की संख्या में वृद्धि से वनस्पति का विनाश
- वनों की कटाई: ईंधन और निर्माण सामग्री के लिए अवैध कटाई
- अनुचित कृषि: फसल चक्र में परिवर्तन, रासायनिक खाद का अत्यधिक उपयोग
- खनन गतिविधियाँ: खनिज निष्कर्षण से भूमि का विनाश
मरुस्थलीकरण का भौगोलिक वितरण
राजस्थान में मरुस्थलीकरण की गंभीरता क्षेत्र के अनुसार भिन्न है:
विशेषता: 50% से अधिक भूमि प्रभावित
कारण: अत्यधिक चराई, कम वर्षा
विशेषता: 25-50% भूमि प्रभावित
कारण: अनुचित कृषि, वनों की कटाई
सूखा आवृत्ति और प्रकार
सूखा (Drought) एक दीर्घकालीन मौसमी घटना है जिसमें वर्षा में असामान्य कमी होती है। राजस्थान में सूखा एक आवर्ती संकट है जो जलवायु परिवर्तन के कारण अधिक बार आ रहा है।
सूखा के प्रकार
सूखा आवृत्ति में परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन के कारण राजस्थान में सूखे की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि हुई है:
सूखा-प्रवण जिले
राजस्थान के निम्नलिखित जिले सूखे के लिए अत्यंत संवेदनशील हैं:
- जैसलमेर: 15 cm वार्षिक वर्षा, 80% सूखाग्रस्त
- बाड़मेर: 20 cm वार्षिक वर्षा, 75% सूखाग्रस्त
- बीकानेर: 25 cm वार्षिक वर्षा, 70% सूखाग्रस्त
- नागौर: 30 cm वार्षिक वर्षा, 65% सूखाग्रस्त
- पाली: 35 cm वार्षिक वर्षा, 60% सूखाग्रस्त
जल संकट और संसाधन
राजस्थान में जल संकट जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक दोहन और अनुचित प्रबंधन का परिणाम है। राज्य भारत के सबसे जल-दुर्लभ क्षेत्रों में से एक है।
जल संसाधन की स्थिति
| जल संसाधन | कुल उपलब्ध | वर्तमान उपयोग | स्थिति |
|---|---|---|---|
| सतही जल | 32.2 BCM | 26.5 BCM | 82% दोहित |
| भूजल | 24.7 BCM | 28.5 BCM | 115% दोहित (Over-extraction) |
| कुल | 56.9 BCM | 55 BCM | 96.7% दोहित |
भूजल संकट
राजस्थान में भूजल का अत्यधिक दोहन सबसे गंभीर समस्या है। कृषि में 90% जल का उपयोग होता है, जिससे भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है।
- कृषि में अत्यधिक दोहन: ट्यूबवेल और बोरवेल से अनियंत्रित निष्कर्षण
- हरित क्रांति: उच्च जल-माँग वाली फसलें (कपास, गन्ना, मक्का)
- जनसंख्या वृद्धि: घरेलू और औद्योगिक जल की माँग में वृद्धि
- कम पुनर्भरण: कम वर्षा और अधिक वाष्पीकरण
- जलवायु परिवर्तन: वर्षा में कमी से भूजल पुनर्भरण में कमी
जल संकट के प्रभावित क्षेत्र

प्रभाव और चुनौतियाँ
जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण, सूखा और जल संकट का राजस्थान की अर्थव्यवस्था, समाज और पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।
कृषि पर प्रभाव
सूखे के वर्षों में गेहूँ, जौ, दलहन का उत्पादन 40-60% तक गिर जाता है। 2018-19 में राजस्थान में 50% फसल हानि दर्ज की गई।
कृषि आय में 50-70% की कमी से किसान कर्ज में डूब जाते हैं। आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
भूजल स्तर गिरने से ट्यूबवेल सूख जाते हैं। नहरों में जल की कमी से सिंचित क्षेत्र में कमी।
मरुस्थलीकरण से मिट्टी की उर्वरता में कमी। जैविक पदार्थ और पोषक तत्वों की कमी।
पशुपालन पर प्रभाव
राजस्थान में पशुपालन एक महत्वपूर्ण आजीविका है, लेकिन जलवायु परिवर्तन इसे गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है:
- चारे की कमी: सूखे के कारण चरागाहों में घास की कमी से पशुओं की मृत्यु दर बढ़ती है
- जल की कमी: पीने के पानी की कमी से पशु कुपोषित हो जाते हैं
- पशु रोग: जलवायु परिवर्तन से पशु रोगों की बारंबारता बढ़ रही है
- आय में कमी: दूध उत्पादन में 30-40% की कमी
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
- ग्रामीण पलायन: सूखे के कारण लाखों लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं
- बेरोजगारी: कृषि और पशुपालन में गिरावट से ग्रामीण बेरोजगारी बढ़ रही है
- महिलाओं पर दबाव: जल संकट से महिलाओं को लंबी दूरी तक पानी लाना पड़ता है
- स्वास्थ्य समस्याएँ: कुपोषण, जल-जनित रोग, तनाव-संबंधित बीमारियाँ
- शिक्षा में बाधा: बच्चों को पानी लाने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ता है
पर्यावरणीय प्रभाव
समाधान और नीति हस्तक्षेप
जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण और जल संकट से निपटने के लिए राजस्थान सरकार और भारत सरकार कई नीतियाँ और कार्यक्रम लागू कर रहे हैं।
राजस्थान की प्रमुख नीतियाँ
उद्देश्य: जल संसाधनों का सतत प्रबंधन और संरक्षण
- वर्षा जल संचयन: घरों और खेतों में टैंक बनाने के लिए सब्सिडी
- भूजल पुनर्भरण: चेक डैम, एनिकट, बोरवेल रीचार्जिंग
- जल-बचत सिंचाई: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को प्रोत्साहन
- नहर प्रबंधन: नहरों में रिसाव को कम करने के लिए लाइनिंग
उद्देश्य: मरुस्थलीकरण को रोकना और भूमि की उत्पादकता बहाल करना
- वनरोपण कार्यक्रम: 2 लाख हेक्टेयर में वृक्षारोपण (2020-2030)
- चरागाह विकास: घास के मैदानों का संरक्षण और विकास
- मिट्टी संरक्षण: कंटूर बंडिंग, टेरेसिंग, गली नियंत्रण
- सामुदायिक वनीकरण: ग्रामीणों को वृक्षारोपण में भाग लेने के लिए प्रोत्साहन
उद्देश्य: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना और अनुकूलन करना
- कृषि विविधीकरण: जल-माँग वाली फसलों को कम करना और सूखा-सहन फसलें लगाना
- पशु नस्ल सुधार: सूखा-सहन पशु नस्लें विकसित करना
- आजीविका विविधीकरण: कृषि के अलावा अन्य आजीविका विकल्प
- आपातकालीन प्रबंधन: सूखे के समय राहत और पुनर्वास कार्यक्रम
राष्ट्रीय कार्यक्रम
राजस्थान में: 2 लाख से अधिक जल संरक्षण कार्य पूरे किए गए
प्रभाव: 50 लाख से अधिक ग्रामीणों को रोजगार
राजस्थान में: 5 लाख हेक्टेयर में ड्रिप सिंचाई
प्रभाव: जल उपयोग में 40-50% की बचत
राजस्थान में: 1 लाख हेक्टेयर में वृक्षारोपण
प्रभाव: कार्बन सिंक और जलवायु शमन
राजस्थान में: 50 लाख घरों में नल जल कनेक्शन
प्रभाव: जल सुरक्षा में सुधार
सामुदायिक स्तर पर समाधान
- अलवर जिला: जल संचयन से भूजल स्तर 30 मीटर बढ़ा। 100+ गाँवों में सूखा समाप्त।
- बाड़मेर जिला: सामुदायिक वनीकरण से 50,000 हेक्टेयर में हरियाली। पशु चारा उत्पादन 200% बढ़ा।
- जैसलमेर जिला: वर्षा जल संचयन से 500 गाँवों में जल सुरक्षा। कृषि उत्पादन 150% बढ़ा।
- नागौर जिला: ड्रिप सिंचाई से 10,000 किसानों की आय दोगुनी। जल उपयोग 50% कम।
भविष्य की रणनीति
वन क्षेत्र में वृद्धि
वर्तमान 9.6% से 15% तक वन क्षेत्र बढ़ाना। 5 लाख हेक्टेयर में वृक्षारोपण।
जल सुरक्षा
सभी गाँवों में पेयजल उपलब्ध कराना। भूजल पुनर्भरण को दोगुना करना।
कृषि में बदलाव
सूखा-सहन फसलें लगाना। जैविक खेती को बढ़ावा देना।
नवीकरणीय ऊर्जा
सौर ऊर्जा से सिंचाई पंप चलाना। कार्बन उत्सर्जन 50% कम करना।
प्रश्न: राजस्थान में जलवायु परिवर्तन के कारण मरुस्थलीकरण और जल संकट कैसे बढ़ रहे हैं? समाधान सुझाएँ।
उत्तर की संरचना: (1) परिचय — जलवायु परिवर्तन की परिभाषा (2) कारण — तापमान वृद्धि, वर्षा में कमी, अत्यधिक दोहन (3) प्रभाव — कृषि संकट, जल संकट, पलायन (4) समाधान — जल संरक्षण, वनीकरण, कृषि विविधीकरण (5) निष्कर्ष — सतत विकास की आवश्यकता

📚 परीक्षा प्रश्न (PYQ)
व्याख्या: राजस्थान में औसत तापमान में 1.5°C की वृद्धि हुई है, जो वैश्विक औसत (1.1°C) से अधिक है। यह जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।
व्याख्या: 2001-2018 में राजस्थान के 42% वर्ष सूखाग्रस्त थे, जबकि 1901-1950 में यह प्रतिशत केवल 18% था। यह सूखे की आवृत्ति में 24 प्रतिशत बिंदु की वृद्धि दर्शाता है।
(1) अत्यधिक चराई — पशुओं की संख्या में वृद्धि से वनस्पति का विनाश
(2) वनों की कटाई — ईंधन और निर्माण सामग्री के लिए अवैध कटाई
(3) अनुचित कृषि — फसल चक्र में परिवर्तन, रासायनिक खाद का अत्यधिक उपयोग
(4) खनन गतिविधियाँ — खनिज निष्कर्षण से भूमि का विनाश
(1) कृषि में अत्यधिक दोहन — ट्यूबवेल और बोरवेल से अनियंत्रित निष्कर्षण
(2) हरित क्रांति — उच्च जल-माँग वाली फसलें (कपास, गन्ना)
(3) जनसंख्या वृद्धि — घरेलू और औद्योगिक जल की माँग में वृद्धि
(4) कम पुनर्भरण — कम वर्षा और अधिक वाष्पीकरण
(5) जलवायु परिवर्तन — वर्षा में कमी से भूजल पुनर्भरण में कमी
(1) फसल उत्पादन में कमी: सूखे के वर्षों में गेहूँ, जौ, दलहन का उत्पादन 40-60% तक गिर जाता है। 2018-19 में राजस्थान में 50% फसल हानि दर्ज की गई।
(2) किसानों की आय में कमी: कृषि आय में 50-70% की कमी से किसान कर्ज में डूब जाते हैं। आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
(3) सिंचाई संकट: भूजल स्तर गिरने से ट्यूबवेल सूख जाते हैं। नहरों में जल की कमी से सिंचित क्षेत्र में कमी।
(4) मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट: मरुस्थलीकरण से मिट्टी की उर्वरता में कमी। जैविक पदार्थ और पोषक तत्वों की कमी।
समाधान: जल संरक्षण, सूखा-सहन फसलें, ड्रिप सिंचाई, कृषि विविधीकरण।
(1) जल संरक्षण नीति: वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जल-बचत सिंचाई, नहर प्रबंधन।
(2) MGNREGA: ग्रामीण रोजगार सृजन और जल संरक्षण कार्य। 2 लाख से अधिक जल संरक्षण कार्य पूरे किए गए।
(3) प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): 5 लाख हेक्टेयर में ड्रिप सिंचाई। जल उपयोग में 40-50% की बचत।
(4) जल जीवन मिशन: 50 लाख घरों में नल जल कनेक्शन। सभी को पेयजल उपलब्ध कराना।
(5) सामुदायिक स्तर पर समाधान: अलवर में भूजल स्तर 30 मीटर बढ़ा। बाड़मेर में 50,000 हेक्टेयर में हरियाली।

