जनजातीय जनसंख्या — भील, मीणा, गरासिया, सहरिया, डामोर
परिचय — राजस्थान की जनजातीय जनसंख्या
राजस्थान की जनजातीय जनसंख्या भारत के सबसे महत्वपूर्ण जनजातीय समूहों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, राजस्थान में 13.5% अनुसूचित जनजाति (ST) जनसंख्या है, जो लगभग 92 लाख व्यक्ति हैं। यह राजस्थान Govt Exam Preparation के लिए भूगोल खण्ड में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
राजस्थान में पाई जाने वाली प्रमुख जनजातियाँ हैं — भील, मीणा, गरासिया, सहरिया, डामोर, कोल, सांसी, कथोड़ी, भिलाला, लूहार, नायक आदि। इनमें से भील सबसे बड़ी जनजाति है, जिसकी जनसंख्या लगभग 15 लाख है। ये जनजातियाँ राजस्थान के विभिन्न भागों में निवास करती हैं और अपनी अलग-अलग सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विशेषताओं के लिए जानी जाती हैं।

भील जनजाति — सबसे बड़ी जनजाति
भील राजस्थान की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण जनजाति है। इनकी जनसंख्या लगभग 15 लाख है, जो राजस्थान की कुल जनजातीय जनसंख्या का लगभग 16% है। भील शब्द संस्कृत के ‘बिल’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘धनुष’। ये धनुष-बाण चलाने में कुशल माने जाते हैं।
भील जनजाति की विशेषताएँ
- निवास क्षेत्र: दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान — उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़
- भाषा: भीली भाषा (इंडो-आर्यन परिवार), हिंदी भी बोलते हैं
- व्यवसाय: कृषि, वनोपज संग्रहण, शिकार, दिहाड़ी मजदूरी
- सामाजिक संरचना: गोत्र-आधारित, पितृसत्तात्मक समाज
- धर्म: प्रकृति पूजा, पूर्वज पूजा, हिंदू धर्म के तत्व
- त्योहार: भगोरिया (फसल कटाई का त्योहार), होली, दिवाली
भील जनजाति
राजस्थान की सबसे बड़ी STमीणा, गरासिया, सहरिया, डामोर
राजस्थान की अन्य महत्वपूर्ण जनजातियाँ हैं — मीणा, गरासिया, सहरिया और डामोर। ये सभी अपनी अलग-अलग सांस्कृतिक और सामाजिक विशेषताओं के लिए जानी जाती हैं।
मीणा राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है, जिसकी जनसंख्या लगभग 13 लाख है।
- निवास क्षेत्र: जयपुर, दौसा, अलवर, भीलवाड़ा, टोंक, सवाई माधोपुर
- भाषा: मीणा भाषा (हिंदी से मिली-जुली)
- व्यवसाय: कृषि, पशुपालन, शिकार (पारंपरिक रूप से)
- सामाजिक संरचना: गोत्र-आधारित, विवाह नियम कठोर
- त्योहार: होली, दिवाली, नवरात्रि
- विशेषता: मीणा जनजाति को ऐतिहासिक रूप से ‘अपराधी जनजाति’ के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिसे 1952 में हटाया गया
गरासिया राजस्थान की एक महत्वपूर्ण जनजाति है, जिसकी जनसंख्या लगभग 4-5 लाख है।
- निवास क्षेत्र: सिरोही, पाली, जालोर जिलों के पहाड़ी क्षेत्र (अरावली पर्वत)
- भाषा: गरासिया भाषा (राजस्थानी से मिली-जुली)
- व्यवसाय: कृषि, पशुपालन, वनोपज संग्रहण
- सामाजिक संरचना: पितृसत्तात्मक, बहुविवाह प्रथा
- त्योहार: गैर (नृत्य), होली, दिवाली
- विशेषता: गरासिया महिलाएँ पारंपरिक नृत्य ‘गैर’ के लिए प्रसिद्ध हैं
सहरिया राजस्थान की एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण जनजाति है, जिसकी जनसंख्या लगभग 2-3 लाख है।
- निवास क्षेत्र: करौली, धौलपुर, सवाई माधोपुर जिलों के वन क्षेत्र
- भाषा: सहरिया भाषा (हिंदी से मिली-जुली)
- व्यवसाय: शिकार, वनोपज संग्रहण, कृषि दिहाड़ी
- सामाजिक संरचना: सरल, कम पदानुक्रमित
- धर्म: प्रकृति पूजा, आत्मा पूजा
- विशेषता: सहरिया जनजाति सबसे पिछड़ी जनजातियों में से एक मानी जाती है
डामोर राजस्थान की एक छोटी जनजाति है, जिसकी जनसंख्या लगभग 50,000 से कम है।
- निवास क्षेत्र: उदयपुर, डूंगरपुर जिलों के दक्षिणी भाग
- भाषा: डामोर भाषा (भीली से मिली-जुली)
- व्यवसाय: कृषि, पशुपालन, दिहाड़ी मजदूरी
- सामाजिक संरचना: गोत्र-आधारित, पितृसत्तात्मक
- धर्म: हिंदू धर्म के साथ स्थानीय देवताओं की पूजा
- विशेषता: डामोर जनजाति भील जनजाति से निकटता रखती है
| जनजाति | जनसंख्या (लगभग) | मुख्य निवास क्षेत्र | प्रमुख व्यवसाय |
|---|---|---|---|
| भील | 15 लाख | उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा | कृषि, वनोपज |
| मीणा | 13 लाख | जयपुर, दौसा, अलवर | कृषि, पशुपालन |
| गरासिया | 4-5 लाख | सिरोही, पाली, जालोर | कृषि, पशुपालन |
| सहरिया | 2-3 लाख | करौली, धौलपुर | शिकार, वनोपज |
| डामोर | 50,000 से कम | उदयपुर, डूंगरपुर | कृषि, दिहाड़ी |

भौगोलिक वितरण और निवास क्षेत्र
राजस्थान की जनजातीय जनसंख्या का भौगोलिक वितरण असमान है। ये मुख्यतः दक्षिणी, दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी राजस्थान में केंद्रित हैं। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, जयपुर और दौसा जिलों में जनजातीय जनसंख्या का सर्वाधिक प्रतिशत है।
क्षेत्रीय वितरण
सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ
राजस्थान की जनजातियों की अपनी विशिष्ट सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ हैं। ये समूह अपनी परंपराओं, भाषाओं, धर्मों और जीवन शैली के लिए जाने जाते हैं।
सामाजिक विशेषताएँ
अधिकांश जनजातियाँ गोत्र-आधारित समाज में विभाजित हैं। विवाह नियम कठोर होते हैं और अंतर-गोत्र विवाह प्रतिबंधित होते हैं।
अधिकांश जनजातियों में पितृसत्तात्मक संरचना पाई जाती है। पुरुष परिवार का मुखिया होता है और संपत्ति का मालिक होता है।
अधिकांश जनजातियों में बहुविवाह प्रथा प्रचलित है। विवाह समारोह सरल होते हैं और दहेज की परंपरा नहीं है।
प्रत्येक जनजाति की अपनी भाषा, नृत्य, संगीत और त्योहार हैं। ये सांस्कृतिक तत्व उनकी पहचान का अभिन्न अंग हैं।
आर्थिक विशेषताएँ
- कृषि: अधिकांश जनजातियाँ कृषि पर निर्भर हैं। वे मुख्यतः अनाज, दालें और सब्जियाँ उगाते हैं।
- पशुपालन: गायें, भेड़ें, बकरियाँ और सूअर पालन आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
- वनोपज संग्रहण: महुआ, तेंदू पत्ते, शहद, मोम, औषधीय पौधे आदि का संग्रहण आय का स्रोत है।
- शिकार: परंपरागत रूप से शिकार आय का एक महत्वपूर्ण साधन था, लेकिन अब कानूनी प्रतिबंध हैं।
- दिहाड़ी मजदूरी: कृषि के बाहर के मौसम में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं।
सांस्कृतिक विशेषताएँ



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